दहलीज के इस पार

 उस दिन भी जब ड्राइंग रूम में ननदों की विदाई की बातें हो रही थीं, सौम्या चुपचाप अपने कमरे में आई और अलमारी के सामने खड़ी हो गई। उसने दोनों ननदों के लिए बहुत सुंदर और कीमती साड़ियां खरीदकर रखी थीं। उसने सोचा था कि इस बार जब वे जाएंगी, तो वह खुद अपने हाथों से उन्हें यह भेंट देगी। लेकिन तभी पल्लवी की आवाज़ उसके कानों में पड़ी, जो बालकनी में खड़ी होकर फोन पर अपनी मौसी से बात कर रही थी।

“अरे मौसी, हम तो बस आ ही रहे हैं। भैया ने बहुत ज़िद की तो रुक गए, वरना भाभी के हाथ की चाय-नाश्ते के अलावा इस घर में अब अपनापन बचा ही क्या है? मां-बाबूजी के जाने के बाद तो मायका बस नाम का रह गया है। भाभी तो बस अपने काम में लगी रहती हैं, उनसे क्या बात करें।”

शाम ढलते ही ड्राइंग रूम से आती ठहाकों की आवाज़ें रसोई की दीवारों से टकराकर लौट रही थीं। चाय की केतली में उबलती पत्ती की खुशबू पूरे घर में फैल रही थी, लेकिन उस खुशबू में सौम्या के मन का सूनापन घुलता जा रहा था। सौम्या ने करीने से कांच की ट्रे में अदरक वाली चाय के कप सजाए, साथ में गरमा-गरम कचौड़ियाँ रखीं और गहरी सांस लेकर चेहरे पर एक सहज मुस्कान ओढ़ ली। जैसे ही उसने ड्राइंग रूम का पर्दा हटाया, एक क्षण के लिए वहां सन्नाटा खिंच गया। बातों का जो सिलसिला कुछ पल पहले तक परवान चढ़ रहा था, वह अचानक यूं थम गया मानो कोई अजनबी अनचाहे ही उनकी निजता में दाखिल हो गया हो।

“दीदी, आपके लिए बिना चीनी वाली चाय बनाई है, और रीमा, तुम्हारे लिए इलायची वाली,” सौम्या ने ट्रे को सेंटर टेबल पर रखते हुए बड़े अपनेपन से कहा।

बड़ी ननद पल्लवी ने अपने फोन की स्क्रीन पर नज़रें गड़ाए हुए ही कप उठा लिया, “हम्म, रख दो।” छोटी ननद रीमा ने एक हल्की सी औपचारिक मुस्कान दी और तुरंत विषय बदलते हुए अपने भाई कुणाल से बोली, “भैया, आप उस दिन जो बात कर रहे थे ना, बुआ जी के बेटे की शादी वाली… उसका क्या तय हुआ?”

सौम्या वहीं खड़ी रही, इस उम्मीद में कि शायद कोई उससे भी पूछेगा कि उसकी राय क्या है, या कम से कम बैठने को ही कह देगा। लेकिन कुणाल अपनी बहनों के साथ पुरानी यादों और घर की नई चर्चाओं में इस कदर मशगूल हो गया कि उसे अपनी पत्नी की मौजूदगी का अहसास तक नहीं रहा। सौम्या कुछ पल चुपचाप खड़ी रही, फिर उसने खाली प्लेटें उठाईं और खामोशी से वापस रसोई की ओर मुड़ गई। पीछे से फिर वही ठहाके गूंज उठे जो उसके वहां रहते हुए अचानक थम गए थे।

यह कोई पहला दिन नहीं था। पिछले बारह वर्षों से सौम्या इसी अदृश्य दीवार से टकरा रही थी। बारह साल पहले जब वह दुल्हन बनकर इस प्रतिष्ठित और भरे-पूरे परिवार में आई थी, तो उसके सपने बहुत सीधे और सादे थे। वह मानती थी कि मायका अगर जड़ें देता है, तो ससुराल वह ज़मीन है जहां औरत को अपनी शाखाएं फैलानी होती हैं। उसने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी थी। सास-ससुर की हर सेवा, पति की हर ज़रूरत और ननदों के हर लाड़-प्यार को उसने अपनी प्राथमिकता बना लिया था।

