अवनि ने समर का हाथ एक झटके से पीछे धकेल दिया और अपनी आवाज़ को बेहद संयत रखते हुए कहा, “बस समर, बहुत हो चुका। आज तक तुमने मेरे शरीर पर अधिकार जमाया, मेरे मन को रौंदा, लेकिन मेरी आत्मा अब भी आज़ाद है। आज इस घर की दहलीज के साथ मैं तुम्हारे इस सड़े हुए वहम को भी हमेशा के लिए छोड़ रही हूँ।”
उसी रात अवनि ने अपने कुछ ज़रूरी कपड़े और अपनी डिग्रियाँ एक छोटे से बैग में भरीं और उस आलीशान हवेली से बाहर निकल गई। समर ने पीछे से उपहास करते हुए दरवाज़े से चिल्लाकर कहा था, “सड़क पर भीख मांगेगी! दो दिन में भूखी-प्यासी मेरे पैरों में नाक रगड़ती हुई वापस आएगी!” लेकिन अवनि ने मुड़कर भी नहीं देखा। उसके कदम दृढ़ थे और उसकी दिशा तय थी।
सर्दियों की गुनगुनी धूप जब आंगन में लगे नीम के पत्तों से छनकर फर्श पर अल्पना जैसी आकृतियाँ बना रही थी, तब अवनि ने अपने हाथ में पकड़ी गर्म कहवे की प्याली को होंठों से लगाया। उसके सामने बैठी उसकी बचपन की सहेली राधिका मुग्ध भाव से उसे देख रही थी। राधिका ने अपनी नज़रें अवनि के चेहरे पर टिकाते हुए धीरे से कहा, “अवनि, बरसों पहले जब मैं तुमसे मिली थी, तुम्हारी आँखों में एक बुझा हुआ, सहमा सा खौफ तैरता था। पर आज तुम्हारे चेहरे की यह गरिमा और यह निश्चल आभा देखकर यकीन नहीं होता कि तुम वही लड़की हो। तुमने खुद को इस कदर कैसे तराश लिया?” अवनि के होंठों पर एक गहरी, शांत मुस्कान तैर गई। उसने हवा में उड़ती अपनी लट को सलीके से कान के पीछे किया और शून्य में देखते हुए एक लंबी सांस ली। वह जानती थी कि यह ठहराव किसी तोहफे की तरह मुफ़्त नहीं मिला था। इसे पाने के लिए उसने अपने वजूद के एक-एक रेशे को असह्य पीड़ा की भट्टी में झोंका था, तब जाकर वह उस राख में से एक नए स्वाभिमान के साथ बाहर निकल पाई थी।
करीब सात साल पहले की बात है, जब अवनि का विवाह एक प्रतिष्ठित और आर्थिक रूप से बेहद संपन्न परिवार के लड़के समर से हुआ था। समर का व्यक्तित्व बाहर से देखने पर किसी भी इंसान को प्रभावित कर सकता था। वह विदेश से लौटा एक उच्च-शिक्षित चार्टर्ड एकाउंटेंट था, जिसकी बातचीत में तहज़ीब और सलीका झलकता था। अवनि के मध्यमवर्गीय माता-पिता ने जब समर का हाथ अवनि के हाथ में सौंपा था, तो उनकी आँखों में गंगाजल जैसी पवित्र खुशी थी। उन्हें लगा था कि उन्होंने अपनी सीधी-सादी, साहित्य प्रेमी बेटी को सात जन्मों के सुख और सुरक्षा की छांव में सौंप दिया है। समर के भव्य बंगले में जब अवनि ने महावर लगे पैरों से पहली बार कदम रखा था, तो उसे लगा था कि उसका हर ख्वाब मुकम्मल हो गया। लेकिन विवाह के शुरुआती कुछ हफ़्तों का मधुमास बीतते ही वह खूबसूरत भ्रम कांच की तरह चटकने लगा।
समर का जो रूप दुनिया देखती थी, वह उसके असली चेहरे पर चढ़ा एक बहुत महीन और शातिर नकाब था। उस नकाब के पीछे बैठा व्यक्ति असुरक्षा, हीनभावना और गहरे वहम का एक ऐसा दलदल था, जिसमें हर रोज़ अवनि का दम घुटने लगा। शुरुआत बहुत छोटी-छोटी बातों से हुई। समर को अवनि का खिड़की पर खड़े होकर गली के फेरीवाले से सब्ज़ी लेना गवारा नहीं था। उसे लगता था कि अवनि जानबूझकर लोगों की निगाहें अपनी ओर खींचना चाहती है। यदि अवनि अपनी किसी पुरानी सहेली या रिश्तेदार से फोन पर ज़रा देर तक बात कर लेती, तो समर के माथे की नसें तन जाती थीं। वह अवनि के हाथ से फोन छीनकर कॉल लॉग्स खंगालने लगता। वह पूछता कि इतनी देर तक किस बात पर हँसी जा रही थी, बात का असली मकसद क्या था, और क्या उसके पीठ पीछे कोई साज़िश रची जा रही थी।
