शहर की उस शांत-सी कॉलोनी में आमने-सामने दो घर थे। एक घर में रहती थीं सुधा और दूसरे में नंदिनी।
दोनों की उम्र लगभग बराबर थी, दोनों गृहिणी थीं और दोनों के बच्चे एक ही स्कूल में पढ़ते थे। सुबह की चाय से लेकर शाम की बालकनी तक, दोनों की दिनचर्या में बहुत कुछ एक जैसा था। पड़ोस की औरतें अक्सर कहतीं, “सुधा और नंदिनी तो बहनों जैसी हैं।”
सुधा मुस्करा देती, मगर नंदिनी के मन में कहीं एक महीन-सी चुभन उठती।
कारण था—सुधा की बेटी रिया।
रिया पढ़ाई में बहुत अच्छी थी। स्कूल में होने वाली हर प्रतियोगिता में उसका नाम आता। कभी भाषण, कभी चित्रकला, कभी नृत्य। पुरस्कारों से भरी उसकी अलमारी देखकर नंदिनी अनायास अपनी बेटी काव्या की ओर देखने लगती।
काव्या भी होशियार थी, पर वह रिया जैसी चमक नहीं बिखेर पाती थी।
एक दिन स्कूल के वार्षिक समारोह में रिया को ‘सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थी’ का पुरस्कार मिला। मंच पर रिया का नाम पुकारा गया तो सुधा की आँखें खुशी से भर आईं।
नंदिनी ने भी तालियाँ बजाईं।
बहुत देर तक।
लेकिन लौटते समय उसके भीतर कोई धीरे-धीरे फुसफुसा रहा था—
“हर बार रिया ही क्यों?”
घर पहुँचकर काव्या ने माँ का हाथ पकड़कर पूछा, “माँ, आज आप खुश नहीं थीं?”
नंदिनी चौंकी।
“क्यों बेटा?”
“जब रिया को पुरस्कार मिला, सब बहुत खुश थे। आप भी ताली बजा रही थीं, लेकिन आपकी आँखें खुश नहीं थीं।”
नंदिनी के पास कोई उत्तर नहीं था।
उस रात वह देर तक सो नहीं सकी।
उसे सुधा से जलन होने लगी थी। सुधा की बेटी की सफलता उसे अपनी बेटी की असफलता लगने लगी थी। धीरे-धीरे उसने सुधा से बातचीत कम कर दी। जब सुधा अपनी बेटी की उपलब्धि बताती, नंदिनी विषय बदल देती। कभी-कभी तो वह मन ही मन उसकी सफलता में कमी खोजने लगती।
“अरे, पढ़ाई में अच्छी है तो क्या हुआ? घर-गृहस्थी भी तो देखनी चाहिए।”
यह कहते हुए उसे स्वयं पता था कि वह सच नहीं बोल रही।
एक दिन अचानक कॉलोनी में खबर फैली कि सुधा के पति की नौकरी चली गई है।
सुधा के घर की आर्थिक स्थिति बिगड़ गई। रिया की महँगी कोचिंग बंद हो गई। घर में चिंता का वातावरण रहने लगा।
नंदिनी ने यह सुना तो कुछ क्षण के लिए उसके भीतर एक अजीब-सी राहत आई।
“अब शायद रिया आगे नहीं बढ़ पाएगी।”
यह विचार आते ही उसे अपने आप पर घिन-सी महसूस हुई।
उसी शाम दरवाजे पर दस्तक हुई।
सुधा खड़ी थी। चेहरे पर थकान थी और आँखों में चिंता।
“नंदिनी… एक मदद चाहिए।”
नंदिनी चुप रही।
सुधा ने संकोच से कहा, “रिया की बोर्ड परीक्षा है। उसकी कोचिंग बंद हो गई है। सुना है काव्या के पास पिछले साल के अच्छे नोट्स हैं। अगर कुछ दिनों के लिए मिल जाएँ तो…”
नंदिनी ने भीतर जाकर नोट्स निकाले और सुधा को दे दिए।
सुधा की आँखें भर आईं।
“तुमने बहुत बड़ी मदद कर दी।”
नंदिनी ने बस इतना कहा, “पड़ोसी किस दिन काम आते हैं?”
