मालती देवी के कांपते होंठों पर कई दिनों बाद एक हल्की, सुकून भरी मुस्कान खिल उठी। उन्होंने बड़ी मुश्किल से अपना हाथ उठाकर अंकित के सिर पर रख दिया। उनके स्पर्श में वही पुरानी ममता, वही आशीष लौट आया था। मालती ने कमजोर आवाज में कहा, “जीते रहो मेरे बच्चे… तुमने आज अपने दादाजी की आत्मा को शांत कर दिया। जब तक परिवार की जड़ें हरी रहेंगी, तब तक कोई तूफान इस घर को हिला नहीं पाएगा।”
पुरानी हवेली के खुले आंगन में सुबह की पहली किरण जब लाल ईंटों की फर्श को चूमती, तो सबसे पहले वहां मालती देवी की धीमी पदचाप गूंज उठती। उम्र के पचहत्तरवें पड़ाव पर पहुंची मालती देवी का शरीर भले ही झुक गया था, घुटनों में पुराना दर्द उतर आया था, पर उनकी दिनचर्या आज भी उसी तरह बंधी थी जैसे पचास बरस पहले थी। आंगन के ठीक बीचो-बीच खड़े विशालकाय, घने बरगद के पेड़ के नीचे एक पक्का गोल चबूतरा बना था। मालती देवी हाथ में पीतल का लोटा लिए उस चबूतरे पर पहुंचतीं, जड़ में जल चढ़ातीं, अपनी कांपती उंगलियों से खुरदरे तने को सहलातीं और फिर सूती चादर बिछाकर वहीं बैठ जातीं।
यह बरगद उनके लिए केवल लकड़ी और पत्तियों का ढेर नहीं था। यह उनके पूरे जीवन का साक्षी, उनका सबसे वफादार संगी और उनके भीतर के सूनेपन को भरने वाला सहारा था। पचास साल पहले जब वे दुल्हन बनकर इस चौखट पर उतरी थीं, तो उनके पति दीनानाथ जी ने उनका हाथ थामकर आंगन के इस कोने में ले जाकर कहा था, “मालती, यह नन्हा सा पौधा मैंने उस दिन रोपा था जिस दिन तुम्हारी और मेरी सगाई पक्की हुई थी। जैसे-जैसे यह बढ़ेगा, वैसे-वैसे हमारा प्यार, हमारा यह परिवार फलेगा-फूलेगा। आज से इसकी जिम्मेदारी तुम्हारी है।”
उस दिन से मालती ने उस पौधे को केवल पानी ही नहीं दिया, बल्कि अपने स्नेह, त्याग और आंसुओं से सींचा। साल दर साल बीतते गए। नन्हा पौधा एक विशाल वटवृक्ष बन गया। दीनानाथ जी के साथ जीवन की धूप-छांव कटती रही। दो बेटे हुए—राघव और माधव। दोनों की शादियां हुईं, बच्चे हुए और आंगन बच्चों की खिलखिलाहट से भर गया। फिर एक दिन, नियति का क्रूर चक्र चला और दीनानाथ जी एक लंबी बीमारी के बाद मालती का हाथ हमेशा के लिए छोड़कर चले गए। उस दिन मालती की दुनिया उजड़ गई थी। उस भयंकर विछोह के बाद अगर मालती को किसी ने संभाला, तो वह वही बरगद था। जब भी हवा चलती और उसकी घनी शाखाएं आपस में टकराकर सरसरातीं, तो मालती को लगता मानो दीनानाथ जी अपनी गंभीर आवाज में कह रहे हों—”मालती, घबराओ मत, मैं यहीं हूं, तुम्हारे आसपास ही तो हूं।”
दिन बीतते रहे। बड़े बेटे राघव का बेटा, यानी मालती का बड़ा पोता अंकित अब पच्चीस वर्ष का हो चुका था। शहर की एक बड़ी कंपनी में अच्छी नौकरी लग गई थी और अब उसके ब्याह की बात एक अच्छे, संभ्रांत परिवार में पक्की हो चुकी थी। शादी तय होते ही हवेली में उत्सव की सुगबुगाहट शुरू हो गई। रिश्तेदारों के आने-जाने और नई बहू के स्वागत के लिए घर का रंग-रोगन और साज-सज्जा की योजनाएं बनने लगीं।
एक शाम, जब सूरज ढल चुका था और आंगन में हल्की ठंडक उतर आई थी, पूरा परिवार चबूतरे के पास कुर्सियां डालकर चाय पी रहा था। अंकित ने अपने नए फोन में बने घर के 3D नक्शे को दिखाते हुए कहा, “पापा, चाचाजी, शादी में लड़की वाले शहर के बड़े कारोबारी हैं। उनके रिश्तेदार भी आएंगे। यह हवेली बहुत पुरानी हो चुकी है। हमारा आंगन बहुत खुला और खाली दिखता है। अगर हम इस बीच वाले चबूतरे को तोड़ दें और इस पुराने बरगद को कटवा दें, तो यहां एक आलीशान बैठक बन सकती है, जिसमें कांच की खिड़कियां और सोफा सेट आ जाएगा। बाहर से आने वाले मेहमानों पर कितना अच्छा असर पड़ेगा।”
