हल्की गुलाबी धूप ड्रॉइंग रूम की खिड़कियों से छनकर कांच की मेज पर बिछी सफेद चादर को रोशन कर रही थी। रविवार की सुबह का माहौल हमेशा की तरह खुशनुमा और सुकून भरा था। रेडियो पर धीमे सुरों में पुराना हिंदी गीत बज रहा था और रसोई से गर्म-गर्म कचौड़ियों और अदरक वाली चाय की सोंधी खुशबू पूरे घर में तैर रही थी। प्रोफेसर देवेन्द्र अवस्थी अखबार के पन्ने पलटते हुए चाय की चुस्कियों का आनंद ले रहे थे, वहीं उनकी धर्मपत्नी सरिता जी सभी के लिए नाश्ता परोसने में व्यस्त थीं। घर के जुड़वा बच्चे, आरव और अनन्या, जो अब चंद दिनों में अपनी जिंदगी के अठारहवें पड़ाव पर कदम रखने वाले थे, मेज के इर्द-गिर्द बैठकर हंसी-मजाक कर रहे थे।
माहौल को हल्का और पिता को खुशमिज़ाज देख आरव ने अपनी बात आगे बढ़ाने का यही सही मौका समझा। उसने अपनी प्लेट में कचौड़ी रखते हुए थोड़ा बनावटी संकोच दिखाया, फिर मुस्कुराते हुए बोला, “पापा, आप तो जानते ही हैं कि अगले शनिवार को हम दोनों पूरे अठारह साल के हो जाएंगे। यानी कानूनी तौर पर एडल्ट! स्कूल खत्म होकर कॉलेज का यह पहला साल है और मेरे सभी दोस्तों ने अपने अठारहवें जन्मदिन पर शहर के सबसे बड़े लाउंज में शानदार पार्टियां दी थीं। मैंने भी अपने दोस्तों से वादा किया है कि इस बार मेरी तरफ से एक धमाकेदार डीजे पार्टी होगी। बस मुझे पच्चीस हजार रुपये का बजट चाहिए।”
आरव की बात सुनकर देवेन्द्र जी ने चश्मे के ऊपर से उसे देखा और अभी कुछ कहने ही वाले थे कि ममतामयी माँ सरिता जी बीच में ही बोल पड़ीं, “अरे देवेन्द्र जी, बच्चा बड़ा हो रहा है। जिंदगी में अठारहवां जन्मदिन तो एक ही बार आता है ना! दोस्तों के बीच बच्चे का मान रहना चाहिए। आप मना मत कीजिए, दे दीजिए पैसे।”
आरव की आँखों में चमक आ गई। वह मन ही मन अपनी पार्टी की योजनाएं बनाने लगा कि कौन से कपड़े पहनेगा और कौन से गानों पर डांस होगा। तभी देवेन्द्र जी की नजर अपनी बेटी अनन्या पर पड़ी, जो चुपचाप अपनी चाय का कप थामे खिड़की से बाहर लगे गुलमोहर के पेड़ को निहार रही थी। उसके चेहरे पर एक गहरी शांति और होठों पर एक नन्हीं मुस्कान थी।
देवेन्द्र जी ने प्यार से पूछा, “मेरी गुड़िया इतनी खामोश क्यों है? आरव ने तो अपनी फरमाइश रख दी, पर तुम तो उसकी जुड़वा बहन हो, तुम्हारा भी तो अठारहवां जन्मदिन उसी दिन है। बताओ बेटा, तुम्हें अपनी सहेलियों के साथ किस महंगे होटल में जाना है या क्या खास तोहफा चाहिए? क्या तुमने भी कोई लिस्ट बनाई है?”
