आलोक की आवाज़ में एक अजीब सा ठहराव था। उन्होंने कहा, “सुमित, परिवार मुनाफे और घाटे पर चलने वाली कोई कॉर्पोरेट कंपनी नहीं होती। परिवार एक ऐसा वटवृक्ष होता है जिसकी छांव में जब एक डाल सूखने लगे, तो दूसरी डालियां उसे सहारा देती हैं, उसे काटकर अलग नहीं फेंका जाता। जिस भाई ने अपनी पहली कमाई से मेरी इस बहन के गले का हार बनवाया था, जिसने मां-बाबूजी के इलाज में अपनी जमा-पूंजी झोंक दी थी, आज अगर उसकी कश्ती तूफानों में फंसी है, तो क्या मैं किनारे पर बैठकर तमाशा देखूं?
सुमित जब अपनी बड़ी बहन रश्मि के घर पहुंचा, तो शहर की तपती दुपहरी और थकावट उसके चेहरे पर साफ झलक रही थी। दरवाजे की घंटी बजाते ही रश्मि ने मुस्कुराते हुए दरवाजा खोला और भाई को देखते ही उसकी आंखें चमक उठीं। पानी, शरबत और औपचारिक हाल-चाल के बाद जब बातचीत का दौर शुरू हुआ, तो सुमित ने सोफे पर टिकते हुए चारों ओर नज़र दौड़ाई। घर में एक अजीब सा सन्नाटा था। उसने सहज लहजे में पूछा, “जीजाजी कहीं नज़र नहीं आ रहे दीदी? और राघव भैया भी नहीं दिखे?”
रश्मि ने रसोई की ओर देखते हुए एक गहरी सांस ली और बोली, “तुम्हारे जीजाजी यानी आलोक जी तो सुबह ही गोदाम के काम से निकल गए थे। आज रविवार है, फिर भी कोई आराम नहीं। और राघव… वह अभी थोड़ी देर पहले ही अपनी पुरानी मोपेड पर कुछ गत्ते के डिब्बे बांधकर निकला है।”
सुमित चौंक पड़ा। राघव, जो कभी शहर के मुख्य बाज़ार में एक शानदार इलेक्ट्रॉनिक्स और मोबाइल की दुकान चलाता था, जिसके ठाठ-बाट देखकर कभी रिश्तेदार रश्क किया करते थे, वह मोपेड पर गत्ते लादकर निकले? सुमित की उत्सुकता बढ़ गई, “राघव भैया और मोपेड पर गत्ते? बात क्या है दीदी? उनकी बाज़ार वाली दुकान कैसी चल रही है?”
रश्मि का चेहरा बुझ सा गया। उसने अपनी साड़ी का पल्लू उंगलियों में लपेटते हुए धीमे स्वर में कहा, “दुकान तो पिछले साल ही बंद हो गई भाई। कोरोना के बाद से बाज़ार ऐसा मंदा हुआ कि उबर ही नहीं पाए। भारी कर्ज़, दुकान का भारी किराया और फिर पार्टनर का धोखा… सब कुछ एक साथ आ गया। दुकान पर ताला लग गया और सारा सामान औने-पौने दाम में बेचना पड़ा। अब राघव आसपास की कॉलोनियों और छोटे कस्बों में घूम-घूमकर बिजली के छोटे-मोटे उपकरण, तार, स्विच और एलईडी बल्ब की सप्लाई करता है। दिनभर मोपेड पर भटकता है, तब जाकर कुछ सौ रुपये हाथ आते हैं।”
“तो फिर उनका परिवार कैसे संभलता है दीदी? दो बच्चे हैं, भाभी हैं, उनका खर्च?” सुमित ने आंखें सिकोड़कर पूछा।
“राघव जो थोड़ा-बहुत कमाता है, वह बच्चों की स्कूल की फीस और किताबों में ही खत्म हो जाता है। कभी-कभार कोई बीमार पड़ जाए तो हाथ पूरी तरह खाली हो जाते हैं,” रश्मि ने अपनी बेबसी जाहिर की।
सुमित ने सीधे होकर बैठते हुए सवाल किया, “तो फिर इस घर का बाकी खर्च? इतना बड़ा मकान, बूढ़े माता-पिता की दवाइयां, चौका-चूल्हा, राशन… यह सब कहां से आ रहा है?”
