आरव दबे कदमों से अंदर आया और मां की साड़ी का पल्लू पकड़कर बोला, “मां, तुम सुबह सबसे पहले जागती हो और रात को सबसे बाद में सोती हो। पूरे दिन तुम किसी न किसी के लिए कुछ न कुछ करती रहती हो। कभी झाड़ू, कभी खाना, कभी कपड़े… फिर भी दादाजी, दादी और पापा सब छोटी चाची से ही इतनी अच्छी तरह बात क्यों करते हैं? दादी तो चाची के पैर दबाने तक को तैयार रहती हैं, लेकिन तुम्हें कभी प्यार से ‘थैंक यू’ भी नहीं बोलतीं। ऐसा क्यों, मां?”
सुबह के साढ़े पांच बज रहे थे। बाहर अभी भोर की हल्की ठंडी हवा चल रही थी और आसमान में गहरा नीलापन पसरा हुआ था। पूरा घर गहरी नींद की आगोश में था, सिवाय शारदा के। अलार्म बजने से पहले ही उसकी आंखें खुल चुकी थीं। उठते ही उसने अपना जूड़ा बांधा, पल्लू ठीक किया और नंगे पैर रसोई की ओर बढ़ गई ताकि किसी की नींद में खलल न पड़े।
शारदा की सुबह हमेशा चाय की केतली की सीटी, अदरक कूटने की आवाज और दूध उबालने के साथ शुरू होती थी। ससुर जी के लिए बिना चीनी की काली चाय, सासू मां के लिए तुलसी-अदरक वाली कड़क चाय, पति आलोक के लिए सादी मीठी चाय और आठ साल के बेटे आरव के लिए बॉर्नविटा वाला दूध। इसके बाद शुरू होता नाश्ता बनाने और दोपहर के टिफिन तैयार करने का अंतहीन सिलसिला।
करीब आठ बजे घर में चहल-पहल बढ़ी। देवरानी कृतिका अपने कमरे से बाहर निकली। करीने से प्रेस की हुई फॉर्मल साड़ी, करीने से संवरे बाल और चेहरे पर हल्का मेकअप। वह शहर के एक नामी मल्टीनेशनल बैंक में सीनियर मैनेजर थी। कृतिका के डाइनिंग टेबल पर आते ही सासू मां कौशल्या देवी के चेहरे पर एक खास चमक आ गई।
“अरे कृतिका बहू, आओ बैठो! रात को बहुत देर से लौटी थी ना, तुम्हारी तबीयत तो ठीक है? शारदा, जरा जल्दी से कृतिका को गर्म पोहा और उबले अंडे लाकर दो। इसे देर हो रही होगी।” कौशल्या देवी ने बड़े लाड़ से कहा।
शारदा तुरंत तवे से गरमा-गरम नाश्ता लेकर आई और कृतिका के सामने रख दिया। कृतिका ने लैपटॉप पर अपनी उंगलियां चलाते हुए बिना नजरें उठाए बस इतना कहा, “थैंक्स भाभी।”
कुछ ही देर में आलोक और ससुर जी भी नाश्ते की मेज पर आ गए। बातचीत का सारा केंद्र कृतिका थी। उसके बैंक के बड़े प्रोजेक्ट, उसकी पदोन्नति, उसकी सैलरी और शहर के बड़े लोगों से उसकी जान-पहचान पर चर्चा हो रही थी। ससुर जी गर्व से कह रहे थे, “हमारी छोटी बहू ने तो पूरे खानदान का नाम रोशन कर रखा है। आज समाज में जो हमारी इज्जत है, वह इसके ऊंचे पद और काबिलियत की बदौलत है।”
