अंजलि ने मेरी हथेलियों को अपने हाथों में थाम लिया। उसकी आंखें कृतज्ञता से भीग गईं, “आंटी, यह सब आपकी वजह से हुआ है। अगर उस दिन आपने मुझे रोने के लिए छोड़ने के बजाय यह रास्ता न दिखाया होता, मेरा हाथ न थामा होता, तो शायद आज मैं मायके के किसी कोने में लाचारी की जिंदगी जी रही होती या अपने ससुराल को बिखरते हुए देख रही होती। आपने मुझे सिर्फ रास्ता नहीं दिखाया, मुझे जीने का मकसद दिया है।”
भोपाल के अरेरा कॉलोनी के पास एक शांत और मध्यमवर्गीय मोहल्ले में स्थित ‘सद्भावना अपार्टमेंट’ के फ्लैट नंबर 204 की चौखट जब भी खुलती, पूरे गलियारे में एक जानी-पहचानी भीनी-भीनी सौंधी खुशबू तैर जाती। वह खुशबू होती थी कभी खिले-खिले मसालों वाले पुलाव की, तो कभी घी में सिकती गर्मागर्म कुरकुरी पूरियों और मखमली छोले की। यह जादू था अंजलि के हाथों का। अंजलि, जो हमारे पड़ोस में रहने वाले सेवानिवृत्त क्लर्क हरिशंकर जी और उनकी धर्मपत्नी उमा देवी की इकलौती बहू थी। अंजलि कोई बहुत बड़ी डिग्री वाली आधुनिक महिला नहीं थी, बस बारहवीं तक ही पढ़ पाई थी, मगर संस्कारों और व्यवहार में वह ऐसी थी कि जो एक बार उससे मिल लेता, उसका मुरीद हो जाता। चेहरे पर सदा रहने वाली सौम्य मुस्कान, बड़ों के प्रति आदर और बात करने का ऐसा सलीका जो आज के दौर में बहुत कम देखने को मिलता है।
हरिशंकर जी का परिवार एक साधारण, मर्यादित और सुखी परिवार था। हरिशंकर जी को मामूली पेंशन मिलती थी, जिससे घर की दवाइयों का खर्च भी बमुश्किल निकलता था। पूरे परिवार की रीढ़ था उनका बेटा वरुण। वरुण शहर की एक निजी ऑटोमोबाइल एजेंसी में सुपरवाइजर का काम करता था। सुबह नौ बजे पुरानी मोटरसाइकिल स्टार्ट करके निकलना और रात को आठ बजे थके कदमों से घर लौटना उसकी दिनचर्या थी। तनख्वाह कोई बहुत भारी-भरकम नहीं थी, बस पच्चीस-तीस हजार रुपये हाथ आते थे, मगर अंजलि का गृहस्थी चलाने का हुनर ऐसा था कि इतने में ही वह पूरे घर को फूलों की तरह महकाए रखती थी। उनका छह साल का बेटा, आरव, पास ही के एक स्कूल में पहली कक्षा में पढ़ता था। दादा-दादी की आंखों का तारा और अंजलि के जीने की वजह।
मैं, यानी मालती, उसी अपार्टमेंट की तीसरी मंजिल पर अपने पति के साथ रहती थी। मेरे अपने बच्चे बाहर नौकरी कर रहे थे, इसलिए अक्सर मेरा मन अंजलि के घर ही जाकर लगता था। अंजलि मुझे बिल्कुल अपनी मां जैसा मानती थी और मैं भी उसे पड़ोसन कम, अपनी बेटी ज्यादा समझती थी। जब भी मैं उसके घर जाती, वह कभी खाली हाथ नहीं बैठने देती। कभी उसके हाथ का बना गुजराती ढोकला, तो कभी राजस्थानी दाल-बाटी। वह रसोई में जब जाती, तो लगता मानो अन्नपूर्णा स्वयं उसके हाथों में उतर आई हों।
मगर जिंदगी हमेशा एक जैसी नहीं चलती। ऊपर वाला जब इम्तिहान लेता है, तो चारों तरफ से रास्ते बंद कर देता है।
