आत्मसम्मान की दहलीज

 मास्टर जी और रघुवीर सिंह ने किसी तरह अवनि को सहारा दिया और उसे लेकर उसके घर पहुंचे। अवनि के पिता दीनानाथ और मां यशोदा अपनी लाडली बेटी की यह हालत देखकर सुध-बुध खो बैठे। घर में कोहराम मच गया। अवनि मां के सीने से लगकर फूट-फूटकर रोने लगी। पिता का दिल टुकड़े-टुकड़े हो गया।

शीशे के सामने बैठी अवनि अपने लाल सुर्ख जोड़े को निहार रही थी। मांगटीके की चमक और हाथों में रची गहरी मेहंदी उसके रूप को और भी निखार रही थी। कमरे में शहनाई की धीमी, मधुर धुन गूंज रही थी और बाहर आंगन में शादी की चहल-पहल थी। थोड़ी ही देर में बारात आने वाली थी। उसका विवाह विवान से होने जा रहा था—एक संवेदनशील, सुलझा हुआ और आत्मनिर्भर युवा, जो न केवल एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में उच्च पद पर था, बल्कि जिसका दिल भी उतना ही उदार और साफ था।

अवनि ने जब शीशे में अपनी बड़ी-बड़ी कजरारी आंखों को देखा, तो अचानक उन आंखों के कोर भीग गए। वह दृश्य, जो आज से करीब पांच साल पहले उसकी जिंदगी को हमेशा के लिए अंधेरे में धकेल देने पर तुला था, एक चलचित्र की तरह उसके सामने घूमने लगा। आज जब वह जिंदगी के सबसे बड़े और पवित्र मोड़ पर खड़ी थी, तो अतीत का वह पन्ना अपने आप खुल गया था। अवनि ने शादी की बात आगे बढ़ने से पहले ही विवान को अपने जीवन का वह सबसे काला सच बता दिया था। उसने साफ कह दिया था कि वह अपने नए जीवन की इमारत झूठ या किसी छिपाव की बुनियाद पर नहीं रख सकती। विवान ने उस दिन उसका हाथ थामकर जो कहा था, उसी ने अवनि को यह विश्वास दिलाया था कि सच्चा प्यार किसी मजबूरी या दया का मोहताज नहीं होता, बल्कि वह सम्मान और बराबरी पर टिकता है।

बात उन दिनों की है जब अवनि अपने कस्बे के एक छोटे से कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई कर रही थी। उसका गांव चंदनपुर एक शांत, मगर पारंपरिक सोच वाला इलाका था। अवनि के पिता दीनानाथ एक सीधे-साधे किसान थे, जो अपनी बेटी को पढ़ा-लिखाकर एक स्वतंत्र इंसान बनाना चाहते थे। अवनि रोज सुबह अपनी पुरानी साइकिल उठाकर पांच किलोमीटर दूर कस्बे के कॉलेज जाती थी। उस रास्ते में दोनों तरफ घने गन्ने और सरसों के खेत पड़ते थे।

उसी गांव में रघुवीर सिंह नाम का एक बड़ा जमींदार परिवार रहता था। रघुवीर सिंह गांव के सबसे रसूखदार और प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। स्वभाव से वे न्यायप्रिय और भले इंसान थे, लेकिन उनका इकलौता बेटा रणविजय पूरी तरह बिगड़ चुका था। रणविजय के बिगड़ने की सबसे बड़ी वजह उसकी दादी का अंधा लाड-प्यार था। बचपन से ही दादी ने उसे जो चाहा वह लाकर दिया, उसकी हर गलती पर पर्दा डाला और कभी किसी को उसे डांटने तक नहीं दिया। बाप जब भी हाथ उठाने की कोशिश करता, दादी बीच में ढाल बनकर खड़ी हो जातीं। यही वजह थी कि रणविजय बड़ा होकर बेहद उद्दंड, बदमिजाज और बेपरवाह बन गया था। वह खुद को गांव का राजा समझता था।

रणविजय काफी समय से अवनि पर बुरी नजर रखे हुए था। रास्ते में आते-जाते वह अक्सर अपनी तेज रफ्तार मोटरसाइकिल उसके करीब से निकालता, फब्तियां कसता और अवनि को डराने की कोशिश करता। अवनि हर बार उसे अनदेखा कर देती या नजरें फेरकर तेजी से अपनी साइकिल आगे बढ़ा देती। लेकिन रणविजय की ढिठाई दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही थी।

