राघव अवाक रह गया। उसने सोचा था कि मीरा उसे देखते ही रो पड़ेगी, शिकायतें करेगी और फिर उसकी दौलत देखकर सब माफ कर देगी। लेकिन यहां तो मीरा किसी और ही मिट्टी की बन चुकी थी। एक ऐसी स्त्री जिसे अब किसी सहारे की दरकार नहीं थी। उसे एहसास हुआ कि उसने दुनिया तो जीत ली, लेकिन एक ऐसा अनमोल रिश्ता हार गया जिसे दुनिया की कोई दौलत वापस नहीं खरीद सकती। वह चुपचाप उठा, उसने वे कागजात समेटे और बिना कुछ कहे भारी कदमों से दरवाजे की ओर बढ़ गया।
बाहर हल्की बारिश हो रही थी और मिट्टी की सोंधी महक पूरे कमरे में फैली हुई थी। बालकनी में आरामकुर्सी पर बैठी मीरा अपनी पसंदीदा किताब ‘रेगिस्तान का फूल’ पढ़ रही थी। यह कहानी एक ऐसी स्त्री की थी जिसने अपने पति के युद्ध में चले जाने के बाद अकेले ही पूरे राज्य को संभाला था और जब सालों बाद उसका पति विजयी होकर लौटा, तो उसने रानी को महल के सारे सुख सौंपने चाहे। लेकिन रानी ने मुस्कुराकर कहा था कि जो हाथ तलवार और हल चलाना सीख गए हों, उन्हें अब सोने के कंगनों की जरूरत नहीं रही।
“दीदी, आपकी अदरक वाली चाय।” घर की सहायिका सुमति ने मेज पर कप रखते हुए कहा।
मीरा जैसे किसी गहरे ख्यालों की दुनिया से बाहर आई। उसने किताब बंद की और चाय का घूंट लिया। आज उसने अपने आर्किटेक्चर फर्म से छुट्टी ली हुई थी। उसकी इकलौती बेटी काव्या मेडिकल की पढ़ाई के लिए दूसरे शहर के हॉस्टल में रह रही थी। घर में एक अजीब सा सन्नाटा था, लेकिन यह सन्नाटा मीरा को चुभता नहीं था, बल्कि यह उसकी अपनी कमाई हुई शांति थी। आज उसे ऑफिस जाना था, कई अहम प्रोजेक्ट्स की मीटिंग थी, लेकिन कल रात आए एक फोन कॉल ने उसे आज घर पर रुकने पर मजबूर कर दिया था।
फोन राघव का था। वही राघव, जो पंद्रह साल पहले उसे और तीन साल की काव्या को सोता हुआ छोड़कर अमेरिका चला गया था। राघव की आंखों में एक बहुत बड़ी टेक कंपनी बनाने का सपना था और उसे लगता था कि परिवार, पत्नी और बच्ची की जिम्मेदारियां उसकी उड़ान में बेड़ियां बन रही हैं। वह बिना कुछ कहे, बिना कोई सहारा दिए, अपनी महत्वाकांक्षाओं के आसमान में उड़ने के लिए निकल गया था। और आज, पंद्रह साल बाद, वह सिलिकॉन वैली का एक बहुत बड़ा नाम बन चुका था। कल रात उसने फोन करके कहा था कि वह इंडिया आया हुआ है और आज सुबह मीरा से मिलने आना चाहता है।
मीरा के मन में विचारों का बवंडर उठ रहा था। वह राघव की तरह किसी अनजान मंजिल की तलाश में नहीं गई थी, बल्कि उसने यहीं जमीन पर रहकर अपनी जड़ें मजबूत की थीं।
तभी दरवाजे की घंटी बजी। सुमति ने जाकर दरवाजा खोला। बाहर एक आलीशान कार खड़ी थी और दरवाजे पर राघव खड़ा था। वही राघव, लेकिन अब उसके चेहरे पर एक अलग सा गुरूर और साथ ही एक अजीब सी बेचैनी थी। महंगे सूट और दुनिया भर की कामयाबी ओढ़े वह शख्स आज मीरा के सामने था।