एक दिन दोपहर के वक्त मैं किसी काम से नीचे उतरी, तो 204 नंबर के दरवाजे के पास से अंजलि की सिसकियों और हल्की खीझ भरी आवाज सुनाई दी। अमूमन उस घर में शांति रहती थी, इसलिए मेरे कदम खुद-ब-खुद ठिठक गए। दरवाजा आधा खुला था। मैंने भीतर झांककर देखा, तो अंजलि वरुण के सामने हाथ जोड़े खड़ी थी और वरुण सोफे पर सिर पकड़े बैठा था।
“आप मेरी बात क्यों नहीं समझते? पिछले एक महीने से आपको पेट के ऊपरी हिस्से में यह दर्द उठ रहा है। आप खाना भी नहीं खा पा रहे हैं, बस चाय पीकर काम पर भाग जाते हैं। आज ही चलिए मेरे साथ डॉक्टर के पास।” अंजलि की आंखों में आंसू थे।
वरुण ने झुंझलाते हुए कहा, “अंजलि, तुम बेवजह बात का बतंगड़ बना रही हो। वह सिर्फ गैस का दर्द है। एजेंसी में इस महीने का टारगेट पूरा करना है, अगर छुट्टी ली तो बॉस तनख्वाह काट लेगा। आरव की स्कूल फीस भी भरनी है और बाबूजी की बीपी की दवा भी लानी है। फिजूल में डॉक्टर की फीस और जांचों में हजारों रुपये क्यों फूंकना?”
मैंने अंदर कदम रखा और कड़े स्वर में कहा, “वरुण बेटा, शरीर से बढ़कर कोई नौकरी या पैसा नहीं होता। अगर तबीयत ही नहीं रहेगी, तो जिम्मेदारी कैसे निभाओगे?”
मुझे देखकर दोनों संभल गए। अंजलि ने अपनी साड़ी के पल्लू से आंसू पोंछे और तुरंत उठकर मेरे पैर छुए, “आइए मालती आंटी, बैठिए। मैं आपके लिए शिकंजी लाती हूं।”
“शिकंजी छोड़ अंजलि, पहले इस लड़के को समझा। वरुण, तू आज शाम को ही मेरे साथ डॉक्टर माथुर के क्लिनिक चलेगा। कोई बहाना नहीं चलेगा।” मेरे जोर देने पर वरुण ने बेमन से सिर हिला दिया।
शाम को हम वरुण को लेकर अस्पताल गए। डॉक्टर ने प्राथमिक जांच के बाद कुछ सोनोग्राफी और ब्लड टेस्ट लिखे। तीन दिन बाद जब रिपोर्ट्स आईं, तो डॉक्टर का चेहरा देखकर हमारे पैरों तले जमीन खिसक गई। वरुण के लिवर में एक बड़ा ट्यूमर था, जो अत्यंत आक्रामक रूप ले चुका था। मेडिकल भाषा में उसे एडवांस्ड स्टेज हेपेटोसेलुलर कार्सिनोमा कहा गया। डॉक्टर ने साफ कह दिया कि बीमारी बहुत आगे बढ़ चुकी है और अब कोई भी सर्जरी या कीमोथेरेपी उसकी जान नहीं बचा सकती, बस दर्द को कम करने के लिए दवाएं दी जा सकती हैं। उनके पास ज्यादा से ज्यादा दो या तीन महीने का वक्त था।
वह रिपोर्ट नहीं, बल्कि उस हंसते-खेलते परिवार पर गिरा वज्रपात था। घर में मातम पसर गया। हरिशंकर जी जैसे एक ही झटके में दस साल और बूढ़े हो गए, उन्होंने कमरे का कोना पकड़ लिया। उमा देवी रोते-रोते बदहवास हो जातीं। और अंजलि… अंजलि तो जैसे पत्थर की मूरत बन गई थी। वह दिन-रात वरुण की सेवा में लगी रहती, उसके तलवे सहलाती, उसे चम्मच से दलिया खिलाती और जब वरुण की आंख लग जाती, तो बालकनी के कोने में जाकर बेआवाज रोती ताकि किसी को उसकी चीख न सुनाई दे।
नियति ने कोई रहम नहीं दिखाया। ठीक ढाई महीने बाद, एक मनहूस भोर में वरुण ने अंजलि के हाथों में दम तोड़ दिया।
वरुण के जाने के बाद घर का सन्नाटा चीखने लगा था। तेरहवीं के संस्कार बीतते ही रिश्तेदार एक-एक करके अपने घरों को लौट गए। दुनिया की यही रीत है—दुख बांटने सब आते हैं, मगर दुख ढोने के लिए इंसान को अकेला ही छोड़ जाते हैं।
