बाबूजी की डांट सुनकर शालिनी सहम गई और नजरें झुका लीं। लेकिन राघवेंद्र का मन अब शांत होने वाला नहीं था। उन्होंने बाबूजी की तरफ देखकर हाथ जोड़ लिए, “नहीं बाबूजी, अब मुझे मत रोकिए। मैंने अपनी पूरी जवानी सबको खुश रखने में और समझौते करने में निकाल दी। समर जब चाहता है, अपनी मर्जी से जिंदगी जीता है, नुकसान करता है, और उम्मीद करता है कि बड़ा भाई उसके पाप धोएगा। शालिनी जब आती है, अपने अधिकार गिनाती है। मां जब तक थीं, हमेशा समर की गलतियों पर परदा डालती रहीं। अब मुझमें और सहने की ताकत नहीं है। मुझे भी थोड़ा सुकून चाहिए। मुझे अपने बच्चों का भविष्य देखना है।”
दिसंबर की सर्द सुबह थी और कोहरे की चादर ने पूरे गांव को अपनी आगोश में ले रखा था। मिट्टी और चूने से पुते पुराने दालान में अलाव जल रहा था, जिसकी सुलगती लकड़ियों से उठती लपटें ठंड को दूर करने की नाकाम कोशिश कर रही थीं। राघवेंद्र खुरपी से अलाव की राख को कुरेद रहे थे, पर उनके दिमाग में विचारों की एक अलग ही आँच सुलग रही थी। तभी चाय की सुड़की लेते हुए उनकी छोटी बहन शालिनी ने बहुत सहज भाव से कहा, “भैया, समर का फोन आया था कल। बहुत परेशान है वो। उसने जो नया कंस्ट्रक्शन का काम शुरू किया था, उसमें काफी नुकसान हो गया। लेनदार रोज उसके दरवाजे पर तगादा कर रहे हैं। क्या आपके पास सात-आठ लाख रुपये का इंतजाम नहीं हो सकता? आप तो बड़े हैं, अगर आप ही हाथ खींच लेंगे तो वो बेचारा तो सड़क पर आ जाएगा।”
राघवेंद्र ने गहरी सांस ली और अपने दोनों हाथों को अलाव के ऊपर सेकते हुए कहा, “शालिनी, समर को जब भी देखो, किसी न किसी नए झमेले में फंसा होता है। कभी शेयर बाजार, कभी नया धंधा, तो कभी कोई और योजना। पिछले पांच सालों में उसने तीन बार मुझसे पैसे लिए हैं, ये कहकर कि छह महीने में लौटा देगा। आज तक एक धेला वापस नहीं आया। बैंक में मेरी कोई नोट छापने की मशीन नहीं लगी है।”
शालिनी का चेहरा उतर गया, और उसकी आवाज़ में एक अजीब सी तल्खी घुल गई, “भैया, आप तो ऐसे बोल रहे हैं जैसे आपके पास पैसों की कोई तंगी हो। हम सब जानते हैं कि गांव में रहने का कितना फायदा है। शहर में तो कदम रखते ही जेब कटती है। फ्लैट की ईएमआई, बच्चों की भारी-भरकम स्कूल फीस, दूध, सब्जी, पानी का बिल, यहां तक कि सांस लेने का भी पैसा लगता है। आपको क्या चिंता है? पुश्तैनी पक्के मकान की छत है, जिसका कोई किराया नहीं लगता। अपने खेतों का ताजा अनाज, कोठार में भरे चावल और दालें। दरवाजे पर दो भैंसें बंधी हैं, तो शुद्ध दूध-घी भी मुफ्त का ही समझो। छत पर सोलर पैनल लगा है, तो बिजली का बिल भी नाममात्र आता है। लकड़ियां बाग से आ जाती हैं। आप तो महीने के लाखों रुपये सीधे बचा लेते हैं। अगर उस बचत में से अपने छोटे भाई की मुसीबत के वक्त थोड़ी मदद कर देंगे, तो क्या आपका खजाना खाली हो जाएगा?”
