जब काव्या को यशोदा के कमरे में ले जाया गया, तो वहां का दृश्य देखने लायक था। पालने में एक नन्हा सा जीव मखमली कपड़े में लिपटा हाथ-पैर चला रहा था। काव्या कमरे में ऐसे दाखिल हुई जैसे कोई तपस्वी अपनी तपस्या का फल लेने आया हो। उसके चेहरे पर जो संतोष, तेज और गर्व की चमक थी, उसे देखकर कमरे में मौजूद दादी और ताईजी की आंखें भी झुक गईं। काव्या तब तक पालने से एक इंच भी पीछे नहीं हटी, जब तक उस नन्हे शिशु ने अपनी छोटी-छोटी आंखें खोलकर अपनी इस दीदी की तरफ नहीं देखा।
हवेली के दालान में सुबह से ही रौनक पसरी हुई थी। सावन की भीनी-भीनी फुहारों के बीच रेशमी धागों की चमक, रोली-अक्षत की थालियां और बेसन के लड्डुओं की महक पूरे घर को महका रही थी। संयुक्त परिवार इतना बड़ा था कि आंगन में कदम रखने की जगह न बचती थी। चचेरे, ममेरे, फुफेरे भाइयों की कतारें सजी थीं। कोई हंसी-ठिठोली कर रहा था तो कोई अपनी कलाई आगे बढ़ाकर बहनों से सलीके से गांठ बांधने की मनुहार कर रहा था। उसी गहमागहमी के बीच, सात साल की काव्या दालान के एक खंभे की ओट में चुपचाप खड़ी थी। उसकी बड़ी बहन तन्वी एक के बाद एक भाइयों को तिलक लगाकर नेग के लिफाफे समेटने में मगन थी, पर काव्या की दोनों हथेलियां खाली थीं।
“अरी काव्या! तू वहां खंभे से चिपकी क्या तमाशा देख रही है? जा, जाकर अपने ताऊजी और चाचा के लड़कों को राखी बांध। देख, सब तुझे कितने सलीके से पैसे और कपड़े देंगे,” मां यशोदा ने माथे का पसीना पोंछते हुए दबी आवाज में कहा। उनके चेहरे पर हर तीज-त्योहार पर छा जाने वाली वही जानी-पहचानी बेबसी तैर रही थी।
काव्या ने अपनी फ्रॉक का कोना अंगूठे पर लपेटते हुए दृढ़ स्वर में सिर हिला दिया, “ना मां, मैं किसी को नहीं बांधूंगी। मैं तो बस अपने सगे छोटे भैया को ही राखी बांधूंगी। जब वह आ जाएगा, तभी थाली सजाऊंगी।”
पास ही चांदी की कटोरी में मिश्री घोल रहीं बड़ी ताईजी की नजर जैसे ही काव्या पर पड़ी, उनके होंठों पर एक तीखी मुस्कान उभर आई। वे तंज कसते हुए बोलीं, “सुन री यशोदा, अपनी इस लाडली को समझा ले। ख्वाब देखना छोड़ दे। तेरे नसीब में तो पहले ही दो-दो बेटियां लिख दीं भगवान ने। ऊपर से यह दूसरी वाली न रंग-रूप में अच्छी, न बात का सलीका। खानदान में चौदह-पंद्रह बेटे खेल रहे हैं, पर इसे तो अपनी ही डफली बजानी है। अब नहीं आने वाला कोई भाई, जो है उसी में सब्र करना सीखे यह।”
ताईजी के तीखे बोल सीधे यशोदा के सीने में चुभ गए। उनकी आंखें डबडबा आईं। इस भरे-पूरे परिवार में जहां हर देवरानी-जेठानी की गोद में एक-दो बेटे किलकारियां मार रहे थे, वहीं यशोदा को सिर्फ दो बेटियों की मां होने का ताना हर रोज किसी न किसी बहाने झेलना पड़ता था। काव्या का सांवला रंग और उसकी यह हठ परिवार की औरतों के लिए रोज की चुटकी लेने का विषय बन चुकी थी।
पर काव्या ताईजी के तानों से सहमी नहीं। उसने अपनी बड़ी-बड़ी कजरारी आंखें उठाईं और साफ लफ्जों में बोली, “ताईजी, आप चाहे जो कहो, पर मेरा विश्वास झूठा नहीं है। मैं आज क्या, कभी किसी दूसरे को राखी नहीं बांधूंगी। मैं रोज संध्या आरती में ठाकुर जी के आगे हाथ जोड़ती हूं। मेरे कान्हा मेरी बात कभी नहीं टालेंगे। मेरा भैया जरूर आएगा।”