तेरहवीं के अगले दिन अंजलि का बड़ा भाई, मयंक, इंदौर से आया था। उसने अपनी गाड़ी का दरवाजा खोलते हुए अंजलि से कहा, “चल अंजलि, अपना और आरव का सामान बांध। अब इस वीराने में तेरे लिए क्या बचा है? मैं तुझे यहां घुट-घुट कर मरने के लिए नहीं छोड़ सकता। मेरे घर में एक रोटी तेरे और आरव के लिए हमेशा रहेगी।”
अंजलि ने अपने आंसुओं से भीगे चेहरे को उठाया। उसने एक नजर अपने बूढ़े सास-ससुर पर डाली, जो एक कोने में बुत बने बैठे थे। उनकी आंखों में बेबसी और अंजलि के चले जाने का गहरा खौफ साफ दिखाई दे रहा था। उनका जवान बेटा चला गया था, और अब अगर बहू और पोता भी चले जाते, तो वे जीते जी मर जाते।
अंजलि ने बहुत ही शांत लेकिन दृढ़ आवाज में अपने भाई से कहा, “नहीं भैया, मैं कहीं नहीं जाऊंगी। यह मेरा घर है। जब वरुण थे, तब तो मैं यहां की बहू थी, और अब जब वह नहीं हैं, तो क्या मेरा फर्ज खत्म हो गया? बाबूजी और मां जी को इस उम्र में बेसहारा छोड़कर मैं अपने मायके में जाकर कैसे चैन की सांस ले सकती हूं? आरव अपने दादा-दादी के साये में ही बड़ा होगा। आप मेरी चिंता मत कीजिए, मैं कोई न कोई रास्ता निकाल लूंगी।”
मयंक ने समझाने की बहुत कोशिश की, गुस्से में ताने भी दिए कि ‘कब तक इन बूढ़ों का बोझ उठाएगी’, लेकिन अंजलि अपने फैसले पर अडिग रही। आखिरकार मयंक झुंझलाकर अकेला ही लौट गया।
उस शाम जब सब शांत हुआ, तो मैं अंजलि के पास जाकर बैठ गई। आरव अपनी दादी की गोद में सो चुका था। मैंने अंजलि के सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा, “बेटा, हिम्मत तो तूने बहुत बड़ी दिखाई है, लेकिन जिंदगी सिर्फ जज्बातों से नहीं कटती। घर की दहलीज लांघते ही दुनिया पैसे मांगती है। राशन, आरव की पढ़ाई, बाबूजी की दवाइयां… कुछ सोचा है आगे का? वरुण की कंपनी से कुछ मिला?”
अंजलि ने एक ठंडी सांस भरी और अपनी अलमारी से एक लिफाफा निकालकर मेरे सामने रख दिया, “आंटी, वरुण की कंपनी ने उनका बचा हुआ वेतन और कुछ मदद मिलाकर कुल पैंतीस हजार रुपये दिए हैं। और जब भैया जा रहे थे, तो मेरी हथेली पर पंद्रह हजार रुपये जबरदस्ती रख गए थे। बस यही पचास हजार रुपये की कुल जमा-पूंजी है हमारे पास। इसके बाद आगे अंधकार है।”
मैंने कुछ देर सोचा। पचास हजार रुपये से शहर में चार महीने भी नहीं काटे जा सकते थे। अंजलि पढ़ी-लिखी इतनी नहीं थी कि उसे कोई बैंक या कॉर्पोरेट ऑफिस में नौकरी मिल जाती। सिलाई-कढ़ाई से इतना नहीं कमाया जा सकता था कि चार पेट भर सकें। तभी मेरे दिमाग में एक विचार कौंधा।
“अंजलि, एक बात बता। तेरे हाथ में जो स्वाद है, वह किसी बड़े शेफ के पास भी नहीं है। तेरे बनाए छोले-कुल्चे, दम आलू और राजमा-चावल जो एक बार खा ले, वह उंगलियां चाटता रह जाए। क्या तू इस हुनर को अपनी ताकत बना सकती है?”
