कल्याणी जी ने भावुक होकर कहा, “यह कंगन मेरी माँ ने मुझे दिए थे। आज तक इन्हें किसी रस्म में पहनने की हिम्मत नहीं जुटा पाई, पर आज मैं इन्हें अपनी बेटी को सौंप रही हूँ। तुम मेरी सिर्फ बहू नहीं, इस घर की रौनक हो। माना कि शादी के वक्त मैं अपनी झिझक के कारण तुम्हें वो रस्में नहीं दे पाई, लेकिन आज का यह दिन फीका नहीं जाएगा। जैसा तुम चाहोगी, वैसा ही होगा। बताओ, पूजा के लिए और क्या-क्या सामान चाहिए? मैं अभी कुणाल को बाजार भेजकर सारा सामान मँगवाती हूँ।”
जयपुर की धूप जब गुलाबी शहर की हवेलियों पर सुनहरी चादर बिछाती, तो नयना के चेहरे पर वही पुरानी चंचलता दमक उठती थी। वह बचपन से ही रंगों, चहल-पहल और उत्सवों की दुनिया में पली-बढ़ी थी। घर में कोई छोटा सा भी मौका हो—चाहे किसी का जन्मदिन हो या कोई पारंपरिक व्रत—नयना का उत्साह सातवें आसमान पर रहता। हाथों में रची मेहंदी की महक, खनकती हरी-लाल चूड़ियाँ और आँगन में गूँजते मंगलगीत उसकी ज़िंदगी का अहम हिस्सा थे। शादी तय होने के बाद उसके दिल में नए घर को लेकर न जाने कितने ख्वाब सजने लगे थे। वह अक्सर अपनी सहेलियों से कहती कि ससुराल में जाकर वह हर त्योहार ऐसे मनाएगी कि पूरा मोहल्ला देखता रह जाए। उसे लगता था कि नया परिवार उसकी इस उमंग को और ज्यादा प्यार से गले लगाएगा।
विवाह का दिन आया और बड़ी धूमधाम से विदाई के बाद नयना अपने जीवनसाथी कुणाल के साथ इंदौर पहुँची। इंदौर का वह घर काफी बड़ा, खुला और साफ-सुथरा था, मगर वहाँ कदम रखते ही नयना को एक अजीब सी ख़ामोशी का अहसास हुआ। घर की दीवारें सजी-धजी नहीं थीं, और न ही घर में वैसी रौनक थी जैसी नई दुल्हन के स्वागत में अमूमन देखने को मिलती है। शादी की अगली सुबह जब नयना सोकर उठी, तो उसने सोचा कि अब कंगन खोलने की रस्म होगी, अँगूठी ढूँढने का खेल खेला जाएगा, और ननद-देवर के साथ हँसी-मज़ाक का दौर चलेगा। लेकिन वहाँ ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।
ससुर हरिशंकर जी सुबह-सुबह अपनी चाय की चुस्की लेते हुए अखबार में मग्न थे। वे एक बेहद कड़े, अनुशासित और व्यावहारिक स्वभाव के इंसान थे। उनके अनुसार जीवन का मतलब केवल जिम्मेदारियाँ निभाना, समय पर काम करना और पैसे बचाना था। किसी भी प्रकार की रस्म, रीति-रिवाज या उत्सव मनाना उनके लिए समय और धन की खुली बर्बादी के सिवा कुछ नहीं था। घर की मुखिया यानी नयना की सास कल्याणी जी भी वर्षों से इसी ढर्रे पर ढल चुकी थीं। उनके चेहरे पर एक सधी हुई गंभीरता थी, मानो उन्होंने अपनी सारी इच्छाओं को कब का मन के किसी कोने में दफन कर दिया हो।
जब दोपहर तक भी कोई रस्म शुरू नहीं हुई, तो नयना ने हैरान होकर अपने पति कुणाल से पूछा, “सुनिए, क्या हमारे यहाँ शादी के बाद की रस्में नहीं होंगी? माँ जी से पूछें क्या, वो अँगूठी ढूँढने वाली थाल कब सजेगी?”