काव्या की यह जिद कोई एक दिन की नहीं थी। हर साल रक्षाबंधन आता, घर में ढोलक बजती, मिठाइयां बंटतीं, पर काव्या न तो किसी भाई से तोहफा लेती और न किसी की कलाई पर रक्षा-सूत्र बांधती। वह चुपचाप पूजा के कमरे में जाकर बैठ जाती और लड्डू गोपाल की मूर्ति के सामने एक लाल रेशमी धागा रखकर अपनी बाल-सुलभ भाषा में घंटों बतियाती। यशोदा जब कभी उदास होकर उसे समझाती कि बेटा, संसार के रीती-रिवाजों से लड़ना आसान नहीं होता, तो काव्या अपनी नन्ही बाहें मां के गले में डालकर कहती, “मां, तुम रोया मत करो। जब मन का विश्वास सच्चा होता है न, तो भगवान को भी जमीन पर उतरना पड़ता है। देखना, हमारा घर भी खुशियों से भर जाएगा।” यशोदा बस ठंडी सांस भरकर रह जातीं और मन ही मन भगवान से प्रार्थना करतीं कि काश इस मासूम का यह भरोसा कभी टूटने न पाए।
समय अपनी गति से बीतता रहा। काव्या अब आठ बरस की हो चुकी थी। सर्दी के दिन थे और गांव में घना कोहरा छाया हुआ था। पौ फटने से बहुत पहले, रात के करीब ढाई बजे यशोदा के कमरे से अचानक कराहने की आवाजें आने लगीं। घर में अफरा-तफरी मच गई। काव्या के पिता रमेश बाबू बदहवास होकर कमरे से बाहर निकले। यशोदा की तबीयत अचानक बहुत बिगड़ गई थी और प्रसव पीड़ा असहनीय हो चुकी थी। गांव के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की दाई ने हाथ खड़े कर दिए थे और तुरंत जिला अस्पताल ले जाने की सलाह दी थी।
घर के बड़े-बुजुर्गों ने आनन-फानन में निर्णय लिया। चाचाजी अपनी पुरानी जीप निकालकर लाए और यशोदा को पिछली सीट पर लिटाया गया। रमेश बाबू और दादी जी साथ बैठे। काव्या आंखें मलती हुई दालान में आई और उसने जीप का दरवाजा पकड़ लिया, “पिताजी, मुझे भी मां के साथ जाना है।”
दादी ने उसे डांटकर पीछे खींच लिया, “पागल हुई है क्या छोरी! इतनी कड़कड़ाती ठंड में अस्पताल जाकर क्या करेगी? घर में तन्वी के पास सो जा।”
जीप धूल उड़ाती हुई कोहरे में ओझल हो गई। पूरा घर सन्नाटे में डूब गया, लेकिन काव्या की नींद उड़ चुकी थी। उसका नन्हा दिल किसी अनहोनी की आशंका से तेजी से धड़क रहा था। उसने दालान में बने मंदिर के सामने माथा टेका, लड्डू गोपाल के चरणों से रक्षा-सूत्र उठाया, उसे अपनी मुट्ठी में भींचा और घर के पिछले दरवाजे से बाहर निकल आई। सड़क पर दूर-दूर तक घना अंधेरा और हड्डियों को कंपा देने वाली ठंड थी। उसने देखा कि पड़ोस के कालू काका अपनी साइकिल का कैरियर कस रहे थे ताकि वे भी अस्पताल की तरफ जा सकें। काव्या ने न आव देखा न ताव, वह छुपते-छुपाते, पगडंडियों के सहारे कालू काका की साइकिल की लाल बत्ती का पीछा करते हुए पैदल ही दौड़ पड़ी।
अस्पताल गांव से करीब तीन किलोमीटर दूर था। नंगे पैर, पतली सी चादर लपेटे वह बच्ची पत्थरों और कंटीली झाड़ियों की परवाह किए बिना बस भागती रही। उसके मन में केवल एक ही धुन सवार थी—मां और उसका भैया। जब वह हांफती हुई अस्पताल के बड़े लोहे के गेट पर पहुंची, तो उसके पैर लहूलुहान थे और होंठ ठंड से नीले पड़ चुके थे। अंदर जाने की उसकी हिम्मत नहीं हुई। चारों तरफ सफेद कोट पहने अजनबी लोग, दवाइयों की तीखी गंध और सायरन की आवाजें थीं। वह डरकर अस्पताल के अहाते में खड़े एक पुराने बरगद के विशाल तने के पीछे दुबक कर बैठ गई। अपनी दोनों हथेलियों के बीच उस रेशमी धागे को सीने से सटाए, उसने आंखें मूंद लीं। प्रार्थना करते-करते कब थकान और ठंड के मारे उसकी आंख लग गई, उसे खुद खबर न हुई।
उधर अस्पताल के लेबर रूम के बाहर सुबह की पहली किरण के साथ ही डॉक्टर ने बाहर आकर रमेश बाबू को बधाई दी, “मुबारक हो, आपके घर बेटा हुआ है। जच्चा और बच्चा दोनों बिल्कुल स्वस्थ हैं।”
रमेश बाबू की आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। पूरे परिवार में फोन पर खबर फैला दी गई कि यशोदा ने एक स्वस्थ बालक को जन्म दिया है। जब कालू काका मिठाई लेने के लिए वापस गांव पहुंचे, तो हवेली में उत्सव का माहौल था। तन्वी ने दौड़कर पूछा, “काका, काव्या को आपने भैया की खबर दे दी क्या? वह तो खुशी से नाच उठेगी!”