शालिनी की यह दलील सुनकर राघवेंद्र के भीतर सालों से दबा हुआ लावा जैसे अचानक फूट पड़ा। उन्होंने हाथ की खुरपी जमीन पर पटकी और खड़े हो गए। उनकी आँखों में गुस्सा कम, बरसों की उपेक्षा और बेबसी का दर्द ज्यादा था।
“मुफ्त? तुम्हें यह सब मुफ्त दिखता है शालिनी?” राघवेंद्र की आवाज़ कांप रही थी। “तुम और समर जब शहर जाकर बसे थे, तो अपना हिस्सा नगद और जमीन के कागजों में नापकर ले गए थे। तुमने कभी सोचा कि इस तथाकथित मुफ्त के जीवन को चलाने के लिए मुझे क्या-क्या चुकाना पड़ता है? जब रात के दो बजे कड़ाके की ठंड में नलकूप की मोटर खराब होती है, तो मुझे घुटनों तक ठंडे पानी में उतरना पड़ता है। खाद और बीज के लिए सहकारी समिति के चक्कर काटने पड़ते हैं। कभी बेमौसम बारिश से फसल बर्बाद हो जाती है, तो उस नुकसान की भरपाई कौन करता है? घर की छत टपकती है तो समर हाथ बंटाने नहीं आता। माताजी जब छह महीने अस्पताल में जिंदगी और मौत से जूझ रही थीं, तब समर केवल दो दिन के लिए औपचारिकता निभाने आया था। उनका डायलिसिस, उनकी दवाइयां, बाबूजी के घुटनों का इलाज, दिन-रात की तीमारदारी—ये सब क्या मुफ्त में हो गया? और तुम्हारी शादी में जो लाखों का कर्जा चढ़ा था, उसे उतारते-उतारते मेरी जवानी के दस साल बीत गए। समर ने तो तब भी हाथ खड़े कर दिए थे। तुम्हारी भाभी ने अपने गहने गिरवी रख दिए थे ताकि तुम्हारी डोली शान से उठे। और आज तुम मुझे शहर के खर्चों का गणित सिखा रही हो? तुम दोनों ने अपनी मर्जी से शहर की चमकदार जिंदगी चुनी, और मुझे इस माटी और जिम्मेदारियों के साथ बांध दिया। अब बस, बहुत हो चुका। मैंने शहर में ब्लॉक एजुकेशन ऑफिसर के पद के लिए ट्रांसफर की अर्जी दे दी है। अगले महीने हमें सरकारी क्वार्टर मिल जाएगा। मैं अपने बच्चों को लेकर शहर जा रहा हूं। कम से कम वहां मुझे और तुम्हारी भाभी को इस अंतहीन भागदौड़ और रोज-रोज के तानों से मुक्ति मिलेगी।”
दालान के कोने में कुर्सी पर बैठे बाबूजी, पंडित दीनानाथ, जो अब तक खामोशी से गीता का पाठ कर रहे थे, अपनी लाठी टेकते हुए उठे। उनकी बूढ़ी आंखें नम थीं। उन्होंने कांपती आवाज़ में शालिनी से कहा, “चुप रह शालिनी! एक शब्द और मत बोल। तू जिस सुख और बचत की बात कर रही है, वो सुख नहीं, तेरे भाई के खून-पसीने की कमाई है। तूने कभी राघवेंद्र के पैरों की बिवाइयां देखी हैं? उसकी हथेलियों के छाले देखे हैं? जब तुम दोनों शहर में एयर कंडीशनर चलाकर सोते हो, तब यह रात-रात भर जागकर खेतों की रखवाली करता है। हमारे कुनबे का नाम, इस चौखट की इज्जत सिर्फ और सिर्फ राघवेंद्र की वजह से बची हुई है। गांव के बाकी बुजुर्ग आज अपने बेटों के शहर जाने के बाद अनाथों की तरह जी रहे हैं, पर राघवेंद्र ने मुझे कभी अकेला महसूस नहीं होने दिया। तू उसे उपदेश देने आई है?”