अंजलि ने हैरान होकर मेरी तरफ देखा, “मतलब आंटी? मैं कुछ समझी नहीं।”
“मतलब यह कि रोने और किस्मत को कोसने से बेहतर है कि हम अपनी किस्मत खुद लिखें। हमारे मोहल्ले से आधा किलोमीटर दूर जो नया आईटी पार्क और कमर्शियल कॉम्प्लेक्स बना है, वहां दोपहर में सैकड़ों कर्मचारी घर के खाने के लिए तरसते हैं। वे कैंटीन का बासी और तेल से लथपथ खाना खाकर ऊब चुके हैं। अगर तू सुबह शुद्ध, साफ-सुथरा और स्वादिष्ट खाना बनाकर वहां एक छोटा सा ‘होममेड लंच स्टॉल’ लगाए, तो कैसा रहेगा?”
अंजलि के चेहरे पर एक झिझक उभरी, “आंटी… मैं? सड़क पर स्टॉल लगाऊंगी? लोग क्या कहेंगे? और फिर बाबूजी और मां जी… वे क्या सोचेंगे कि खानदान की बहू सड़क पर खाना बेच रही है?”
मैंने उसका कंधा थपथपाया, “मेहनत की रोटी कमाने में कोई शर्म नहीं होती अंजलि। शर्म तो तब आनी चाहिए जब हम लाचार होकर दूसरों के आगे हाथ फैलाएं। दुनिया का काम है बातें बनाना, जब घर में चूल्हा नहीं जलता तो कोई पड़ोसी आटा देने नहीं आता। तू सास-ससुर की फिक्र मत कर, उनसे मैं बात करूंगी।”
रात को मैंने हरिशंकर जी और उमा देवी को बैठाकर बहुत प्यार और सलीके से समझाया। शुरुआत में हरिशंकर जी की आंखें भर आईं, उनका पुरुष स्वाभिमान आहत हुआ कि उनके जीते-जी बहू को बाहर निकलना पड़ेगा। लेकिन जब मैंने उन्हें हकीकत का आईना दिखाया कि यह अंजलि की मजबूरी नहीं, बल्कि परिवार को बिखरने से बचाने का उसका धर्म है, तो उन्होंने भारी मन से अंजलि के सिर पर हाथ रख दिया, “बहू, तू हमारी बेटी है। अगर तूने यह बीड़ा उठाया है, तो मेरा आशीर्वाद तेरे साथ है।”
अगले ही दिन से काम शुरू हो गया। मेरे पति ने नगर निगम के एक परिचित से बात करके आईटी पार्क के सामने वाले सर्विस रोड के एक साफ-सुथरे कोने पर वेंडिंग की इजाजत दिलवा दी। हमने पचास हजार में से पच्चीस हजार रुपये खर्च करके एक मजबूत, साफ-सुथरा स्टील का पोर्टेबल फूड कार्ट बनवाया, जिस पर एक सुंदर बैनर लगाया गया—’मां अन्नपूर्णा का स्वाद – शुद्ध घर जैसा भोजन’। बड़े-बड़े इंसुलेटेड कैसरोल, स्टील के डिब्बे, बायोडिग्रेडेबल प्लेटें और चम्मच खरीदे गए।
शुरुआत का पहला दिन किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था। अंजलि सुबह चार बजे उठ गई थी। उसने नहा-धोकर पूजा की और फिर रसोई में जुट गई। उसने पचास लोगों के हिसाब से बासमती जीरा राइस, पंजाबी छोले, बूंदी का रायता और गर्मागर्म पूरियां तैयार कीं। हरिशंकर जी ने खुद आगे बढ़कर पानी के जार और मसाले पैक करने में मदद की।
सुबह ठीक ग्यारह बजे मेरे पति और मोहल्ले के एक लड़के की मदद से वह कार्ट आईटी पार्क के सामने लग गया। अंजलि ने साफ एप्रन पहना था और सिर पर सूती दुपट्टा अच्छे से बांधा हुआ था। मैं भी उसके साथ खड़ी थी ताकि उसका हौसला न टूटे। शुरुआत के एक घंटे तक कोई नहीं आया। लोग दूर से देखते और आगे निकल जाते। अंजलि का चेहरा उतरने लगा था। उसकी आंखों में डर तैरने लगा कि अगर यह खाना नहीं बिका तो सारा पैसा डूब जाएगा।
तभी करीब साढ़े बारह बजे एक युवा लड़का, जो शायद किसी सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करता था, पास आया और झिझकते हुए पूछा, “दीदी, क्या है खाने में?”
