पत्थर के शहर में एक टूटा आईना

दीनू ने अपने गमछे से आँखें पोंछते हुए बताया, “बिटिया, तारा हमेशा से ऐसी नहीं थी। गाँव में सबसे होनहार लड़की थी। माँ तो इसके पैदा होते ही गुजर गई थी, मैंने ही माँ और बाप दोनों बनकर इसे पाला था। बड़ी लाड़-प्यार से इसका ब्याह किया था। पर इसके ससुराल वालों ने दहेज के लालच में इस पर जो जुल्म ढाए, वह कोई जानवर भी नहीं सह सकता। एक दिन उन्होंने इसकी छह महीने की मासूम बच्ची को खाट से नीचे फेंक दिया और तारा को जलाकर मारने की कोशिश की।

शहर के किनारे बनी उस पुरानी रेलवे कॉलोनी के ठीक पीछे एक कच्ची बस्ती थी, जहाँ धूल, गर्द और जिंदगी की जद्दोजहद हर सुबह एक साथ उठती थी। हमारे घर की पिछली बालकनी उसी बस्ती की ओर खुलती थी। सुबह की पहली चाय के साथ जब मैं बालकनी में खड़ी होती, तो दुनिया के कई रंग एक साथ आँखों के आगे तैरने लगते। पर उन तमाम रंगों में एक रंग ऐसा था, जो हर रोज़ दिल को एक गहरी टीस दे जाता था। वह रंग थी तारा।

तारा, जिसे पूरी बस्ती वाले सिर्फ ‘सिरफिरी’ कहकर बुलाते थे। उसके बिखरे हुए सूखे बाल, गर्द से सनी मैली साड़ी और आँखों में एक अजीब सा भटकता हुआ वीराना। उम्र शायद पच्चीस-छब्बीस की रही होगी, पर उसके चेहरे पर जमाने भर की ठोकरों ने बेवक्त बुढ़ापे की लकीरें खींच दी थीं। अक्सर बस्ती के आवारा लड़के उसके पीछे सीटी बजाते, कभी कंकड़ फेंकते, और तारा या तो जोर-जोर से हँसने लगती या फिर गालियों की बौछार कर देती। कॉलोनी के पक्के घरों के लोग उसे देखकर अपनी खिड़कियाँ बंद कर लेते थे, मानो उसकी हवा भी किसी को बीमार कर देगी।

मेरी बड़ी चाची, जो घर की सबसे सख्त मिजाज महिला थीं, उनका तो सख्त हुक्म था कि उस तरफ कभी देखना भी मत। चाची का कहना था कि ऐसे लोग सिर्फ समाज के लिए खतरा होते हैं, न जाने कब क्या अनहोनी कर बैठें। पर मेरे मन में तारा के लिए कभी डर नहीं जन्मा। उसकी बड़ी-बड़ी, खाली आँखों में जब भी मेरी नजरें पड़तीं, मुझे वहाँ पागलपन नहीं, बल्कि एक असीम शून्य दिखाई देता था। ऐसा लगता था जैसे किसी ने उसकी आत्मा को नोचकर फेंक दिया हो और अब केवल एक खाली ढांचा इस दुनिया के तमाशों के बीच भटक रहा हो।

एक दिन की बात है। चाची मंदिर गई हुई थीं और मैं अपने दो साल के भतीजे आरव को गोद में लेकर बालकनी में टहल रही थी। आरव खिलखिलाकर हवा में हाथ-पैर मार रहा था। तभी नीचे से तारा गुजरी। हमेशा की तरह बड़बड़ाती हुई, अपने में खोई हुई। अचानक आरव के हाथ से उसका लाल रंग का प्लास्टिक का खिलौना छूटकर नीचे गिर पड़ा। तारा ठिठक गई। उसने झुककर वह खिलौना उठाया और सिर उठाकर बालकनी की तरफ देखा।

उस पल तारा की आँखों में जो भाव मैंने देखा, उसने मुझे अंदर तक हिला दिया। वह कोई विक्षिप्त औरत की निगाह नहीं थी; वह एक भूखी, प्यासी माँ की निगाह थी जो किसी अपने को देख रही हो। उसने खिलौना ऊपर की ओर लहराया और अपने होंठों को सिकोड़कर बच्चों जैसी आवाज निकाली। आरव ने भी खुशी से अपने हाथ हिला दिए।