सुधा चली गई।
लेकिन उसी रात नंदिनी ने पहली बार अपने मन को आईने में देखा।
उसे समझ आया कि उसकी जलन रिया से नहीं थी, सुधा से भी नहीं थी।
वह अपनी बेटी के भविष्य को लेकर डरी हुई थी।
उसे लगता था कि किसी दूसरी लड़की की सफलता उसकी बेटी की जगह कम कर रही है। जबकि सफलता कोई कुर्सी तो थी नहीं, जिस पर एक बैठे तो दूसरे के लिए जगह न बचे।
कुछ महीनों बाद बोर्ड का परिणाम आया।
रिया ने बहुत अच्छे अंक प्राप्त किए।
और काव्या ने भी।
काव्या के अंक रिया से कम थे, लेकिन उसने विज्ञान की बजाय साहित्य में अपना भविष्य बनाने का निर्णय लिया था।
परिणाम लेकर वह दौड़ती हुई माँ के पास आई।
“माँ! मेरे हिंदी में सबसे ज्यादा नंबर हैं। मैं लेखिका बनना चाहती हूँ।”
नंदिनी ने बेटी को गले से लगा लिया।
उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
उसी समय सुधा और रिया मिठाई लेकर उनके घर आईं।
“काव्या, तुम्हें बहुत-बहुत बधाई!” रिया ने उसे गले लगाया।
काव्या ने मुस्कराकर कहा, “और तुम्हें भी!”
दोनों लड़कियाँ हँसते हुए बाहर चली गईं।
सुधा ने नंदिनी की ओर देखा।
“तुम कुछ कहना चाहती हो?”
नंदिनी ने उसकी हथेली थाम ली।
“हाँ।”
कुछ पल वह चुप रही, फिर बोली—
“मुझे तुमसे जलन होती थी।”
सुधा आश्चर्य से उसे देखने लगी।
नंदिनी की आँखें झुक गईं।
“तुम्हारी बेटी की सफलता देखकर मुझे अपनी बेटी की कमी दिखाई देती थी। मैं भूल गई थी कि दूसरे के घर का दीपक मेरे घर का उजाला नहीं छीनता।”
सुधा ने उसका हाथ दबाया।
“नंदिनी, हम औरतें न जाने क्यों अक्सर दूसरी औरत की खुशी को अपनी हार समझ बैठती हैं।”
नंदिनी की आँखों में आँसू आ गए।
“शायद इसलिए कि हमें बचपन से तुलना करना सिखाया गया है।”
दोनों कुछ देर चुप रहीं।
फिर सुधा ने मुस्कराकर कहा, “तो आज से एक समझौता करें?”
“कैसा?”
“तुम काव्या की खुशी में खुश होना और मैं रिया की हर सफलता में तुम्हें साथ बुलाऊँगी।”
नंदिनी हँस पड़ी।
“और अगर फिर जलन हुई?”
सुधा ने हँसते हुए कहा, “तो चाय बनाकर बैठेंगे और जलन को मिलकर भगा देंगे।”
दोनों खिलखिला उठीं।
बाहर शाम उतर रही थी। आसमान में सूरज की आखिरी किरणें बिखर रही थीं।
नंदिनी ने बालकनी से दोनों बच्चियों को साथ-साथ जाते देखा।
उसके मन में पहली बार किसी दूसरे की सफलता देखकर कोई टीस नहीं उठी।
बल्कि एक सुकून उतरा।
उसे लगा—
जलन तब जन्म लेती है, जब हम दूसरे की रोशनी को अपने अँधेरे का कारण समझ लेते हैं।
और सच तो यह है कि एक दीपक जलने से दूसरे दीपक की लौ कम नहीं होती।
वह तो बस इतना करता है—
अँधेरा थोड़ा और कम कर देता है।
लेखिका: डॉ आभा माहेश्वरी अलीगढ