अंजलि की आवाज पहले तो थोड़ी कांपी, फिर उसने संभलकर कहा, “भैया, घर के बने जीरा राइस, छोले और रायता है। सिर्फ साठ रुपये की थाली है।”
उस लड़के ने कहा, “ठीक है, एक प्लेट दे दीजिए।”
लड़के ने जैसे ही पहला निवाला मुंह में रखा, उसके चेहरे के भाव बदल गए। उसने अंजलि की तरफ देखा और बोला, “अरे वाह दीदी! बिल्कुल मेरी मां के हाथ जैसा स्वाद है। मसालों का कोई भारीपन नहीं और एकदम ताजा!” उसने तुरंत फोन निकालकर अपने ऑफिस के ग्रुप में मैसेज डाला। पंद्रह मिनट के भीतर उस लड़के के साथ उसके सात-आठ सहकर्मी भी वहां पहुंच गए।
उस दिन दोपहर दो बजे तक अंजलि का सारा खाना खत्म हो चुका था। अंतिम बर्तन तक साफ हो गया था। जब अंजलि ने अपनी गुल्लक में उस दिन की कमाई—करीब तीन हजार रुपये—देखी, तो उसकी आंखों से टप-टप आंसू गिर पड़े। वह आंसू बेबसी के नहीं थे, वे उस आत्मविश्वास के थे जो एक आत्मनिर्भर स्त्री के भीतर पहली बार जागता है।
शुरुआती एक-दो हफ्ते शरीर के लिए बहुत थका देने वाले रहे। सुबह चार बजे से उठना, भारी-भारी बर्तनों को संभालना, प्याज-टमाटर काटना और फिर दोपहर की धूप में खड़े होकर मुस्कुराते हुए ग्राहकों को खाना परोसना। कई बार अंजलि के पैरों में सूजन आ जाती, हाथों में गर्म तेल के छींटे पड़ जाते, लेकिन उसके चेहरे की मुस्कान कभी फीकी नहीं पड़ी।
उसका खाना केवल खाना नहीं था, उसमें अपनत्व का भाव था। वह हमेशा ध्यान रखती कि अगर कोई ग्राहक ज्यादा भूखा है तो बिना अतिरिक्त पैसे लिए उसे थोड़ा चावल या सब्जी ज्यादा दे देती। कॉलेज के छात्र और दफ्तर के युवा उसे ‘अंजलि दीदी’ कहने लगे थे।
धीरे-धीरे अंजलि के खाने की शोहरत पूरे इलाके में फैलने लगी। आईटी पार्क के कर्मचारियों ने कैंटीन जाना लगभग बंद ही कर दिया था। लोग ग्यारह बजते ही अंजलि के कार्ट के बाहर कतार लगाकर खड़े हो जाते। महीने के अंत तक हालात यह हो गए कि अंजलि को खाना कम पड़ने लगा। उसने अपने मेन्यू में विविधता लाई—सोमवार को कढ़ी-चावल, मंगलवार को दाल मखनी, बुधवार को राजमा, और साथ में घर की बनी हरी धनिए की तीखी चटनी और सलाद।
चार महीने बीतते-बीतते अंजलि की शुद्ध मासिक आय चालीस से पचास हजार रुपये तक पहुंच गई। उसने घर के हालात पूरी तरह बदल दिए। हरिशंकर जी की दवाइयां अब कभी खत्म नहीं होती थीं, आरव की स्कूल फीस समय पर जमा होती थी और घर में राशन की कोई तंगी नहीं थी। हरिशंकर जी अब गर्व से शाम को जब पार्क में टहलने जाते, तो अपने दोस्तों से कहते, “मेरी बहू नहीं, वह मेरा बेटा है। उसने हमारे बुढ़ापे को बेसहारा नहीं होने दिया।”
छह महीने बाद, एक दिन दोपहर को जब भीड़ थोड़ी कम हुई, तो मैं अंजलि के कार्ट पर पहुंची। धूप खिली हुई थी और अंजलि पसीने से भीगे माथे के साथ बहुत फुर्ती से डिब्बे समेट रही थी।
मैंने पीछे से जाकर आवाज लगाई, “अरे बिटिया, जरा अपनी इस बुढ़िया मां के लिए भी एक प्लेट कढ़ी-चावल लगाना, बड़ी भूख लगी है!”
