तुम्हारी आँखों से आँसू गिर रहे थे, पर तुम्हारे हाथ कांपते हुए आटे की थाली में चलते रहे। मैं दरवाज़े की ओट में खड़ा सब सुन रहा था। मेरे सीने में कुछ बुरी तरह टूटा, एक टीस उठी कि मैं आगे बढ़ूँ, माँ का हाथ थाम लूँ और कहूँ कि बस कीजिए। पर मेरे पाँव जैसे ज़मीन में जम गए थे। मैंने मुड़कर बैठक में बैठे बाबूजी को देखा। वे हमेशा की तरह सिर झुकाए, अपनी चाय का घूंट भरते हुए चुपचाप अखबार पढ़ते रहे, मानो कुछ हुआ ही न हो। बाबूजी का वह सहमा हुआ मौन देखकर मेरी नसें भी सुन्न पड़ गईं। बचपन का वही डर मुझ पर हावी हो गया। मैं उस दिन भी नहीं बोला।
रात के सन्नाटे में जब पूरी दुनिया सो रही होती है, तब दिल के पुराने ज़ख्म अक्सर जाग उठते हैं। आज इस बालकनी में खड़े होकर जब मैं सामने फैले सुनसान रास्ते को देख रहा हूँ, तो कैलेंडर के पन्ने अपने आप उलटने लगते हैं। ठीक छह बरस बीत चुके हैं उस मनहूस शाम को, जब तुमने उस भारी मन और भीगी आँखों के साथ इस घर की दहलीज़ हमेशा-हमेशा के लिए लाँघ दी थी। हमारे वैवाहिक जीवन की उम्र कुल मिलाकर नब्बे दिन ही तो रही होगी। पर वे तीन महीने मेरे बंजर जीवन में उस सावन की तरह आए थे, जिसकी महक से मेरी सूखी आत्मा तृप्त हो गई थी। उसके बाद तो ऐसा पतझड़ आया जिसने पूरे घर के पत्तों को नोच डाला। मैंने इस वीराने में, इस अकेलेपन में सांस लेना सीख तो लिया, पर सच कहूँ तो हर साँस एक सज़ा बन गई।
तुम सचमुच अपने नाम ‘लावण्या’ जैसी ही थीं—शांत, शालीन, सौम्य और संस्कारों की एक जीती-जागती मूरत। जब तुम ब्याहकर इस घर में आई थीं, तो तुम्हारी बड़ी-बड़ी आँखों में एक नई गृहस्थी बसाने के हज़ारों सपने तैर रहे थे। तुमने अपने परिवार, अपनी स्वतंत्रता और अपने सपनों को पीछे छोड़कर सिर्फ मेरे हाथ को थामा था। पर अफ़सोस, तुम जिस आंगन में अपनी खुशियों का बगीचा लगाने आई थीं, उसकी ज़मीन तो पहले से ही कड़वाहट और अहंकार के तेज़ाब से बंजर हो चुकी थी।
मेरी माँ… श्रीमती कल्याणी देवी। पूरे मोहल्ले में और रिश्तेदारों के बीच उनका दबदबा ऐसा था कि लोग उनके सामने आँख उठाकर बात करने से कतराते थे। उनके स्वभाव में ममता से ज़्यादा हुकूमत का नशा था। घर का कोई भी सदस्य उनकी मर्ज़ी के बिना सांस भी नहीं ले सकता था। और मेरे पिता, बाबूजी, एक सीधे-सादे, शांत प्रकृति के शिक्षक। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी माँ के गुस्से और तानों के आगे सिर झुकाकर गुज़ार दी थी। मैंने बचपन से यही देखा था कि माँ हर छोटी बात पर बाबूजी की बेइज़्ज़ती करती थीं, यहाँ तक कि बाहर वालों के सामने भी उन्हें नीचा दिखाने से नहीं हिचकिचाती थीं। बाबूजी का वह दबा हुआ, सहमा हुआ चेहरा देखकर मेरे बालमन में यह बात बैठ गई थी कि बड़ों के सामने चुप रहना, उनकी ज्यादतियों को बिना उफ़ किए सहना ही सबसे बड़ा ‘संस्कार’ है। पर मुझे तब यह समझ नहीं आया था कि अन्याय को चुपचाप सहना संस्कार नहीं, बल्कि सबसे बड़ी कायरता है।
शादी के कुछ ही हफ़्तों बाद जब तुमने पहली बार मुझसे माँ के बर्ताव का ज़िक्र किया था, तो मैंने तुम्हारी बात को गंभीरता से नहीं लिया था। तुमने कहा था कि माँ हर बात पर तुम्हें ताने देती हैं, सुबह पाँच बजे से लेकर रात के ग्यारह बजे तक तुमसे नौकरों की तरह काम करवाती हैं और फिर भी हर निवाले पर ज़हर उगलती हैं। मैंने तब बड़ी सहजता से कह दिया था, “अरे लावण्या, माँ पुराने ख्यालात की हैं, थोड़ा वक़्त दो, सब ठीक हो जाएगा।”
पर उस दिन मेरे पैरों तले से ज़मीन खिसक गई, जब मैंने अपने कानों से वह सब सुना। शाम का वक़्त था, मैं दफ़्तर से जल्दी लौट आया था। जैसे ही मैंने बैठक का दरवाज़ा खोला, मुझे रसोई से माँ की तीखी आवाज़ सुनाई दी। वे कह रही थीं, “तेरे बाप ने तो हमें कंगाल समझकर ठग लिया! चार्टर्ड अकाउंटेंट बेटा मिला था तो लगा था कि कोई बड़ी गाड़ी या कम से कम हमारे रुतबे के हिसाब से दहेज देंगे। पर तेरे बाप ने तो बस अपनी यह एम.एस-सी. पास बेटी हमारे गले में बाँध दी, जिसे ठीक से चाय बनानी भी नहीं आती!”
