देहरी की छाँव

 ट्रेन की खिड़की से बाहर देखते हुए मयंक की उँगलियाँ लगातार अपनी हथेलियों को मसल रही थीं। बाहर तेजी से पीछे छूटते हरे-भरे खेत, आम की अमराइयां और धूल उड़ाती पगडंडियाँ गवाह थीं कि उसका पैतृक कस्बा अब बस चंद मिनटों की दूरी पर था। पूरे आठ साल बीत चुके थे इस रास्ते से गुजरे हुए। आठ लंबे साल, जिनमें मौसम तो अनगिनत बार बदले, पर मयंक के दिल में जमी बर्फ कभी नहीं पिघली थी। आज जब वह वापस लौट रहा था, तो कोई त्योहार या खुशी का बुलावा नहीं था, बल्कि एक ऐसा मनहूस तार था जिसने उसके पैरों तले की ज़मीन खींच ली थी।

मयंक की बगल में बैठी उसकी पत्नी विशाखा चुपचाप अपनी गोद में रखे हैंडबैग को देख रही थी। उसके चेहरे पर गहरा खिंचाव था। वह इस परिवार में बड़े अरमानों के साथ ब्याह कर आई थी, लेकिन आठ साल पहले जिस भरी दोपहर में उसे और मयंक को इस घर से बेदखल किया गया था, वह ज़ख्म आज भी उसके सीने में हरा था। विशाखा को अच्छी तरह याद था कि कैसे बात-बात पर उसके सलीके, उसके मायके और उसके तौर-तरीकों पर तंज कसे जाते थे। उसे हमेशा यह अहसास कराया गया कि वह इस खानदान के काबिल नहीं है। विशाखा ने एक ठंडी सांस ली और मयंक की ओर देखा, जिसकी आँखें लाल थीं। किसी अपने के जाने का गम इंसान के सारे गिले-शिकवे एक पल में धुंधला कर देता है।

स्टेशन से बाहर निकलकर मयंक ने एक ऑटो किराए पर लिया। कस्बे की गलियाँ पहले से कुछ चौड़ी हो गई थीं, मगर हवा में वही चिर-परिचित सोंधी महक थी। जैसे-जैसे पुश्तैनी हवेली नुमा मकान करीब आ रहा था, मयंक की धड़कनें तेज हो रही थीं। नुक्कड़ पर पहुँचते ही ऑटो रुक गया। सामने वही भारी लकड़ी का मुख्य दरवाजा था। दरवाजे के बाहर सफेद कुर्ते-पायजामे में गाँव और कस्बे के कई बुजुर्ग सिर झुकाए खड़े थे। घर के बाहर बंधी गायें खूंटे से बंधी चुपचाप खड़ी थीं, जैसे उन्हें भी किसी अनहोनी का भान हो चुका था।

मयंक ने जैसे ही भारी कदमों से देहरी लांघी, सामने बरामदे में सफेद चादर से ढकी एक देह रखी थी। यह उसके पिता, दीनानाथ जी थे। वही दीनानाथ, जिनकी कड़क आवाज़ से कभी पूरा मुहल्ला थर्राता था, आज हमेशा के लिए खामोश सोए थे। उनके सिरहाने मयंक का छोटा भाई देवांश बैठा था। उसकी आँखें रोते-रोते सूज चुकी थीं और गालों पर सूखे आँसुओं की लकीरें खिंची थीं। मयंक को देखते ही देवांश की आँखों में एक अजीब सा दर्द उभरा। वह लड़खड़ाते हुए उठा और दौड़कर मयंक के सीने से लग गया। दोनों भाई बिना एक शब्द बोले, हिचकियों के साथ रोने लगे। आठ साल की दूरी, अनगिनत फोन कॉल्स की बेरुखी, ज़मीन-जायदाद के ताने और अहंकार की विशाल दीवार उस एक आलिंगन में भरभराकर गिर गई।

