पिता का यह अद्भुत और न्यायपूर्ण फैसला सुनकर दोनों भाइयों की आंखों से आंसू छलक पड़े। उन्हें अपनी नासमझी का अहसास हुआ। दोनों ने एक साथ आगे बढ़कर पिता के चरण स्पर्श किए। सूर्यकांत ने चंद्रकांत को गले से लगा लिया और बोला, “पिताजी ने आज हमें असली विरासत का मतलब समझा दिया है। हम वादा करते हैं कि इस कलम की स्याही यानी हमारा भाईचारा कभी सूखने नहीं देंगे।”
ठाकुर दीनदयाल ने अपने जीवन के पचहत्तर वसंत देख लिए थे। उम्र के इस पड़ाव पर आकर इंसान का शरीर भले ही कमज़ोर हो जाता है, लेकिन उसकी आंखों का अनुभव और भी गहरा हो जाता है। दीनदयाल जी ने अपने पूरे जीवन में कई हंसते-खेलते परिवारों को बिखरते देखा था। वे अक्सर देखते थे कि पिता की आंखें मूंदते ही सगे भाई एक-दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं। ज़मीन के एक छोटे से टुकड़े या घर की किसी पुरानी चीज़ के लिए वे लोग अदालतों के चक्कर काटते और पीढ़ियों का प्यार वकीलों की फाइलों में दफन हो जाता। दीनदयाल जी को उन बुजुर्गों की नासमझी पर हमेशा क्रोध आता था जो अपने जीवनकाल में अपनी संपत्ति का सही और स्पष्ट बंटवारा नहीं करते थे और अपने बच्चों को विवादों की आग में धकेल कर दुनिया से विदा हो जाते थे। उन्होंने दृढ़ निश्चय कर लिया था कि वे अपने जीते-जी अपनी पूरी संपत्ति, ज़मीन-जायदाद और घर का बंटवारा अपने दोनों बेटों के बीच पूरी निष्पक्षता से कर देंगे, ताकि उनके जाने के बाद घर के आंगन में कोई दीवार न खड़ी हो।
एक रविवार की सुबह, दीनदयाल जी ने अपने विशाल पुश्तैनी घर ‘शांति भवन’ के मुख्य दालान में अपने दोनों बेटों, बहुओं और बड़े पोते-पोतियों को बुलवाया। माहौल में एक अजीब सी खामोशी और गंभीरता थी। दीनदयाल जी अपनी पुरानी नक्काशीदार आरामकुर्सी पर बैठे थे। उन्होंने सबसे पहले परिवार के सभी सदस्यों के साथ मिलकर कुलदेवता की प्रार्थना की। प्रार्थना समाप्त होने के बाद, उन्होंने एक अनुभवी और ज़िम्मेदार मुखिया की तरह गहरी सांस ली और कहा, “मेरे बच्चों, यह ईश्वर की असीम अनुकंपा है कि आज हम सब एक ही छत के नीचे बैठकर एक-दूसरे के सुख-दुख साझा कर रहे हैं। मेरी यही कामना है कि यह प्रेम हमेशा बना रहे।”
इसके बाद उन्होंने अपने पोते-पोतियों को प्यार से पुचकारा और सख्त लेकिन स्नेहपूर्ण आवाज़ में कहा, “बच्चों, अब तुम लोग बाहर जाकर बगीचे में खेलो। हमें कुछ ज़रूरी पारिवारिक विषयों पर चर्चा करनी है। जब ज़रूरत होगी, तो तुम्हें बुला लिया जाएगा।” बच्चों के जाते ही उन्होंने अपनी पत्नी की तस्वीर की ओर देखा और फिर अपने दोनों बेटों—बड़े बेटे सूर्यकांत और छोटे बेटे चंद्रकांत—की ओर मुखातिब हुए।
उन्होंने अपनी योजना स्पष्ट करते हुए कहा, “मैंने तय किया है कि मेरे रहते ही तुम दोनों भाइयों के बीच गांव की खेती, शहर के मकानों और बैंक के पैसों का बंटवारा हो जाए। मैं नहीं चाहता कि कल को दुनिया वाले तुम पर उंगली उठाएं।” उन्होंने गांव की उपजाऊ ज़मीन, आम के बागान और शहर की दुकानों का पूरा ब्यौरा कागज़ पर लिख रखा था। उन्होंने वह कागज़ मेज़ पर रखा और अपने बड़े बेटे सूर्यकांत की ओर देखकर कहा, “सूर्यकांत, तुम घर के बड़े बेटे हो। तुमने इस परिवार की ज़िम्मेदारियों का बोझ हमेशा अपने कंधों पर उठाया है। इसलिए, पहला हक़ तुम्हारा है। तुम्हें इन दोनों हिस्सों में से जो भी हिस्सा पसंद हो, बेझिझक मांग लो।”