शुरुआती दिनों में जब भी घर में कोई महत्वपूर्ण निर्णय लिया जाता—चाहे वह घर का रंग-रोगन हो, किसी रिश्तेदार को क्या भेंट देनी है, या त्योहारों का बजट—सौम्या को हमेशा उस परिचर्चा से बाहर रखा जाता। सास सरला देवी बड़े सहज भाव से कह देतीं, “बहू, तुम अभी नई हो, तुम्हें हमारे खानदान के तौर-तरीके नहीं पता। तुम जाकर आराम करो या शाम के खाने की तैयारी देख लो।” सौम्या तब यही सोचकर मुस्कुरा देती कि अभी नया परिवेश है, धीरे-धीरे सब समझ आ जाएगा और वह इस परिवार का अभिन्न अंग बन जाएगी।

पर वक्त बीतता गया, साल दर साल गुज़रते गए, लेकिन वह ‘नयापन’ कभी खत्म ही नहीं हुआ। सौम्या को घर के काम-काज, रसोई के प्रबंधन, और अतिथियों के सत्कार का पूरा जिम्मा तो सौंप दिया गया, लेकिन घर के दिलों की चाबी उसे कभी नहीं मिली। वह उस बड़े से घर में रहकर भी एक पराई दर्शक बनकर रह गई थी। कभी उसने बालकनी में अपनी पसंद के कुछ पौधे लगाने चाहे, तो सास ने टोक दिया कि यह सब अच्छा नहीं लगता। कभी उसने अपने मायके से आई कोई खूबसूरत चादर बिछाई, तो अगले ही दिन उसे हटाकर अलमारी के किसी कोने में रख दिया गया। उसके द्वारा दी गई साड़ियों या उपहारों को सास अक्सर किसी दूर की रिश्तेदार या कामवाली को दे देतीं, यह कहकर कि यह उनके स्तर का नहीं है।

कुणाल बुरा इंसान नहीं था। वह कमाता अच्छा था, कभी ऊंची आवाज़ में बात नहीं करता था और दुनिया की नज़रों में एक सुलझा हुआ पति था। लेकिन उसकी दुनिया अपने काम, अपने माता-पिता और अपनी दोनों बहनों के इर्द-गिर्द ही घूमती थी। जब भी सौम्या ने अपने अकेलेपन की बात उससे कहनी चाही, उसने बात को बहुत हल्के में उड़ा दिया। “तुम बेवजह हर बात को दिल से लगा लेती हो सौम्या। मां और बहनें अपने बचपन के किस्से दोहराती हैं, अब उसमें तुम क्या करोगी? तुम्हें किस चीज़ की कमी है इस घर में? इज़्ज़त है, सब सुख-सुविधाएं हैं, फिर यह फालतू की बातें क्यों सोचती हो?” कुणाल की इस संवेदनहीन दलील के बाद सौम्या ने धीरे-धीरे उससे शिकायत करना ही छोड़ दिया था।

समय का चक्र घूमा। सास-ससुर एक के बाद एक दुनिया से विदा हो गए। सौम्या ने उस कठिन दौर में भी अपनी ननदों को मां की तरह संभाला। उसे लगा था कि अब शायद वे दूरियां मिट जाएंगी जो पीढ़ियों से चली आ रही थीं। उसे लगा था कि अब जब ननदें मायके आएंगी, तो वे अपने भाई के साथ-साथ अपनी भाभी को भी गले लगाएंगी, घर के पुराने दुखों को साझा करेंगी।