एक दिन, सर्दियों की ढलती दोपहर थी। आसमान में धुंध छाने लगी थी और ठंड की वजह से रास्ते पर सन्नाटा पसरा हुआ था। अवनि कॉलेज की लाइब्रेरी से किताबें लेकर कुछ देर से लौट रही थी। वह पैडल मारते हुए तेजी से घर की तरफ बढ़ रही थी। तभी गन्ने के घने खेत से निकलकर अचानक रणविजय उसके सामने आकर खड़ा हो गया। अचानक हुए इस अवरोध से अवनि घबरा गई, उसका संतुलन बिगड़ा और वह साइकिल समेत पक्की सड़क के किनारे कच्ची मिट्टी में गिर पड़ी। उसकी किताबें बिखर गईं और कोहनी में हल्की खरोंच आ गई।

अवनि ने गुस्से में उठकर अपने कपड़े झाड़े और रणविजय पर चिल्ला पड़ी, “तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई इस तरह सामने आने की? रास्ते से हटो, वरना मैं तुम्हारे पिताजी से शिकायत कर दूंगी!”

रणविजय के चेहरे पर एक घिनौनी और कुटिल मुस्कान तैर गई। उसने कहा, “पिताजी का डर किसे दिखा रही हो? इस पूरे इलाके में मेरी मर्जी चलती है। बहुत दिनों से तुम्हें देख रहा हूं, बड़ा घमंड है न अपनी इस सादगी और पढ़ाई पर? आज देखता हूं कौन बचाता है तुम्हें।”

इससे पहले कि अवनि संभल पाती या भागने की कोशिश करती, भारी-भरकम शरीर वाले रणविजय ने झपटकर अवनि का हाथ पकड़ लिया। अवनि की चीख निकल गई। उसने पूरी ताकत से उसका हाथ छुड़ाने की कोशिश की, अपने पैरों से वार किए और मदद के लिए चिल्लाई। लेकिन उस निर्जन रास्ते पर उसकी आवाज खेतों की सरसराहट में ही दबकर रह गई। रणविजय की शारीरिक ताकत के आगे अवनि की कोई बिसात न थी। वह दरिंदा उसे बेरहमी से घसीटता हुआ गन्ने के घने खेत के अंदर ले गया। अवनि गिड़गिड़ाती रही, अपने सम्मान की भीख मांगती रही, लेकिन वहशी रणविजय पर कोई असर न हुआ। खेत की उस निर्दयी मिट्टी पर उसने अवनि की अस्मत को तार-तार कर दिया और उसकी रूह तक को लहूलुहान कर दिया।

अपनी हवस पूरी करने के बाद जब रणविजय खेत की मेड़ से बाहर निकला, तो उसकी किस्मत खराब थी। ठीक उसी समय मुख्य सड़क से एक बैलगाड़ी गुजर रही थी, जिस पर खुद उसके पिता रघुवीर सिंह और गांव के सबसे सम्मानित बुजुर्ग मास्टर शिवनारायण जी बैठे थे। वे पास के कस्बे से किसी काम से लौट रहे थे। रणविजय को बदहवास और अस्त-व्यस्त हालत में खेत से निकलते देख दोनों ठिठक गए। रघुवीर सिंह के माथे पर त्योरियां चढ़ गईं। उन्होंने जोर से आवाज दी, “रणविजय! तुम इस वक्त यहां क्या कर रहे हो?”

रणविजय अपने पिता को देखकर बुरी तरह घबरा गया और नजरें चुराकर वहां से भाग खड़ा हुआ। रघुवीर सिंह और मास्टर जी को कुछ अनहोनी की आशंका हुई। वे तुरंत खेत के अंदर बढ़े। चंद कदम आगे बढ़ते ही जो दृश्य उन्होंने देखा, उसने दोनों के पैरों तले से जमीन खिसका दी। सामने अवनि जमीन पर बिखरी पड़ी थी। उसके कपड़े फटे हुए थे, चेहरे पर खरोंचों के निशान थे और वह बेसुध होकर सिसक रही थी। रघुवीर सिंह का सिर शर्म से झुक गया। एक पल में उन्हें समझ आ गया कि उनके अपने ही खून ने क्या घिनौना पाप किया था।

