अनुराग और वंदना ने आगे बढ़कर एक साथ दोनों के पैर छुए। वंदना की आँखों से लगातार आंसू बह रहे थे। उसने कहा, “पापा, मम्मी… आज आपने हमें सिखाया कि प्यार सिर्फ जवानी का आकर्षण नहीं होता। असली प्यार तो वह है जो उम्र के पतझड़ में भी एक-दूसरे की छांव बनकर खड़ा रहे। हमें माफ कर दीजिए, हम आपके इस मूक प्रेम की गहराई को समझ नहीं पाए थे।”
सुबह के ठीक छह बजे जब अलार्म की घंटी बजी, तो हरिनारायण जी ने हमेशा की तरह झटके से उठने की कोशिश नहीं की। आज की भोर में एक अजीब सा ठहराव था, जैसे बहती नदी अचानक किसी शांत सरोवर में तब्दील हो गई हो। पैंतीस बरस तक सिंचाई विभाग के मुख्य लेखा अधिकारी के पद पर रहते हुए जिस घड़ी की सुइयों ने उन्हें हमेशा दौड़ाया था, आज वही घड़ियां उनके कमरे की दीवार पर सुस्ताती हुई जान पड़ रही थीं। आज 31 मार्च था—हरिनारायण श्रीवास्तव के राजकीय सेवाकाल का अंतिम दिन।
वे चुपचाप बिस्तर से उठे और सीधे बड़े शीशे के सामने जा खड़े हुए। कल शाम ही वे मोहल्ले के उस बड़े सैलून से लौटे थे जहाँ केवल नौजवान लड़के अपने बाल संवारने जाया करते थे। जीवन भर खादी का सादा कुरता या बिना इस्त्री की पैंट पहनकर काम चलाने वाले हरिनारायण जी ने कल न सिर्फ अपने सफेद बालों में हल्का सा नैचुरल ब्लैक डाई करवाया था, बल्कि चेहरे की हल्की मालिश भी करवा ली थी। शीशे में अपनी परछाईं देखते हुए वे अपनी पतली मूंछों को ताव दे रहे थे कि तभी दरवाजे की ओट से एक दबी हुई खिलखिलाहट गूंजी।
उनकी धर्मपत्नी, मालती देवी, हाथ में चाय की प्याली लिए खड़ी थीं और अपनी साड़ी के पल्लू से मुंह ढककर हंसी रोकने का निष्फल प्रयास कर रही थीं।
“अरे वाह! आज तो हुजूर की रंगत ही जुदा है। मैं तो समझी थी कोई नया मेहमान घर में आ गया है,” मालती ने चाय की प्याली मेज पर रखते हुए चुटकी ली। “जीवन बीत गया आपका फटा पायजामा सिलते-सिलते और तेल की एक बूंद तक सिर पर न लगाने वाले आज इस उम्र में रूप-सज्जा करवा रहे हैं! ये सब किसके लिए हो रहा है?”