लेकिन हकीकत नहीं बदली। पल्लवी और रीमा जब भी आतीं, घर का माहौल किसी क्लब जैसा हो जाता जहां सौम्या केवल एक व्यवस्थापक थी। दोनों बहनें कमरे का दरवाज़ा बंद करके घंटों फुसफुसातीं, ऑनलाइन शॉपिंग करतीं, बाहर घूमने के कार्यक्रम बनातीं। अगर सौम्या चाय लेकर अंदर जाती, तो वे दोनों एक-दूसरे को देखकर ऐसे मुस्कुरातीं मानो कोई गुप्त राज़ छुपा रही हों। बाहर जाने की बात होती तो कह दिया जाता, “भाभी, आप घर संभालिए, वैसे भी बाहर बहुत धूप है, आप थक जाएंगी। और हां, शाम को लौटते वक्त हमें दाल-बाटी खानी है, आप तैयारी रखिएगा।” सौम्या घर पर रहकर उनके लिए पकवान बनाती और वे बाहर की तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा करतीं, जिनमें घर के हर सदस्य का ज़िक्र होता, सिवाय उसके।

कई बार तो ऐसा होता कि पड़ोसियों या दूर के रिश्तेदारों से सौम्या को पता चलता कि पल्लवी के बेटे का दाखिला किस कॉलेज में हुआ है, या रीमा ने नया फ्लैट खरीदा है। जब वह कुणाल से पूछती, तो वह सामान्य रूप से कह देता, “हां, मुझे तो पता था, तुम्हें बताना भूल गया होगा।” उस वक्त सौम्या के सीने में जो हूक उठती, उसे बयां करने के लिए कोई शब्द नहीं थे। अपने ही घर में बेगानी होने का यह दंश उसे भीतर ही भीतर खोखला कर रहा था।

उस दिन भी जब ड्राइंग रूम में ननदों की विदाई की बातें हो रही थीं, सौम्या चुपचाप अपने कमरे में आई और अलमारी के सामने खड़ी हो गई। उसने दोनों ननदों के लिए बहुत सुंदर और कीमती साड़ियां खरीदकर रखी थीं। उसने सोचा था कि इस बार जब वे जाएंगी, तो वह खुद अपने हाथों से उन्हें यह भेंट देगी। लेकिन तभी पल्लवी की आवाज़ उसके कानों में पड़ी, जो बालकनी में खड़ी होकर फोन पर अपनी मौसी से बात कर रही थी।

“अरे मौसी, हम तो बस आ ही रहे हैं। भैया ने बहुत ज़िद की तो रुक गए, वरना भाभी के हाथ की चाय-नाश्ते के अलावा इस घर में अब अपनापन बचा ही क्या है? मां-बाबूजी के जाने के बाद तो मायका बस नाम का रह गया है। भाभी तो बस अपने काम में लगी रहती हैं, उनसे क्या बात करें।”

यह सुनकर सौम्या के हाथ से साड़ियों का पैकेट छूटकर ज़मीन पर गिर पड़ा। आंखें आंसुओं से भर आईं। बारह साल का समर्पण, चौबीसों घंटे की सेवा, सबकी खुशियों के आगे अपनी इच्छाओं की बलि… और बदले में क्या मिला? सिर्फ यह ठप्पा कि वह बाहरी है और हमेशा रहेगी।

उस रात सौम्या सो नहीं सकी। छत के पंखे को घूमते देखते हुए उसके ज़हन में अपनी चौदह वर्षीय बेटी अनन्या का चेहरा घूम गया। अनन्या अक्सर अपनी मां को इस तरह उपेक्षित होते देखती थी। कल जब अनन्या बड़ी होगी, किसी दूसरे घर जाएगी, तो क्या वह भी अपनी मां की तरह खुद को घिसती रहेगी सिर्फ एक स्वीकृति पाने के लिए? क्या एक स्त्री का अस्तित्व केवल इस बात पर निर्भर करता है कि दूसरे उसे ‘अपना’ कहें या ‘पराया’?