मास्टर जी और रघुवीर सिंह ने किसी तरह अवनि को सहारा दिया और उसे लेकर उसके घर पहुंचे। अवनि के पिता दीनानाथ और मां यशोदा अपनी लाडली बेटी की यह हालत देखकर सुध-बुध खो बैठे। घर में कोहराम मच गया। अवनि मां के सीने से लगकर फूट-फूटकर रोने लगी। पिता का दिल टुकड़े-टुकड़े हो गया।

शुरुआत में दीनानाथ और यशोदा समाज के डर से कांप उठे। यशोदा ने आंसुओं से भीगी आवाज में कहा, “हे भगवान! यह क्या अनर्थ हो गया। अगर यह बात गांव में फैली, तो हमारी बच्ची की जिंदगी बर्बाद हो जाएगी। कोई इससे शादी नहीं करेगा, लोग मुंह पर थूकेंगे। हमें अपनी जुबान बंद रखनी होगी।”

लेकिन अवनि ने अपनी मां के हाथ पकड़ लिए। उसकी आंखों में आंसुओं के साथ-साथ एक गजब की चिंगारी थी। उसने रुंधे गले से लेकिन दृढ़ता से कहा, “नहीं मां! चुप क्यों रहूं मैं? गुनाह उसने किया है, तो शर्म से सिर मेरा क्यों झुके? अगर मैं आज चुप रही, तो वह कल किसी और लड़की के साथ यही करेगा। मैं न्याय मांगूंगी, चाहे कुछ भी हो जाए।”

दीनानाथ ने अपनी बेटी की आंखों में वह आग देखी और अपनी लाचारी को परे धकेलते हुए फैसला किया कि वे पंचायत के सामने जाएंगे।

अगले दिन गांव के बड़े बरगद के पेड़ के नीचे पंचायत बैठी। खबर पूरे चंदनपुर में आग की तरह फैल चुकी थी। हर कोई कानाफूसी कर रहा था। रघुवीर सिंह खुद कटघरे में खड़े व्यक्ति की तरह सिर झुकाए बैठे थे। उनकी पत्नी यानी रणविजय की मां और दादी भी वहां मौजूद थीं। दादी बार-बार रो-रोकर यही कह रही थीं कि उनके पोते को फंसाया जा रहा है, वह तो नादान है।

लेकिन मास्टर शिवनारायण जी ने भरी पंचायत में गवाही दी। उन्होंने साफ शब्दों में कहा, “मैंने अपनी इन बूढ़ी आंखों से रणविजय को उस खेत से भागते देखा है और अवनि को उस हालत में पाया है। रणविजय ने अक्षम्य अपराध किया है।”

स्वयं रघुवीर सिंह ने भी भारी मन से इस बात की पुष्टि की। उन्होंने कहा, “मेरा बेटा गुनहगार है। उसने हमारे कुल के नाम पर कालिख पोती है।”

अपराध पूरी तरह सिद्ध हो चुका था। अब बारी थी पंचों के फैसले की। गांव के सरपंच और अन्य पंचों ने आपस में काफी देर तक फुसफुसाहट की। वे एक ऐसा रास्ता निकालना चाहते थे जिससे सामाजिक मर्यादा भी न टूटे, रघुवीर सिंह का रसूख भी बचा रहे और लड़की का जीवन भी ‘संवर’ जाए।

आखिरकार सरपंच ने अपनी पगड़ी ठीक करते हुए फैसला सुनाया, “जो हुआ वह बेहद दुखद है। लेकिन बात अब गांव के सम्मान की है। अगर यह मामला पुलिस और अदालत तक गया, तो दोनों परिवारों की जग-हंसाई होगी और सबसे ज्यादा बदनामी इस बेचारी लड़की की होगी। कल को इससे कौन ब्याह रचाएगा? इसलिए पंचों की सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया जाता है कि रणविजय का विवाह अवनि से करा दिया जाए। रघुवीर सिंह इस शादी का पूरा खर्च उठाएंगे और अवनि को अपनी कुलवधू बनाकर रानी की तरह रखेंगे। इससे लड़की का भविष्य भी सुरक्षित हो जाएगा और दोनों खानदानों की लाज भी बच जाएगी।”

पंचायत का यह फैसला सुनकर रणविजय की दादी के चेहरे पर राहत की सांस तैर गई और गांव वाले भी सिर हिलाकर कहने लगे कि यही सबसे उत्तम न्याय है। अवनि के माता-पिता भी एक पल के लिए इस सामाजिक दबाव के आगे झुकते दिखे। उन्हें लगा कि शायद यही उनकी बेटी के लिए एकमात्र रास्ता है जिससे वह ताउम्र के तानों से बच सकेगी।

तभी पंचायत के बीच में बैठी अवनि उठकर खड़ी हो गई। उसकी आवाज पूरे मैदान में गूंज उठी, “मुझे यह फैसला कतई मंजूर नहीं है!”

