उस दिन मालती के पैरों तले से जमीन खिसक गई थी। जिस मालती ने बचपन में भाई के हिस्से की रोटी कभी नहीं छीनी थी, आज उसी पर चोरी का इल्जाम था! उसने रो-रोकर अपने भाइयों की तरफ देखा, पर दोनों खामोश रहे। भाभी के पीछे खड़े बड़े भाई ने अपनी नजरें फेर लीं क्योंकि भाभी का मायका बहुत रसूखदार था और घर में उन्हीं की चलती थी। छोटे भाई ने कुछ बोलना चाहा, पर वह भी बड़े भाई के आर्थिक अहसानों तले दबा हुआ था। मालती को अपनी सफाई देने का मौका तक नहीं दिया गया।
सुबह की पहली किरण के साथ ही मालती की दौड़भाग शुरू हो जाती थी। पहले ससुर जी का गर्म काढ़ा, फिर सास जी की बीपी और शुगर की दवाइयां, बच्चों के स्कूल बैग में रखे जाने वाले लंच बॉक्स, पति का प्रेस किया हुआ कुर्ता और नाश्ते की गर्म चाय। घर के हर एक सदस्य की जरूरत को अपनी सांसों में पिरोकर जब वह ग्यारह बजे तक रसोई का काम समेटकर बैठी, तो उसकी कमर में एक हल्की सी मीठी टीस उठ रही थी। उसने सोचा कि दस मिनट चैन से बैठकर ड्राइंग रूम की मेज पर पड़ा आज का अखबार देख ले।
उसने अखबार का पहला पन्ना पलटा ही था कि बीच के एक विशेष स्तंभ पर उसकी नजर ठहर गई। बड़े-बड़े काले अक्षरों में छपा था—”दौलत की तराजू पर तुलते खून के रिश्ते”।
वह पंक्ति पढ़ते ही मालती के हाथ जैसे सुन्न पड़ गए। भीतर कुछ ऐसा चटका कि आंखों के कोरों से गर्म आंसुओं की दो बूंदें सीधे उस छपे हुए पन्ने पर गिर पड़ीं। वह अखबार वहीं सोफे पर छूट गया और मालती भारी कदमों से अपने कमरे में आकर बिस्तर पर ढह सी गई।
उस एक शीर्षक ने उसके सीने में दबे उस पुराने बक्से का ताला खोल दिया था, जिसमें उसका बीता हुआ कल बंद था। यादों का एक पूरा दरिया उमड़ आया। उसे याद आया अपना वह पुराना, खपरैल वाला दो कमरों का घर। जहां जब पंसारी की दुकान से आधा किलो चना या एक किलो मोटा आटा उधार पर आता था, तब जाकर मां मिट्टी के चूल्हे में उपले सुलगाती थी। बरसात के दिनों में जब छत से पानी टपकता, तो मां बर्तनों को जगह-जगह रख देती ताकि फर्श पर कीचड़ न हो।
वह दिन मालती कैसे भूल सकती थी जब हफ्ते-हफ्ते भर केवल उबले हुए आलू या पतली मक्के की राब में थोड़ा सा नमक डालकर पूरा परिवार दिन काटता था। उसका छोटा भाई गोलू, जिसे नमकीन चीजें बिल्कुल नहीं भाती थीं, वह अक्सर कटोरी सामने रखकर रूठ जाता था। तब मां अपनी फटी हुई धोती के पल्लू से पसीना पोंछती और पड़ोस वाली चाची के घर जाती। चाची भी बहुत दयालु थीं, कभी खाली हाथ नहीं लौटाती थीं। वे एक कटोरी में थोड़ी सी पिसी हुई खांड या गुड़ की डली थमा देतीं।
मां उस गुड़ की डली को बड़े सहेजकर रखती। आधा टुकड़ा गोलू की कटोरी में घोलती और बाकी आधा यह कहकर पुराने टीन के डिब्बे में छुपा देती कि “कल के लिए भी थोड़ा बचाना है।” गोलू मुंह बिचकाकर, आधी मीठी और आधी बेस्वाद राब को घूंट-घूंट पीता और बड़बड़ाता कि उसे यह पसंद नहीं। तब मालती अपने हिस्से का निवाला रोककर उसे डांटती, “चुपचाप खा ले गोलू! मां रोज-रोज किसी के सामने हाथ फैलाने नहीं जाएगी।” पर डांटते हुए मालती का अपना गला रुंध जाता था।