शारदा चुपचाप सबको रोटियां परोस रही थी। उसके चेहरे पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं। किसी ने यह नहीं पूछा कि उसने सुबह से पानी पिया या नहीं, या जो पोहा उसने इतनी मेहनत से बनाया, वह उसके लिए बचा भी है या नहीं।
आरव अपने कमरे के दरवाजे पर खड़ा यह सब बड़ी गहराई से देख रहा था। आठ साल का मासूम बच्चा, जिसके लिए उसकी मां ही पूरी दुनिया थी, रोज यह फर्क महसूस करता था।
शाम को जब कृतिका अपनी कार से वापस लौटी, तो घर का माहौल फिर बदल गया। सासू मां ने खुद उठकर उसे पानी दिया, पति ने उसका बैग पकड़ा और ससुर जी ने उसका हालचाल पूछा। दूसरी तरफ, शारदा दोपहर से ही रात के खाने की तैयारी में जुटी थी। सब्जी काटना, आटा गूंथना, बर्तन धोना और सबके कपड़े समेटना—उसकी हथेलियां दिनभर के काम से खुरदरी हो चुकी थीं और कमर में मीठा-मीठा दर्द उठ रहा था।
रात को जब सबने खाना खा लिया, तो शारदा रसोई समेटने लगी। आरव अपनी कॉपी-किताब लेकर रसोई के पास आ गया। उसने देखा कि मां सिंक पर खड़े-खड़े अपनी पीठ पर हाथ रखकर गहरी सांस ले रही थी। चेहरे पर गहरी थकान और आंखों में एक अनकहा सूनापन था।
आरव दबे कदमों से अंदर आया और मां की साड़ी का पल्लू पकड़कर बोला, “मां, तुम सुबह सबसे पहले जागती हो और रात को सबसे बाद में सोती हो। पूरे दिन तुम किसी न किसी के लिए कुछ न कुछ करती रहती हो। कभी झाड़ू, कभी खाना, कभी कपड़े… फिर भी दादाजी, दादी और पापा सब छोटी चाची से ही इतनी अच्छी तरह बात क्यों करते हैं? दादी तो चाची के पैर दबाने तक को तैयार रहती हैं, लेकिन तुम्हें कभी प्यार से ‘थैंक यू’ भी नहीं बोलतीं। ऐसा क्यों, मां?”
मासूम बच्चे के इस सीधे सवाल ने शारदा के सीने पर किसी भारी पत्थर की तरह वार किया। उसकी आंखें भर आईं। उसने सिंक का नल बंद किया, हाथ पोंछे और घुटनों के बल बैठकर आरव को सीने से लगा लिया।
उसने अपने आंसुओं को दबाते हुए धीमी, कांपती आवाज में कहा, “बेटा, तुम्हारी छोटी चाची पढ़ी-लिखी हैं, अफसर हैं, पैसे कमाती हैं। दुनिया उन्हीं को सलाम करती है जो अपने पैरों पर खड़े होते हैं। घर के चूल्हे-चौके की कोई कीमत नहीं होती मेरे लाल। इसीलिए मैं तुमसे कहती हूं, दिन-रात मेहनत करके पढ़ाई करो, ताकि तुम्हें कभी किसी के सामने अपनी अहमियत साबित न करनी पड़े।”
आरव ने मासूमियत से अपनी बड़ी-बड़ी आंखें उठाकर पूछा, “लेकिन मां, तुम भी तो इतनी अच्छी हो। नानाजी ने तुम्हें क्यों नहीं पढ़ाया? तुम भी तो चाची की तरह बड़ी अफसर बन सकती थीं ना?”