पूरे परिसर में सन्नाटा छा गया। सरपंच ने आंखें तरेरते हुए कहा, “बेटी, होश में बात कर। पंचायत तेरे भले की सोच रही है। इसके अलावा तेरे पास क्या रास्ता है? एक बार बदनामी का ठप्पा लग गया तो कोई भला मानुस तुझे नहीं अपनाएगा।”

अवनि आगे बढ़ी। उसके चेहरे पर न भय था, न झिझक। उसने निर्भीक होकर कहा, “भला? कैसा भला सरपंच जी? जिस इंसान ने मेरी आत्मा को रौंदा, जिसने एक जानवर की तरह मुझ पर हमला किया, आप उसी दरिंदे के साथ मुझे जीवन भर के लिए बांध देना चाहते हैं? क्या एक औरत का अस्तित्व सिर्फ शादी तक ही सीमित है? क्या किसी अपराधी को सजा देने के बजाय उसे इनाम में वही लड़की सौंप देना न्याय है? यह कोई विवाह नहीं, यह तो मेरे आत्मसम्मान का घिनौना सौदा है। मैं किसी भी ऐसे समझौते को स्वीकार नहीं करूंगी जो मेरी आत्मा को रोज मारे। मैं उस हैवान के साथ सात फेरे लेने से पहले मर जाना बेहतर समझूंगी। चाहे मुझे सारी जिंदगी अकेले ही क्यों न रहना पड़े, मैं यह समझौता कभी नहीं करूंगी!”

अवनि की बातों ने पंचायत के झूठे नैतिक ढांचे पर करारा तमाचा जड़ा था। लेकिन समाज इतनी आसानी से अपनी हार कहां स्वीकार करता है। पंचायत के पंचों ने दीनानाथ पर दबाव बनाना शुरू किया। कुछ लोगों ने फुसफुसाते हुए कहा कि अगर लड़की नहीं मानी तो इस परिवार का हुक्का-पानी बंद कर दिया जाएगा, इन्हें बिरादरी से बेदखल कर दिया जाएगा।

रणविजय की दादी ने अवनि के पास आकर लालच देने की कोशिश की, “अरे पगली, तू समझ नहीं रही है। तू हमारी खानदानी जायदाद की मालकिन बनेगी। सोने-चांदी से लद जाएगी। महलों जैसा घर है हमारा।”

अवनि ने हाथ जोड़कर कहा, “दादी जी, आपकी दौलत आपके उस पोते की दरिंदगी को नहीं धो सकती। मुझे सोने का पिंजरा नहीं, अपना स्वाभिमान चाहिए।”

अवनि के इस अटूट साहस को देखकर उसके पिता दीनानाथ की रीढ़ भी सीधी हो गई। उन्होंने अपनी बेटी का कंधा थामते हुए भरी पंचायत में कहा, “मेरी बेटी बिल्कुल सही कह रही है। हम गरीब जरूर हैं, लेकिन अपनी बेटी की आत्मा का सौदा नहीं करेंगे। हमें बिरादरी से निकालना हो तो निकाल दीजिए, लेकिन मेरी बच्ची उस मुजरिम के घर कभी नहीं जाएगी।”

जब पंचायत के तमाम पैंतरे और धमकियां अवनि के चट्टानी इरादों के आगे पस्त हो गईं, तो सबसे बड़ा मोड़ रघुवीर सिंह की तरफ से आया। अपने बेटे के कुकर्म और अवनि के अदम्य साहस को देखकर रघुवीर सिंह की अंतरात्मा जाग उठी। वे अपनी जगह से उठे और हाथ जोड़कर अवनि के सामने आ खड़े हुए। उनकी आंखों में आंसू थे। उन्होंने कहा, “बेटी अवनि, आज तुमने मेरी आंखें खोल दीं। मेरा बेटा एक अपराधी है, और एक अपराधी की सही जगह जेल की सलाखों के पीछे है, मंडप में नहीं। अगर मैं एक पिता होने के नाते अपने बेटे को बचाने की कोशिश करूंगा, तो ईश्वर मुझे कभी माफ नहीं करेगा।”