सूर्यकांत ने अपने पिता के चरण स्पर्श किए और अत्यंत विनम्रता से कहा, “पिताजी, आपने मुझे बड़ा होने का मान दिया, यही मेरी सबसे बड़ी संपत्ति है। लेकिन मेरा मानना है कि पहला अधिकार मेरे छोटे भाई चंद्रकांत का है। उसे अभी जीवन का लंबा सफर तय करना है, उसके बच्चों की शिक्षा और भविष्य की चुनौतियां बड़ी हैं। इसलिए, मैं अपनी तरफ से पहला चुनाव करने का अधिकार उसे देता हूं।”
यह सुनकर चंद्रकांत की आंखें भर आईं। उसने हाथ जोड़कर और सिर झुकाकर कहा, “भैया, जहां आप जैसे बड़े भाई और पिताजी जैसे न्यायप्रिय पिता बैठे हों, वहां मुझ जैसे छोटे को कुछ मांगने या चुनाव करने की क्या आवश्यकता है? आप दोनों मेरी झोली में जो भी डाल देंगे, मैं उसे ईश्वर का प्रसाद समझकर माथे से लगा लूंगा। मेरे लिए ज़मीन जायदाद से ज़्यादा आप दोनों का आशीर्वाद मायने रखता है।”
अपने दोनों बेटों के बीच इतना गहरा प्रेम, त्याग और सम्मान देखकर दीनदयाल जी का सीना गर्व से चौड़ा हो गया। उन्हें लगा जैसे उन्होंने जीवन की सबसे बड़ी जंग जीत ली हो। जहां दूसरे घरों में बंटवारे के नाम पर तलवारें खिंच जाती थीं, वहां उनके आंगन में त्याग और समर्पण की गंगा बह रही थी। उन्होंने भावुक होकर अपने दोनों बेटों को गले से लगा लिया। उन्होंने दोनों के लिए शहर में एक जैसी दो शानदार कोठियां बनवा रखी थीं। दोनों में एक जैसे कमरे, एक जैसा फर्नीचर और हर तरह की सुख-सुविधाएं थीं। खेती की ज़मीन और व्यापार का भी एकदम बराबर और न्यायपूर्ण बंटवारा हो गया। दोनों भाइयों ने पिता के हर फैसले को सहर्ष स्वीकार कर लिया।
लेकिन, कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी। संपत्ति का बंटवारा तो हो गया, लेकिन अब बारी थी घर की सबसे अनमोल धरोहर की। वह थी एक सौ साल पुरानी ‘स्वर्ण जड़ित पुश्तैनी कलम’ (सोने की निब वाली कलम)। यह कलम दीनदयाल जी के दादाजी को एक महान स्वतंत्रता सेनानी ने भेंट की थी। इस कलम से परिवार के हर महत्वपूर्ण दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए जाते थे। यह केवल एक कलम नहीं थी; यह परिवार के सम्मान, सत्यनिष्ठा और गौरव का प्रतीक थी। यह एक मखमली डिब्बी में धरोहर के रूप में तिजोरी में सहेज कर रखी गई थी।
जिन बेटों ने करोड़ों की ज़मीन और मकानों के बंटवारे पर एक बार भी अपना हक़ नहीं जताया था, उस पुश्तैनी कलम की बात आते ही दोनों के भीतर का पारिवारिक स्वाभिमान जाग उठा। दोनों ही उस कलम को अपनी धरोहर के रूप में सहेजना चाहते थे।
सबसे पहले बड़े बेटे सूर्यकांत ने अपना पक्ष रखा। उसने अत्यंत आदर के साथ कहा, “पिताजी, मैं घर का बड़ा बेटा हूं। मैंने परिवार की परंपराओं और मान-मर्यादा को हमेशा करीब से देखा और जीया है। यह कलम हमारे पूर्वजों का आशीर्वाद है। एक बड़ा बेटा होने के नाते, मैं इस धरोहर की पवित्रता और इसके सम्मान को आजीवन सुरक्षित रख सकता हूं। यह मेरे पास रहेगी तो परिवार के इतिहास का गौरव हमेशा बरकरार रहेगा।”
दीनदयाल जी सोच में पड़ गए। सूर्यकांत की बात में वज़न था। वह वाकई बहुत संजीदा और परंपराओं का पालन करने वाला व्यक्ति था। उसे कलम सौंपना एकदम सही निर्णय लगता था।