कुणाल ने अपनी टाई की गाँठ ढीली करते हुए बेहद बेपरवाही से कहा, “अरे नयना, तुम भी किन बचकानी बातों में उलझ रही हो। हमारे घर में ये सब ड्रामेबाजी नहीं होती। पिताजी इन फालतू की रस्मों और दिखावे को बिल्कुल पसंद नहीं करते। उनका मानना है कि इन सब से केवल फिजूलखर्ची और वक्त का नुकसान होता है। असली बात यह है कि हम दोनों एक-दूसरे का सम्मान करें और शांति से रहें। वैसे भी, हमें यहाँ कौन सा बरसों बिताना है! मेरी कंपनी मुझे अगले महीने ही हैदराबाद ट्रांसफर कर रही है, हम दोनों वहीं अपना आशियाना बनाएंगे। इसलिए इन पुरानी बातों को छोड़ो और आराम करो।”
कुणाल की बातों ने नयना के कोमल मन को भीतर तक ठेस पहुँचाई। उसने भारी मन से कहा, “कुणाल, यह केवल दिखावा या फिजूलखर्ची नहीं होती। ये रस्में दिलों को जोड़ती हैं, नए रिश्ते में मिठास घोलती हैं। हर लड़की अपने बचपन से ऐसे पलों के सपने देखती है। मेरे सारे अरमान तो यहाँ आकर एक-एक करके बिखर रहे हैं।” कुणाल ने उसकी बात को हल्के में टाल दिया और अपने लैपटॉप में व्यस्त हो गया। नयना आँसू पीकर रह गई और चुपचाप रसोई की तरफ बढ़ गई।
शादी के कुछ ही हफ्तों बाद करवा चौथ का पावन पर्व नजदीक आने लगा। नयना के मायके में करवा चौथ किसी बड़े उत्सव से कम नहीं होता था। उसकी माँ और भाभी कई दिन पहले से ही साड़ियों की खरीदारी, आभूषणों की चमक और पूजा की तैयारियों में जुट जाती थीं। भोर की पहली किरण फूटने से पहले मिलने वाली सरगी, सास का लाड़-प्यार और शाम को चाँद के इंतजार में छतों पर सुहागिनों का जमावड़ा—यह सब नयना की यादों में जीवंत था। नयना ने मन ही मन सोचा कि भले ही शादी के बाद की रस्में छूट गईं, लेकिन अपने पति की लंबी उम्र के इस व्रत को वह पूरे विधि-विधान और उल्लास से मनाएगी।
करवा चौथ की भोर में, जब चारों तरफ तारों की हल्की छाँव थी, नयना सुबह चार बजे उठकर नहा-धोकर तैयार हो गई। उसने हल्के गुलाबी रंग का खूबसूरत सूट पहना और मंद मुस्कान के साथ रसोई में गई, जहाँ कल्याणी जी पानी गर्म कर रही थीं। नयना ने बड़े आदर से उनके चरण छुए और मासूमियत से पूछा, “माँ जी, मेरी सरगी की थाली कहाँ है? सुबह का समय हो गया है, मुझे क्या खाना है?”
कल्याणी जी ने आश्चर्य से नयना को सिर से पाँव तक देखा। उनकी आँखों में एक अजीब सा संकोच और बेबसी थी। उन्होंने धीमी आवाज में कहा, “बहू, हमारे इस घर में करवा चौथ नहीं मनाया जाता। यहाँ कोई निर्जला व्रत नहीं रखता। सच कहूँ तो मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी में तुम्हारे ससुर जी के लिए कभी करवा चौथ का उपवास नहीं किया। यहाँ इन सब बातों का कोई चलन नहीं है।”
नयना के पैरों तले से मानो ज़मीन खिसक गई। उसने अविश्वास से पूछा, “क्या? माँ जी, आप यह क्या कह रही हैं? करवा चौथ तो हर सुहागिन का सबसे बड़ा मान होता है। इसमें तो अपने जीवनसाथी की लंबी उम्र और मंगल की कामना की जाती है। इस बहाने पूरा परिवार साथ बैठता है, कहानियाँ सुनी जाती हैं, स्वादिष्ट पकवान बनते हैं और रात को जब चाँद निकलता है, तो अर्घ्य देकर एक-दूसरे के हाथ से पानी पीते हैं। इसमें दिखावा कहाँ है? मेरे मायके में तो माँ को दादी सास खुद हाथों से फेनियाँ और मेवे खिलाती थीं। क्या इस घर में सुहाग के इस पावन पर्व की कोई जगह नहीं है?”