हरिनारायण जी ने बनावटी तल्खी के साथ आंखें तरेरीं, “देखिए भाग्यवान, हमारी इस काया का उपहास मत उड़ाइए। आप क्या जानें कि इस सरकारी जंजीर से मुक्ति का क्या आनंद होता है! पैंतीस साल फाइलों के पन्नों में अपनी जवानी खपा दी, कभी ढंग से आईने में खुद को नहीं देखा। आज जब आजाद परिंदा बनने जा रहा हूँ, तो कम से कम दफ्तर के जूनियरों को यह तो पता चले कि उनका अफसर दिल से कभी बूढ़ा नहीं हुआ था।”
मालती जी ने सिर हिलाते हुए कहा, “हाँ-हाँ, क्यों नहीं! दुनिया को तो आप बाद में दिखाइएगा, पहले ये चाय ठंडी हो रही है इसे पी लीजिए। वरना फेयरवेल पार्टी में भाषण देते-देते गला बैठ जाएगा।”
हरिनारायण जी चाय की चुस्की लेते हुए पुराने दिनों की यादों में खोने लगे। रेडियो पर धीमे सुरों में मुकेश का गीत बज रहा था—’सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है…’। तभी बाहर दरवाजे की घंटी बजी और उनके पुराने चपरासी रघुवीर ने आकर सूचना दी कि सरकारी गाड़ी नीचे आ चुकी है। हरिनारायण जी ने एक अंतिम बार आईने में देखा, सूट का कॉलर ठीक किया, मालती जी को मुस्कुराते हुए विदा कहा और सीढ़ियां उतर गए।
दफ्तर का माहौल आंसुओं और तालियों से भरा रहा। शॉल, श्रीफल, चांदी का स्मृति-चिह्न और भावुक विदाई भाषणों के बीच कब दोपहर ढली और शाम घिर आई, पता ही न चला। जब शाम को सरकारी गाड़ी उन्हें उनके घर ‘शांति कुंज’ के सामने छोड़ने आई, तो हरिनारायण जी के मन में एक गहरा खालीपन तैर रहा था। उन्हें लग रहा था कि अब खाली घर, सन्नाटा और बीमारी की बातें ही उनकी बची हुई जिंदगी का सच होंगी।
लेकिन जैसे ही गाड़ी का दरवाजा खुला, हरिनारायण जी ठिठक गए। उनके दो मंजिला मकान के बाहर रंग-बिरंगी फेयरी लाइट्स जगमगा रही थीं। बरामदे में फूलों की लड़ियां लटक रही थीं और भीतर से बच्चों के हंसने की आवाजें आ रही थीं।
उन्होंने ड्राइवर मोहन की तरफ घूमकर देखा, “अरे मोहन, तुम मुझे कहीं गलत पते पर तो नहीं ले आए भाई? यह तो किसी शादी-ब्याह का घर लग रहा है।”
मोहन हाथ जोड़कर मुस्कुराया, “नहीं साहब जी, यह आपका ही बंगला है। छोटे साहब और दीदी जी दोनों दोपहर में ही गाड़ियों से आ गए थे।”
“क्या? अनुराग और वंदना? बिना बताए?” हरिनारायण जी की आँखें फटी की फटी रह गईं। उनका बड़ा बेटा अनुराग बेंगलुरु की एक सॉफ्टवेयर कंपनी में बड़ा अफसर था, जिसे फोन करने पर भी दो मिनट की फुर्सत नहीं मिलती थी। और बेटी वंदना, जो लखनऊ में अपने ससुराल में व्यस्त रहती थी, दोनों का इस तरह अचानक आ जाना किसी सपने जैसा था।
वे धीरे-धीरे कदमों से मुख्य दरवाजे की ओर बढ़े। जैसे ही उन्होंने चौखट पर कदम रखा, पार्टी पॉपर्स की तेज आवाज के साथ सुनहरी चमकीली पन्नियों की बारिश उनके सिर पर होने लगी।
“हैप्पी रिटायरमेंट, पापा!”
एक साथ कई कंठों से निकली यह गूंज पूरे घर में फैल गई। सामने अनुराग, उसकी पत्नी शालिनी, उनके दो बच्चे, और दूसरी तरफ वंदना, उसके पति राजेश और उनकी नन्ही बेटी खड़ी तालियां बजा रहे थे। बीच में मालती जी हाथ में पूजा की थाली लिए खड़ी थीं, उनके चेहरे पर एक ऐसी चमक थी जो हरिनारायण जी ने बरसों से नहीं देखी थी।
हरिनारायण जी का गला रुंध गया। वे सख्त मिजाज अफसर रहे थे, उन्होंने जिंदगी में कभी किसी के सामने आंसू नहीं बहाए थे। उन्होंने बड़ी चतुराई से अपनी जेब से रुमाल निकाला और चश्मे के शीशे साफ करने के बहाने पलकों के कोरों पर आई नमी को सोख लिया।
“तुम सब… इस तरह अचानक? मुझे तो लगा था तुम लोगों को मेरी रिटायरमेंट की तारीख भी याद नहीं होगी,” हरिनारायण जी ने भर्राई आवाज में कहा।
बेटी वंदना आगे बढ़ी और पिता के गले लग गई, “पापा, आप हम लोगों के लिए पूरी जिंदगी धूप में जलते रहे, क्या हम आपके जीवन की इस सबसे बड़ी शाम को रोशन करने भी नहीं आ सकते थे?”