विशाखा ने जब अंदर कदम रखा, तो उसकी नज़रें अनायास ही घर के हर कोने को टटोलने लगीं। घर काफी बदल चुका था। जिस पुराने रसोईघर में धुएं के कारण उसका दम घुटता था, वहाँ अब एक आधुनिक चिमनी और मार्बल का स्लैब लगा हुआ था। आँगन के पास जो जर्जर सीढ़ियाँ थीं, जिन पर चढ़ते हुए कभी उसका पैर फिसल गया था, वहाँ अब मजबूत लोहे की रेलिंग लगी थी। जिस पुराने कमरे में सीलन की बदबू आती थी, वहाँ नई खिड़कियाँ और चमकदार पुट्टी लगी थी। विशाखा हैरान थी कि ससुर जी तो हमेशा कंजूस होने का ताना देते थे, फिर उन्होंने इस पुराने मकान को इतना आधुनिक और सुरक्षित क्यों बनवाया? मगर शोक के इस माहौल में यह सब सोचना भी उसे अनुचित लगा।

अंदर कमरे में सफेद साड़ियों में लिपटी औरतें बैठी थीं। मयंक की चाची, कौशल्या देवी, जो कभी इस घर में हर झगड़े की जड़ मानी जाती थीं, विशाखा को देखते ही दहाड़ मारकर रो पड़ीं। “अरे बहू! तू आ गई? देख, तेरे ससुर तुझे कितना याद करते थे! चले गए हम सबको अनाथ करके।” कौशल्या देवी ने विशाखा को बाहों में भर लिया। विशाखा के बदन में सिहरन दौड़ गई। यही चाची थीं, जिन्होंने आठ साल पहले दीनानाथ जी के कान भरे थे कि नई बहू बेटे को परिवार से काट रही है और अलग चूल्हा जलाना चाहती है। विशाखा की आँखों में एक भी आँसू नहीं आया, मगर उसने सिर झुकाकर चाची के कंधे पर हाथ रख दिया। दुनियादारी के रीति-रिवाज भी बड़े अजीब होते हैं, जहाँ नफरत करने वाले भी सबसे आगे बैठकर विलाप करते हैं।

दोपहर ढलते-ढलते अंतिम यात्रा की तैयारी होने लगी। मयंक जब पिता के पार्थिव शरीर को कंधा देने आगे बढ़ा, तो उसका पूरा शरीर कांप उठा। आठ साल पहले जब वह घर छोड़कर जा रहा था, तब दीनानाथ जी ने लाठी पटकते हुए कहा था, “अगर आज इस चौखट के बाहर कदम रखा, तो याद रखना मेरे जीते-जी इस घर में कभी मत लौटना। अपनी मेहनत से बनाई इस जायदाद पर तेरा कोई हक नहीं रहेगा।” मयंक ने भी गुस्से में अपना बैग उठाया था और पलटकर कहा था, “मुझे आपकी एक पाई भी नहीं चाहिए। मैं अपनी ज़िंदगी अपने दम पर जी सकता हूँ।” उस दिन दोनों का घमंड जीत गया था और बाप-बेटे का रिश्ता हार गया था।

श्मशान घाट पर जब मयंक ने कांपते हाथों से पिता की चिता को मुखाग्नि दी, तो लपटों के साथ-साथ उसके भीतर का सारा आक्रोश भी पिघलने लगा। उसे पिता का वह रूप याद आने लगा, जो इस कड़वाहट के पीछे कहीं खो गया था। कैसे बचपन में जब उसे निमोनिया हुआ था, तो यही पिता उसे गोद में उठाकर पूरी रात अस्पताल के बरामदे में टहलते रहे थे। कैसे पहली साइकिल सिखाते वक्त पीछे से कैरियर पकड़े-पकड़े वे खुद हांफने लगे थे, पर मयंक को गिरने नहीं दिया था। मयंक ने महसूस किया कि बुढ़ापे में माता-पिता अक्सर असुरक्षा की भावना से घिर जाते हैं। उनका गुस्सा दरअसल उनका डर होता है—खो जाने का डर, अकेले रह जाने का डर—और बच्चे अक्सर उस डर को नफरत समझकर दूरियाँ बना लेते हैं।