मेरे भीतर जाने कहाँ से एक अजीब सा साहस उमड़ पड़ा। मैंने आरव को कसकर पकड़ा और नीचे उतर गई। मुख्य दरवाजे के पास आकर मैंने जालीदार गेट खोला। तारा वहीं खड़ी थी, हाथ में खिलौना लिए। उसके चेहरे पर एक सहमी हुई सी झिझक थी, मानो उसे डर हो कि कोई अभी उस पर डंडा चला देगा। मैंने अपनी आँखों में नरमी भरकर मुस्कुराते हुए कहा, “तारा, खिलौना दे दे।”

तारा ने संकोच से खिलौना मेरे हाथ में थमाया, पर उसकी नजरें आरव के नन्हे, कोमल चेहरे पर टिक गईं। आरव ने बिना किसी डर के तारा की ओर हाथ बढ़ा दिए। वह नन्हा बच्चा समाज के उस फर्क को नहीं जानता था जो इंसानों को ‘सामान्य’ और ‘पागल’ में बांटता है। मैंने एक पल के लिए सांस रोकी, चाची के डर को परे धकेला, और आरव को धीरे से तारा की बांहों में थमा दिया।

तारा का पूरा शरीर कांप उठा। उसकी पथराई आँखों में अचानक आँसुओं की एक चमक दौड़ी। वह वहीं चौखट के पास जमीन पर पालथी मारकर बैठ गई। उसने आरव को इतनी नजाकत से अपनी गोद में समेटा, जैसे कोई फूल की पंखुड़ियों को थामता है। वह अपनी उँगलियों से आरव के गाल सहलाने लगी और एक धीमी, टूटी-फूटी लोरी गुनगुनाने लगी। उस वक्त कोई भी इंसान देखकर यह नहीं कह सकता था कि यह वही औरत है जिस पर लोग पत्थर फेंकते हैं। वह एक संपूर्ण, वात्सल्य से भरी स्त्री थी। मैं भी पास ही सीढ़ियों पर बैठ गई। दस-पंद्रह मिनट तक वह आरव से बच्चों की तरह बतियाती रही, उसके नन्हे पैरों को चूमती रही। जब चाची के लौटने का समय हुआ, तो मैंने धीरे से आरव को वापस माँगा। उसने बिना किसी जिद्द के बच्चे को मुझे सौंप दिया और अपनी गंदी साड़ी का पल्लू समेटते हुए चुपचाप चली गई।

उस दिन के बाद से तारा का हमारे दरवाजे पर आना एक सिलसिला बन गया। जब भी घर के बड़े व्यस्त होते या बाहर जाते, तारा कुछ पलों के लिए आती। कभी किसी सूखे पत्ते को खिलौना बनाकर आरव को देती, तो कभी अपनी टूटी जुबान में कोई कहानी सुनाने की कोशिश करती। धीरे-धीरे हमारे घर के अन्य लोगों ने भी यह देख लिया। चाची ने एक-दो बार डांटा जरूर, लेकिन जब उन्होंने अपनी आँखों से देखा कि तारा आरव को कितने जतन से थामती है, तो उनका सख्त दिल भी थोड़ा पिघल गया। उनका खौफ अब कम होने लगा था।

मगर जिंदगी हमेशा सीधी लकीर पर नहीं चलती। बरसात का मौसम शुरू हो चुका था। बादलों की गड़गड़ाहट के साथ एक दिन बस्ती में अचानक भारी कोहराम मच गया। चीख-पुकार सुनकर हम सब बालकनी में दौड़े। नीचे का नजारा देखकर रूह कांप गई। तारा का संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका था। उसका उन्माद अपनी चरम सीमा पर था। वह अपने कपड़े फाड़ने पर उतारू थी और उसके हाथ में एक भारी पत्थर था जिससे वह अपने ही सिर पर वार करने की कोशिश कर रही थी।

उसके बूढ़े पिता, जो पास ही के कारखाने में बोझा ढोने का काम करते थे, और उसका भाई, जो मजदूरी करता था, दोनों मिलकर भी उसे रोक नहीं पा रहे थे। बस्ती के कुछ मर्द रस्सियाँ लेकर उसे एक पुराने शीशम के पेड़ से बाँधने की कोशिश कर रहे थे। पर तारा किसी घायल शेरनी की तरह झपट रही थी। अचानक उसने एक झटके से खुद को छुड़ाया और बंदर की फुर्ती से शीशम के ऊंचे पेड़ की शाखों पर चढ़ गई।