इसके बाद घर में जो उत्सव शुरू हुआ, उसने हरिनारायण जी के भीतर के सारे सन्नाटे को एक झटके में बहा दिया। नाती-पोतों ने दादाजी के चारों तरफ नाच-गाना शुरू कर दिया। पुराने किस्से छिड़े, दफ्तर की चुटीली बातें हुईं और फिर आया उपहारों का सिलसिला।
वंदना ने आगे बढ़कर अपने पर्स से एक चमकदार चाबी निकाली और अपने पिता की हथेली पर रख दी।
“यह क्या है बेटा?” हरिनारायण जी ने कौतूहल से पूछा।
“पापा, बाहर गैरेज में देखिए,” वंदना ने मुस्कुराते हुए कहा।
सब लोग खिड़की की तरफ दौड़े। बाहर एक खूबसूरत, गहरे नीले रंग की नई रॉयल एनफील्ड बुलेट खड़ी थी। हरिनारायण जी का मुंह खुला का खुला रह गया।
वंदना ने उनके कंधे पर सिर रखकर कहा, “पापा, कॉलेज के दिनों में आपको बुलेट चलाने का कितना शौक था ना? लेकिन जब आपकी नौकरी लगी और हम दोनों भाई-बहन हुए, तो आपने अपनी सारी जमा-पूंजी हमारे भविष्य में लगा दी और खुद जिंदगी भर उस पुरानी, खटखटाती हुई बजाज चेतक स्कूटर से काम चलाते रहे। सरकारी पद की गरिमा ने आपको कभी अपनी पसंद जीने नहीं दी। अब आप आजाद हैं। अब आप शान से अपनी इस पसंदीदा सवारी पर मम्मी को पीछे बैठाकर पूरे शहर की हवा खाइए।”
हरिनारायण जी के होंठ कांपने लगे, वे कुछ बोल पाते इससे पहले ही अनुराग आगे बढ़ा। उसने झुककर पिता के चरण स्पर्श किए और एक भारी लिफाफा उनके हाथों में थमा दिया।
“अब इसकी क्या जरूरत थी अनुराग?” हरिनारायण जी ने कहा।
दस साल का पोता कबीर ताली बजाते हुए चिल्लाया, “दादू, लिफाफा खोलिए मत, मैं बताता हूँ! यह क्रूज की टिकटें हैं! आप और दादी पूरे पंद्रह दिनों के लिए यूरोप के मेडिटेरेनियन क्रूज पर जा रहे हैं। पापा ने आप दोनों का इंटरनेशनल टूर बुक किया है!”
यह सुनते ही मालती देवी का चेहरा लाल हो गया। वे संकोच और शर्म से दोहरी होने लगीं और कबीर की पीठ पर हल्की चपत लगाते हुए बोलीं, “धत तेरे की! इस उम्र में यह सब क्या तमाशा है? मैं कहीं नहीं जाने वाली, घुटनों का दर्द देखा है अपना?”
