मालती देवी पिछले कई दिनों से घर के बदलते हुए माहौल को बहुत गहराई से महसूस कर रही थीं। उनका बेटा अनिरुद्ध पेशे से एक सरकारी शिक्षक था—बेहद शांत, सुलझा हुआ और अपनी दुनिया में मगन रहने वाला इंसान। लेकिन उसकी यही खामोशी उसकी पत्नी कविता को हमेशा अखरती थी। कविता एक चुलबुली और महत्वाकांक्षी लड़की थी, जिसे लगता था कि अनिरुद्ध की जिंदगी में कोई रंग नहीं है। इसी बीच उनके मोहल्ले में समीर नाम के एक शख्स का आना-जाना शुरू हुआ था। समीर बातों का बहुत धनी था, उसकी दुनिया दिखावे और खोखले वादों से भरी थी। कविता धीरे-धीरे समीर की चिकनी-चुपड़ी बातों में आ गई थी। मालती देवी ने कई बार कविता को इशारों-इशारों में समझाने की कोशिश की थी कि घर की मर्यादा और असली खुशी क्या होती है, लेकिन कविता की आँखों पर एक अलग ही पर्दा पड़ा हुआ था।
आज का दिन तो जैसे मालती देवी के लिए किसी बुरे सपने जैसा था। अनिरुद्ध हमेशा की तरह स्कूल से लौटकर बरामदे में रखी अपनी कुर्सी पर बैठा था। उसकी आँखों में एक अजीब सी शून्यता थी, जैसे वह बहुत कुछ जानता था लेकिन कुछ कहना नहीं चाहता था। मालती देवी को अपने बेटे की इस उदासी पर तरस आ रहा था। उन्होंने पास जाकर बड़े प्यार से कहा, “बेटा, यहाँ गुमसुम क्यों बैठे हो? भीतर चलो, मैंने तुम्हारे लिए चाय और नाश्ता बनाया है।” अनिरुद्ध ने एक फीकी सी मुस्कान के साथ कहा, “नहीं माँ, अभी इच्छा नहीं है।” इतना कहकर उसने सीढ़ियों की तरफ देखा। मालती देवी की नज़र भी उसी तरफ गई और उनके पैरों तले जमीन खिसक गई।
कविता अपने हाथ में एक बड़ा सा सूटकेस लिए सीढ़ियों से नीचे उतर रही थी। उसके चेहरे पर एक अजीब सी कठोरता थी और दरवाजे पर समीर अपनी गाड़ी के पास खड़ा उसका इंतजार कर रहा था। समीर के हाथ में कविता का एक और बैग था। मालती देवी बदहवास सी हो गईं। उन्होंने कांपती हुई आवाज़ में पूछा, “कविता बहू, यह सब क्या है? यह सूटकेस लेकर तुम कहाँ जा रही हो?”
कविता ने बिना किसी हिचकिचाहट के समीर की तरफ देखा और बोली, “माँ जी, अब मैं इस घर में एक पल भी घुट-घुट कर नहीं जी सकती। मैं समीर के साथ जा रही हूँ। मुझे एक ऐसी जिंदगी चाहिए जिसमें कोई उत्साह हो, कोई चाहत हो। आपका बेटा तो एक चलती-फिरती लाश है, जिसे न मेरी कोई परवाह है और न ही दुनिया की कोई समझ।”
यह सुनकर अनिरुद्ध अपनी जगह पर ही बैठा रहा, बस उसकी मुट्ठियां कस गईं। मालती देवी की आँखों से आंसू बहने लगे। उन्होंने आगे बढ़कर कविता का रास्ता रोकने की कोशिश की और बोलीं, “बहू, मैं तुम्हारे हाथ जोड़ती हूँ। ऐसा अनर्थ मत करो। जो तुम कर रही हो, उससे सिर्फ हमारे परिवार की ही नहीं, तुम्हारी भी बहुत बदनामी होगी। यह समाज तुम्हें कभी माफ नहीं करेगा। तुम जहाँ भी जाओगी, लोग तुम्हें ताने मारेंगे। मेरी इज्जत का तो सोचो, कल को मैं लोगों को क्या मुँह दिखाऊंगी?”