नीचे तमाशबीनों की भारी भीड़ जुट चुकी थी। लोग तालियाँ बजा रहे थे, सीटियाँ मार रहे थे, जैसे कोई मुफ्त का सर्कस चल रहा हो। कोई वीडियो बना रहा था, तो कोई उस पर गालियाँ कस रहा था। तारा पेड़ की सबसे पतली डाल पर जाकर बैठ गई और हिस्टीरियाई अंदाज में जोर-जोर से हँसने लगी। उसकी वह हँसी रोंगटे खड़े कर देने वाली थी। फिर उसने डाल को पकड़ा और झूलते हुए पास के एक मकान की छत पर छलांग लगा दी। छत पर कपड़े सुखा रही महिला चीखती हुई सीढ़ियों की तरफ भागी। पर तारा को किसी से कोई मतलब नहीं था। वह छत से उतरकर अपनी उसी बदहाल झोपड़ी के आगे आकर बैठ गई।

अब उसके हाथ में कहीं से मिला एक टूटा हुआ आईना और एक बिना दांतों वाला कंघा था। वह खून से लथपथ माथे की परवाह किए बिना उस टूटे आईने में अपना अक्स देख रही थी और अपनी उलझी जटाओं को संवारने का व्यर्थ यत्न कर रही थी, मानो उसे किसी बारात में जाना हो। उस भयानक उपद्रव के बाद उसकी यह बेपरवाह, शांत हरकत लोगों को और ज्यादा चौंका रही थी। तमाशा खत्म देख भीड़ धीरे-धीरे छंटने लगी।

अगले दिन, बस्ती के मुखिया और पुलिस की मदद से तारा को शहर के बड़े मानसिक चिकित्सालय ले जाया गया। उसके जाने के बाद वह पूरा इलाका जैसे वीरान हो गया। रात के सन्नाटे में जब उसकी चीखें नहीं गूंजती थीं, तो सुकून मिलने के बजाय एक अजीब सा खालीपन सालता था। एक ऐसी बेबस रूह, जो तड़पती रही और हम सब सिर्फ देखते रहे।

कुछ दिनों बाद, तारा के पिता दीनू हमारे दरवाजे पर आकर बैठ गए। धूप में झुलसा चेहरा, झुकी हुई कमर और आँखों में आंसुओं का सैलाब लिए वह बूढ़ा इंसान अपनी किस्मत को कोस रहा था। मैंने उन्हें पानी दिया और तारा का हाल पूछा। मेरी इस हमदर्दी ने उनके भीतर का बांध तोड़ दिया। वे फूट-फूट कर रो पड़े।

दीनू ने अपने गमछे से आँखें पोंछते हुए बताया, “बिटिया, तारा हमेशा से ऐसी नहीं थी। गाँव में सबसे होनहार लड़की थी। माँ तो इसके पैदा होते ही गुजर गई थी, मैंने ही माँ और बाप दोनों बनकर इसे पाला था। बड़ी लाड़-प्यार से इसका ब्याह किया था। पर इसके ससुराल वालों ने दहेज के लालच में इस पर जो जुल्म ढाए, वह कोई जानवर भी नहीं सह सकता। एक दिन उन्होंने इसकी छह महीने की मासूम बच्ची को खाट से नीचे फेंक दिया और तारा को जलाकर मारने की कोशिश की। बच्ची नहीं बची… और उसी दिन से तारा की दिमागी नसें फट गईं। वह अपनी बच्ची को ढूँढते-ढूँढते इस हाल में पहुँच गई। जिन हाथों से कभी मैंने अपनी गुड़िया को झूला झुलाया था, आज उन्हीं हाथों से मुझे उसे रस्सियों में बांधना पड़ता है। भगवान किसी दुश्मन को भी ऐसी औलाद का दुख न दे।”

दीनू की बातें सुनकर मेरा कलेजा मुँह को आ गया। समाज जिसे ‘पागल’ कहकर दुत्कार रहा था, वह दरअसल एक ऐसी माँ थी जिसके मातृत्व की निर्मम हत्या कर दी गई थी। उसका आरव के प्रति वह लगाव कोई पागलपन नहीं, बल्कि उसके अंदर दबी हुई ममता की वही तड़प थी।