अनुराग ने हंसते हुए अपनी माँ के कंधे पकड़े, “मम्मी, अब कोई बहाना नहीं चलेगा। बचपन से आज तक हम लोगों ने जब भी किसी वेकेशन की बात की, तो आपने यही कहा कि बच्चों की पढ़ाई जरूरी है, अपनी सैर-सपाटे में पैसे बर्बाद नहीं करने। आपने अपने सारे गहने, अपनी सारी इच्छाएं हमारे करियर के लिए गिरवी रख दीं। अब यह समय आपका है। दुनिया देखिए, खुलकर सांस लीजिए।”
पूरे हॉल में तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी। आस-पड़ोस के मित्र और रिश्तेदार भी अब तक आ चुके थे। बेहतरीन संगीत, स्वादिष्ट भोजन और कहकहों के बीच रात के ग्यारह बज गए। मेहमान धीरे-धीरे विदा हो गए। बच्चे थके-हारे अपने-अपने कमरों में सोने चले गए।
अब ड्राइंग रूम में केवल घर के खास सदस्य बैठे थे—हरिनारायण जी, मालती जी, अनुराग, वंदना और उनकी बहु-दामाद। चारों तरफ बिखरे हुए गिफ्ट रैपर और गुलदस्ते इस बात की गवाही दे रहे थे कि आज का दिन कितना असाधारण था।
तभी वंदना की नजर अपनी माँ पर पड़ी जो एक कोने में बैठी चुपचाप अपनी साड़ी के पल्लू से खेल रही थीं।
“अरे मम्मी!” वंदना अचानक बोल उठी, “हम सबने पापा को कुछ न कुछ इतना बड़ा गिफ्ट दिया। गाड़ी हो गई, विदेश यात्रा हो गई। लेकिन आप तो उनकी अर्धांगिनी हैं, पूरे पैंतीस साल की सहयात्री! आपने अपने जीवनसाथी को इस नए जीवन की शुरुआत पर क्या दिया? आपका गिफ्ट कहां है?”
मालती जी सकपका गईं। उनका चेहरा फिर से झेंप से भर गया। उन्होंने नजरें चुराते हुए कहा, “अरे छोड़ो ना… मैं क्या उपहार दूंगी। मेरे पास जो था, वो सब तो तुम बच्चों को दे दिया।”
“ऐसे कैसे छोड़ दें मम्मी जी!” बहू शालिनी ने प्यार से जिद पकड़ी, “मैंने शाम को देखा था, आप अलमारी के सबसे ऊपर वाले लॉकर में कुछ छिपाकर रख रही थीं। चलिए, आज राज खुल ही जाना चाहिए।”
शालिनी उठकर अंदर गई और एक लंबे, पतले डिब्बे को लेकर बाहर आई, जो सुनहरे कागज में बड़ी सादगी से लिपटा हुआ था। उसने वह पैकेट लाकर हरिनारायण जी की गोद में रख दिया।
“लो पापा, मम्मी का सीक्रेट गिफ्ट!”
सभी बच्चे उत्सुकता से घेरकर खड़े हो गए। हरिनारायण जी ने मुस्कुराते हुए मालती की ओर देखा, जिनकी नजरें शर्म के मारे फर्श पर गड़ी हुई थीं। उन्होंने आहिस्ता-आहिस्ता सुनहरे कागज को फाड़ा। डिब्बा खुला, तो भीतर मखमली कपड़े पर एक चीज रखी हुई दिखाई दी।
वह एक ‘फोल्डिंग वॉकिंग स्टिक’ थी—एक मजबूत, आधुनिक छड़ी, जो मुड़कर छोटी हो जाती थी और उसके हैंडल पर एक छोटी सी टॉर्च और ग्रिप बनी हुई थी।
छड़ी को देखते ही कमरे में सन्नाटा छा गया, और फिर अनुराग ठहाका मारकर हंस पड़ा, “अरे मम्मी! यह क्या? हम पापा को बुलेट दिला रहे हैं, क्रूज पर भेज रहे हैं, और आपने पहले ही दिन उन्हें बूढ़ा समझकर हाथ में लाठी थमा दी? अभी तो पापा के नए जीवन की शुरुआत हुई है और आप उन्हें सहारा ढूंढने को कह रही हैं!”
वंदना भी अपनी हंसी न रोक सकी, “हाँ मम्मी, सच में आपका कोई जवाब नहीं। इतना अनरोमैंटिक गिफ्ट कोई अपनी शादी की सालगिरह या रिटायरमेंट पर देता है भला?”