मीरा अपनी जगह से नहीं उठी। उसने बस एक शांत निगाह से राघव को देखा।
“मीरा, मैं अंदर आ सकता हूँ?” राघव ने थोड़ी झिझक के साथ पूछा।
“दरवाजा खुला है राघव, लेकिन यह घर मेरा है। तुम यहां एक अतिथि की तरह आ सकते हो।” मीरा की आवाज में ना कोई गुस्सा था, ना ही कोई कंपन। एक ठहराव था, जो राघव को हैरान कर रहा था।
राघव अंदर आया और सोफे पर बैठ गया। उसने घर के चारों ओर देखा। यह वह छोटा सा जर्जर घर नहीं था जिसे वह छोड़कर गया था। यह मीरा की अपनी मेहनत से बनाया गया एक खूबसूरत, कलात्मक और सुकून भरा आशियाना था।
“तुम बहुत बदल गई हो मीरा। और काव्या कैसी है? मुझे पता चला कि वह मेडिकल कॉलेज में है।” राघव ने बात शुरू करने की कोशिश की।
“वह ठीक है। अपने सपनों को पूरा कर रही है।” मीरा ने संक्षेप में उत्तर दिया।
“मीरा, मैं जानता हूँ कि मैंने पंद्रह साल पहले जो किया, वह गलत था। मैंने तुम्हें और काव्या को उस वक्त अकेला छोड़ दिया जब तुम्हें मेरी सबसे ज्यादा जरूरत थी। लेकिन देखो, आज मैं क्या बन गया हूँ। मैंने वह सब हासिल कर लिया है जिसका मैंने सपना देखा था। मेरी कंपनी आज अरबों की है। मैं आज यहां तुम्हें तुम्हारी तपस्या का सिला देने आया हूँ।” राघव की आवाज में अब एक अधिकार और गर्व झलक रहा था।
उसने अपनी जेब से एक चेकबुक और कुछ पेपर्स निकाले। “यह ब्लैंक चेक है मीरा। और यह लंदन के एक खूबसूरत विला के पेपर्स हैं। मैं तुम्हें और काव्या को वह हर खुशी देना चाहता हूँ जिससे तुम महरूम रही हो। मैं चाहता हूँ कि तुम दोनों मेरे साथ चलो। मैं अपनी गलतियों का प्रायश्चित करना चाहता हूँ। मैं अब तुम्हें दुनिया की हर सुख-सुविधा दे सकता हूँ।”
मीरा ने उन कागजातों को देखा और फिर मुस्कुरा दी। उसकी मुस्कान में कोई व्यंग्य नहीं था, बस एक गहरी समझ थी। ठीक वैसे ही जैसे उसकी किताब की नायिका ने अपने पति से कहा था।
“राघव, तुम्हें लगता है कि तुम यहां मेरी जिंदगी के खालीपन को भरने आए हो? तुम्हें अपनी कामयाबी पर बहुत नाज है, और होना भी चाहिए। तुमने अपने सपनों के लिए एक बड़ी कीमत चुकाई है। लेकिन तुम एक बात भूल गए। जिस वक्त तुमने हमें छोड़ा था, वह मेरी जिंदगी का सबसे अंधकारमय वक्त था। मैंने काव्या की बुखार से तपती रातों में अकेले जागकर वक्त काटा है। मैंने लोगों के ताने सुने हैं, मैंने एक-एक पैसे के लिए मोहताज होकर ट्यूशन पढ़ाए हैं और फिर अपनी पढ़ाई पूरी करके अपना करियर बनाया है।”
राघव की आंखें झुक गईं।
मीरा आगे बोली, “तुम अपनी कामयाबी की दुनिया में संतुष्ट रहो राघव, और मैं अपनी इस शांति भरी दुनिया में खुश हूँ। तुमने तब मेरा साथ छोड़ा जब मुझे सिर्फ तुम्हारे सहारे और प्यार की कामना थी, तुम्हारे पैसों की नहीं। और आज तुम मेरे उस प्यार का सौदा अपनी दौलत से करने आए हो?”
