जानकी ने रोते हुए मंगत के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए और बहुत धीमे स्वर में कहा, “मंगत, कल रात तूने जो किया, वह तू नहीं था, वह तेरी शराब थी। पर आज मैं तुझसे कुछ मांगने आई हूँ। जिस दिन माँ मरी थी, उसने तेरा हाथ मेरे हाथ में देकर कहा था कि इसे संभालना। मैंने पूरी ज़िंदगी तेरे लिए कुर्बान कर दी, कभी कोई शिकायत नहीं की। पर आज मैं तुझसे भीख मांगती हूँ—या तो तू मुझे ज़हर लाकर दे दे ताकि मैं यह रोज़-रोज़ की मौत देखना बंद करूँ, या फिर अपनी इस बहन के सिर पर हाथ रखकर इस बोतल को हमेशा के लिए छोड़ दे। तू अगर खुद को मिटाना चाहता है, तो पहले मुझे मिटा दे।”
कस्बे के पुराने मोहल्ले में स्थित मिट्टी और ईंटों का वह छोटा सा मकान बरसों से शांति और संतोष की मिसाल बना हुआ था। उस घर में मंगत अपनी बड़ी बहन जानकी के साथ रहता था। मंगत सीधा-सादा, हाड़-तोड़ मेहनत करने वाला मज़दूर और बढ़ई का काम जानने वाला कारीगर था। जानकी ने माँ-बाप के गुज़र जाने के बाद अपनी पूरी जवानी भाई की परवरिश और घर संभालने में खपा दी थी। उसने कभी अपने ब्याह का सपना नहीं देखा; उसके लिए मंगत की रोटी, उसके कपड़े और उसकी सेहत ही पूरी दुनिया थी। दिन भर आरी और रंदे की आवाज़ के बीच पसीना बहाकर मंगत जब शाम को लौटता, तो जानकी के हाथ की बनी दाल-रोटी खाकर गहरी नींद सो जाता। दोनों का जीवन किसी शांत नदी की तरह बह रहा था, जिसमें न कोई बड़ा भंवर था और न ही कोई ऊंची लहर।
फिर अचानक एक दिन एक दूर के रिश्तेदार ने मंगत के सामने एक बात रखी। पास के गाँव में धनिया नाम की एक युवती थी, जिसके पहले पति की एक साल पहले बीमारी से मौत हो गई थी। उसके मायके में कोई सहारा नहीं था, बूढ़ा बाप बीमार रहता था और जवान बेटी की देखरेख उसके वश से बाहर हो रही थी। रिश्तेदार ने कहा कि चट मंगनी और पट ब्याह हो जाए, तो दोनों का भला होगा। मंगत की उम्र भी ढल रही थी, उसने कभी सोचा नहीं था कि उसके आंगन में भी शहनाई बजेगी। बिना देर किए, बिरादरी के चंद लोगों की मौजूदगी में सादे ढंग से विवाह संपन्न हुआ और धनिया उस छोटे से घर की दहलीज़ लांघकर भीतर आ गई।
शुरुआत में घर का माहौल उत्सव जैसा हो गया। जानकी की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। वह हर आने-जाने वाले को गर्व से बताती कि उसके भाई का घर बस गया है। वह धनिया को बेटी की तरह लाड़ लड़ाती, सुबह चूल्हा जलाने से लेकर रात का बरतन मांजने तक सारा काम खुद करने की कोशिश करती ताकि नई बहू को कोई तकलीफ न हो। जानकी सोचती थी कि अब बुढ़ापे में सुख से कटेगी, घर में कोई हंसने-बोलने वाला आ गया है। पर यह सुनहरी धूप ज़्यादा दिन नहीं टिक सकी।
धनिया के स्वभाव में धीरे-धीरे एक अजीब सा अधिकार भाव पनपने लगा। उसे लगने लगा कि इस घर पर अब सिर्फ उसका हक होना चाहिए। जानकी की मौजूदगी उसे अपने रास्ते का कांटा महसूस होने लगी। धनिया जब भी खाना बनाती, जानकी के हिस्से में जली रोटियाँ आतीं या फिर कोई न कोई नुक्स निकाला जाता। जानकी बरसों से उस घर की धुरी रही थी; वह सब कुछ सहकर भी कभी-कभार टोक देती, जो धनिया को नागवार गुज़रता। मंगत जब दिन भर की थकावट समेटे घर लौटता, तो धनिया उसके सामने आँसुओं का सैलाब बहा देती। वह नमक-मिर्च लगाकर जानकी की छोटी-छोटी बातों का ऐसा बतंगड़ बनाती कि मंगत का दिमाग चकरा जाता।
मंगत पर नई गृहस्थी और पत्नी के मोह का ऐसा नशा चढ़ा था कि उसे अपनी उस बहन का त्याग और ममता दिखना बंद हो गई जिसने उसके लिए अपनी पूरी ज़िंदगी होम कर दी थी। वह बात-बात पर जानकी पर बरस पड़ता, उसे जली-कटी सुनाता और धनिया के झूठे आंसुओं पर भरोसा कर बैठता। एक शाम बात इतनी बढ़ गई कि धनिया के भड़काने पर मंगत ने चूल्हे से जलती हुई लकड़ी खींच ली और जानकी को मारने दौड़ा। जानकी चीखते हुए बाहर भागी। मोहल्ले के लोग जमा हो गए और उन्होंने मंगत को पकड़कर खूब लानत-मलानत की। उस रात मंगत ने शराब पी रखी थी। सुबह जब नशा उतरा, तो उसने जानकी के पैर पकड़ लिए, रोया और कसम खाई कि अब कभी हाथ नहीं उठाएगा और न ही शराब को हाथ लगाएगा। जानकी का ममतामयी दिल पसीज गया, उसने भाई को गले से लगा लिया।