अंजलि ने चौंककर पीछे देखा। उसके चेहरे पर वही चिर-परिचित, ममतामयी मुस्कान बिखर गई। उसने तुरंत अपने हाथ एप्रन से पोंछे और लपककर मेरे पैर छू लिए।
“आंटी आप! अरे आप धूप में क्यों आईं, मुझे फोन कर देतीं तो मैं घर पर ही आपके लिए थाली भेज देती। बैठिए ना, मैं अभी आपके लिए स्पेशल कढ़ी निकालती हूं।” उसने बड़े लाड़ से प्लेट सजाकर मुझे थमाई।
कढ़ी का एक चम्मच मुंह में रखते ही मैंने कहा, “लाजवाब! सच में अंजलि, तेरे हाथों में साक्षात मां अन्नपूर्णा का वास है। देख, आज तेरी इस मेहनत का ही फल है कि तूने पूरे परिवार को संभाल लिया।”
अंजलि ने मेरी हथेलियों को अपने हाथों में थाम लिया। उसकी आंखें कृतज्ञता से भीग गईं, “आंटी, यह सब आपकी वजह से हुआ है। अगर उस दिन आपने मुझे रोने के लिए छोड़ने के बजाय यह रास्ता न दिखाया होता, मेरा हाथ न थामा होता, तो शायद आज मैं मायके के किसी कोने में लाचारी की जिंदगी जी रही होती या अपने ससुराल को बिखरते हुए देख रही होती। आपने मुझे सिर्फ रास्ता नहीं दिखाया, मुझे जीने का मकसद दिया है।”
मैंने उसके सिर पर हाथ रखते हुए प्यार से डांटा, “पगली, रास्ता चाहे कोई भी दिखाए, लेकिन उस तपती सड़क पर चलने का हौसला तो तेरा ही था। सुबह चार बजे उठकर पसीना तूने बहाया है। समाज की परवाह किए बिना अपनी मर्यादा और स्वाभिमान को तूने संभाला है। मुझे गर्व है तुझ पर।”
आज अंजलि उसी आईटी पार्क के पास अपनी खुद की एक छोटी सी भोजनालय की दुकान खोल चुकी है, जहां उसने दो जरूरतमंद महिलाओं को भी काम पर रखा है। उसकी आंखों में अब पति के खोने का गम तो है, जो शायद कभी पूरी तरह नहीं मिटेगा, लेकिन उस गम पर उसके स्वाभिमान, साहस और कर्तव्यनिष्ठा की चमक कहीं ज्यादा भारी है। उसने यह साबित कर दिया कि जब हौसले बुलंद हों, तो चूल्हे की आग से भी जिंदगी की सबसे रोशन इबारत लिखी जा सकती है।
अंजलि की इस यात्रा को देखकर एक सवाल मन में बार-बार उठता है—क्या हमारे समाज में आज भी हर उस बेसहारा बहू को ऐसा संबल और ऐसा हौसला मिल पाता है? अगर एक परिवार अपनी बहू को बेटी मानकर उसका साथ दे, तो कोई भी औरत कभी लाचार नहीं हो सकती। इस बारे में आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है कि समाज की संकीर्ण सोच से ऊपर उठकर हर महिला को अपने पैरों पर खड़े होने का ऐसा ही अधिकार मिलना चाहिए? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो लाइक, कमेंट और शेयर करें। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें, धन्यवाद।