“और कहां से आएगा भाई, तुम्हारे जीजाजी हैं न अकेले खटने वाले!” रश्मि की आवाज़ में खीझ और चिंता दोनों साफ छलक आईं। “मकान की ईएमआई, बिजली-पानी का बिल, दोनों वक्त का राशन, सास-ससुर के डॉक्टर का खर्च, सब कुछ आलोक जी के अकेले कंधे पर है। वे दिन में अपने अकाउंटिंग के काम में खटते हैं और रात को एक प्राइवेट फर्म की बैलेंस शीट बनाते हैं। जब तक राघव की दुकान चलती थी, वह आधा खर्च खुशी-खुशी उठाता था, मगर पिछले आठ-नौ महीनों से उसने घर के खर्च में एक नया पैसा भी नहीं दिया है।”
सुमित के चेहरे पर कड़वाहट तैर गई। उसने त्योरियां चढ़ाते हुए कहा, “दीदी, यह कहां का न्याय है? संयुक्त परिवार के नाम पर यह तो सीधा-सीधा शोषण है। जब तक जेब में पैसा था, तब तक भाईचारा था; अब जब बुरा वक्त आया तो सारा बोझ जीजाजी पर डाल दिया? ऐसे तो तुम्हारे पति की हड्डियों का चूरा बन जाएगा।”
“मैं क्या करूं सुमित? मैं तो खुद भीतर ही भीतर घुट रही हूं,” रश्मि ने अपनी लाचारी बयां की। “एक बार मैंने आलोक जी से कहा था कि राघव से साफ-साफ कहो कि थोड़ा बोझ खुद उठाए, या फिर अपना अलग इंतजाम करे। जानते हो उन्होंने क्या कहा? आलोक जी भड़क गए। बोले कि जब राघव कमाता था, तब तो कभी उससे पाई-पाई का हिसाब नहीं मांगा, आज जब उसका वक्त खराब है, तो क्या मैं अपने सगे भाई का हाथ छोड़ दूं? वह कोई ऐश-मौज नहीं कर रहा, धूप-धूल में अपनी इज़्ज़त दांव पर लगाकर फेरी लगा रहा है। वह गिर गया है तो क्या मैं उसे ठोकर मार दूं? लोग अजनबियों पर तरस खाते हैं, वह तो मेरा सगा खून है।”
सुमित ने गुस्से में मेज पर हाथ पटकते हुए कहा, “यह सब किताबी बातें हैं दीदी! भावुकता से पेट नहीं भरता और न ही परिवार चलते हैं। तुम्हारे जीजाजी की अक्ल पर पत्थर पड़ गए हैं। वे महान बनने के चक्कर में अपनी ही गृहस्थी का दीया बुझा रहे हैं। अगर यही हाल रहा, तो लिख कर रख लो, कुछ महीनों में आलोक जी भी कर्ज़ में डूब जाएंगे। राघव तो डूबा ही है, इनको भी ले डूबेगा। फिर तुम्हारे बच्चों का भविष्य क्या होगा? वे सड़कों पर आ जाएंगे। आज के ज़माने में अपनी औलाद को संभालना मुश्किल है, ये पूरे कुनबे का ठेका लिए बैठे हैं। तुम्हें सख्त होना पड़ेगा, वरना इस घर की बर्बादी तय है।”
कमरे के ठीक बाहर, आलोक बाज़ार का थैला हाथ में लिए खड़े थे। वे काफी देर पहले आ चुके थे और सुमित की हर तीखी बात उनके कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतर रही थी। सुमित जब चुप हुआ, तो आलोक ने गंभीर कदमों से कमरे में प्रवेश किया। उनका चेहरा शांत था, मगर आंखों में एक ऐसी चमक थी जो स्वाभिमानी इंसान के भीतर ही होती है।
आलोक को सामने देखकर सुमित झेंप गया, मगर उसने अपने चेहरे पर सख्ती बनाए रखी। आलोक ने सब्ज़ियों का थैला एक तरफ रखा, ठंडे पानी का एक घूंट पिया और सीधे सुमित की आंखों में देखते हुए बोले, “सुमित, तुम हमारे रिश्तेदार हो, मेरी पत्नी के भाई हो। तुम्हारा इस घर में हमेशा आदर है। मगर तुम हमारे आंगन में बैठकर हमारे ही परिवार की जड़ों में मट्ठा डालने की कोशिश मत करो। जिन रिश्तों को हमने बरसों के प्यार और त्याग से सींचा है, उन्हें तुम अपने स्वार्थ और चालाकी के तराजू में मत तौलो। यहां न कोई दुर्योधन है जो अपने भाई का हक छीनेगा, और न ही हमें किसी शकुनि की कड़वी सलाह की ज़रूरत है।”
सुमित का चेहरा फक पड़ गया। उसने तुनककर कहा, “जीजाजी, मैं तो बस अपनी बहन और उसके बच्चों की भलाई सोच रहा था। राघव भैया अगर कमा नहीं पा रहे हैं, तो कम से कम आपके ऊपर बोझ तो न बनें।”
आलोक की आवाज़ में एक अजीब सा ठहराव था। उन्होंने कहा, “सुमित, परिवार मुनाफे और घाटे पर चलने वाली कोई कॉर्पोरेट कंपनी नहीं होती। परिवार एक ऐसा वटवृक्ष होता है जिसकी छांव में जब एक डाल सूखने लगे, तो दूसरी डालियां उसे सहारा देती हैं, उसे काटकर अलग नहीं फेंका जाता। जिस भाई ने अपनी पहली कमाई से मेरी इस बहन के गले का हार बनवाया था, जिसने मां-बाबूजी के इलाज में अपनी जमा-पूंजी झोंक दी थी, आज अगर उसकी कश्ती तूफानों में फंसी है, तो क्या मैं किनारे पर बैठकर तमाशा देखूं? आज अगर मैंने उसका साथ छोड़ दिया, तो कल को जब मेरे बच्चे बड़े होंगे, तो वे मुझसे क्या सीखेंगे? यही कि जब अपना कोई कमज़ोर पड़े, तो उसे लात मार दो?”
कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया। रश्मि की आंखें भर आईं और सुमित के पास आलोक के इस निश्छल और फौलादी जवाब का कोई तोड़ नहीं था। अगले ही दिन सुमित बिना कुछ कहे अपने शहर वापस लौट गया।
महीने बीतते गए। आलोक दिन-रात मेहनत करते रहे। उन्होंने अपने खर्चों में कटौती की, मगर कभी चेहरे पर शिकन नहीं आने दी। राघव की मेहनत भी धीरे-धीरे रंग लाने लगी थी। वह सुबह पांच बजे निकलता और रात को दस बजे लौटता। उसने सिर्फ फेरी तक सीमित रहने के बजाय, शहर के बड़े प्रोजेक्ट्स और ठेकेदारों से सीधे संपर्क बनाना शुरू किया। आलोक ने रात को जागकर राघव के लिए एक छोटा सा बिज़नेस प्रपोजल तैयार किया और उसे सही वित्तीय योजना समझाई।
करीब डेढ़ साल का कड़ा संघर्ष बीता। राघव ने अपनी निष्ठा और मेहनत से छोटे ठेकों के ज़रिये अच्छा मुनाफा कमाना शुरू कर दिया था। एक शाम, जब आलोक काम से लौटे, तो घर का माहौल बदला हुआ था। पूरा घर रोशनी से जगमगा रहा था। मां-बाबूजी के चेहरों पर संतोष की अनोखी चमक थी और बच्चे चहक रहे थे।
जैसे ही आलोक भीतर आए, राघव अपनी पत्नी और बच्चों के साथ उनके सामने आ खड़ा हुआ। राघव की आंखों से अविरल आंसू बह रहे थे। उसने आगे बढ़कर आलोक के पैर छू लिए और उनके हाथों में एक भारी लिफाफा और एक फाइल रख दी।
आलोक ने चौंककर पूछा, “यह सब क्या है राघव?”
राघव रुंधे गले से बोला, “भैया, यह आपकी उस तपस्या का फल है जो आपने मेरे बुरे वक्त में की थी। इस लिफाफे में पिछले डेढ़ साल का वह सारा खर्च है जो आपने अकेले उठाया था। मैं जानता हूं कि आपके अहसानों की कोई कीमत नहीं हो सकती, मगर यह एक छोटे भाई का फर्ज है। और इस फाइल में… शहर के मुख्य बाज़ार में एक नई दुकान के कागज़ात हैं। इस बार दुकान केवल मेरी नहीं, ‘आलोक-राघव ब्रदर्स’ की होगी। अगर उस दिन आपने मेरा हाथ छोड़ दिया होता, तो शायद आज मैं कहीं का न रहता। आपने मुझे बचाया नहीं भैया, आपने मुझे एक नया जीवन दिया है।”
रश्मि दरवाजे की ओट में खड़ी यह सब देख रही थी। उसकी आंखों से पश्चाताप और गर्व के आंसू एक साथ बह निकले। उसे याद आया कि कैसे वह अपने भाई सुमित की बातों में आकर इस परिवार को तोड़ने की सोचने लगी थी। आज अगर आलोक डिग गए होते, तो यह सुनहरा दिन कभी न आता। आलोक ने राघव को गले से लगा लिया। दोनों भाइयों का वह आलिंगन केवल दो इंसानों का मिलन नहीं, बल्कि उस भारतीय संयुक्त परिवार की अमर भावना की विजय थी जो स्वार्थ के हर तूफान को हराने का माद्दा रखती है।
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मूल लेखक
मुकुन्द लाल
हजारीबाग (झारखंड)