कविता ने झिड़कते हुए कहा, “माँ जी, मुझे रोकने की कोशिश मत कीजिएगा। अगर आपने जबरदस्ती की, तो मैं पुलिस को बुला लूंगी या फिर कुछ ऐसा कर लूंगी कि आप लोग कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटते रह जाएंगे। मुझे शांति से जाने दीजिए।”
मालती देवी कुछ और कहतीं, उससे पहले ही दरवाजे पर खड़ा समीर हंसते हुए बीच में बोल पड़ा, “अरे आंटी जी, क्यों बेचारी को रोक रही हो? जब आपके सीधे-सादे और डरपोक बेटे के बस का कुछ है ही नहीं, तो वह कब तक इस बेजान घर में कैद रहेगी? मैं एक असली मर्द हूँ, जो इसे वो सारी खुशियां दे सकता है जिसकी यह हकदार है। अनिरुद्ध को तो यह भी नहीं पता कि एक औरत को कैसे खुश रखा जाता है।”
समीर के मुँह से ‘डरपोक’ और ‘असली मर्द’ शब्द निकलते ही बरामदे का माहौल अचानक बदल गया। मालती देवी ने देखा कि जो अनिरुद्ध अब तक चुपचाप सिर झुकाए बैठा था, वह अचानक अपनी जगह से उठा। उसके चेहरे का रंग बदल चुका था। उसकी आँखों में एक ऐसी दहकती हुई ज्वाला थी जिसे मालती देवी ने अपने बेटे के जीवन में आज तक नहीं देखा था। अनिरुद्ध ने कोई हथियार नहीं उठाया, लेकिन उसके भीतर का सोया हुआ पुरुषार्थ आज पूरी तरह से जाग चुका था।
एक ही झटके में अनिरुद्ध चलकर दरवाजे तक पहुँचा। इससे पहले कि समीर कुछ समझ पाता, अनिरुद्ध ने उसका कॉलर इतनी जोर से पकड़ा कि समीर की सांसें अटक गईं। अनिरुद्ध की आवाज़ में आज बादलों जैसी गरज थी, “तूने मेरी खामोशी को मेरी कमजोरी समझने की जो भूल की है ना, वह तेरी जिंदगी की सबसे बड़ी गलती है। मेरी पत्नी अगर अपनी मर्जी से जाना चाहती है, तो वह स्वतंत्र है, लेकिन मेरे घर की दहलीज पर खड़े होकर मेरी माँ का अपमान करने और मुझे कायर कहने की हिम्मत तूने कैसे की?”
अनिरुद्ध ने एक झटके से समीर को सड़क की तरफ धकेल दिया। समीर, जो अब तक बड़ी-बड़ी बातें कर रहा था, अनिरुद्ध का यह रौद्र रूप देखकर बुरी तरह कांपने लगा। उसे समझ आ गया कि यह वो इंसान नहीं है जिसे वह सीधा और बेवकूफ समझ रहा था। अनिरुद्ध ने समीर की आँखों में आँखें डालकर कहा, “अगर तूने आज के बाद मेरी माँ या मेरे परिवार की तरफ आँख उठाकर भी देखा, तो मैं वो हश्र करूंगा कि तू जिंदगी भर याद रखेगा। निकल जा यहाँ से!”
समीर, जो कविता को बड़े-बड़े सपने दिखा रहा था, पल भर में अपनी असलियत पर आ गया। अपनी जान बचाने के डर से उसने कविता का बैग वहीं सड़क पर फेंका और अपनी गाड़ी में बैठकर बिना पीछे मुड़े वहाँ से भाग खड़ा हुआ।
कविता सीढ़ियों के पास बुत बनकर यह सब देख रही थी। जिस समीर को वह अपना रक्षक और सच्चा साथी मान बैठी थी, वह एक ही पल में उसे अकेला छोड़कर भाग गया था। और जिस पति को वह कमजोर और बेजान समझती थी, आज वह अपनी माँ और अपने स्वाभिमान के लिए किसी चट्टान की तरह तन कर खड़ा था।
अनिरुद्ध वापस पलटा और कविता के पास आकर खड़ा हो गया। उसके चेहरे पर अब क्रोध नहीं, बल्कि एक अजीब सी गंभीरता थी। उसने कविता की तरफ देखते हुए कहा, “कविता, मैंने हमेशा तुम्हें अपनी खुशी चुनने की आज़ादी दी। मैं शांत था क्योंकि मुझे लगता था कि रिश्ते शोर मचाने से नहीं, बल्कि एक-दूसरे को समझने से चलते हैं। तुम जाना चाहती हो, तो जा सकती हो। मैं तुम्हें नहीं रोकूंगा। लेकिन यह याद रखना कि जो इंसान एक मुसीबत आते ही तुम्हें सड़क पर छोड़कर भाग गया, वह जीवन भर तुम्हारा साथ क्या निभाएगा। असली ताकत चिल्लाने या दिखावा करने में नहीं होती, बल्कि खामोशी से अपने परिवार की जिम्मेदारी उठाने में होती है।”
ये शब्द कविता के दिल पर हथौड़े की तरह लगे। उसके मन पर पड़ा हुआ सारा भ्रम एक झटके में टूट गया। उसे अपनी गलती का अहसास इतनी गहराई से हुआ कि वह वहीं घुटनों के बल बैठ गई और फूट-फूट कर रोने लगी। उसने मालती देवी के पैर पकड़ लिए, “मुझे माफ कर दीजिए माँ जी। मैं एक छलावे में अंधी हो गई थी। मुझे समझ ही नहीं आया कि जो हीरा मेरे पास था, मैं उसे छोड़कर एक काँच के टुकड़े के पीछे भाग रही थी।”
मालती देवी, जिनका दिल एक माँ का था, उनकी आँखों में भी आंसू आ गए। अनिरुद्ध ने आगे बढ़कर कविता को उठाया। उसने कहा, “रिश्ते में जो दरार आई है, वह एक दिन में नहीं भरेगी कविता। लेकिन अगर तुम सच में अपनी गलती सुधारना चाहती हो, तो हम इस रिश्ते को एक नई और सच्ची शुरुआत दे सकते हैं।”
कविता ने नम आँखों से हामी भरी। मालती देवी ने राहत की सांस ली। आज उन्हें अपने बेटे पर पहले से भी ज्यादा गर्व हो रहा था। उन्होंने समझ लिया था कि उनका बेटा इतना सक्षम है कि किसी भी तूफान से अपने परिवार की नैया पार लगा सकता है। घर में जो एक घना अंधेरा छाने वाला था, वह आज एक नई और सकारात्मक सुबह में बदल गया था।
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