राघव ने दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए सहमति जताई, “बात तो तुम्हारी सही है बेटा। आजकल ऐसे पुराने पेड़ों का आंगन में क्या काम? पत्तियां गिरती हैं, रोज बुहारना पड़ता है। पेड़ कट जाएगा तो आंगन भी एकदम खुला और चौड़ा हो जाएगा।”
माधव ने भी हां में हां मिलाई, “हां भैया, कल ही लकड़ी काटने वालों को बुला लेते हैं। दो दिन में पेड़ कट जाएगा और शादी से पहले-पहले कमरा तैयार हो जाएगा।”
मालती देवी पास ही तख्त पर बैठी माला फेर रही थीं। जैसे ही ये शब्द उनके कानों में पड़े, उनके हाथ से माला छूटकर फर्श पर गिर पड़ी। उनके सीने में एक भयानक टीस उठी। उन्हें लगा मानो कोई कुल्हाड़ी सीधे उनकी आत्मा पर चला रहा हो। वे कांपते हुए उठीं और धीमी आवाज में बोलीं, “राघव… बेटा, यह क्या कह रहे हो? यह कोई साधारण पेड़ नहीं है। यह तेरे बाबूजी की अंतिम निशानी है। इसे उन्होंने अपने हाथों से लगाया था। यह हमारे परिवार की छाया है, इसे मत काटो।”
राघव ने झुंझलाते हुए कहा, “अरे अम्मा, तुम भी हर बात में जज्बाती हो जाती हो। जमाना बदल गया है। बाबूजी को गुजरे पंद्रह साल हो गए। अब क्या हम उनकी यादों के चक्कर में घर का विकास रोक दें? अंकित की शादी का सवाल है, समाज में चार लोग आकर देखेंगे तो क्या कहेंगे कि इतने पुराने ढर्रे पर जी रहे हैं। तुम चिंता मत करो, तुम्हारे बैठने के लिए छत पर व्यवस्था करवा देंगे।”
उस रात के बाद मालती देवी के भीतर कुछ टूट गया। उन्होंने किसी से कोई बहस नहीं की, कोई विरोध नहीं जताया, पर उनकी आंखों की चमक बुझ गई। अगली सुबह से मालती देवी ने रसोई में कदम नहीं रखा। चाय का प्याला ठंडा होकर पड़ा रहा। दोपहर की थाली वैसे की वैसे लौट गई। वे दिनभर बस उस बरगद के तने से टेक लगाकर शून्य में ताकती रहतीं। उनकी पलकों से आंसू बहते और सीधे बरगद की जड़ों में समा जाते।
दो दिन के भीतर ही मालती देवी की देह शिथिल पड़ गई। कमजोरी इतनी बढ़ गई कि वे अपने बिस्तर से उठ भी नहीं पा रही थीं। तीसरे दिन उन्हें तेज बुखार ने जकड़ लिया। मां की अचानक बिगड़ती हालत देखकर राघव और माधव घबरा गए। शहर से बड़े डॉक्टर को बुलाया गया। डॉक्टर ने जांच की, दवाइयां दीं, इंजेक्शन लगाए, लेकिन शाम तक बुखार और चढ़ गया। मालती देवी की सांसें भारी होने लगी थीं और वे बार-बार अपनी आधी खुली आंखों से खिड़की की ओर देखतीं, जहां से बाहर बरगद की एक टहनी नजर आती थी।
डॉक्टर ने राघव को अलग ले जाकर धीमे स्वर में कहा, “देखिए राघव जी, दवाओं का असर नहीं हो रहा है। इनकी बीमारी शारीरिक से ज्यादा मानसिक है। ऐसा लगता है जैसे इन्होंने जीने की इच्छा ही छोड़ दी है। किसी गहरे सदमे या दुख ने इनके दिल को जकड़ लिया है। अगर यह कुछ खाएंगी-पिएंगी नहीं और ऐसे ही खामोश रहीं, तो स्थिति बहुत गंभीर हो सकती है।”