कालू काका चौंक गए, “काव्या? वह तो अस्पताल में थी ही नहीं। वह तो घर पर सो रही होगी।”
यह सुनते ही हवेली में सन्नाटा खिंच गया। घर के हर कमरे, छत और बागीचे में काव्या को तलाशा गया, पर उसका कहीं कोई नामोनिशान नहीं था। रमेश बाबू को जब अस्पताल में खबर मिली कि काव्या रात से ही गायब है, तो उनके पैरों तले से जमीन खिसक गई। बेटे के जन्म की सारी खुशियां पल भर में चिंता के घने बादलों में घिर गईं। गांव और अस्पताल के आसपास के रास्तों पर लोग उसे पागलों की तरह ढूंढने लगे। पुलिस को सूचना देने की तैयारी हो ही रही थी कि तभी अस्पताल के एक सफाईकर्मी की नजर बरगद की जड़ों के बीच सिकुड़ कर सोई हुई उस छोटी सी बच्ची पर पड़ी।
रमेश बाबू दौड़कर वहां पहुंचे। काव्या का शरीर ठंड से अकड़ चुका था, पर उसकी मुट्ठी सीने पर मजबूती से कसी हुई थी। पिता ने तड़पकर उसे अपनी बाहों में उठा लिया, “काव्या! मेरी बच्ची, आंखें खोल!”
गरम चाय के छींटे और पिता की छाती की गर्माहट पाकर काव्या ने धीरे-धीरे अपनी पलकें झपकाईं। सामने पिता को देखकर उसने रोने के बजाय सबसे पहले अपनी मुट्ठी खोली और कांपती आवाज में पूछा, “पिताजी… मेरा भैया आ गया ना?”
रमेश बाबू अपनी रुलाई रोक न सके। उन्होंने अपनी बेटी का माथा चूमते हुए कहा, “हां मेरी गुड़िया, तेरा भाई आ गया। तेरी पुकार सचमुच भगवान ने सुन ली।”
जब काव्या को यशोदा के कमरे में ले जाया गया, तो वहां का दृश्य देखने लायक था। पालने में एक नन्हा सा जीव मखमली कपड़े में लिपटा हाथ-पैर चला रहा था। काव्या कमरे में ऐसे दाखिल हुई जैसे कोई तपस्वी अपनी तपस्या का फल लेने आया हो। उसके चेहरे पर जो संतोष, तेज और गर्व की चमक थी, उसे देखकर कमरे में मौजूद दादी और ताईजी की आंखें भी झुक गईं। काव्या तब तक पालने से एक इंच भी पीछे नहीं हटी, जब तक उस नन्हे शिशु ने अपनी छोटी-छोटी आंखें खोलकर अपनी इस दीदी की तरफ नहीं देखा।
काव्या ने धीरे से यशोदा का हाथ थामा और पूरे अधिकार के साथ बोली, “मां, देख लो! अब यह मेरा भाई है। इसकी कलाई पर पहली और इकलौती राखी सिर्फ मैं बांधूंगी। किसी के तानों से भगवान के फैसले नहीं बदलते।”
यशोदा ने अपनी दोनों बेटियों और बेटे को सीने से चिपका लिया। उस दिन पूरे परिवार ने जाना कि रिश्ते केवल खून और समाज के रिवाजों से नहीं, बल्कि आत्मा के सच्चे विश्वास से भी आकार लेते हैं। काव्या की उस निश्छल और अटूट आस ने न केवल परिवार को उसका खोया हुआ मान लौटाया, बल्कि उस घर की संकीर्ण सोच की दीवारों को भी हमेशा के लिए ढहा दिया। बाद के वर्षों में जब भी वह प्रसंग छिड़ता, तो पिता गर्व से कहते कि हमारे घर का यह चिराग किसी दुआ से नहीं, बल्कि अपनी बहन के अटूट विश्वास की जिद से इस दुनिया में आया है।
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