“ऐसा नहीं है मीरा… मैं बस चाहता हूँ कि मैं तुम्हारे संघर्षों का मुआवजा दे सकूं। आओ, आज मैं तुम्हें वह जिंदगी देता हूँ जिसकी तुम हकदार हो। आज मैं समर्थ हूँ तुम्हारे हर दर्द को मिटाने के लिए।” राघव ने मिन्नत भरे स्वर में कहा।
“राघव, आज मैं भी समर्थ हूँ! मुझे अब किसी और के बनाए महल की जरूरत नहीं है। मैंने अपनी ईंटों से अपना आशियाना खुद खड़ा किया है। तुम कृपया अपनी उस दुनिया में लौट जाओ, जहां सफलता को बैंक बैलेंस से मापा जाता है। मुझे मेरे हाल पर, मेरी स्वतंत्रता में जीने दो। क्योंकि रिश्ते और प्यार मजबूरी में नहीं, बराबरी और स्वतंत्रता में जिए जाते हैं। जो प्यार किसी मुआवजे या प्रतिदान की उम्मीद रखे, वह प्यार नहीं, व्यापार है। और मैंने तुमसे प्यार किया था, कोई सौदा नहीं।”
राघव अवाक रह गया। उसने सोचा था कि मीरा उसे देखते ही रो पड़ेगी, शिकायतें करेगी और फिर उसकी दौलत देखकर सब माफ कर देगी। लेकिन यहां तो मीरा किसी और ही मिट्टी की बन चुकी थी। एक ऐसी स्त्री जिसे अब किसी सहारे की दरकार नहीं थी। उसे एहसास हुआ कि उसने दुनिया तो जीत ली, लेकिन एक ऐसा अनमोल रिश्ता हार गया जिसे दुनिया की कोई दौलत वापस नहीं खरीद सकती। वह चुपचाप उठा, उसने वे कागजात समेटे और बिना कुछ कहे भारी कदमों से दरवाजे की ओर बढ़ गया।
राघव के जाने के बाद मीरा ने एक गहरी सांस ली। खिड़की के बाहर बारिश अब रुक चुकी थी और सूरज की किरणें पत्तों से छनकर अंदर आ रही थीं। मीरा को लगा जैसे उसके कंधों से पंद्रह साल पुराना कोई अदृश्य बोझ उतर गया हो। उसने अपनी किताब उठाई और उसे बुकशेल्फ में रख दिया।
“सुमति!” मीरा ने आवाज दी।
“जी दीदी।”
“जरा मेरा टिफिन और लैपटॉप बैग पैक कर देना। मुझे ऑफिस जाना है।” मीरा ने अपने बाल बांधते हुए कहा।
सुमति हैरान रह गई। “पर दीदी, आपने तो आज छुट्टी ली हुई थी न! आपने कहा था कि आज कोई बहुत जरूरी मेहमान आने वाले हैं।”
मीरा ने खिलखिलाकर हंसते हुए कहा, “नहीं पगली, कोई नहीं आने वाला। और जो अतीत का हिस्सा बन चुका हो, उसके लिए अपने आज के काम और जिम्मेदारियों का नुकसान करना कोई समझदारी थोड़े ही है। जिंदगी आगे बढ़ने का नाम है, पीछे मुड़कर देखने का नहीं।”
सुमति अचरज से मीरा के चेहरे पर छाई उस नई और दृढ़ चमक को देखती रह गई और फिर मुस्कुराते हुए रसोई की तरफ चल दी। मीरा ने अपना बैग उठाया और एक नई ऊर्जा, एक नए विश्वास के साथ अपने कर्मक्षेत्र की ओर कदम बढ़ा दिए। आज वह पूरी तरह से आजाद थी।
क्या आपको लगता है कि मीरा ने राघव को माफ ना करके और अपना जीवन खुद जीने का फैसला लेकर सही किया? अगर आप मीरा की जगह होते तो क्या करते? अपने विचार कमेंट्स में जरूर बताएं!
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