बाबूजी की डांट सुनकर शालिनी सहम गई और नजरें झुका लीं। लेकिन राघवेंद्र का मन अब शांत होने वाला नहीं था। उन्होंने बाबूजी की तरफ देखकर हाथ जोड़ लिए, “नहीं बाबूजी, अब मुझे मत रोकिए। मैंने अपनी पूरी जवानी सबको खुश रखने में और समझौते करने में निकाल दी। समर जब चाहता है, अपनी मर्जी से जिंदगी जीता है, नुकसान करता है, और उम्मीद करता है कि बड़ा भाई उसके पाप धोएगा। शालिनी जब आती है, अपने अधिकार गिनाती है। मां जब तक थीं, हमेशा समर की गलतियों पर परदा डालती रहीं। अब मुझमें और सहने की ताकत नहीं है। मुझे भी थोड़ा सुकून चाहिए। मुझे अपने बच्चों का भविष्य देखना है।”
दीनानाथ जी ने गहरी सांस ली। उनके चेहरे पर गहरी झुर्रियां और खिंच गईं। उन्होंने राघवेंद्र के कंधे पर अपना कांपता हुआ हाथ रखा और बहुत धीमे स्वर में बोले, “बेटा, तूने जो कहा, सच कहा। मैं तेरी पीड़ा समझता हूं। तूने हमारे लिए जितना किया, उतना शायद कोई श्रवण कुमार भी नहीं कर पाता। तू बिल्कुल स्वतंत्र है। तू अपनी नौकरी, अपने परिवार और अपनी शांति को चुन। बस जाने से पहले इस घर, इस जमीन और इन मवेशियों का कोई बंदोबस्त कर जा। किसी को अधिया पर दे दे या बेच दे। और जहां तक मेरा सवाल है… तू चाहे तो मुझे अपने साथ उस छोटे से क्वार्टर में रख लेना, और अगर वहां जगह की तंगी हो या तेरी शांति में मेरी वजह से खलल पड़े, तो मुझे शहर के किसी वृद्धाश्रम में छोड़ देना। मुझे कोई शिकायत नहीं होगी। तूने मेरा बहुत साथ निभाया है बेटा, अब मैं तुझ पर बोझ नहीं बनूंगा।”
“वृद्धाश्रम!” यह शब्द सुनते ही जैसे राघवेंद्र के सीने पर किसी ने भारी पत्थर रख दिया हो। उनके पैरों तले से जमीन खिसक गई। उन्होंने अपनी नजरें उठाईं और अपने पिता के उस बूढ़े, झुके हुए चेहरे को देखा, जिसने अपनी पूरी जिंदगी इस परिवार को सींचने में लगा दी थी। जिस पिता की उंगली पकड़कर उन्होंने चलना सीखा था, आज वही पिता अपने ही घर में बेगाने होने की बात कर रहे थे।
कमरे के दरवाजे की ओट में खड़ी राघवेंद्र की पत्नी, जानकी, भी बाहर निकल आई। उसकी आंखों में आंसू थे। उसने आगे बढ़कर दीनानाथ जी के पैर छुए और बोली, “बाबूजी, यह आप कैसी बातें कर रहे हैं? अगर हम ही आपको छोड़ देंगे तो ईश्वर हमें कभी माफ नहीं करेगा। यह घर केवल ईंट-पत्थरों का ढांचा नहीं है, यह हमारा स्वाभिमान है।”
राघवेंद्र स्तब्ध खड़े थे। उनके भीतर एक भयानक युद्ध चल रहा था—एक तरफ उनका व्यक्तिगत सुकून, उनकी थकान और शहर की आसान जिंदगी थी, तो दूसरी तरफ उनकी जड़ें, उनके संस्कार और पिता का यह अगाध स्नेह। उन्होंने समझ लिया कि पलायन किसी समस्या का हल नहीं है। अगर वे आज घर छोड़कर भाग जाएंगे, तो वे भी समर की तरह ही स्वार्थी कहलाएंगे। लेकिन साथ ही, वे यह भी जानते थे कि बिना सीमाएं तय किए इस परिवार को टूटने से नहीं बचाया जा सकता।