धीरे-धीरे वह शक एक लाइलाज बीमारी का रूप धारण कर चुका था। समर ने घर के ड्राइंग रूम से लेकर मुख्य दरवाज़े तक सीसीटीवी कैमरे लगवा दिए थे। वह अपने दफ़्तर के केबिन में बैठकर अपने फोन स्क्रीन पर अवनि की हर हरकत पर पहरा रखता था। अवनि कब पानी पीने उठी, कब उसने अपने बाल संवारे, वह रसोई में कितनी देर रही—हर पल का हिसाब एक अपराधी की तरह उससे मांगा जाता। बाज़ार से लौटते वक्त अगर अवनि को पंद्रह मिनट की भी देरी हो जाती, तो समर घर का दरवाज़ा बंद करके उस पर सवालों के कोड़े बरसाने लगता। वह उसके बैग की तलाशी लेता, उसके पर्स में रखे नोटों और रसीदों का मिलान करता, और उसकी आँखों में झांककर यह साबित करने की कोशिश करता कि वह किसी और से मिलकर आई है।
अवनि के वजूद को समर ने सिर्फ अपनी मिल्कियत मान लिया था। घर के भीतर दिन भर तिरस्कार, अपमान और शक्की गालियों का जो सिलसिला चलता, वह रात के सन्नाटे में एक और भयावह मोड़ ले लेता। रात के अंधेरे में समर अपनी सारी शंकाओं को दरकिनार करके अवनि पर अपने तथाकथित पति होने का बर्बर अधिकार जताने पहुँच जाता। अवनि की रूह उस बेमेल और ज़बरदस्ती के रिश्ते से कांप उठती थी। जिस इंसान की ज़ुबान से दिन भर उसके चरित्र पर कालिख पोती जाती थी, रात को उसका वह झूठा शारीरिक अधिकार अवनि को भीतर से तोड़कर रख देता था। अवनि बिस्तर के एक कोने में सिमटकर रात भर रोती रहती, उसकी सिसकियाँ तकिए में ही घुटकर मर जातीं। कई बार अवनि सोचती कि क्या यही शादी है? क्या ईश्वर ने स्त्री को सिर्फ इसलिए रचा है कि वह किसी पुरुष के मानसिक रोग की बलि चढ़ती रहे? उन भयावह रातों में अवनि अक्सर सोचती कि अच्छा ही हुआ कि उनकी कोई संतान नहीं हुई। वह कभी नहीं चाहती थी कि किसी मासूम बच्चे की परवरिश ऐसे घुटन भरे और ज़हरीले माहौल में हो, जहाँ हर सांस पर शक का पहरा था।
एक दौर ऐसा भी आया जब अवनि का दिमाग नकारात्मक विचारों के बवंडर में फंसने लगा। वह सोचती कि जब उसे हर पल बिना किसी गुनाह के बदचलन और चरित्रहीन होने का ताना ही सुनना है, तो क्यों न वह वाकई इस घर की मर्यादाओं को लांघकर वह सब कर गुज़रे जिसका समर उस पर आरोप लगाता है? उसके मन में बदले की एक भयानक ज्वाला धधकने लगी थी। वह समर के अहंकार को मिट्टी में मिला देना चाहती थी। लेकिन ठीक उसी क्षण, उसके भीतर की अंतरात्मा और उसके माता-पिता द्वारा दिए गए नैतिक संस्कार एक ढाल बनकर खड़े हो गए। अवनि ने खुद से सवाल किया कि क्या समर के गंदे विचारों का जवाब अपनी पवित्रता को गंवाकर दिया जा सकता है? यदि वह भी उसी गटर में उतर गई, तो समर की संकीर्ण मानसिकता और उसके अपने अस्तित्व में क्या फर्क रह जाएगा? अवनि ने महसूस किया कि बदला खुद को गिराकर नहीं, बल्कि खुद को इतना ऊपर उठाकर लिया जाना चाहिए कि सामने वाला अपनी तुच्छता देखकर खुद अपनी नज़रों में बौना हो जाए।