बच्चों की हंसी और हल्के-फुल्के तानों से मालती देवी की आंखें भर आईं। वे इतनी संकोची थीं कि अपनी भावनाएं शब्दों में ढालना उनके लिए पहाड़ तोड़ने जैसा था। वे बिना कुछ कहे, सिर झुकाए चुपचाप उठकर अपने बेडरूम की तरफ भागीं और दरवाजा भीतर से बंद करने ही वाली थीं कि हरिनारायण जी की गंभीर आवाज ने उनके कदम रोक दिए।
“रुकिए, मालती।”
हरिनारायण जी अपनी जगह से उठे। उनके चेहरे पर अब वह चंचलता नहीं थी जो सुबह से दिख रही थी। उन्होंने उस छड़ी को बड़े आदर और कोमलता से उठाया, जैसे वह कोई निर्जीव लकड़ी न होकर सोने का कोई दुर्लभ आभूषण हो। उन्होंने छड़ी को खोला, उसकी बनावट को महसूस किया और फिर अपने बच्चों की तरफ मुड़े।
“तुम लोग हंस रहे हो ना?” हरिनारायण जी की आवाज में एक ऐसा भारीपन था जिसने कमरे के पूरे माहौल को एक पल में बदल दिया।
अनुराग और वंदना सहम गए।
हरिनारायण जी ने छड़ी को सीने से लगाते हुए कहा, “तुम लोगों ने मुझे बुलेट दी, क्रूज की टिकटें दीं… यह तुम्हारा बड़प्पन है, तुम्हारा प्यार है। लेकिन तुम दोनों ने मुझे वो दिया जो तुम्हारी उम्र सोच सकती है। तुम लोगों ने मुझे मेरी बाहरी दुनिया के शौक लौटाए हैं। लेकिन तुम्हारी माँ ने मुझे वो दिया है, जो आने वाले कल का सबसे बड़ा सच है।”
वे धीरे-धीरे चलकर मालती के पास पहुंचे, जो चौखट के पास खड़ी अपनी सिसकियां रोक रही थीं।
हरिनारायण जी ने अपनी पत्नी के कांपते कंधे पर हाथ रखा और बच्चों से बोले, “उम्र के इस मोड़ पर इंसान को सबसे ज्यादा डर अकेलेपन और असहाय होने से लगता है। शरीर जवाब देगा, घुटने दर्द करेंगे, रात के अंधेरे में नजर धुंधलाएगी। तुम्हारी माँ ने यह छड़ी देकर मुझे यह नहीं कहा कि मैं बूढ़ा हो गया हूँ। उसने बिना बोले मुझसे यह वादा किया है कि जब रास्ते पथरीले होंगे, जब अंधेरा गहराएगा, और जब तुम सब अपनी-अपनी दुनिया में व्यस्त हो जाओगे, तब भी वह मेरी लाठी बनकर, मेरा सहारा बनकर मेरे साथ खड़ी रहेगी। यह छड़ी नहीं है बच्चों, यह उसका मौन संकल्प है कि जीवन की अंतिम सांस तक हम दोनों एक-दूसरे का हाथ थामे रहेंगे।”
कमरे में सुई पटक सन्नाटा छा गया था। अनुराग और वंदना का सिर शर्म और पश्चाताप से झुक गया। वे समझ गए थे कि सांसारिक चमक-दमक वाले उपहारों के सामने उस सादी सी छड़ी की कीमत कितनी विराट थी।
तभी हरिनारायण जी मुस्कुराए। उन्होंने अपनी जेब से एक छोटी सी मखमली डिब्बी निकाली और मालती के कांपते हाथों में रख दी।
“जब तुमने मुझे मेरे आने वाले कल का सहारा दे ही दिया है, तो मैं भी तुम्हारे लिए कुछ लाया हूँ,” हरिनारायण जी ने बहुत कोमल स्वर में कहा।
मालती ने भीगी आँखों से डिब्बी खोली। उसके भीतर सोने की बालियां या कोई कीमती गहना नहीं था। उसके अंदर चांदी की एक बेहद बारीक और सुंदर ‘पायल’ रखी हुई थी, जिसके घुंघरू बहुत छोटे और मधुर थे।
मालती ने अचरज से अपने पति की ओर देखा, “इस उम्र में… पायल? यह क्या पागलपन है?”