उस अंधेरी रात में सौम्या के भीतर कुछ बहुत शांत, लेकिन बेहद दृढ़ता से टूटकर फिर से जुड़ गया। उसने महसूस किया कि वह पिछले बारह सालों से एक ऐसी खिड़की से हवा की उम्मीद कर रही थी जो कभी खुली ही नहीं थी। उसने अपनी पहचान, अपनी खुशी और अपने आत्मसम्मान की डोर उन लोगों के हाथों में थमा दी थी जो उसे कभी अपना हिस्सा मानना ही नहीं चाहते थे। गलती उनकी नहीं थी कि वे उसे बाहरी समझते थे; गलती उसकी थी कि उसने खुद को उनकी स्वीकृति का मोहताज बना लिया था।

अगली सुबह का सूरज कुछ अलग था। सौम्या समय पर उठी, लेकिन उसके चेहरे पर वह पुरानी उदासी और झिझक नहीं थी। उसने हमेशा की तरह नाश्ता बनाया, पर इस बार वह किसी की प्रशंसा या किसी के बुलावे का इंतज़ार किए बिना खुद अपनी प्लेट लेकर डाइनिंग टेबल की मुख्य कुर्सी पर बैठ गई।

जब कुणाल और उसकी दोनों बहनें टेबल पर आए, तो सौम्या को वहां आराम से बैठकर अखबार पढ़ते और नाश्ता करते देख वे थोड़े हैरान रह गए। आमतौर पर सौम्या सबके खाने के बाद, रसोई के स्लैब पर या ठंडे हो चुके बर्तनों के बीच खाना खाती थी।

“अरे सौम्या, चाय कहां है?” कुणाल ने पूछा।

सौम्या ने बहुत शांत और सहज आवाज़ में उत्तर दिया, “केतली गैस पर रखी है कुणाल, तुम सब अपने हिसाब से कप में निकाल लो। मैं आज सुबह थोड़ा जल्दी में हूं।”

पल्लवी और रीमा ने एक-दूसरे की तरफ देखा। पल्लवी ने तंज़ कसते हुए कहा, “भाभी, आज बड़ी फुर्सत में लग रही हैं? हम आज दोपहर की ट्रेन से निकल रहे हैं, हमारी पैकिंग और रास्ते का खाना…”

सौम्या ने अपनी चाय की चुस्की ली, अखबार को मोड़कर टेबल पर रखा और पल्लवी की आंखों में आंखें डालकर बड़े आदर, किंतु अडिग स्वर में कहा, “पल्लवी, तुम दोनों अब मेहमान नहीं हो कि तुम्हें सब कुछ परोस कर दिया जाए, और अगर मेहमान हो, तो बाज़ार से बहुत कुछ मिल जाता है। मैंने नाश्ता बना दिया है, दोपहर के लिए भी खाना तैयार है। लेकिन पैकिंग तुम दोनों को खुद करनी होगी। आज से मैं वह काम नहीं करूंगी जो तुम खुद कर सकती हो।”

कमरे में सन्नाटा छा गया। कुणाल की आंखें फटी की फटी रह गईं, “सौम्या! यह तुम क्या कह रही हो? बहनों से ऐसे बात करते हैं?”

सौम्या उठी, उसके चेहरे पर कोई गुस्सा नहीं था, बस एक गरिमामय शांति थी। उसने कुणाल से कहा, “कुणाल, मैंने बारह साल तक इस घर को अपना माना, लेकिन तुम सबने मुझे हमेशा दहलीज के उस पार ही खड़ा रखा। मुझे कभी इस बात का मलाल नहीं रहा कि तुम सब आपस में कितने जुड़े हो, दुख इस बात का था कि तुमने मुझे कभी उस जुड़ाव के लायक ही नहीं समझा। मैंने खाना बनाने, घर संभालने और मुस्कुराने की ज़िम्मेदारी तो उठाई, लेकिन अपनी आत्म-इज़्ज़त खोने की शर्त पर नहीं। अगर मैं इस घर की सदस्य हूं, तो बराबरी की हूं। और अगर मैं तुम्हारी नज़रों में सिर्फ एक ‘आउटसाइडर’ हूं, तो फिर एक आउटसाइडर से इतनी उम्मीदें क्यों?”