क्रिया-कर्म और तेरहवीं के दिन बड़ी शांति से बीत गए। कस्बे के रिश्तेदार, पड़ोसी और पुराने जानकार आते, हाथ जोड़ते और दीनानाथ जी की बातें करते। कोई कहता, “मास्टर जी आखिरी वक्त में हर किसी से बड़े बेटे की तरक्की की बातें करते थे।” कोई कहता, “वे अक्सर डाकिया की राह तकते थे कि शायद मयंक की कोई चिट्ठी आई हो।” विशाखा ये सब सुनती तो उसके दिल में एक टीस उठती, पर उसका मन यह मानने को तैयार नहीं था कि इतने कठोर ससुर कभी बदल भी सकते हैं।

तेरहवीं की रस्म पूरी होने के अगले दिन, जब घर के सारे मेहमान चले गए, देवांश एक पुराना लोहे का बक्सा उठाकर आँगन में ले आया। उसने एक ताला खोला और उसमें से एक पीला पड़ चुका बड़ा लिफाफा निकाला।

“भैया, यह बाबूजी ने मुझे अपनी अंतिम सांसों से कुछ दिन पहले दिया था,” देवांश की आवाज़ भर्रा गई। “उन्होंने मुझसे कसम ली थी कि जब तक आप खुद इस घर में न आ जाओ, यह लिफाफा न खोला जाए।”

मयंक ने थरथराते हाथों से वह लिफाफा लिया। भीतर एक पत्र था, जिस पर दीनानाथ जी की जानी-पहचानी, सधी हुई लिखावट थी। मयंक ने पढ़ना शुरू किया, और उसके साथ विशाखा भी पास आकर खड़ी हो गई।

“मयंक बेटा,

अगर यह कागज़ तेरे हाथों में है, तो इसका मतलब है कि ईश्वर ने मुझे तुझसे आमने-सामने माफी माँगने की मोहलत नहीं दी। उस मनहूस दोपहर को मैंने जो कुछ कहा, वह एक बूढ़े, असुरक्षित और डरपोक बाप का पागलपन था। मुझे लगा था कि अगर मैंने सख्ती नहीं दिखाई, तो मेरा बड़ा बेटा, जो मेरी रीढ़ की हड्डी था, मुझे इस वीराने में अकेला छोड़कर शहर की चकाचौंध में खो जाएगा। मेरा रोकने का तरीका गलत था, बेटा। बहुत गलत था। मैंने अपने डर को गुस्से का चोला पहना दिया।

तेरे जाने के बाद मुझे अपनी गलती समझ आई, पर मेरा झूठा स्वाभिमान मुझे फोन उठाने नहीं देता था। तूने जब पैसे भेजने चाहे, तो मैंने लौटा दिए, क्योंकि मुझे तेरे पैसों की नहीं, तेरी मौजूदगी की भूख थी। इस मकान में जो तूने बदलाव देखे हैं, वह मैंने अपनी पेंशन और पुश्तैनी बाग बेचकर करवाए हैं। विशाखा बहू जब पहली बार आई थी, तो उसने कहा था कि रसोई में धुआं बहुत होता है और सीढ़ियों पर डर लगता है। मैंने यह सब इसलिए बनवाया ताकि जब कभी मेरा बेटा और बहू लौटें, तो उन्हें यह घर पराया और तकलीफदेह न लगे।

विशाखा बेटी से कहना, उसका ससुर बहुत अभागा था जो अपनी सगी बेटी जैसी बहू का मान नहीं रख सका। मैंने रिश्तेदारों की बातों में आकर उस पर जो तोहमतें लगाईं, उसका पश्चाताप मुझे हर दिन जलाता रहा।

देवांश ने मेरी बहुत तीमारदारी की है, पर वह छोटा है। बेटा मयंक, मैंने अपनी सारी वसीयत तुम दोनों भाइयों के नाम बराबर कर दी है। पर मेरी असली वसीयत यह मकान नहीं, तुम दोनों का प्यार है। मेरी चिता की राख के साथ अपने मन का मैल भी बहा देना। अगर हो सके, तो अपने इस अभागे बाप को माफ कर देना।”