शारदा ने एक गहरी, ठंडी सांस ली। उसका अतीत किसी पुरानी फिल्म के रीलों की तरह उसकी आंखों के आगे घूमने लगा। “क्योंकि मेरे घर में हम छह बहनें थीं बेटा। तुम्हारे नानाजी एक छोटे से डाकघर में मामूली क्लर्क थे। छह बेटियों की परवरिश, रोटी और फिर उनकी शादियां… इतना बड़ा बोझ था उनके कंधों पर कि वे चाहकर भी मुझे कॉलेज नहीं भेज सके। दसवीं पास करते ही मेरी शादी की बातें होने लगीं और अठारह की उम्र में मुझे विदा कर दिया गया। बस, यही मेरी किस्मत थी।”
कहते-कहते शारदा का गला रुंध गया। वह तुरंत उठी और गैस के चूल्हे को पोंछने का बहाना करने लगी ताकि बेटा उसके गिरते आंसू न देख सके।
लेकिन उस रात कुछ बदल गया था। आरव तो सो गया, मगर शारदा की आंखों से नींद कोसों दूर थी। वह छत की ओर देखती रही। क्या एक गृहिणी का पूरा जीवन सिर्फ दूसरों की सेवा में खप जाने के लिए है? क्या उसका अपना कोई नाम, कोई हुनर, कोई सपना नहीं था? बचपन में उसे कढ़ाई, सिलाई और पुरानी कलाकृतियों को नया रूप देने का कितना शौक था। जब वह स्कूल में थी, तो उसकी बनाई पेंटिंग्स और कशीदाकारी को जिले स्तर पर पुरस्कार मिले थे। शादी के बाद ससुराल की जिम्मेदारियों ने उन सभी रंगों को सुखा दिया था।
शारदा ने उस रात अपने आंसुओं को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी ताकत बनाने का फैसला किया। उसने तय किया कि वह अब अपनी किस्मत को कोसने के बजाय खुद अपनी पहचान गढ़ेगी। सम्मान मांगा नहीं जाता, सम्मान अर्जित किया जाता है।
अगले दिन से शारदा ने अपने समय का प्रबंधन करना शुरू किया। सुबह जल्दी उठकर वह घर का सारा काम दोगुनी फुर्ती से निबटा लेती। दोपहर में जब सास आराम करतीं और घर में सन्नाटा होता, तो वह टीवी देखने या सोने के बजाय अपने पुराने संदूक से सिलाई की मशीन, धागे और कपड़े के टुकड़े निकाल लेती।
शुरुआत में उसने घर के पुराने, बेकार पड़े कपड़ों और साड़ियों से आधुनिक डिजाइन के थैले, कुशन कवर और हैंडमेड कुर्ते सिलने शुरू किए। आरव को जब स्कूल के प्रोजेक्ट के लिए कुछ बनाना होता, तो शारदा उसमें अपनी कलात्मक समझ डाल देती, जिससे आरव के काम की पूरे स्कूल में तारीफ होती।
एक दिन आरव की स्कूल टीचर, मिस अंजलि, पेरेंट्स-टीचर मीटिंग में शारदा से मिलीं। उन्होंने कहा, “मिसेज शारदा, आरव ने बताया कि उसके क्राफ्ट और उसके बैग का डिजाइन आपने बनाया है। वह काम वाकई बेमिसाल है। क्या आप हमारे स्कूल के एनुअल फंक्शन के लिए बच्चों की पारंपरिक ड्रेसेस डिजाइन कर सकती हैं?”
यह शारदा के लिए एक सुनहरा मौका था। उसने बिना किसी झिझक के ‘हां’ कह दिया। अगले दस दिनों तक उसने दिन में घर संभाला और रातों को जाग-जागकर 35 बच्चों की पोशाकें सिलीं और उन पर बारीक पारंपरिक काम किया। जब फंक्शन हुआ, तो स्टेज पर बच्चों की पोशाकों ने सबका दिल जीत लिया। स्कूल के ट्रस्टीज ने मंच से शारदा का नाम लेकर आभार जताया और उन्हें पंद्रह हजार रुपये का चेक मानदेय के रूप में दिया।
