स्वाभिमान की नई सुबह

“फिर मेरे अंदर की ममता और मेरा डर, दोनों खत्म हो गए दीदी। मैंने उस दिन रोना छोड़ दिया। मैंने घर में रखी कपड़े धोने वाली मूसली उठाई और उसे बता दिया कि अब और नहीं। मैंने उसे घर से धक्के मारकर निकाल दिया है। कह दिया है कि अगर मुड़कर इस गली में आया, तो पुलिस में रिपोर्ट कर दूंगी कि तूने बच्चे की जान लेने की कोशिश की।”

मैं और सुधा दोनों हैरान थे। कल तक अपने पति के बिना खुद को अधूरा मानने वाली चंपा के अंदर इतना साहस कहाँ से आ गया!

  मैं अपनी बालकनी में खड़ा, हाथ में अदरक वाली गर्म चाय का प्याला लिए, इस शांत और खूबसूरत सुबह का आनंद ले रहा था। मेरी दिनचर्या का यह सबसे सुकून भरा पल होता था, जब मैं अख़बार के पन्नों में दुनिया जहान की ख़बरें टटोलता था। अभी मैंने अख़बार के मुख्य पृष्ठ पर नज़र दौड़ाई ही थी कि रसोईघर से मेरी पत्नी, सुधा की तीखी आवाज़ आई, “अजी सुन रहे हो? दुनिया भर की पंचायत बाद में कर लेना, पहले घर की खबर ले लो। आज फिर चंपा नहीं आई है! अब अख़बार छोड़कर जल्दी-जल्दी हाथ बंटाओ, वरना मुझे ऑफिस के लिए देर हो जाएगी।”

चंपा, हमारे घर की साफ-सफाई और बर्तन-झाड़ू का काम करने वाली बाई। वैसे तो वह बहुत मेहनती थी, लेकिन महीने में चार-पांच छुट्टियां मारना उसकी पुरानी आदत थी। और जब भी वह छुट्टी मारती, घर का पूरा रूटीन बिगड़ जाता। सुधा जो खुद एक वर्किंग वुमन थी, उसके लिए बिना चंपा के सुबह का काम निपटाना किसी पहाड़ तोड़ने से कम नहीं होता था। और ऐसे मौकों पर सुधा के गुस्से का शिकार अक्सर मैं ही होता था। मैं खामोशी से अपना अख़बार समेटकर रसोई में जा पहुँचा और सब्जियां काटने में उसकी मदद करने लगा। तभी पड़ोस की बालकनी से शर्मा जी की पत्नी की आवाज़ आई, “सुधा जी, आज चंपा नहीं आई क्या?” यह सवाल सुनते ही सुधा का गुस्सा और भड़क गया, “नहीं आई! बताकर भी नहीं जाती। कम से कम बता दे तो इंसान रात को ही कुछ तैयारी करके रख ले। कल कुछ ढीली तो लग रही थी, बहाने बना रही थी। सच कहूँ शर्मा जी, इनको कितना भी सिर पर चढ़ा लो, पुराने कपड़े दो, पैसे दो, पर ये कभी वफादार नहीं होतीं।” शर्मा जी की पत्नी ने भी हां में हां मिलाई। इस बीच मैंने अपना टिफिन उठाया और चुपचाप ऑफिस के लिए खिसक लेना ही बेहतर समझा।

उस दिन सुधा को अकेले ही सारा काम करना पड़ा। रात को जब मैं ऑफिस से लौटा, तो वह थकान से चूर थी। काम की वजह से उसे रात में नींद तो अच्छी आ गई, लेकिन चंपा के प्रति उसका गुस्सा शांत नहीं हुआ था।

अगले दिन सुबह मैं बालकनी में खड़ा था कि डोरबेल बजी। दरवाजा खोला तो सामने चंपा खड़ी थी। वह चुपचाप अंदर आई और बिना मेरी तरफ देखे सीधे रसोई की तरफ बढ़ गई। सुधा उसे देखते ही बरस पड़ी, “कल क्यों नहीं आई चंपा? एक फोन भी नहीं कर सकती थी?” चंपा ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने झाड़ू उठाई और काम करने लगी। सुधा को उसकी यह चुप्पी और भी अखरी। उसने थोड़ा तेज आवाज़ में कहा, “मैं कुछ पूछ रही हूँ तुमसे!”