कल्याणी जी ने नजरें झुका लीं और बोलीं, “बहू, जब इस घर की नींव ही नियमों और सादगी पर रखी गई हो, तो हम अपनी मर्जी कैसे चलाएं? तुम्हारे ससुर जी को यह सब ढकोसला लगता है। इसलिए मैंने भी कभी ज़िद नहीं की। अब यही इस घर का दस्तूर है।”
“यानी यहाँ न कोई पूजा होगी, न कोई सरगी मिलेगी और न ही कोई सुहाग का शृंगार होगा?” नयना का गला भर आया। वह और कुछ न कह सकी और तेज कदमों से अपने कमरे में लौट आई। बंद कमरे में उसने अपने चेहरे को हथेलियों में छुपा लिया और फूट-फूट कर रो पड़ी। उसके मन में कई विचार कौंधने लगे। क्या शादी सिर्फ एक समझौता है जहाँ अपनी खुशियों और भावनाओं का गला घोंटना पड़ता है? क्या परंपराओं को सहेजने की चाह रखना कोई अपराध है?
कुछ देर रोने के बाद नयना ने अपनी आँखें पोंछीं। उसके भीतर का स्वाभिमान और आस्था जाग उठी। उसने शीशे के सामने खड़े होकर खुद से कहा, “नहीं, मैं उदास होकर अपने इस पहले करवा चौथ को मुरझाने नहीं दूँगी। चाहे कोई मेरा साथ दे या न दे, मैं अपने पति के लिए यह व्रत पूरे मन और निष्ठा से रखूँगी। मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं करनी, लेकिन अपनी आस्था और अपने सपनों को मैं बिना लड़े दम नहीं तोड़ने दूँगी। अगर माँ जी ने कभी व्रत नहीं रखा, तो यह उनकी मजबूरी रही होगी, पर मैं अपने सुहाग के लिए भूखी-प्यासी रहकर भी मुस्कराऊँगी।”
उधर रसोई में खड़ी कल्याणी जी का मन बुरी तरह अशांत हो चुका था। नयना की आँखों में छलके आँसू और उसके टूटे हुए बोल कल्याणी जी के कानों में बार-बार गूँज रहे थे। वे सोचने लगीं कि जब पैंतीस साल पहले वे दुल्हन बनकर इस घर में आई थीं, तब उनके मन में भी तो यही सब उमंगें थीं। वे भी तो अपनी कलाई पर लाल चूड़ियाँ और माथे पर चमकता टीका सजाकर अपने पति का दीदार करना चाहती थीं। लेकिन पति के कड़े मिजाज और डर के कारण उन्होंने चुपचाप अपनी हर ख्वाहिश की बलि दे दी थी। वक्त के साथ वे इतनी सख्त हो गईं कि भूल ही गईं कि खुशियाँ कैसे मनाई जाती हैं।
“क्या मेरी खामोशी और समझौते की सजा इस मासूम बच्ची को मिलनी चाहिए?” कल्याणी जी ने अपने आप से सवाल किया। “क्या एक सास अपनी बहू की पीड़ा नहीं समझेगी? अगर मैं अपनी ज़िंदगी में खुशियों का रंग नहीं भर पाई, तो क्या मुझे अपनी बहू के जीवन से भी सारे रंग छीनने का हक है? नहीं, अब ज़माना बदल चुका है। सास को सिर्फ पुरानी लकीरें पीटने वाली दीवार नहीं, बल्कि बेटी की तरह थामने वाली छाँव बनना होगा।”