पत्र समाप्त होते-होते मयंक का गला पूरी तरह रुंध गया था। वह फफक-फफक कर रो पड़ा। विशाखा की आँखों से भी आंसुओं की अविरल धारा बह निकली। वह नया किचन, वह रेलिंग, वह खिड़कियाँ… वे सिर्फ ईंट और सीमेंट की मरम्मत नहीं थीं, बल्कि एक पश्चाताप से भरे पिता की मूक प्रार्थना थीं, जो वे शब्दों में कभी कह नहीं पाए थे।

उसी वक्त चाची कौशल्या देवी कमरे के कोने में खड़ी आँसू पोंछ रही थीं। उनका सिर शर्म से झुका हुआ था। वे धीरे से आगे बढ़ीं और कांपती आवाज़ में बोलीं, “बहू… मयंक बेटा… मुझे माफ कर दो। भाई साहब तो सीधे थे, मेरे ही मन में जलन थी कि बड़ा बेटा शहर जाकर ज्यादा कमाने लगा तो कहीं सारा रुतबा उसी का न हो जाए। मैंने ही भाई साहब के कान भरे थे। आज मुझे अपनी ही नजरों में घिन आ रही है।”

विशाखा ने चाची की ओर देखा। उसके मन में जो कड़वाहट सालों से जमी थी, वह पिता के उस पत्र की पवित्रता के आगे बहुत छोटी लग रही थी। विशाखा आगे बढ़ी और उसने कौशल्या देवी के हाथ थाम लिए। “चाचीजी, जो बीत गया, उसे याद करके अब और घाव मत कुरेदिए। बाबूजी जाते-जाते सब कुछ साफ कर गए हैं। अब इस घर में नफरत की कोई जगह नहीं बचेगी।”

उस शाम, सूरज की लालिमा जब आँगन में उतर रही थी, मयंक और देवांश चबूतरे पर एक साथ बैठे थे। दोनों के हाथ एक-दूसरे की हथेलियों में बंधे थे। देवांश ने कहा, “भैया, बाबूजी के जाने के बाद मैं अंदर से टूट चुका था। मुझे लगता था कि मैं दुनिया में अकेला रह गया हूँ। पर आज आपको देखकर लग रहा है कि बाबूजी कहीं नहीं गए, वे आपके रूप में यहीं मेरे पास हैं।”

मयंक ने छोटे भाई के कंधे पर हाथ रखा और दृढ़ता से कहा, “तू कभी अकेला नहीं होगा देवांश। शहर में मेरी नौकरी है, मुझे वहाँ जाना होगा, लेकिन यह घर मेरी जड़ें हैं। हम हर दीवाली, हर होली इसी आँगन में मनाएंगे। ज़मीन के टुकड़े हो सकते हैं, पर भाइयों के दिल नहीं बँटते।”

दो दिन बाद जब मयंक और विशाखा की वापसी की गाड़ी का वक्त हुआ, तो विशाखा ने मुख्य देहरी पर घी का एक दीपक जलाया। उसने झुककर उस चौखट को चूमा, जहाँ से कभी वह अपमानित होकर निकली थी। आज उस चौखट में उसे परायापन नहीं, बल्कि एक पिता का गहरा, मूक आशीर्वाद महसूस हो रहा था।

गाड़ी जैसे ही कस्बे की सीमा से बाहर निकली, मयंक ने खिड़की का शीशा नीचे किया और ठंडी हवा को महसूस किया। उसके कुर्ते की जेब में पिता का वह पत्र रखा था। उसे ऐसा लगा मानो हवा में गूंजती हर सांस कह रही हो कि रिश्ते कभी मरते नहीं, बशर्ते हम अपने अहंकार को समय रहते दफनाना सीख लें। ज़िंदगी इतनी लंबी नहीं होती कि उसे नफरत और गिले-शिकवों में जाया किया जाए; कभी-कभी झुक जाना, टूटने से कहीं बेहतर होता है।

आपको क्या लगता है, एक परिवार को बिखरने से बचाने के लिए सबसे पहले किसे झुकना चाहिए—बड़ों को अपने तजुर्बे और बड़प्पन के साथ, या छोटों को अपने आदर के साथ? अपनी राय कमेंट में जरूर लिखें।

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