तुम्हारी आँखों से आँसू गिर रहे थे, पर तुम्हारे हाथ कांपते हुए आटे की थाली में चलते रहे। मैं दरवाज़े की ओट में खड़ा सब सुन रहा था। मेरे सीने में कुछ बुरी तरह टूटा, एक टीस उठी कि मैं आगे बढ़ूँ, माँ का हाथ थाम लूँ और कहूँ कि बस कीजिए। पर मेरे पाँव जैसे ज़मीन में जम गए थे। मैंने मुड़कर बैठक में बैठे बाबूजी को देखा। वे हमेशा की तरह सिर झुकाए, अपनी चाय का घूंट भरते हुए चुपचाप अखबार पढ़ते रहे, मानो कुछ हुआ ही न हो। बाबूजी का वह सहमा हुआ मौन देखकर मेरी नसें भी सुन्न पड़ गईं। बचपन का वही डर मुझ पर हावी हो गया। मैं उस दिन भी नहीं बोला।
तुम रोज़ अंदर ही अंदर घुटती रहीं। तुम्हारे पास बायोकेमिस्ट्री में मास्टर्स की डिग्री थी, गोल्ड मेडलिस्ट थीं तुम। शादी से पहले तुम एक बड़ी रिसर्च लैब में काम करना चाहती थीं, तुम्हारा सपना था कि तुम एक वैज्ञानिक बनो। पर इस घर में तुम्हारी डिग्री केवल आलमारी के किसी कोने में धूल फाँकने के लिए रह गई थी। माँ ने तुम्हारी पढ़ाई का मज़ाक उड़ाते हुए साफ़ कह दिया था कि इस घर की बहुएँ बाहर जाकर नौकरियाँ नहीं करतीं, उनका काम चूल्हा-चौका संभालना और बड़ों की चाकरी करना है।
आख़िर एक आत्मसम्मान से भरी पढ़ी-लिखी स्त्री कब तक ऐसा अपमान सहती? उस आख़िरी सुबह जब तुमने अपना सूटकेस उठाया, तो तुम्हारे चेहरे पर कोई गुस्सा नहीं था, बल्कि एक अजीब सा ठहराव था। वह ठहराव जो किसी इंसान के अंदर सब कुछ ख़त्म हो जाने के बाद आता है। तुमने उस घर की सीमा लाँघने से पहले एक पल के लिए पलटकर मुझे देखा था। तुम्हारी उस आख़िरी नज़र में मेरे लिए कोई नफ़रत नहीं थी, सिर्फ़ एक गहरी निराशा और दया का भाव था।
मैं उस वक्त दीवान के सहारे बेबस खड़ा था। मेरे हाथ जुड़े हुए थे, गालों पर आँसू बह रहे थे, पर मेरे होंठ सिले हुए थे। अपनी ही ब्याहता, अपनी ही संगिनी के स्वाभिमान के लिए ढाल बनकर खड़े होने की हिम्मत मुझमें नहीं थी। उस दिन मुझे पहली बार अहसास हुआ कि एक मर्द का अपनी पत्नी के हक़ के लिए आवाज़ न उठा पाना, उसे समाज की गालियों से भी ज़्यादा खोखला बना देता है। मेरा वह मौन कोई मर्यादा नहीं था, वह मेरी आत्मिक दुर्बलता थी।
तुम्हारे जाने के बाद माँ ने बहुत तमाशा किया। उन्होंने रिश्तेदारों में ढिंढोरा पीटा कि बहू घमंडी थी, बड़ों का आदर नहीं जानती थी। उन्होंने मेरे लिए नए-नए रिश्तों की कतार लगा दी। पर उस दिन मेरे भीतर का जो इंसान मरा था, उसी राख से एक ज़िद्दी पछतावा पैदा हुआ। मैंने माँ से साफ़ कह दिया कि मैं अपनी पूरी ज़िंदगी अकेले काट लूँगा, पर किसी दूसरी लड़की की ज़िंदगी इस घर की वेदी पर चढ़ाने के लिए कभी दूसरी शादी नहीं करूँगा। माँ ने चीख-पुकार की, रोईं, धोईं, पर मैं अपने फ़ैसले पर पत्थर की तरह अड़ा रहा।
समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा। साल दर साल बीतते गए। बाबूजी दो साल पहले इस दुनिया से चले गए, और उनके जाने के बाद माँ का सारा घमंड जैसे रेत के महल की तरह ढह गया। अब इस बड़े से पुश्तैनी मकान में केवल दो साये रहते हैं—एक मैं और दूसरी मेरी माँ। रिश्तेदार अपने-अपने परिवारों में मशगूल हो गए। अब कोई माँ के पास बैठने नहीं आता। जिस ‘खानदान के चिराग़’ और ‘रुतबे’ के नशे में उन्होंने तुम्हारा जीना दूभर किया था, आज उसी चिराग़ के लिए, एक नन्हें पोते या पोती की किलकारी सुनने के लिए वे हर पल तरसती हैं।
कल शाम जब मैं दफ़्तर से लौटा, तो पूजा घर से मुझे किसी के सिसकने की आवाज़ आई। मैंने झांककर देखा, तो माँ भगवान की मूरत के आगे सिर पटक-पटककर फूट-फूटकर रो रही थीं। वे अपनी कांपती आवाज़ में कह रही थीं, “हे भगवान, यह किस जनम का पाप मेरे सामने आ गया? मैंने अपनी बहू को रुलाया, उसे घर से निकाल दिया, आज मेरा बेटा मुझसे बात तक नहीं करता। यह भरा-पूरा घर श्मशान बन गया है!”