कल्याणी जी ने एक गहरा फैसला लिया। उनके भीतर की दबी हुई ममता और एक औरत का आत्मसम्मान जाग उठा। वे सीधे अपनी पुरानी संदूक की तरफ बढ़ीं। उन्होंने काँपते हाथों से संदूक का ताला खोला और सबसे नीचे दबे मखमली डिब्बे को बाहर निकाला। उसमें उनकी माँ द्वारा दिए गए सोने के दो बेहद नक्काशीदार कंगन रखे थे, जिन्हें उन्होंने सालों से नहीं पहना था। साथ ही उन्होंने अपनी एक लाल बनारसी साड़ी निकाली जो बरसों से सहेज कर रखी थी।
वे सीधे नयना के कमरे में पहुँचीं। नयना बिस्तर पर बैठी शून्य में ताक रही थी। कल्याणी जी ने बड़े स्नेह से नयना के सिर पर हाथ रखा। नयना ने चौंक कर ऊपर देखा।
कल्याणी जी की आँखों में नमी थी, लेकिन चेहरे पर एक अनोखा संकल्प था। उन्होंने नयना के हाथ थामे और बोलीं, “उठो मेरी बच्ची, ऐसे उदास बैठना मेरी बहू को शोभा नहीं देता। अगर यह तुम्हारा पहला करवा चौथ है, तो आज से तुम्हारी इस सास का भी यह पहला ही करवा चौथ होगा। आज मैं भी तुम्हारे साथ निर्जला व्रत रखूँगी।”
नयना हैरान रह गई, “माँ जी! आप… आप यह क्या कह रही हैं? बाबूजी…”
कल्याणी जी ने नयना के होंठों पर उँगली रख दी और दृढ़ता से कहा, “बाबूजी को मैं संभाल लूँगी। किसी रिश्ते में अनुशासन जरूरी होता है बहू, लेकिन उस अनुशासन की कीमत अपनों की मुस्कान नहीं हो सकती। मैंने अपनी ज़िंदगी में जो खोया, वो मैं अपनी बेटी जैसी बहू को नहीं खोने दूँगी। आज के दिन सास अपनी बहू को सरगी देती है ना? देखो, मैं तुम्हारे लिए मीठे मेवे, फल और यह शुद्ध दूध की खीर बनाकर लाई हूँ। पहले तुम यह खाओ।”
कल्याणी जी ने आगे बढ़कर अपने आँचल से वह मखमली डिब्बा निकाला और नयना की दोनों कलाइयों में वे सोने के कंगन पहना दिए। कंगन की खनक ने जैसे उस कमरे की सारी उदासी को एक पल में धो दिया।
कल्याणी जी ने भावुक होकर कहा, “यह कंगन मेरी माँ ने मुझे दिए थे। आज तक इन्हें किसी रस्म में पहनने की हिम्मत नहीं जुटा पाई, पर आज मैं इन्हें अपनी बेटी को सौंप रही हूँ। तुम मेरी सिर्फ बहू नहीं, इस घर की रौनक हो। माना कि शादी के वक्त मैं अपनी झिझक के कारण तुम्हें वो रस्में नहीं दे पाई, लेकिन आज का यह दिन फीका नहीं जाएगा। जैसा तुम चाहोगी, वैसा ही होगा। बताओ, पूजा के लिए और क्या-क्या सामान चाहिए? मैं अभी कुणाल को बाजार भेजकर सारा सामान मँगवाती हूँ।”
सास के मुँह से ये शब्द सुनकर नयना की आँखें छलक पड़ीं। उसके दिल का सारा बोझ पल भर में बह गया। उसने आगे बढ़कर कल्याणी जी को कसकर गले लगा लिया। उस आलिंगन में केवल एक सास और बहू नहीं थीं, बल्कि दो पीढ़ियों की औरतें थीं जो एक-दूसरे के दर्द को समझकर खुशियों का नया इतिहास लिख रही थीं।