हरिनारायण जी ने अपनी पत्नी की आंखों में झांकते हुए कहा, “जब तुम ब्याह कर इस घर में आई थीं मालती, तो तुम्हारे पैरों की पायल की झंकार से यह पूरा घर गूंजता था। फिर बच्चे हुए, जिम्मेदारियों का बोझ बढ़ा, और तुमने अपने पैरों से घुंघरू उतार दिए ताकि तुम्हारे चलने की आवाज से बच्चों की पढ़ाई में खलल न पड़े या किसी को तुम्हारी मौजूदगी भारी न लगे। तुमने परिवार को संभालने में अपने सारे शौक, अपनी पहचान कुर्बान कर दी।”
वे एक क्षण रुके, उनकी अपनी आँखें भी अब पूरी तरह भीग चुकी थीं।
“आज जब मैं अपनी जिम्मेदारियों से सेवामुक्त हुआ हूँ, तो मैं चाहता हूँ कि तुम भी इस घर की चिंताओं से रिटायर हो जाओ। अब यह पायल पहनो। मैं चाहता हूँ कि अब जब तुम घर के आंगन में या मेरे साथ बुलेट के पीछे बैठकर चलो, तो तुम्हारी यह पायल मुझे याद दिलाती रहे कि मेरे जीवन का संगीत अभी मरा नहीं है। यह छड़ी मेरा सहारा बनेगी, और तुम्हारी पायल की झंकार मेरे बचे हुए सफर की धड़कन बनेगी।”
मालती देवी फूट-फूट कर रो पड़ीं और हरिनारायण जी के कंधे से लग गईं।
अनुराग और वंदना ने आगे बढ़कर एक साथ दोनों के पैर छुए। वंदना की आँखों से लगातार आंसू बह रहे थे। उसने कहा, “पापा, मम्मी… आज आपने हमें सिखाया कि प्यार सिर्फ जवानी का आकर्षण नहीं होता। असली प्यार तो वह है जो उम्र के पतझड़ में भी एक-दूसरे की छांव बनकर खड़ा रहे। हमें माफ कर दीजिए, हम आपके इस मूक प्रेम की गहराई को समझ नहीं पाए थे।”
उस रात शांति कुंज के आंगन में केवल एक सरकारी अफसर की विदाई नहीं हुई थी, बल्कि दो बुजुर्ग आत्माओं ने एक-दूसरे के प्रति अपने अटूट समर्पण का नया अध्याय शुरू किया था। बाहर खड़ी बुलेट, क्रूज की टिकटें, वह साधारण सी फोल्डिंग छड़ी और चांदी की वह पायल—ये सब अब उपहार नहीं रहे थे, वे उस परिवार की नई सुबह के खूबसूरत साक्षी बन चुके थे जहाँ रिश्तों की नींव केवल त्याग पर नहीं, बल्कि एक-दूसरे के प्रति अगाध आदर और समझ पर टिकी थी।
जीवन के किसी भी पड़ाव पर जब प्रेम और सम्मान एक-दूसरे का संबल बन जाते हैं, तो ढलती उम्र का कोई भी दिन अंत नहीं, बल्कि एक नए, सुनहरे जीवन की शुरुआत बन जाता है।
क्या हमारे घरों में भी बुजुर्गों की असली जरूरतों और उनके मूक प्रेम को हम समझ पाते हैं? इस भागदौड़ भरी जिंदगी में माता-पिता को महंगे तोहफे देना आसान है, लेकिन क्या हम उन्हें वह भावनात्मक सहारा दे पाते हैं जिसकी उन्हें सबसे ज्यादा दरकार होती है? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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मूल लेखिका : नीरजा कृष्णा