भूख की आग भी क्या अजीब होती है। जब पेट की अंतड़ियां ऐंठती हैं, तब इंसान यह नहीं देखता कि खाना बासी है, कड़ा है या बेस्वाद। बस पेट की ज्वाला शांत होनी चाहिए। रात को जब चूल्हा ठंडा पड़ जाता, तो तीनों भाई-बहन मां की फटी हुई सूती रजाई के भीतर एक-दूसरे से चिपककर लेट जाते ताकि ठंड भी कम लगे और भूख का अहसास भी मिट जाए।
पिताजी कस्बे की एक छोटी सी मिल में मुंशी थे। ऐसा नहीं था कि वे मेहनत नहीं करते थे। सुबह छह बजे से रात नौ बजे तक वे बही-खातों में सिर खपाते रहते थे। लेकिन जो भी चार पैसे आते, वे दादाजी के दमे के इलाज और हम तीनों बच्चों की स्कूल की फीस में चले जाते थे। सरकारी राशन की दुकान से मिलने वाले गेंहू और चावल ही जिंदगी की सबसे बड़ी ढाल थे। दाल तो घर में किसी बड़े त्योहार या मेहमान के आने पर ही बनती थी।
पर उस घोर तंगी के दौर में भी एक चीज कभी कम नहीं हुई—वह था आपस का असीम प्रेम और संस्कार। स्कूल में जब मास्टर जी तीनों भाई-बहनों की कॉपियां देखते, तो हमेशा कहते, “दीनानाथ जी, आपके बच्चे भले ही फटे बस्ते लेकर आते हैं, लेकिन इनकी तमीज और एक-दूसरे के लिए फिक्र देखकर दिल खुश हो जाता है। बच्चे हों तो ऐसे।” यह सुनकर पिताजी का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता था।
समय का पहिया घूमा। भाई-बहन बड़े हुए। मालती ने सिलाई-कढ़ाई सीखकर अपनी पढ़ाई का खर्च खुद उठाया। बड़ा भाई प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में दिन-रात एक कर गया और छोटा भाई भी एक प्राइवेट कंपनी में लग गया। फिर धीरे-धीरे सबकी शादियां हो गईं।
पिताजी इस दुनिया से चले गए, लेकिन जाते-जाते वे अपने पीछे एक भरा-पूरा परिवार छोड़ गए थे। शुरुआत में सब कुछ बहुत अच्छा रहा। सब अपनी-अपनी गृहस्थी में खुश थे। तीज-त्योहारों पर सब मिलते, पुराने दिनों को याद करके हंसते और मां की आंखों में संतोष के आंसू छलक आते थे।
लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, नई पीढ़ी के कदम आंगन में पड़े और दुनिया की हवा बदलने लगी। धीरे-धीरे आपसी बातचीत का दायरा कम होने लगा और बातों में ‘किसके पास क्या है’ का वजन बढ़ने लगा। बड़े भाई ने शहर में अपना बड़ा फ्लैट ले लिया था, उनकी आमदनी अच्छी थी। छोटा भाई अभी भी मध्यम वर्ग की जद्दोजहद में था, और मालती का ससुराल भी एक सामान्य परिवार था जहां जिम्मेदारियां ज्यादा थीं और बचत कम।
मालती ने धीरे-धीरे एक बहुत कड़वी सच्चाई महसूस की। बचपन में जिस परिवार में प्यार की गिनती आंसुओं और त्याग से होती थी, अब वहां कद्र बैंक बैलेंस और गाड़ियों के मॉडल देखकर होने लगी थी। मालती चाहे मायके जाकर हफ्तों रहकर मां की सेवा करती, रसोई का सारा काम अकेले संभालती, भाई-भाभियों के बच्चों को अपनी जान से ज्यादा चाहती, लेकिन तारीफ हमेशा उसी की होती जो बड़े-बड़े तोहफे लेकर आता। जिसने सोने की अंगूठी दी, उसकी बात सिर-माथे पर; और जिसने हाथ से सिलकर कुर्ता दिया, उसका तोहफा अलमारी के किसी अनदेखे कोने में फेंक दिया गया।