तभी छोटे बेटे चंद्रकांत ने भी आगे बढ़कर कलम पर अपना दावा पेश कर दिया। उसने कहा, “पिताजी, बड़े भैया की बात बिल्कुल सत्य है। वे समझदार और शांत स्वभाव के हैं। लेकिन यह पुश्तैनी कलम केवल तिजोरी में सजाकर रखने की वस्तु नहीं है। दादाजी ने इस कलम से परिवार के व्यापार और समाज सेवा के कई नए अध्याय लिखे थे। मैं आज के दौर में परिवार के व्यापार को नई ऊंचाइयों पर ले जा रहा हूं। मुझे रोज़ नए अनुबंधों पर हस्ताक्षर करने होते हैं। अगर यह कलम मेरे पास होगी, तो मैं हर दिन पूर्वजों के आशीर्वाद से परिवार का नाम रोशन करूंगा। परंपराओं को सहेजने के साथ-साथ उन्हें आगे बढ़ाना भी ज़रूरी है, इसलिए मैं इस कलम का सच्चा अधिकारी हूं।”
दीनदयाल जी गहरी दुविधा में पड़ गए। दोनों बेटों के तर्क अपनी-अपनी जगह बिल्कुल सही थे। एक परंपराओं का रक्षक था, तो दूसरा भविष्य का निर्माता। वे नहीं चाहते थे कि इस एक कलम की वजह से भाइयों के बीच ज़रा सी भी कड़वाहट पैदा हो। कमरे में सन्नाटा छा गया। दोनों भाइयों की नज़रें पिता के चेहरे पर टिकी थीं।
तभी दीनदयाल जी के चेहरे पर एक शांत और अर्थपूर्ण मुस्कान तैर गई। उन्होंने उस मखमली डिब्बी को खोला और वह सुनहरी कलम निकाल कर अपने हाथ में ली। उन्होंने दोनों बेटों को अपने करीब बुलाया और बोले, “मेरे बच्चों, तुम दोनों ने ही इस कलम का महत्व बिल्कुल सही समझा है। सूर्यकांत, तुम इसकी रक्षा कर सकते हो और चंद्रकांत, तुम इससे नया भविष्य लिख सकते हो। लेकिन तुम दोनों एक बात भूल गए।”
दोनों बेटों ने आश्चर्य से पूछा, “क्या पिताजी?”
दीनदयाल जी ने गहरी सांस लेते हुए कहा, “कलम चाहे कितनी भी कीमती क्यों न हो, चाहे वह सोने की ही क्यों न हो, वह तब तक कुछ नहीं लिख सकती जब तक उसमें स्याही न हो। और इस पुश्तैनी कलम की असली स्याही है—तुम दोनों भाइयों का आपसी प्रेम, एकता और विश्वास। अगर तुम दोनों अलग हो गए, तो यह कलम महज़ एक धातु का टुकड़ा बनकर रह जाएगी।”
यह सुनकर दोनों भाइयों की आंखें खुल गईं।
दीनदयाल जी ने आगे कहा, “इसलिए, यह कलम न तो सूर्यकांत की तिजोरी में जाएगी और न ही चंद्रकांत के दफ्तर में। यह कलम हमारे घर के बीचों-बीच बने इस पुश्तैनी मंदिर में भगवान के चरणों में रखी जाएगी। जब भी सूर्यकांत को परिवार के किसी अहम फैसले पर मुहर लगानी होगी, या जब भी चंद्रकांत को व्यापार का कोई नया अनुबंध करना होगा, तुम दोनों साथ आओगे। एक भाई कागज़ पकड़ेगा और दूसरा इस कलम से हस्ताक्षर करेगा। यह कलम तुम दोनों को बांटेगी नहीं, बल्कि हर बड़े काम में तुम दोनों को एक साथ जोड़े रखेगी।”
पिता का यह अद्भुत और न्यायपूर्ण फैसला सुनकर दोनों भाइयों की आंखों से आंसू छलक पड़े। उन्हें अपनी नासमझी का अहसास हुआ। दोनों ने एक साथ आगे बढ़कर पिता के चरण स्पर्श किए। सूर्यकांत ने चंद्रकांत को गले से लगा लिया और बोला, “पिताजी ने आज हमें असली विरासत का मतलब समझा दिया है। हम वादा करते हैं कि इस कलम की स्याही यानी हमारा भाईचारा कभी सूखने नहीं देंगे।”
पूरे घर में खुशी की लहर दौड़ गई। जो बंटवारा अक्सर घरों को तोड़ देता है, उसी बंटवारे ने आज इस परिवार की नींव को और भी मज़बूत कर दिया था। दीनदयाल जी ने संतोष की सांस ली, क्योंकि वे जानते थे कि अब उनके जाने के बाद भी उनका परिवार हमेशा एक रहेगा।
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लेखिका : गायत्री शर्मा