राघवेंद्र ने आगे बढ़कर बाबूजी के दोनों हाथ थाम लिए और भावुक स्वर में बोले, “बाबूजी, मुझे माफ कर दीजिए। गुस्से में मेरे मुंह से गलत बात निकल गई। मैं आपको छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा। यह माटी मेरी पहचान है, और जब तक मेरी सांसें चल रही हैं, यह चौखट सूनी नहीं होगी। मैं गांव में ही रहूंगा।”
फिर वे शालिनी की तरफ मुड़े। उनकी आवाज़ में अब क्रोध नहीं था, बल्कि एक शांत और अडिग दृढ़ता थी। “शालिनी, मेरी बात समर तक साफ-साफ पहुंचा देना। इस बार मैं उसे कोई पैसा नहीं दूंगा। न मेरे पास इतना फालतू धन है, और न ही यह उसकी भलाई के लिए सही होगा। हर बार जब वह गड्ढा खोदेगा और मैं उसे भरूंगा, तो वह कभी अपनी गलतियों से नहीं सीखेगा। अगर उसे वाकई अपने पैरों पर खड़ा होना है, तो उसे अपने फैसलों की जिम्मेदारी खुद लेनी होगी। मैंने उसे पहले भी कहा था कि वह गांव लौट आए, यहां हमारे पास उपजाऊ जमीन है, हम मिलकर आधुनिक खेती और डेयरी का बड़ा काम शुरू कर सकते हैं। जमीन किसी को भूखा नहीं मारती। लेकिन अगर उसे शहर में ही रहना है, तो अपनी समस्याओं का हल भी उसे खुद ढूंढना होगा। बड़ा भाई होने के नाते मेरा आशीर्वाद और मेरा मार्गदर्शन हमेशा उसके साथ है, लेकिन अब मेरी गाढ़ी कमाई का दुरुपयोग नहीं होगा।”
शालिनी ने पहली बार अपने बड़े भाई की आंखों में वह दर्द और संकल्प देखा जो उसने कभी महसूस नहीं किया था। उसे अपनी भूल का गहरा अहसास हुआ। उसे समझ आया कि गांव में रहना कोई मुफ्त की विलासिता नहीं, बल्कि एक भारी तपस्या है, जिसे राघवेंद्र अकेले अपने दम पर निभा रहे थे।
उसकी आंखें भर आईं। उसने आगे बढ़कर राघवेंद्र के हाथ पकड़ लिए, “भैया, मुझे माफ कर दीजिए। मैं शहर की चकाचौंध और समर की बातों में आकर इतनी अंधी हो गई थी कि मुझे आपका त्याग दिखाई ही नहीं दिया। आप बिल्कुल सही कह रहे हैं। जब तक समर को खुद मेहनत की कीमत समझ नहीं आएगी, वो कभी संभल नहीं पाएगा। मैं आज ही जाकर उससे बात करूंगी और उसे समझाऊंगी कि वह अपनी फिजूलखर्ची बंद करे और अपने नुकसान की भरपाई खुद करे। और अगर हो सके, तो वह भी गांव आकर आपके साथ हाथ बंटाए।”
उस दिन घर के आंगन में जमी कड़वाहट की बर्फ पिघल चुकी थी। दोपहर की धूप अब आंगन में खिलखिला रही थी। राघवेंद्र ने राहत की सांस ली। यह कोई समझौता नहीं था, बल्कि परिवार को बचाने के लिए एक नई और मजबूत शुरुआत थी—जहाँ प्रेम भी था, कर्तव्य भी, और सही दिशा दिखाने वाली मर्यादा भी।
क्या आज के दौर में भी संयुक्त परिवार में टिके रहने वाले व्यक्ति के त्याग को अक्सर ‘मुफ्त की सुविधा’ मान लिया जाता है? अपनी राय हमें नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो लाइक, कमेंट और शेयर करें। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें, धन्यवाद।
मूल लेखिका — मधु शुक्ला .
सतना , मध्यप्रदेश .