वह पंद्रह हजार रुपये का चेक सिर्फ कागज का टुकड़ा नहीं था, वह शारदा के स्वाभिमान की पहली ईंट थी। उसने वह चेक किसी को नहीं दिखाया, बल्कि उससे एक नई आधुनिक सिलाई मशीन खरीदी और कुछ कच्चा माल मंगवाया।
शारदा को समझ आ गया था कि आज का जमाना तकनीक का है। उसने आरव की मदद से यूट्यूब और इंटरनेट पर नई तकनीकों को सीखा। आरव ने अपनी मां के बनाए परिधानों, हाथ से बने जूट के बैग्स और कशीदाकारी वाली साड़ियों के छोटे-छोटे वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डालना शुरू किया।
शुरुआत धीमी थी, लेकिन शारदा के काम में सफाई, सादगी और अनोखापन था। धीरे-धीरे स्थानीय बुटीक वालों ने उससे संपर्क करना शुरू किया। छह महीने के भीतर, शारदा का काम इतना बढ़ गया कि वह अकेले सब कुछ नहीं संभाल पा रही थी। उसने अपने मोहल्ले की दो ऐसी औरतों को अपने साथ जोड़ा, जो आर्थिक रूप से कमजोर थीं और सिलाई जानती थीं।
घर में किसी को कानो-कान खबर नहीं थी कि दोपहर के सन्नाटे में शारदा के कमरे में क्या चल रहा था। घर के किसी काम में कोई कोताही नहीं हुई थी—ससुर जी की चाय समय पर मिलती थी, सास का खाना तैयार रहता था और आलोक के कपड़े हमेशा इस्त्री मिलते थे।
बदलाव का बड़ा दिन तब आया जब कृतिका के बैंक ने महिला उद्यमियों के लिए एक राज्य स्तरीय एग्जिबिशन और सम्मान समारोह आयोजित किया। कृतिका उस आयोजन की मुख्य कोऑर्डिनेटर थी। उसने घर पर बड़े गर्व से बताया कि इस बार के हस्तशिल्प और टेक्सटाइल श्रेणी में शहर के एक नए स्टार्टअप “शारदा क्रिएशंस” को ‘बेस्ट वूमेन एंटरप्रेन्योर’ का अवॉर्ड मिल रहा है और बैंक उसे 10 लाख रुपये का बिजनेस एक्सपेंशन फंड भी दे रहा है।
ससुर जी ने कहा, “वाह, आज की औरतें सचमुच कमाल कर रही हैं। हमें भी चलना चाहिए, कृतिका का इतना बड़ा इवेंट है।”
अगले दिन पूरा परिवार भव्य ऑडिटोरियम में मौजूद था। मंच पर बड़े-बड़े उद्योगपति और बैंक के आला अधिकारी बैठे थे। कृतिका मंच संचालन कर रही थी। जब मुख्य पुरस्कार की घोषणा की बारी आई, तो कृतिका ने गर्व से माइक संभाला, “देवियों और सज्जनों, हस्तशिल्प और पारंपरिक परिधानों में एक नया मुकाम हासिल करने वाली, जिन्होंने पिछले आठ महीनों में न सिर्फ एक सफल ब्रांड खड़ा किया बल्कि कई जरूरतमंद महिलाओं को रोजगार भी दिया, ‘शारदा क्रिएशंस’ की फाउंडर… मिसेज शारदा शर्मा को मैं मंच पर आमंत्रित करती हूं!”
कृतिका के मुंह से जैसे ही अपनी ही जेठानी का नाम निकला, उसकी आवाज लड़खड़ा गई। पूरा परिवार—ससुर जी, कौशल्या देवी और आलोक—सन्न रह गए। उन्हें लगा शायद किसी और का नाम है।
लेकिन तभी हॉल की पिछली पंक्ति से उठकर, हल्के नीले रंग की सादी कॉटन साड़ी में, सिर पर सलीके से पल्लू रखे शारदा मंच की ओर बढ़ने लगी। आरव अपनी सीट पर खड़ा होकर तालियां बजा रहा था, “वो मेरी मम्मा हैं! वो मेरी मम्मा हैं!”