तभी मैंने देखा कि चंपा के हाथ कांप रहे थे। उसने जैसे ही झाड़ू नीचे रखी, वह फूट-फूट कर रोने लगी। उसकी सिसकियाँ इतनी तेज थीं कि सुधा का गुस्सा पल भर में पिघल गया। सुधा ने आगे बढ़कर उसके कंधे पर हाथ रखा, “क्या हुआ चंपा? रो क्यों रही है?” चंपा ने अपने पल्लू से चेहरा पोंछा, तो मैंने देखा कि उसकी बायीं आंख के पास एक गहरा नीला निशान था और होंठ सूजे हुए थे।

वह रुंधे गले से बोली, “क्या बताऊँ दीदी! कल वो (उसका पति, माधव) शराब पीकर घर आया था। मैंने पूरे महीने लोगों के घर बर्तन मांज कर जो पैसे जोड़े थे, वो सब छीनने लगा। मैंने मना किया तो मुझे बहुत मारा। दीदी, उसने मुझे बालों से पकड़ कर जमीन पर घसीटा। फिर कहता है, खाने को क्या है? मैंने दाल-रोटी दी, तो थाली फेंक दी और गालियां बकने लगा कि रोज-रोज यही घास-फूस खिलाती है, कभी मुर्गा नहीं ला सकती? दीदी, मेरे पूरे बदन में दर्द हो रहा है। कल से एक निवाला भी नहीं खाया है।”

उसकी बातें सुनकर सुधा अवाक रह गई। एक औरत होने के नाते वह चंपा का दर्द गहराई से महसूस कर रही थी। सुधा ने तुरंत उसे वहीं बैठाया और रसोई से गर्म दूध और दो रोटियां लाकर उसे दीं। “पहले कुछ खा ले चंपा, फिर बात करेंगे।” चंपा ने कांपते हाथों से रोटी का टुकड़ा तोड़ा। भूख शांत होने के बाद उसने अपनी विवशता बयान की, “दीदी, वो आदमी कोई काम नहीं करता। दिन भर ताश खेलता है और शाम को शराब पीकर आता है। मेरा एक छोटा सा बेटा है, राजू। मैं बस उसके लिए जी रही हूँ। सोचती हूँ कि ये आदमी सुधर जाएगा, पर हर दिन वही मारपीट। कभी-कभी तो सोचती हूँ कि जहर खा लूं, पर फिर राजू का चेहरा याद आ जाता है।”

उस दिन चंपा काम करके चली गई, लेकिन हम दोनों के मन में एक भारीपन छोड़ गई। सुधा दिन भर सोचती रही कि समाज में एक स्त्री की स्थिति क्या सच में इतनी दयनीय है? क्या उसे केवल मार सहने और एक पुरुष के अधीन रहने के लिए ही बनाया गया है?

लेकिन हमारे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब अगले दिन डोरबेल बजी और हमने दरवाजा खोला। सामने चंपा खड़ी थी, और आज उसके चेहरे पर कल जैसी उदासी या आंसू नहीं थे। बल्कि उसके होंठों पर एक अजीब सी मुस्कान थी। उसने बालों में एक सस्ता सा गजरा लगा रखा था और उसके चेहरे की सूजन भी कुछ कम लग रही थी। वह अंदर आई और चहकते हुए काम में लग गई।

सुधा से रहा नहीं गया। उसने पूछा, “क्या बात है चंपा? आज बहुत खुश लग रही है? दर्द ठीक है तेरा?”

चंपा ने शरमाते हुए कहा, “हां दीदी, आज ठीक हूँ। कल रात वो (माधव) चिकन लेकर आया था। खुद अपने हाथों से बनाकर खिलाया मुझे। कह रहा था कि गुस्से में हाथ उठ गया, आगे से नहीं मारेगा। मेरे लिए ये गजरा भी लाया था बाजार से। आखिर है तो मेरा आदमी ही न दीदी। गुस्सा करता है तो प्यार भी तो करता है। दो दिन घर पर ही रुकेगा, मेरे साथ।”

सुधा ठगी सी खड़ी रह गई। कल जो औरत अपनी जान देने की बात कर रही थी, वह आज उसी अत्याचारी पति के एक छोटे से झूठे लाड़-प्यार पर पिघल गई थी। मैंने सुधा की आँखों में एक अजीब सी निराशा और झुंझलाहट देखी। क्या भारतीय नारी की यही नियति है? क्या वह ममता, दया और समर्पण के नाम पर अपने आत्मसम्मान को इस तरह रोज कुचले जाने देती है? क्या वह इतनी ‘अबला’ है कि चंद मीठे बोलों के लिए अपनी शारीरिक और मानसिक पीड़ा भूल जाती है? सुधा ने उस दिन चंपा से कुछ नहीं कहा, बस एक ठंडी सांस ली और अपने काम में लग गई।

दिन बीतते गए। चंपा का वही सिलसिला चलता रहा। कभी वह रोते हुए आती, तो कभी मुस्कुराते हुए। यह मार-पीट और फिर सुलह का एक अंतहीन चक्र बन गया था। सुधा अक्सर उसे समझाती, “चंपा, अपने लिए नहीं तो अपने बेटे राजू के लिए सोच। जिस माहौल में वो बड़ा हो रहा है, कल को वो भी अपने बाप जैसा बन गया तो? तू खुद पैसे कमाती है, तुझे किसी माधव की जरूरत नहीं है।” चंपा हमेशा सिर झुका कर सुन लेती और कहती, “औरत की बिना आदमी के क्या इज्जत है दीदी? समाज जीने नहीं देगा।”