डॉक्टर की बात सुनकर पूरे घर में सन्नाटा पसर गया। राघव और माधव बदहवास हो गए। बहुएं रोने लगीं। अंकित अपनी दादी के बिस्तर के पास घुटनों के बल बैठ गया। उसने दादी का सूखा, कांपता हुआ हाथ अपने दोनों हाथों में थाम लिया और भरभराई आवाज में बोला, “दादी… दादी मां, आंखें खोलो न। देखो, तुम्हारा अंकित बुला रहा है। तुम्हें क्या हो गया है दादी? क्या चाहिए तुम्हें? हम तुम्हारे लिए सब कुछ करेंगे, बस एक बार कुछ बोल दो।”
मालती देवी ने बड़ी मुश्किल से अपनी भारी पलकें उठाईं। उनकी सूखी आंखों में बेपनाह दर्द और बेबसी तैर रही थी। उन्होंने बेहद क्षीण आवाज में अपने बेटों और पोते की तरफ देखा और टूटे-टूटे शब्दों में कहा, “बेटा… मुझे… मुझे आंगन में ले चलो। मुझे उस चबूतरे पर लिटा दो… मैं… मैं अपने दीनानाथ जी की छांव में जाना चाहती हूं… बस एक बार…”
इतना कहते ही उनकी आंखें बंद हो गईं। राघव और माधव की आंखों से आंसू छलक पड़े। दोनों बेटों ने तुरंत बिस्तर सहित अपनी मां को सहारा देकर उठाया और बाहर आंगन में बरगद के नीचे उसी पक्के चबूतरे पर लाकर लिटा दिया।
शाम का धुंधलका घिरने लगा था। मंद-मंद बयार चल रही थी। जैसे ही मालती देवी की देह उस चबूतरे पर पहुंची, बरगद की घनी पत्तियों की सरसराहट तेज हो गई। एक शीतल, आत्मीय हवा का झोंका मालती देवी के तपते माथे को छूकर गुजरा। मालती देवी ने धीरे से आंखें खोलीं। उन्होंने अपनी धुंधली दृष्टि से ऊपर देखा, जहां बरगद की विशाल हरी शाखाएं एक छत्र की तरह फैली हुई थीं। ऐसा लगा मानो वह पेड़ अपनी बाहें फैलाकर अपनी इस पुरानी संगिनी को गले लगा रहा हो। मालती देवी के चेहरे पर एक असीम, अनिर्वचनीय शांति तैर गई। उन्होंने अपनी कांपती हुई हथेली को धीरे से आगे बढ़ाकर बरगद के तने पर रख दिया।
यह दृश्य देखकर वहां खड़े हर व्यक्ति का कलेजा कांप उठा।
अंकित अपनी जगह पर सुन्न खड़ा था। उसकी नजरें कभी अपनी अचेत सी होती दादी के चेहरे पर जातीं, तो कभी उस विशाल वटवृक्ष पर, जिसकी शाखाएं पूरे घर को अपने आंचल में समेटे हुए थीं। अचानक अंकित की अंतरात्मा पर जैसे किसी ने हथौड़ा मार दिया। उसे याद आया कि जब वह छोटा था, तो इसी चबूतरे पर बैठकर दादी उसे कहानियां सुनाती थीं। जब उसे कभी चोट लगती या पढ़ाई का तनाव होता, तो वह इसी पेड़ की ठंडी छांव में आकर सुकून पाता था। उसके दादाजी ने यह पेड़ सिर्फ लकड़ी के लिए नहीं, बल्कि इस परिवार को एकजुट रखने, एक छत और एक पहचान देने के लिए लगाया था। और वह… आधुनिकता और दिखावे के अंधे नशे में, अपनी शादी के क्षणिक ठाठ-बाट के लिए अपने परिवार की आत्मा को ही काटने जा रहा था!
अंकित की आंखों से पश्चाताप के आंसू बह निकले। वह आगे बढ़ा और सीधे चबूतरे पर दादी के पैरों के पास गिर पड़ा। उसने जोर से दादी के पांव पकड़ लिए और चीख पड़ा, “दादी मां! मुझे माफ कर दो! मैं अंधा हो गया था। मैं अपने स्वार्थ और दिखावे में यह भूल गया था कि यह पेड़ सिर्फ एक दरख्त नहीं, हमारे दादाजी का आशीर्वाद है, तुम्हारी सांसें हैं और हमारे पूरे परिवार की जड़ है!”
फिर अंकित ने पलटकर अपने पिता और चाचा की ओर देखा और दृढ़ आवाज में कहा, “पापा, चाचाजी! यह पेड़ नहीं कटेगा। कभी नहीं कटेगा! अगर किसी मेहमान को मेरे घर का यह पेड़ गंवारा नहीं है, तो मुझे ऐसे खोखले दिखावे की कोई जरूरत नहीं। मेरी शादी इसी आंगन में होगी, इसी बरगद की छांव में फेरे लिए जाएंगे। जहां दादाजी का आशीर्वाद और दादी का प्यार है, वहीं असली घर है। यह कमरा बाहर की खाली जमीन पर भी बन सकता है, पर यह पेड़ दोबारा नहीं उग सकता!”