मंच पर पहुंचकर जब शारदा ने चीफ गेस्ट से ट्रॉफी और दस लाख रुपये का चेक ग्रहण किया, तो पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। कृतिका अवाक खड़ी थी। आलोक की आंखें फटी की फटी रह गई थीं।
माइक शारदा के सामने किया गया। सब सोच रहे थे कि एक साधारण, घरेलू महिला इतने बड़े मंच पर क्या बोलेगी।
शारदा ने माइक थामा। उसकी आवाज में कोई घबराहट नहीं थी, बल्कि एक शांत आत्मविश्वास था।
“नमस्कार। आज मुझे जो सम्मान मिला है, उसके पीछे किसी बड़े बिजनेस स्कूल की डिग्री नहीं, बल्कि रसोई की वह तपिश है जिसने मुझे कभी हार न मानना सिखाया। बरसों तक मुझे लगता था कि घर के चूल्हे-चौके में खप जाना ही मेरी नियति है। समाज में इज्जत सिर्फ उसी की होती है जो दफ्तर जाता है और पैसे कमाता है। एक दिन मेरे आठ साल के बेटे ने मुझसे पूछा था कि मां, तुम इतनी मेहनत करती हो फिर भी तुम्हें वो सम्मान क्यों नहीं मिलता जो दूसरों को मिलता है? उस दिन मुझे समझ आया कि अगर मैं खुद अपनी पहचान नहीं बनाऊंगी, तो मेरा बेटा कभी यह नहीं समझ पाएगा कि एक औरत की सीमाएं सिर्फ घर की चारदीवारी नहीं होतीं। मैंने अपनी कला को अपना औजार बनाया। मैं यह सम्मान उन सभी गृहिणियों को समर्पित करती हूं, जिनके काम को हम ‘कुछ नहीं करती’ कहकर खारिज कर देते हैं। हुनर हर औरत में होता है, बस जरूरत होती है खुद पर विश्वास करने की।”
भाषण समाप्त होते ही पूरा सभागार सम्मान में खड़ा हो गया।
घर लौटने के बाद का दृश्य पूरी तरह बदल चुका था। लिविंग रूम में वही ट्रॉफी टेबल के बीचों-बीच रखी थी।
ससुर जी की आंखें नम थीं। उन्होंने आगे बढ़कर शारदा के सिर पर हाथ रखा, “बहू, आज तुमने मेरी आंखें खोल दीं। हम हमेशा बाहर की चमक-दमक को ही कामयाबी समझते रहे, लेकिन उस चमक के पीछे जो तुम्हारी मूक साधना थी, उसे कभी देख ही नहीं पाए। हमें माफ कर दो, आज तुमने हमारे पूरे खानदान का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है।”
कौशल्या देवी ने अपनी बड़ी बहू को गले से लगा लिया और रो पड़ीं, “शारदा, तूने बिना कोई शिकायत किए, बिना घर की जिम्मेदारियों को छोड़े इतना बड़ा काम कर दिखाया। तू सचमुच इस घर की लक्ष्मी है।”
कृतिका धीरे से शारदा के पास आई। उसके चेहरे से वह पुराना घमंड गायब था। उसने शारदा के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए, “भाभी, मुझे माफ कर दीजिएगा। मुझे लगता था कि सिर्फ कॉरपोरेट में काम करने वाले ही सफल होते हैं। लेकिन आपने जो मुकाम शून्य से शुरू करके हासिल किया है, वह मेरे इस ऊंचे पद से कहीं ज्यादा बड़ा है। आज से आप सिर्फ मेरी जेठानी नहीं, मेरी रोल मॉडल हैं।”
आरव अपनी मां से लिपट गया। उसकी आंखों में अपने सवाल का जवाब था—उसकी मां सिर्फ घर संभालने वाली नहीं थी, वह एक विजेता थी।
शारदा ने मुस्कुराते हुए अपने परिवार को देखा। उसने अपने हक का सम्मान किसी से मांगा नहीं था, बल्कि अपनी मेहनत, लगन और आत्मसम्मान के दम पर उसे अर्जित किया था। रसोई की चौखट पार करके उसने साबित कर दिया था कि पंखों को उड़ान भरने के लिए सिर्फ एक हौसले की जरूरत होती है।
हर औरत के भीतर एक असीम शक्ति और हुनर छिपा होता है, जिसे अक्सर घर की जिम्मेदारियों के नीचे दबा दिया जाता है। क्या हमारे समाज को आज भी गृहिणियों के काम को ‘काम’ मानने के लिए उनके पैसे कमाने का इंतजार करना पड़ता है? आपकी नजर में एक महिला के असली सम्मान की परिभाषा क्या है? अपने विचार और अनुभव कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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