लेकिन आदतें इतनी आसानी से कहाँ छूटती हैं। वादे रेत की दीवार साबित हुए। घर में रोज़-रोज़ का क्लेश बढ़ता गया। धनिया की मांगें और कड़वाहट बढ़ती जा रही थी, और मंगत का शराब का सहारा लेना भी दिन-ब-दिन गहराता जा रहा था। फिर एक दिन ऐसा आया जब मंगत और धनिया के बीच किसी घरेलू बात पर भयानक झगड़ा हुआ। नशे में धुत्त मंगत ने आपा खो दिया और धनिया पर हाथ छोड़ दिया। बात इतनी बिगड़ी कि धनिया ने गुस्से में अपने कपड़े एक पोटली में बांधे और घर की सांकल खोलकर बाहर निकल गई। जानकी ने उसके पैर पकड़े, गिड़गिड़ाई कि रुक जाओ, भाई नशे में है, सुबह सब ठीक हो जाएगा; पर धनिया ने एक न सुनी और तेज़ कदमों से अंधेरी रात में गायब हो गई।
अगली सुबह जब मंगत का नशा फटा, तो घर का सन्नाटा उसे डसने लगा। अपनी गलती का अहसास होते ही वह बदहवास होकर ससुराल की तरफ भागा। उसने सोचा कि गिड़गिड़ाकर, पैर छूकर धनिया को मना लाएगा। लेकिन ससुराल पहुँचकर उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई—धनिया वहाँ पहुँची ही नहीं थी। उसने आसपास के नाते-रिश्तेदारों, बस अड्डों और रेलवे स्टेशनों पर खाक छानी, पर धनिया का कहीं कोई सुराग नहीं मिला। जैसे ज़मीन खा गई हो या आसमान निगल गया हो। बदनामी और पुलिस के डर से उसने थाने में रपट भी नहीं लिखवाई, उसे डर था कि कहीं उल्टा उसी पर कोई संगीन इल्ज़ाम न लग जाए।
धनिया के चले जाने के बाद मंगत के भीतर का इंसान जैसे भीतर से टूटकर बिखर गया। कुछ ही महीनों के दांपत्य ने उसे जिस सुख का स्वाद चखाया था, उसकी यादें अब नासूर बनकर उसे टीसने लगीं। पहले जब वह अकेला था, तो उसे किसी चीज़ की कमी नहीं खलती थी; पर एक बार भरे-पूरे संसार का आभास पाकर उसे खो देने का दर्द वह बर्दाश्त नहीं कर सका। उस गम, पछतावे और खालीपन को मिटाने के लिए उसने शराब की बोतलों में डूबना शुरू कर दिया।
काम-धंधा पूरी तरह छूट गया। आरी और रंदे पर जंग लग गई। मंगत हफ्तों तक खाट पर बेसुध पड़ा रहता। दुनिया का हर इंसान उसे अपना दुश्मन नज़र आने लगा। कोई पड़ोसी या शुभचिंतक उसे समझाने आता, तो वह ऐसी नफ़रत भरी नज़रों से घूरता मानो उसकी इस तबाही के ज़िम्मेदार वही लोग हों। जानकी की हालत दयनीय हो गई। वह दिन भर दूसरों के घरों में झाड़ू-पोछा करती, गेहूं पीसती और जो चार पैसे मिलते, उससे चूल्हा जलाती। भाई कितना भी पापी या भटका हुआ क्यों न हो, जानकी का कलेजा उसे भूखा देखकर फट जाता था। वह रो-रोकर उसके आगे थाली रखती, पर मंगत का ध्यान सिर्फ इस बात पर रहता कि किसी तरह शराब के पैसे मिल जाएँ। जब जानकी पैसे छिपाने लगी, तो मंगत ने घर के बर्तन और राशन बेचना शुरू कर दिया।
फिर एक मनहूस रात वह हुआ जिसने मंगत के पतन की इंतहा कर दी। वह बेतहाशा शराब पीकर आया। घर जाने के बजाय वह बस्ती के चौराहे पर लगे बिजली के खंभे के सहारे जा बैठा। उस चौराहे के इर्द-गिर्द इलाके के जाने-माने रसूखदार लोगों की हवेलियाँ और पक्के मकान थे। नशे के ज़ोर पर मंगत के दिल में बरसों से दबा ज़हर, गरीबी की कुंठा और दुनिया के प्रति भरी नफ़रत जुबान पर आ गई। उसने जोर-जोर से उन संभ्रांत लोगों के नाम लेकर गालियाँ बकना शुरू कर दिया।
सन्नाटे को चीरती हुई उसकी कर्कश आवाज़ गूंजने लगी, “अरे ओ सेठ बंसीलाल! तिजोरी पर कुंडली मारकर क्यों बैठे हो? ज़रा बाहर निकलो, देखो मेरे पैरों में कितने छाले पड़े हैं, आकर मेरी मालिश करो! क्या समझा है, गरीबों का खून चूसकर बहुत बड़े धर्मात्मा बन गए?”