दोपहर होते-होते घर का नज़ारा पूरी तरह बदल चुका था। कुणाल बाजार से रोली, अक्षत, मिट्टी के करवे, सुहाग की पिटारी और ताजे फूल लेकर आया। वह भी अपनी माँ का यह नया रूप देखकर हैरान भी था और भीतर ही भीतर बेहद खुश भी। हरिशंकर जी ने जब घर में पूजा की तैयारियाँ और दोनों महिलाओं को सजे-धजे देखा, तो पहले तो उनके माथे पर शिकन उभरी। वे कुछ कहने ही वाले थे कि कल्याणी जी ने शांत लेकिन अडिग आवाज में कहा, “सुनिए, पैंतीस साल तक मैंने आपकी हर बात सिर आँखों पर रखी है। आपके हर नियम को अपना धर्म माना। लेकिन आज मेरी बहू के सपनों का दिन है। आज कोई टोक-टोका नहीं होगा। आज इस घर में पूजा भी होगी और खुशियाँ भी मनेंगी।”
हरिशंकर जी अपनी पत्नी के इस शांत आत्मविश्वास के आगे निरुत्तर हो गए। उन्होंने पहली बार महसूस किया कि उनके बनाए कड़े नियमों ने उनके अपनों को कितनी छोटी-छोटी खुशियों से महरूम रखा था। वे बिना कुछ कहे अपने कमरे में चले गए, पर उनके चेहरे पर कोई नाराजगी नहीं थी।
शाम ढलते ही पूरा घर अगरबत्तियों और चमेली के फूलों की खुशबू से महक उठा। आँगन में सुंदर रंगोली सजी थी। नयना ने लाल जोड़े में सजकर सोलह शृंगार किया था, तो कल्याणी जी भी लाल बनारसी साड़ी में साक्षात वात्सल्य की मूरत लग रही थीं। दोनों ने मिलकर करवा चौथ की पावन कथा सुनी, करवे बदले और मंगलकामनाएँ कीं।
रात को जब आसमान में बादलों की ओट से पूर्णमासी का चाँद चमका, तो नयना और कल्याणी जी दोनों छलनी और थाली लेकर छत पर पहुँचीं। कुणाल और हरिशंकर जी भी चुपचाप उनके पीछे छत पर आ खड़े हुए थे। पहले कल्याणी जी ने छलनी से चाँद को देखा और फिर हरिशंकर जी का चेहरा देखा। हरिशंकर जी की आँखों में बरसों बाद अपनी पत्नी के प्रति एक अनोखा आदर और प्रेम छलक आया। उन्होंने खुद अपने हाथों से कल्याणी जी को जल पिलाकर उनका व्रत खुलवाया।
इसके बाद नयना ने चाँद की आरती उतारी और छलनी से अपने पति कुणाल को देखा। कुणाल ने मुस्कुराते हुए नयना को पानी पिलाया और उसके कान में धीरे से कहा, “नयना, तुमने आज सिर्फ व्रत नहीं रखा, हमारे इस बेजान घर में ज़िंदगी भर की खुशियों की रूह फूँक दी है।”
नयना ने झुककर कल्याणी जी और हरिशंकर जी के पैर छुए। हरिशंकर जी ने नयना के सिर पर हाथ रखते हुए कहा, “जीती रहो बहू। आज तुमने मुझे सिखा दिया कि घर नियमों से नहीं, अपनों के चेहरों पर खिलने वाली मुस्कुराहटों से बनता है।”
उस रात इंदौर के उस बड़े से मकान का कोना-कोना खुशियों, हँसी और रिश्तों की मिठास से रोशन हो गया था। नयना के बिखरे अरमान अब एक मजबूत और प्यारे रिश्ते की डोर में बँध चुके थे, जहाँ एक सास ने सचमुच माँ बनकर अपनी बहू के सपनों को नया आकाश दे दिया था।
अगर आपको यह कहानी अच्छी लगी हो, तो अपने विचार कमेंट करके ज़रूर बताएं कि क्या हर सास को कल्याणी जी की तरह अपनी सोच बदलकर बहू के सपनों का सम्मान करना चाहिए? आपकी राय हमारे लिए बेहद अनमोल है।
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लेखिका : रमा शुक्ला