यह दर्द तब नासूर बन गया जब दो साल पहले मां की तबीयत बिगड़ने पर पुश्तैनी जेवरों के बंटवारे को लेकर घर में कलह मची। बड़े भाई की पत्नी ने सरेआम यह आरोप लगा दिया कि मालती ने मां के साथ रहकर उनके कुछ कीमती जेवर चुपके से अपने पास रख लिए हैं।
उस दिन मालती के पैरों तले से जमीन खिसक गई थी। जिस मालती ने बचपन में भाई के हिस्से की रोटी कभी नहीं छीनी थी, आज उसी पर चोरी का इल्जाम था! उसने रो-रोकर अपने भाइयों की तरफ देखा, पर दोनों खामोश रहे। भाभी के पीछे खड़े बड़े भाई ने अपनी नजरें फेर लीं क्योंकि भाभी का मायका बहुत रसूखदार था और घर में उन्हीं की चलती थी। छोटे भाई ने कुछ बोलना चाहा, पर वह भी बड़े भाई के आर्थिक अहसानों तले दबा हुआ था। मालती को अपनी सफाई देने का मौका तक नहीं दिया गया।
उस दिन मालती ने अपनी रोती हुई मां के पैर छुए और उस घर की दहलीज पार कर ली। उस रात उसने डायरी में लिखा था—”जब तक जेबें खाली थीं, हमारे दिल भरे हुए थे। आज जब तिजोरियां भर गईं, तो दिल इतने संकरे हो गए कि खून के रिश्ते भी दम तोड़ने लगे। जहां पैसा आता है, वहां से इंसानियत और रिश्ते चुपचाप विदा ले लेते हैं।”
आज दो साल बाद, अखबार की उस हेडलाइन ने मालती के उस पुराने घाव को फिर से कुरेद दिया था। वह बिस्तर पर पड़ी सुबक रही थी। तभी दरवाजे की घंटी बजी।
मालती ने जल्दी से अपनी आंखें पोंछीं, दुपट्टा ठीक किया और बाहर आई। जैसे ही उसने दरवाजा खोला, उसके कदम वहीं जम गए।
सामने उसका छोटा भाई गोलू खड़ा था। उसके हाथ में एक बड़ा सा बैग था और चेहरा उतरा हुआ था। उसके पीछे बड़ा भाई और दोनों भाभियां भी सिर झुकाए खड़ी थीं। बीच में व्हीलचेयर पर बैठी बूढ़ी मां थीं, जिनकी कमजोर आंखें अपनी बेटी को ढूंढ रही थीं।
मालती अवाक रह गई। “आप लोग… यहां?”
गोलू ने आगे बढ़कर अपनी दीदी के दोनों हाथ पकड़ लिए और फूट-फूट कर रो पड़ा। “दीदी! हमें माफ कर दो। हम अंधे हो गए थे।”
मालती को कुछ समझ नहीं आया। उसने देखा कि बड़ा भाई भी आगे आया और उसकी आंखों में शर्मिंदगी का अथाह समंदर था। बड़े भाई ने अपनी जेब से एक पुराना, पीला पड़ चुका लिफाफा निकाला और मालती के हाथों में रख दिया।
“यह क्या है भैया?” मालती ने कांपती आवाज में पूछा।
बड़े भाई ने रुंधे गले से कहा, “मालती, पिछले हफ्ते जब मां की तबीयत बहुत ज्यादा खराब हुई और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा, तब डॉक्टरों ने कह दिया था कि शायद वे अब ज्यादा दिन न जी पाएं। उस वक्त मां केवल तुम्हारा नाम ले रही थीं। कल जब हम मां की पुरानी संदूक की सफाई कर रहे थे ताकि उनके इलाज के पुराने पर्चे ढूंढ सकें, तो इस लिफाफे में वो सारे कंगन और जेवर मिले, जिनके गायब होने का झूठा इल्जाम हमने तुम पर मढ़ा था।”
लिफाफे के अंदर मां की हाथ से लिखी एक टूटी-फूटी पर्ची थी, जिसमें लिखा था—“यह कंगन मैंने अपनी बीमारी के बाद के दिनों के लिए और अनाथ आश्रम में दान देने के लिए अलग रखे हैं। मेरे बच्चों को आपस में कभी इस बात पर झगड़ने मत देना।”