राघव और माधव का सिर भी शर्म और ग्लानि से झुक गया। राघव आगे बढ़ा और उसने कांपते हाथों से उस पेड़ के तने को छुआ। बरसों बाद उसने महसूस किया कि उसके पिता की मेहनत और उनका प्यार इसी पेड़ के पत्तों में सांस ले रहा था। राघव की रुलाई फूट पड़ी। उसने अपनी मां का दूसरा हाथ पकड़ते हुए कहा, “अम्मा… हमें माफ कर दो। हम अंधे हो गए थे। यह बरगद कभी नहीं कटेगा। जब तक यह हवेली रहेगी, यह बरगद ऐसे ही सीना ताने खड़ा रहेगा। तुम्हारी इस धरोहर पर कोई कुल्हाड़ी नहीं चलाएगा अम्मा, कोई नहीं चलाएगा!”
बेटों और पोते के इन आंसुओं और वचनों की गूंज जैसे ही मालती देवी के कानों में पड़ी, उनके चेहरे का रंग बदलने लगा। उनके भीतर मानो जीवन का एक नया संचार दौड़ गया। उस पेड़ की सरसराहट और अपने परिवार के इस हृदय परिवर्तन ने उनकी बुझती हुई चेतना में अमृत घोल दिया। मालती देवी ने आहिस्ता-आहिस्ता अपनी आंखें पूरी तरह खोल दीं। उन्होंने देखा कि उनके दोनों बेटे, बहुएं और पोता सब हाथ जोड़े, रोते हुए उनके सामने खड़े थे।
मालती देवी के कांपते होंठों पर कई दिनों बाद एक हल्की, सुकून भरी मुस्कान खिल उठी। उन्होंने बड़ी मुश्किल से अपना हाथ उठाकर अंकित के सिर पर रख दिया। उनके स्पर्श में वही पुरानी ममता, वही आशीष लौट आया था। मालती ने कमजोर आवाज में कहा, “जीते रहो मेरे बच्चे… तुमने आज अपने दादाजी की आत्मा को शांत कर दिया। जब तक परिवार की जड़ें हरी रहेंगी, तब तक कोई तूफान इस घर को हिला नहीं पाएगा।”
कुछ ही पलों में घर का माहौल पूरी तरह बदल गया। जो घर कुछ देर पहले शोक और डर के साए में डूबा था, वहां अब आंसुओं के बीच खुशियों की बहार लौट आई थी। बहुएं दौड़कर गर्म दूध और दलिया ले आईं। मालती देवी ने अपने पोते के हाथों से घूंट-घूंट करके दूध पिया। उनके चेहरे पर जीवन का तेज वापस लौटने लगा था।
महीनों बाद, जब अंकित की शादी का दिन आया, तो हवेली का रूप देखने लायक था। आंगन के उस बरगद को रंग-बिरंगी रोशनी और फूलों की लड़ियों से दुल्हन की तरह सजाया गया था। चबूतरे के चारों ओर सुंदर रंगोलियां बनाई गई थीं। शादी के मंडप को उसी वटवृक्ष की छांव के नीचे स्थापित किया गया था। जब नई बहू ने घर में प्रवेश किया, तो सबसे पहले उसने और अंकित ने जाकर बरगद के तने को छूकर प्रणाम किया और फिर चबूतरे पर गर्व से बैठी दादी मालती देवी के चरण स्पर्श किए।
मालती देवी ने अपनी सजल आंखों से ऊपर देखा। बरगद की शाखाएं मंद हवा में ऐसे झूम रही थीं मानो स्वर्ग से दीनानाथ जी मुस्कुराते हुए अपने पूरे परिवार पर खुशियों और आशीर्वाद के फूल बरसा रहे हों। नई पीढ़ी ने पुरानी जड़ों को थाम लिया था, और वह आंगन हमेशा-हमेशा के लिए प्यार और संस्कारों की छांव से महक उठा था।
दोस्तों, आज की भागदौड़ और दिखावे की दुनिया में हम अक्सर नई चीजों को पाने की होड़ में अपनी पुरानी जड़ों, संस्कारों और बुजुर्गों की भावनाओं को नजरअंदाज कर देते हैं। क्या आपके घर में भी कोई ऐसी पुरानी निशानी या पेड़ है जो आपके बड़े-बुजुर्गों की यादों से जुड़ा हुआ है? आपकी इस बारे में क्या राय है, हमें अपनी भावनाएं कमेंट बॉक्स में जरूर लिखकर बताएं।
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