अनन्या ने धीमे से अपनी नजरें उठाईं। उसके चेहरे पर एक अजीब सा उत्साह था, लेकिन साथ ही एक हिचकिचाहट भी। उसने दोनों हाथों से अपने पिता की हथेली को छुआ और संकोच भरे लहजे में कहा, “पापा… अगर आप बुरा न मानें तो क्या मैं अपने जन्मदिन के लिए कुछ अलग मांग सकती हूँ? मुझे किसी होटल में पार्टी नहीं करनी और न ही कोई महंगा तोहफा चाहिए।”
“हाँ-हाँ बेटी, बिल्कुल कहो। जो मांगना है बेझिझक मांगो,” देवेन्द्र जी ने उसका हौसला बढ़ाते हुए कहा।
अनन्या ने एक गहरी सांस ली और आत्मविश्वास से भरकर बोली, “पापा, जब कोई इंसान अठारह साल का होता है, तो समाज उसे एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में देखना शुरू करता है। उसे वोट देने का अधिकार मिलता है, अपने फैसले खुद लेने की आजादी मिलती है। मैं चाहती हूँ कि अपने बालिग होने के इस पहले दिन को मैं सिर्फ दिखावे या चार घंटे के शोर-शराबे में न गंवाऊं। पिछले महीने जब मैं अपनी सहेली के साथ सरकारी अस्पताल गई थी, तो मैंने देखा था कि थैलेसीमिया और कैंसर से जूझ रहे छोटे-छोटे बच्चों के लिए खून की कितनी कमी है। कई परिवारों को तो एक यूनिट रक्त के लिए रात-रात भर भटकना पड़ता है। पापा, अगर आप और माँ अनुमति दें, तो जो पैसे आप मेरे जन्मदिन की पार्टी पर खर्च करने वाले थे, उनसे हम अपनी सोसायटी के कम्युनिटी हॉल में एक रक्तदान और प्राथमिक स्वास्थ्य जांच शिविर लगा लें? मैंने अपनी कॉलेज की रेड क्रॉस विंग और कुछ डॉक्टरों से बात की है, वे सब मदद के लिए तैयार हैं।”
कमरे में पल भर के लिए गहरा सन्नाटा छा गया। आरव के हाथ का कांटा प्लेट में गिरते-गिरते बचा। सरिता जी हैरान होकर अपनी बेटी का चेहरा देखने लगीं। किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि आज की पीढ़ी की एक सत्रह-अठारह साल की लड़की अपने जन्मदिन पर पार्टी और मौज-मस्ती छोड़कर ऐसा कोई विचार अपने मन में ला सकती है।
देवेन्द्र जी अवाक होकर अपनी बेटी को देखते रहे। उनकी आँखों की कोरों में गर्व और स्नेह की एक पतली सी नमी तैर गई। उन्होंने अपनी कुर्सी से उठकर दोनों हाथों से अनन्या का सिर थाम लिया और उसके माथे को चूमते हुए भावुक स्वर में कहा, “बेटी, आज तुमने मुझे अहसास करा दिया कि उम्र केवल सालों की गिनती से नहीं बढ़ती, बल्कि सोच की गहराई से बढ़ती है। तुम उम्र से अठारह की हो रही हो, लेकिन तुम्हारी सोच ने तुम्हें आज ही एक परिपक्व और महान इंसान बना दिया है। मुझे तुम पर नाज़ है मेरी बच्ची! तुम्हारा यह प्रस्ताव मुझे किसी भी बड़ी पार्टी से हजार गुना ज्यादा खुशी दे गया।”
आरव अपनी जगह पर बैठा थोड़ा असहज महसूस कर रहा था। उसे लगा कि उसकी बहन ने इतनी बड़ी और नेक बात कहकर अनजाने में ही सही, उसकी ख्वाहिश को बहुत छोटा और खोखला साबित कर दिया है। उसने चिढ़ते हुए कहा, “अनन्या, समाज सेवा करने के लिए पूरी जिंदगी पड़ी है। जन्मदिन तो एन्जॉय करने के लिए होता है ना! सब लोग अपने फ्रेंड्स के साथ चिल करते हैं। तू भी अजीब बोरिंग काम करने जा रही है।”
अनन्या ने मुस्कुराते हुए अपने भाई के कंधे पर हाथ रखा और बेहद प्यार से समझाया, “आरव, खुशी की परिभाषा सबके लिए अलग होती है। किसी महंगे कैफे में दो घंटे नाच-गाकर बिल चुका देने में जो मजा है, वह शायद अगले दिन खत्म हो जाएगा। लेकिन अगर हमारे एक छोटे से प्रयास से किसी मरते हुए इंसान की सांसें बच जाएं, किसी माँ की गोद सूनी होने से बच जाए, तो वह सुकून जिंदगी भर हमारे दिल में जिंदा रहेगा। सोच आरव, जब कोई अजनबी आकर कहेगा कि तुम्हारे लगाए कैंप के खून से उसके पिता या बच्चे की जान बच गई, क्या उस दुआ से बड़ा कोई बर्थडे गिफ्ट हो सकता है?”