बड़ी भाभी, जो हमेशा अपनी अमीरी के घमंड में रहती थी, वह भी आगे बढ़ी और उसने मालती के पैर छू लिए। उसकी आवाज कांप रही थी, “दीदी, मुझे अपनी सोच पर घिन आ रही है। मैंने हमेशा रिश्तों को पैसों की तराजू पर तोला। मुझे लगा कि जिसके पास धन नहीं, वह नीयत का कमजोर होता है। लेकिन मां की बीमारी में जब पैसे काम नहीं आए, जब सिर्फ एक-दूसरे के सहारे की जरूरत थी, तब मुझे समझ आया कि मैंने अपने स्वार्थ में कितना सुंदर परिवार बिखेर दिया। मुझे माफ कर दीजिए।”
कमरे में सन्नाटा छा गया था। मालती ने देखा कि व्हीलचेयर पर बैठी मां अपने कांपते हाथ उसकी तरफ फैला रही थीं।
मालती दौड़कर मां के कदमों में बैठ गई और उनका चेहरा अपनी हथेलियों में थाम लिया। मां ने धीरे से उसके सिर पर हाथ फेरा और कहा, “मेरी बच्ची… भूख के उन दिनों में जब हम आधा पेट सोते थे, तब भी कभी हमारे घर में इतनी कड़वाहट नहीं हुई जितनी इन कागजी नोटों ने भर दी। मैंने अपने बच्चों को रोटी बांटना सिखाया था, दौलत की खातिर रिश्ते काटना नहीं।”
बड़े भाई ने अपनी जेब से एक छोटा सा डिब्बा निकाला। उसने ढक्कन खोला—उसमें वही गुड़ की एक डली रखी थी, जो वे रास्ते में आते हुए किसी गांव की दुकान से खरीद कर लाए थे।
बड़े भाई ने वह गुड़ का टुकड़ा तोड़ा, एक टुकड़ा मालती के मुंह में रखा और दूसरा अपने मुंह में। उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे, “दीदी, आज हमें वह बचपन लौटा दो। हमें यह दिखावे की जिंदगी, यह अहंकार और यह खोखली रईसी नहीं चाहिए जिसने हमें एक-दूसरे से जुदा कर दिया था। आज के बाद हमारे बीच कभी पैसे की दीवार नहीं आएगी। अगर इस परिवार में कोई सबसे अमीर है, तो वो तुम हो, जिसने दो साल तक इतना बड़ा अपमान सहकर भी कभी हमारे खिलाफ किसी से बुरा नहीं कहा।”
मालती का दिल भर आया। जो कड़वाहट उसके मन में वर्षों से बर्फ की तरह जमी हुई थी, वह पश्चाताप की इस पावन धूप में एक ही पल में पिघल गई। उसने अपने दोनों भाइयों को गले से लगा लिया।
उस दोपहर मालती के घर का माहौल बदल गया था। कोई बड़ा नहीं था, कोई छोटा नहीं था। सबने मिलकर जमीन पर चटाई बिछाई। मालती ने सादी दाल और रोटियां बनाईं। सबने एक साथ बैठकर वही सादा खाना खाया, और उस दिन हर किसी को उस सादे भोजन में वही स्वाद आया जो बरसों पहले बचपन में मां के हाथ की सूखी रोटियों में आता था।
पैसा सुविधा दे सकता है, सम्मान खरीद सकता है, लेकिन वह प्रेम, विश्वास और अपनत्व की वह गर्माहट कभी नहीं दे सकता जो केवल निःस्वार्थ रिश्तों में मिलती है। इंसानियत और रिश्तों की नींव पैसों से नहीं, बल्कि एक-दूसरे के प्रति त्याग और सम्मान से मजबूत होती है। जब तक हालात चाहे जैसे भी हों, अगर परिवार का हर सदस्य एक-दूसरे के हाथ थामे खड़ा है, तो दुनिया की कोई भी तंगी या मुसीबत उन्हें तोड़ नहीं सकती।
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