अस्पताल में तारा का इलाज महीनों चला। उसे बिजली के झटके दिए गए, भारी दवाइयाँ दी गईं। दीनू अपनी मजदूरी का एक-एक पैसा उसकी दवाइयों में झोंक रहे थे।

लगभग छह महीने बाद, एक शांत दोपहर को तारा वापस आई। खबर फैलते ही पूरी बस्ती उसके दरवाजे पर फिर से जमा हो गई। लोगों को उम्मीद थी कि वही पुरानी तमाशे वाली तारा दिखेगी, जो पत्थर फेंकेगी या गालियाँ बकेगी और उनका मनोरंजन होगा।

पर जब तारा बाहर निकली, तो सारा मंजर ही बदला हुआ था। उसने एक साफ-सुथरी सूती साड़ी पहनी थी, बाल सलीके से बंधे थे, और वह सिर झुकाए शांत बैठी थी। उसकी आँखों का वह हिंसक शून्य अब एक गहरी, उदास शांति में बदल चुका था। दवाइयों और सही देखरेख ने उसके दिमाग के तूफान को शांत कर दिया था। जब लोगों ने देखा कि अब न कोई चीख है, न कोई उपद्रव और न कोई तमाशा, तो वे मायूस होकर एक-एक करके वहां से चले गए। समाज का यह क्रूर चेहरा देखकर मुझे घिन्न आई, लेकिन तारा को इस हाल में देखकर मेरी आँखों में संतोष के आँसू छलक आए।

तारा ठीक तो हो गई थी, लेकिन वह पूरी तरह खामोश थी। वह किसी से बात नहीं करती थी, बस गुमसुम बैठी रहती थी। डॉक्टरों ने कहा था कि दवाइयों ने उसके उन्माद को तो रोक दिया है, लेकिन उसके अवसाद और सदमे को मिटाने के लिए उसे दवा से ज्यादा प्यार, काम और अपनेपन की जरूरत है।

मैंने अपनी चाची से बात की। चाची का दिल भी अब पूरी तरह बदल चुका था। उन्होंने कहा, “बहू, अगर हम इंसान होकर भी किसी डूबते को सहारा न दें, तो हमारी पूजा-पाठ सब बेकार है।” हमने दीनू चाचा से बात की और तारा को अपने घर में एक नई शुरुआत देने का फैसला किया।

तारा को हमारे घर के घरेलू कामों में शामिल किया गया। शुरुआत में वह बहुत सहमी रहती थी, लेकिन जब आरव दौड़कर उसके गले लग गया और उसने अपनी नन्ही बांहें उसकी गर्दन में डाल दीं, तो तारा के सीने में जमी बर्फ आखिरकार पिघल गई। वह जोर-जोर से रो पड़ी—वे आँसू उसके बरसों के दर्द को बहा ले गए।

तारा को सिलाई और कढ़ाई का बहुत शौक था। हमने उसके लिए एक पुरानी सिलाई मशीन की व्यवस्था कर दी। धीरे-धीरे तारा के हाथों का हुनर निखरने लगा। वह आरव और मोहल्ले के बच्चों के लिए खूबसूरत कुर्ते, फ्रॉक और बिस्तर की चादरें सिलने लगी। जिस बस्ती के लोग कभी उस पर कंकड़ फेंकते थे, आज वही लोग अपनी बेटियों के कपड़े सिलवाने के लिए तारा के पास लाइन लगाने लगे थे।

तारा अब केवल एक स्वस्थ इंसान ही नहीं बनी थी, बल्कि वह अपने पैरों पर खड़ी एक स्वाभिमानी महिला बन चुकी थी। उसके बूढ़े पिता के चेहरे पर अब लाचारी के आँसू नहीं, बल्कि गर्व और सुकून की मुस्कान थी। एक दिन जब मैंने तारा को बालकनी में आरव को अपनी गोद में बिठाकर हँसते हुए देखा, तो मुझे लगा कि दुनिया में कोई भी घाव ऐसा नहीं है जिसे प्रेम, सहानुभूति और थोड़े से विश्वास से भरा न जा सके।

मानसिक बीमारी कोई कलंक या तमाशा नहीं है, यह रूह पर लगी एक गहरी चोट है। यदि समाज पत्थर फेंकने वाले हाथ पीछे खींचकर मदद का एक हाथ आगे बढ़ा दे, तो अंधेरे से अंधेरे जीवन में भी उम्मीद की एक नई सुबह लाई जा सकती है।

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