बहन की इस सहज और मर्मस्पर्शी दलील ने आरव के भीतर एक हलचल पैदा कर दी। उसने अपनी माँ की ओर देखा, जिनकी आँखों में भी अब अनन्या के लिए अथाह प्यार और सम्मान झलक रहा था। आरव उस दिन पूरे वक्त अपनी बहन के शब्दों के बारे में सोचता रहा। कॉलेज जाते हुए, दोस्तों से मिलते हुए, उसे बार-बार अस्पताल के वे अनजान चेहरे याद आ रहे थे जिनका जिक्र अनन्या ने किया था।
अगले कुछ दिनों तक घर का माहौल पूरी तरह बदल गया। अनन्या ने अपने कॉलेज के दोस्तों, प्रोफेसर्स और स्थानीय ब्लड बैंक की टीम से संपर्क साधना शुरू किया। उसने खुद पंपलेट डिजाइन किए और अपनी सोसायटी के हर घर में जाकर लोगों को रक्तदान का महत्व समझाया। शुरुआत में कुछ पड़ोसियों ने झिझक दिखाई, लेकिन अनन्या के चेहरे का भोलापन और उसकी निस्वार्थ लगन देखकर लोग धीरे-धीरे जुड़ने लगे।
यह सब देखकर आरव का दिल भी पिघलने लगा। उसे अपनी पार्टी की मांग अब बेहद बचकानी और स्वार्थी लगने लगी थी। शनिवार से दो दिन पहले की शाम, आरव चुपचाप अपने पिता के स्टडी रूम में गया। देवेन्द्र जी किसी किताब के अध्ययन में मग्न थे। आरव ने धीरे से अपनी जेब से हाथ निकाला और मेज पर एक लिफाफा रख दिया।
“यह क्या है बेटा?” देवेन्द्र जी ने पूछा।
आरव ने अपनी आँखें नीची करते हुए कहा, “पापा, आपने जो मुझे पार्टी के लिए एडवांस पैसे दिए थे, यह वही हैं। मुझे कोई अलग से पार्टी नहीं करनी। मैं अपनी बहन से उम्र में भले ही कुछ मिनट बड़ा हूँ, लेकिन इंसानियत में वह मुझसे बहुत आगे निकल गई है। मैं भी अपनी बहन के इस सफर में उसका हमकदम बनना चाहता हूँ। इस बार का जन्मदिन हम दोनों मिलकर उसी रक्तदान शिविर में मनाएंगे।”
देवेन्द्र जी ने अपनी नम आँखों से उठकर अपने बेटे को गले से लगा लिया। एक पिता के लिए इससे बड़ा दिन और क्या हो सकता था जब उसकी संतानें दिखावे की चकाचौंध से निकलकर संवेदना और सेवा का रास्ता चुन लें।
शनिवार की सुबह आई। सोसायटी का कम्युनिटी हॉल सफेद और नीले गुब्बारों से सजा था, लेकिन यह सजावट किसी नाच-गाने के लिए नहीं, बल्कि एक जीवनदायी उत्सव के लिए थी। सुबह नौ बजे डॉक्टरों और नर्सों की एक कुशल टीम अपनी पूरी मेडिकल वैन और उपकरणों के साथ पहुंच चुकी थी। हॉल के मुख्य द्वार पर एक सुंदर सा बोर्ड लगा था, जिस पर लिखा था: ‘जीवन का उपहार – आरव और अनन्या के 18वें जन्मदिन पर एक विनम्र प्रयास’।
दिन चढ़ने के साथ-साथ लोग आने लगे। सबसे पहले रक्तदान करने वालों में खुद देवेन्द्र जी और आरव के कॉलेज के दोस्त थे। आरव ने सबसे आगे बढ़कर अपनी आस्तीन ऊपर चढ़ाई और पहली बार रक्तदान किया। रक्तदान करने के बाद जब नर्स ने उसे जूस का पैकेट दिया और मुस्कुराकर कहा, “थैंक यू बेटा, तुम्हारे इस रक्त से किसी की जिंदगी बचेगी,” तो आरव के रोंगटे खड़े हो गए। उसके दिल के भीतर एक ऐसा गहरा और अनूठा संतोष भर गया, जिसे उसने आज तक किसी पार्टी या दोस्तों की वाहवाही में महसूस नहीं किया था।
अनन्या हॉल में हर आने वाले का हाथ जोड़कर स्वागत कर रही थी। उसने बुजुर्गों के लिए बीपी और शुगर की मुफ्त जांच का भी प्रबंध करवाया था। कॉलोनी के अंकल, आंटियां और युवा वर्ग बड़ी संख्या में आगे आए। दोपहर तक हॉल में एक उत्सव जैसा माहौल बन चुका था, जहाँ हर चेहरा एक नेक काम का हिस्सा बनकर चमक रहा था। शाम चार बजे तक कुल 112 यूनिट रक्त एकत्र हो चुका था और लगभग डेढ़ सौ लोगों का स्वास्थ्य परीक्षण संपन्न हुआ था।
कैंप के समापन पर ब्लड बैंक के मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने माइक संभाला और सभी के सामने कहा, “आज के दौर में जहां अठारह साल के युवा पब, डिस्को और महंगे गैजेट्स के पीछे भागते हैं, वहां इन दोनों बच्चों ने जो मिसाल कायम की है, वह पूरे शहर के लिए प्रेरणा है। यह 112 यूनिट रक्त अगले कुछ दिनों में कई जिंदगियों का चिराग बुझने से बचाएगा। इस परिवार के संस्कार वंदनीय हैं।”
हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। तभी आरव और उसके दोस्तों ने मंच पर एक साधारण सा केक रखा। मोमबत्तियां जलाई गईं। आरव और अनन्या ने मिलकर केक काटा। पहला टुकड़ा आरव ने अपनी बहन को खिलाया और उसके कान में धीरे से कहा, “थैंक यू दीदी, आज तुमने मुझे सिखा दिया कि जिंदगी अपने लिए जीने में नहीं, बल्कि दूसरों के काम आने में है। यह मेरी जिंदगी का सबसे खूबसूरत जन्मदिन है।”
दूर खड़े देवेन्द्र जी और सरिता जी की आँखों से खुशी के आंसू बह रहे थे। उन्होंने अपनी संतानों को सिर्फ बड़ा नहीं किया था, बल्कि उनमें वे जीवन मूल्य रोपे थे जो आने वाली पीढ़ियों को भी रोशनी दिखाते रहेंगे।
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