लेकिन एक दिन कुछ ऐसा हुआ जिसने कहानी का रुख मोड़ दिया।

दिवाली का समय था। चंपा ने अपने बेटे राजू की स्कूल की फीस और उसकी नई किताबों के लिए काफी पैसे जमा किए थे। सुधा ने भी उसे त्योहार के शगुन के तौर पर कुछ अलग से पैसे दिए थे। चंपा बहुत खुश थी। पर अगले दो दिन वह काम पर नहीं आई। सुधा को चिंता होने लगी, गुस्सा नहीं। उसे डर था कि कहीं माधव ने फिर से कोई बड़ा हंगामा न कर दिया हो।

तीसरे दिन चंपा आई। उसका चेहरा सपाट था। न कोई आंसू, न कोई मुस्कान। आंखों में एक अजीब सी दृढ़ता थी, जैसे कोई बड़ा तूफान आकर थम गया हो। उसने चुपचाप काम शुरू किया।

सुधा ने घबराकर पूछा, “चंपा, तू ठीक तो है? क्या हुआ इन दो दिनों में?”

चंपा खड़ी हुई। उसने सुधा की आंखों में सीधा देखा और बोली, “दीदी, जो सालों में नहीं हुआ, वो परसों रात हो गया। उसने मेरे वो पैसे छीन लिए जो मैंने राजू की पढ़ाई के लिए रखे थे। मैंने हमेशा उसकी मार सही, क्योंकि मुझे लगता था कि औरत को सहना चाहिए। लेकिन परसों जब उसने पैसे छीने, तो राजू बीच में आ गया। उस आदमी ने मेरे आठ साल के बच्चे को इतनी जोर से धक्का दिया कि राजू का सिर दीवार से टकराया और खून बहने लगा।” चंपा की आवाज में कोई कंपन नहीं था, बल्कि एक खौफनाक शांति थी।

“फिर?” सुधा ने सांस रोककर पूछा।

“फिर मेरे अंदर की ममता और मेरा डर, दोनों खत्म हो गए दीदी। मैंने उस दिन रोना छोड़ दिया। मैंने घर में रखी कपड़े धोने वाली मूसली उठाई और उसे बता दिया कि अब और नहीं। मैंने उसे घर से धक्के मारकर निकाल दिया है। कह दिया है कि अगर मुड़कर इस गली में आया, तो पुलिस में रिपोर्ट कर दूंगी कि तूने बच्चे की जान लेने की कोशिश की।”

मैं और सुधा दोनों हैरान थे। कल तक अपने पति के बिना खुद को अधूरा मानने वाली चंपा के अंदर इतना साहस कहाँ से आ गया!

चंपा ने आगे कहा, “दीदी, आप सही कहती थीं। बिना इज्जत की जो जिंदगी है, वो जिंदगी नहीं, मौत है। मैं अपने राजू को वो दरिंदगी देखकर बड़ा नहीं होने दूंगी। मैं मेहनत करती हूँ, दो वक्त की रोटी कमा सकती हूँ। मुझे किसी ऐसे आदमी के सहारे की जरूरत नहीं जो मेरी कमाई खाये और मुझे ही जानवर समझे। मैंने पास वाली बस्ती में एक छोटा सा कमरा किराये पर ले लिया है। आज से मैं और मेरा राजू अकेले रहेंगे, पर इज्जत से रहेंगे।”

उस दिन चंपा जब काम करके बाहर निकली, तो उसकी चाल में एक गजब का आत्मविश्वास था। उसका सिर झुका हुआ नहीं था। सुधा की आँखों में आंसू थे, पर ये आंसू पीड़ा के नहीं, गर्व के थे। मैंने महसूस किया कि नारी केवल प्रेम, दया और समर्पण की मूर्ति नहीं है, बल्कि जब उसके आत्मसम्मान या उसकी संतान पर आंच आती है, तो वह चंडी का रूप भी ले सकती है। चंपा ने उस दिन साबित कर दिया था कि नारी अबला नहीं, बल्कि सबला है। उसे बस अपनी उस शक्ति को पहचानने की जरूरत होती है जो उसके अंदर हमेशा से मौजूद होती है।

उस दिन के बाद चंपा ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। आज वह न केवल अपने बच्चे को अच्छी शिक्षा दे रही है, बल्कि उसने खुद को भी एक नई और सशक्त पहचान दी है। यह कहानी सिर्फ चंपा की नहीं, उन अनगिनत स्त्रियों की है जो अँधेरे से निकलकर खुद अपना उजाला बन सकती हैं।

क्या आपको भी लगता है कि हर औरत के अंदर एक ऐसी ताकत छुपी होती है जो उसे किसी भी मुश्किल से बाहर निकाल सकती है? आपको चंपा का यह फैसला कैसा लगा? हमें कमेंट करके जरूर बताएं!

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