खिड़कियाँ खुलने लगीं। लोग छज्जों पर आकर तमाशा देखने लगे। जब तक बात बंसीलाल पर थी, सामने वाले मकान के मास्टर जी मुस्कुरा रहे थे। पर अगले ही पल मंगत का रुख उनकी तरफ मुड़ गया, “ओ मास्टर जी! दिन भर नैतिकता का पाठ पढ़ाते हो, ज़रा अपनी उस पुरानी उधारी का हिसाब तो दो जो तीन साल से दबाए बैठे हो! बाहर निकलो और मेरे लिए दो रोटी सेक कर लाओ, बहुत भूख लगी है!”
मास्टर जी का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। तभी मंगत ने इलाके के सबसे बड़े ठेकेदार को निशाने पर लिया, जिसके यहाँ वह कभी काम करता था, “अरे ओ ठेकेदार के बच्चे! हमारी पसीने की कमाई काटकर जो तूने यह तीन मंजिला कोठी खड़ी की है, आज मैं तेरा सारा कच्चा चिट्ठा खोलूँगा! बाहर आ, वरना तेरे दरवाज़े पर ही अपनी जान दे दूँगा!”
जो लोग पहले ठहाके लगा रहे थे, अपनी इज़्ज़त सरेआम नीलाम होते देख उनके माथे पर बल पड़ गए। एक मामूली शराबी, दो टके के मज़दूर ने पूरे मोहल्ले के तथाकथित इज़्ज़तदारों को नंगा कर दिया था। लोग गुस्से में लाठियाँ लेकर नीचे उतरने लगे। माहौल ऐसा बन गया कि भीड़ मंगत को पीट-पीटकर अधमरा कर देती या पुलिस के हवाले कर देती।
उसी समय जानकी पागलों की तरह दौड़ती हुई आई। उसने देखा कि लोग उसके भाई पर टूट पड़ने को तैयार हैं। जानकी बिना किसी संकोच के मंगत के आगे ढाल बनकर खड़ी हो गई। उसने हाथ जोड़कर, आँचल फैलाकर भीड़ के आगे सिर झुका दिया, “बाबूजी, इसे बख्श दो! यह होश में नहीं है, इसकी मति मारी गई है! जो सज़ा देनी है मुझे दे दो, पर मेरे भाई पर हाथ मत उठाओ!” जानकी के आंसुओं और उस ममतामयी रूप को देखकर लोगों के उठे हुए हाथ रुक गए। लोग थू-थू करते हुए अपने दरवाज़ों के भीतर चले गए। जानकी ने किसी तरह घसीटते हुए, संभालते हुए मंगत को घर के भीतर किया और दरवाज़ा बंद कर लिया।
उस रात जानकी सोई नहीं। उसने मंगत के पैरों में लगी चोटों पर हल्दी लगाई, उसके माथे पर गीली पट्टी रखी और रात भर उसके सिरहाने बैठकर सिसकती रही। सुबह जब सूरज की किरणें आंगन में उतरीं, तो मंगत की आँखें खुलीं। उसका सिर भयंकर दर्द से फटा जा रहा था। उसने देखा कि उसकी बूढ़ी बहन के दोनों हाथ जुड़े हुए थे और आँखें आंसुओं से सूज चुकी थीं।
मंगत ने ग्लानि से नज़रे चुराते हुए पूछा, “दीदी… कल रात क्या हुआ?”