रघुवीर सिंह स्वयं अवनि और उसके पिता को लेकर थाने पहुंचे। उन्होंने अपने बेटे के खिलाफ खुद प्राथमिकी दर्ज करवाई। मास्टर शिवनारायण जी ने अपनी चश्मदीद गवाही दी और अदालत में केस चला। रणविजय के वकीलों ने कई चालें चलने की कोशिश की, लेकिन रघुवीर सिंह की सत्यनिष्ठा और अवनि की अडिग गवाही के आगे कोई दलील न टिक सकी। अदालत ने रणविजय को दस साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई।

गांव में अवनि और उसके परिवार को शुरुआत में कुछ सामाजिक उपेक्षा और तानों का सामना जरूर करना पड़ा, लेकिन अवनि ने कभी अपना हौसला नहीं खोया। उसने हर तंज को अपनी ताकत बनाया। उसने दिन-रात एक करके अपनी पढ़ाई पूरी की। उसने शहर जाकर प्रतियोगी परीक्षाएं दीं और एक प्रतिष्ठित वित्तीय संस्थान में अच्छे पद पर चयनित हो गई। अपनी मेहनत और ईमानदारी के दम पर उसने न केवल अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को पूरी तरह बदल दिया, बल्कि समाज के उस नजरिए को भी बदल दिया जो कभी उसे दया की दृष्टि से देखता था।

उसी संस्थान में उसकी मुलाकात विवान से हुई थी। विवान ने अवनि की कार्यकुशलता, उसके विचारों की स्पष्टता और उसकी गरिमा को देखकर उसे अपना दिल दे दिया था। जब विवान ने विवाह का प्रस्ताव रखा, तो अवनि ने बिना किसी लाग-लपेट के अपने अतीत का हर सच उसके सामने बयां कर दिया था। उसने कहा था, “विवान, मेरे अतीत में एक ऐसा घाव है जिसे यह समाज कलंक कहता है। मैं कोई समझौता करके या सच छिपाकर तुमसे नहीं जुड़ना चाहती।”

विवान ने बेहद सुकून से अवनि के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए थे और मुस्कुराते हुए कहा था, “अवनि, उस हादसे में तुम्हारा कोई दोष नहीं था। तुम उस अंधेरे से लड़कर बाहर निकली हो, यह तुम्हारी कमजोरी नहीं, तुम्हारी सबसे बड़ी ताकत है। मुझे तुम पर गर्व है, और मैं खुद को भाग्यशाली समझूंगा अगर तुम मेरी जीवनसंगिनी बनोगी।”

“दीदी, बारात आ गई!”

अपनी छोटी बहन की आवाज सुनकर अवनि वर्तमान में लौट आई। उसने शीशे में देखा, उसकी आंखों के आंसू अब सूख चुके थे और उनकी जगह एक अलौकिक तेज था। उसने अपनी चुनरी ठीक की और मुस्कुरा दी।

बाहर आंगन में विवान गाजे-बाजे के साथ पहुंच चुका था। जब अवनि वरमाला के लिए मंच पर पहुंची, तो विवान की नजरें उससे मिलीं। उन नजरों में अवनि के लिए अथाह प्रेम, आदर और विश्वास था। दोनों ने एक-दूसरे के गले में वरमाला डाली, तो पूरे पंडाल में तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी।

अवनि ने मंडप में बैठकर जब पवित्र अग्नि के फेरे लिए, तो उसे अहसास हुआ कि अगर उस दिन उसने पंचायत के सामने घुटने टेक दिए होते, अगर उसने उस दरिंदे से शादी करने का समझौता स्वीकार कर लिया होता, तो आज वह एक जिंदा लाश बनकर घुट रही होती। उसका वह एक फैसला—अन्याय के आगे न झुकने का फैसला—ही था, जिसने आज उसे इस मुकाम पर पहुंचाया था जहां उसका जीवन प्रेम, सम्मान और स्वाभिमान से जगमगा रहा था। उसने साबित कर दिया था कि एक स्त्री का भाग्य उसके अपने हौसले से तय होता है, समाज के थोपे गए समझौतों से नहीं।

समाज अक्सर पीड़िता को ही खामोश रहने और अपराधी के साथ समझौता करने की सलाह देकर अपनी झूठी मर्यादा बचाता है। क्या आपको लगता है कि आज के दौर में भी हमारे समाज की यह सोच पूरी तरह बदल पाई है? अपनी राय नीचे कमेंट में जरूर साझा करें।

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 मूल लेखिका 

गीता वाधवानी दिल्ली

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