पानी सिर से तब गुज़रा जब एक दिन समर ने अपनी हैवानियत की सारी सीमाएं तोड़ दीं। अवनि के बचपन के एक पारिवारिक मित्र, जो संयोगवश उस शहर से गुज़र रहे थे, अवनि के माता-पिता का एक ज़रूरी पार्सल देने उसके घर आ गए। वे दरवाज़े पर ही खड़े रहकर बात कर रहे थे और अवनि ने औपचारिकता के नाते उन्हें एक गिलास पानी दिया था। समर ने ऑफिस से कैमरे में यह दृश्य देख लिया। वह आंधी-तूफान की तरह घर लौटा। बिना कुछ सुने, बिना कोई स्पष्टीकरण मांगे, उसने अवनि के चरित्र को लेकर ऐसी भद्दी और असहनीय गालियाँ दीं जिन्हें सुनकर किसी भी आत्मसम्मानित स्त्री का कलेजा फट जाए। जब अवनि ने अपनी बेगुनाही की बात कहनी चाही, तो समर ने अपना हाथ उठाकर पूरी ताकत से अवनि के चेहरे पर मारना चाहा।
पर उस दिन इतिहास बदल गया। वर्षों से सहती आ रही, आंसुओं से भीगी अवनि उस दिन अचानक एक चट्टान बन गई। समर का हाथ अवनि के गाल को छू भी नहीं पाया था कि अवनि ने हवा में ही उसकी कलाई को लोहे जैसी मज़बूत पकड़ से जकड़ लिया। अवनि की आँखों में उस वक्त आंसुओं का एक कतरा भी नहीं था; वहाँ केवल एक धधकती हुई ज्वाला और गहरा आत्मबल था। समर उस अप्रत्याशित विरोध से हक्का-बक्का रह गया। उसने अवनि की आँखों में जो निडरता और आत्मसम्मान की चमक देखी, उसने उसके भीतर के कायर को एक पल में कंपा दिया। उसने कभी सोचा भी नहीं था कि जिस औरत को वह अपनी दासी समझकर कुचलता आया था, वह कभी इस तरह शेरनी बनकर सामने खड़ी हो सकती है।
अवनि ने समर का हाथ एक झटके से पीछे धकेल दिया और अपनी आवाज़ को बेहद संयत रखते हुए कहा, “बस समर, बहुत हो चुका। आज तक तुमने मेरे शरीर पर अधिकार जमाया, मेरे मन को रौंदा, लेकिन मेरी आत्मा अब भी आज़ाद है। आज इस घर की दहलीज के साथ मैं तुम्हारे इस सड़े हुए वहम को भी हमेशा के लिए छोड़ रही हूँ।”
उसी रात अवनि ने अपने कुछ ज़रूरी कपड़े और अपनी डिग्रियाँ एक छोटे से बैग में भरीं और उस आलीशान हवेली से बाहर निकल गई। समर ने पीछे से उपहास करते हुए दरवाज़े से चिल्लाकर कहा था, “सड़क पर भीख मांगेगी! दो दिन में भूखी-प्यासी मेरे पैरों में नाक रगड़ती हुई वापस आएगी!” लेकिन अवनि ने मुड़कर भी नहीं देखा। उसके कदम दृढ़ थे और उसकी दिशा तय थी।
सड़क पर उतरकर शुरू के दिन आसान नहीं थे। दुनिया एक अकेली औरत को देखकर गिद्ध की तरह झपटने को तैयार रहती है। अवनि के पास न बहुत पैसे थे और न ही किसी का सहारा। उसने अपने वृद्ध माता-पिता पर बोझ बनना स्वीकार नहीं किया, क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि समाज की बातें उनके बुढ़ापे को तकलीफ पहुँचाएँ। उसने शहर के एक कोने में एक बेहद छोटा सा, सीलन भरा कमरा किराए पर लिया। उसके पास कभी-कभी दो वक्त की सूखी रोटी के पैसे भी नहीं होते थे, पर उसके भीतर एक संकल्प की आग जल रही थी।