जानकी ने रोते हुए मंगत के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए और बहुत धीमे स्वर में कहा, “मंगत, कल रात तूने जो किया, वह तू नहीं था, वह तेरी शराब थी। पर आज मैं तुझसे कुछ मांगने आई हूँ। जिस दिन माँ मरी थी, उसने तेरा हाथ मेरे हाथ में देकर कहा था कि इसे संभालना। मैंने पूरी ज़िंदगी तेरे लिए कुर्बान कर दी, कभी कोई शिकायत नहीं की। पर आज मैं तुझसे भीख मांगती हूँ—या तो तू मुझे ज़हर लाकर दे दे ताकि मैं यह रोज़-रोज़ की मौत देखना बंद करूँ, या फिर अपनी इस बहन के सिर पर हाथ रखकर इस बोतल को हमेशा के लिए छोड़ दे। तू अगर खुद को मिटाना चाहता है, तो पहले मुझे मिटा दे।”
बहन के ये शब्द किसी खंजर की तरह मंगत के सीने में उतर गए। उसने जानकी के कांपते हाथ, उसकी फटी हुई साड़ी और चेहरे की झुर्रियों को देखा। पहली बार उसके भीतर का नशा और स्वार्थ पूरी तरह काफूर हो गया। उसे समझ आया कि एक स्त्री के चले जाने के गम में उसने उस देवी का अपमान कर दिया जिसने उसके लिए अपना पूरा अस्तित्व दांव पर लगा दिया था।
मंगत फूट-फूट कर रो पड़ा। वह जानकी की गोद में सिर रखकर बच्चों की तरह बिलखने लगा, “दीदी, मुझे माफ़ कर दो! मैं अंधा हो गया था। मैं भूल गया था कि दुनिया उजड़ भी जाए, तब भी मेरी माँ जैसी बहन मेरे साथ खड़ी है। मैं कसम खाता हूँ, आज के बाद शराब की एक बूंद भी मेरे हलक से नीचे नहीं उतरेगी।”
उस दिन के बाद से उस घर की आबोहवा बदलने लगी। यह राह आसान नहीं थी। शराब की तलब जब मंगत को तड़पाती, तो जानकी उसे तुलसी का काढ़ा बनाकर देती, उसके पास बैठकर रामायण की चौपाइयाँ सुनाती और उसका हौसला बंधाती। मंगत ने अपनी इच्छाशक्ति को लोहे की तरह मज़बूत किया। हफ्ते भर की बेचैनी और शारीरिक कष्ट के बाद उसका शरीर और मन दोनों शुद्ध होने लगे।
मंगत ने सबसे पहले जाकर अपनी आरी और रंदे का जंग साफ किया। उसने मोहल्ले के उन्हीं लोगों के दरवाज़े पर जाकर, जिनसे उसने रात में बदसलूकी की थी, हाथ जोड़कर नतमस्तक होकर माफ़ी मांगी। उसकी आँखों में सच्चा पश्चाताप देखकर लोगों के दिल भी पिघल गए। ठेकेदार ने उसकी ईमानदारी और पुरानी कारीगरी को याद करते हुए उसे एक बड़े काम का ठेका दे दिया।
मंगत ने सुबह से शाम तक जी-तोड़ मेहनत शुरू कर दी। उसके हाथों की लकड़ी की नक्काशी में ऐसी जान थी कि धीरे-धीरे पूरे शहर में उसके बनाए फर्नीचर की मांग होने लगी। जानकी की मेहनत के दिन अब लद चुके थे। मंगत ने अपनी पहली बड़ी कमाई से जानकी के लिए रेशमी साड़ी खरीदी और घर की टूटी दीवारों की जगह एक सुंदर, पक्का मकान बनवा दिया।
अब मंगत की सुबह शराब की बदबू से नहीं, बल्कि जानकी द्वारा गाए गए भजनों और चूल्हे पर खौलती चाय की खुशबू से होती थी। उसने अपने अतीत के मलबे से एक ऐसी नई ज़िंदगी की नींव रखी थी, जिसमें अहंकार और हताशा के लिए कोई जगह नहीं थी। जानकी के चेहरे पर अब वही पुराना सुकून और गर्व लौट आया था, और मंगत के जीवन में यह अटूट विश्वास भर चुका था कि जब तक अपनों का सच्चा साथ और खुद में बदलने का संकल्प हो, तब तक कोई भी इंसान कभी हार नहीं सकता।
दोस्तों, जब इंसान ठोकर खाकर गिरता है, तो समाज अक्सर उसे और दबाने की कोशिश करता है, लेकिन परिवार का निस्वार्थ प्रेम उसे फिर से खड़ा कर सकता है। मंगत के इस बदलाव और जानकी के बेमिसाल त्याग के बारे में आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है कि सच्चा पश्चाताप इंसान को समाज में फिर से सम्मान दिला सकता है? अपने विचार कमेंट्स में ज़रूर बताएं!
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लेखिका : प्रतिमा चौहान