वह मुड़ी और पल्लवी तथा रीमा की तरफ देखकर बोली, “तुम दोनों जब भी इस घर में आओ, तुम्हारा स्वागत है क्योंकि यह तुम्हारे भाई का घर है। लेकिन मुझे नौकरानी या सिर्फ काम निकालने का ज़रिया समझने की भूल मत करना। रिश्ते भीख में नहीं मिलते, और अब मुझे किसी के झूठे अपनेपन की ज़रूरत भी नहीं है। मैंने खुद को अपना लिया है, मेरे लिए इतना ही काफी है।”

इतना कहकर सौम्या अपने कमरे में चली गई। उसने अपनी बेटी अनन्या को आवाज़ दी, “अनन्या, तैयार हो जाओ बेटा, आज हम दोनों तुम्हारे पसंदीदा बुक कैफे चलेंगे और साथ में लंच करेंगे।”

ड्राइंग रूम में तीनों भाई-बहन स्तब्ध खड़े थे। बारह साल में पहली बार उन्हें उस औरत की अनुपस्थिति की ताकत और उसकी खामोशी की कीमत समझ आई थी। कुणाल को जैसे किसी ने झकझोर कर नींद से जगा दिया था। उसने पहली बार देखा कि जिसे वह ‘घर की व्यवस्था’ समझता था, वह असल में एक जीती-जागती स्त्री का रोज़ का घुटता हुआ दम था।

जब दोपहर में पल्लवी और रीमा जाने लगीं, तो उनके चेहरों पर वह पुराना घमंड नहीं था। वे सौम्या के कमरे के बाहर आईं। दरवाज़ा खुला था। सौम्या अपनी किताबों को तरतीब से रख रही थी।

रीमा ने हिचकिचाते हुए कहा, “भाभी… हम निकल रहे हैं।”

सौम्या पलटी, चेहरे पर एक हल्की, वास्तविक मुस्कान लाई और कहा, “शुभ यात्रा रीमा। ध्यान से जाना।”

पल्लवी कुछ देर देखती रही, फिर आगे बढ़कर उसने सौम्या का हाथ थाम लिया, “भाभी… हमें माफ कर दीजिए। हमने कभी सोचा ही नहीं कि अनजाने में हम आपको कितना अकेला कर रहे थे। हमें लगा था कि आप हमारे परिवार का हिस्सा नहीं हैं, पर सच तो यह है कि आपने ही इस परिवार को बांध कर रखा था।”

सौम्या ने पल्लवी के हाथ पर थपकी दी, “माफी की बात नहीं है पल्लवी। बस इतना याद रखना कि किसी के घर की बेटी जब तुम्हारे घर आती है, तो वह तुम्हारा हक छीनने नहीं, अपना एक नया संसार बनाने आती है। उसे अजनबी बनाकर तुम कभी खुश नहीं रह सकते।”

ननदें नम आंखों से विदा हुईं, लेकिन इस बार का जाना पहले जैसा नहीं था। वातावरण में एक नई समझ और अपराधबोध की जगह सम्मान की शुरुआत थी। शाम को जब कुणाल कमरे में आया, तो उसने सौम्या के हाथ में चाय का एक कप थमाया—जो उसने खुद बनाया था।

“सौम्या, मुझे माफ कर दो। मैं एक अच्छा बेटा और अच्छा भाई बनने की होड़ में, एक अच्छा हमसफ़र बनना भूल गया था,” कुणाल की आवाज़ भर्राई हुई थी।

सौम्या ने चाय का कप थामा और खिड़की से बाहर डूबते सूरज की लालिमा को देखा। उसने जान लिया था कि रिश्तों की चाबी किसी और के हाथ में ढूंढना मूर्खता है। जिस दिन एक स्त्री खुद अपनी कद्र करना सीख जाती है, उस दिन दुनिया की कोई भी दीवार उसे ‘आउटसाइडर’ नहीं बना सकती। उसने अपने अस्तित्व को दहलीज के इस पार खींच लिया था, जहां अब वह किसी की मोहताज नहीं, बल्कि अपने जीवन की स्वामिनी थी।

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