अवनि ने अंग्रेज़ी साहित्य में अपनी स्नातकोत्तर की डिग्री पूरी कर रखी थी। उसने दिन में छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया और रात को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुट गई। समाज के कई लोगों ने उसके अकेले रहने पर सवाल उठाए, पड़ोसियों ने तरह-तरह की कानाफूसी की, लेकिन अवनि ने अपने कानों में अपनी अंतरात्मा की आवाज़ के सिवा किसी और आवाज़ को जगह नहीं दी। उसने किसी गलत समझौते, किसी शॉर्टकट या किसी अनैतिक रास्ते को अपने करीब भी नहीं फटकने दिया। उसने अपनी कलम, अपनी मेहनत और अपनी ईमानदारी को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया। उसने अपनी उपेक्षा और अपने अपमान को खाद बनाकर अपने भीतर के बीज को एक विशाल वटवृक्ष में तब्दील करने की ठान ली थी।
कड़ी मेहनत, अनगिनत रातों के जागरण और अटूट लगन का परिणाम यह निकला कि अवनि ने राज्य प्रशासनिक सेवा की परीक्षा अपने पहले ही प्रयास में उत्कृष्ट अंकों के साथ उत्तीर्ण कर ली। उसकी नियुक्ति एक ज़िले में महिला एवं बाल विकास विभाग की वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी के रूप में हुई। जिस औरत को कभी चारदीवारी में बंद करके शक के पिंजरे में कैद किया गया था, आज वही औरत सैकड़ों असहाय और पीड़ित महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए एक सशक्त आवाज़ बन चुकी थी।
आज अवनि अपने खुद के दम पर बनाए गए एक सादगीपूर्ण और सुरुचिपूर्ण घर में रहती है। उसके घर में कोई बंदिश नहीं, कोई छुपा हुआ कैमरा नहीं, बल्कि ताज़ी हवा, किताबों की महक और संगीत की मधुर तान है। उसने समर से कभी कोई गुज़ारा भत्ता या हर्जाना नहीं मांगा। उसने कानूनन तलाक लेकर उस रिश्ते के अंतिम तिनके को भी भस्म कर दिया।
कुछ महीने पहले, एक सरकारी बैठक के सिलसिले में अवनि का सामना समर से हुआ था। समर अब समय से पहले बूढ़ा और थका हुआ दिख रहा था। उसकी आँखों में अब भी वही पुरानी बेचैनी और अकेलापन था। जब समर ने अवनि को एक ऊँचे पद पर, गरिमा और आत्मसम्मान से भरपूर देखा, तो वह नज़रें मिलाने की हिम्मत तक नहीं जुटा सका। वह अवनि की सफलता और उसके चेहरे के सुकून के सामने बिल्कुल बौना नज़र आ रहा था। अवनि ने उसके सामने से गुज़रते हुए न तो कोई नफ़रत दिखाई, न ही कोई व्यंग्य किया। उसने केवल एक अजनबी की तरह उसे देखा और आगे बढ़ गई। अवनि की यही उपेक्षा समर के अहंकार पर सबसे बड़ा तमाचा थी। अवनि ने किसी से बदला नहीं लिया था, उसने केवल खुद को संवारा था, और यही उसकी सबसे बड़ी जीत थी।
राधिका ने धीरे से अवनि की हथेली को छुआ, जिससे अवनि की तंद्रा टूटी। अवनि ने चाय की खाली प्याली को मेज़ पर रखा और एक गहरी सांस लेते हुए आंगन में खिले पारिजात के फूलों को देखा, जो रात भर ज़मीन पर गिरकर भी अपनी भीनी खुशबू से पूरे आंगन को महका रहे थे। उसने खुद से कहा कि अंधेरा कितना भी गहरा क्यों न हो, अगर मन में अपने अस्तित्व और चरित्र का दीपक जलता रहे, तो भोर को आने से कोई नहीं रोक सकता।
दोस्तों, अवनि ने जिस तरह परिस्थितियों से हार मानने या गलत रास्ता चुनने के बजाय अपने आत्मसम्मान और मेहनत के बल पर अपनी किस्मत खुद लिखी, क्या आज की हर उस महिला के लिए यह एक सीख नहीं है जो किसी भी तरह के मानसिक या घरेलू अत्याचार को चुपचाप सह रही है? आपके अनुसार, किसी रिश्ते में आत्मसम्मान खोकर समझौता करना कहाँ तक उचित है? अपने विचार कमेंट्स में जरूर बताएं!
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