माँ के उन आँसुओं को देखकर मेरे दिल में कोई बदले की भावना नहीं जगी, बल्कि एक गहरा वैराग्य और आत्ममंथन जागा। मुझे समझ आया कि सिर्फ़ पछतावे की आग में जलते रहना और अपनी ज़िंदगी को सज़ा बनाए रखना भी एक तरह का पलायन है। अगर मैंने छह साल पहले कायरता दिखाई थी, तो क्या आज भी मैं सिर्फ़ अतीत की राख कुरेदता रहूँगा? क्या प्रायश्चित का मतलब सिर्फ़ बर्बादी होता है, या फिर प्रायश्चित का सच्चा अर्थ अपनी ग़लतियों को सुधारकर एक सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ना है?
मैंने उस रात बहुत सोचा। सोशल मीडिया और पुराने दोस्तों के ज़रिए मुझे पता चला था कि तुमने अपने पैरों पर खड़े होकर अपनी एक नई दुनिया बसाई है। तुमने हार नहीं मानी। तुम पुणे के एक बड़े रिसर्च सेंटर में सीनियर साइंटिस्ट के पद पर काम कर रही हो। तुमने अपनी मेहनत से, अपने दम पर वह मुकाम हासिल किया जिसका तुमने सपना देखा था। यह जानकर मेरा सीना गर्व से भर गया। तुमने किसी नए रिश्ते को नहीं अपनाया था, बल्कि अपने काम को, अपने आत्मसम्मान को ही अपनी ज़िंदगी बना लिया था।
अगली सुबह, जब सूरज की पहली किरण ने आँगन में दस्तक दी, तो मैंने अपने जीवन का सबसे बड़ा फ़ैसला लिया। मैंने माँ को ड्राइंग रूम में बुलाया। वे आज पूरी तरह से टूट चुकी थीं, उनके चेहरे का सारा अहंकार ढल चुका था। मैंने उनके सामने जाकर कहा, “माँ, हमने उस बच्ची के साथ जो अन्याय किया था, उसका पाप हम दोनों के सिर पर है। आपने बोलकर पाप किया, और मैंने चुप रहकर उससे भी बड़ा गुनाह किया। अगर आप सच में अपने इस पछतावे से मुक्ति चाहती हैं, तो चलिए मेरे साथ।”
माँ ने अचरज से मुझे देखा, “कहाँ बेटा?”
“पुणे, लावण्या के पास। उससे भीख मांगने नहीं कि वह वापस आ जाए, बल्कि अपने कर्मों की माफ़ी माँगने। ताकि हम अपनी आत्मा पर लदे इस बोझ से मुक्त हो सकें और उसे यह बता सकें कि उसकी कोई ग़लती नहीं थी।”
माँ के चेहरे पर पहले तो संकोच आया, पर फिर उनकी आँखों से आँसू बह निकले। उन्होंने पहली बार बिना किसी तकरार के सिर हिला दिया।
दो दिन बाद, हम पुणे के उस शांत आवासीय इलाके में खड़े थे जहाँ तुम्हारा घर था। दरवाज़े की घंटी बजी और जब तुमने दरवाज़ा खोला, तो तुम्हारे चेहरे के भाव देखने लायक थे। उन आँखों में आश्चर्य था, पुराना दर्द था, पर कोई कड़वाहट नहीं थी। तुम सफ़ेद कुर्ते में उतनी ही गरिमामयी और शांत लग रही थीं, जितनी छह साल पहले थीं।
इससे पहले कि तुम कुछ कह पातीं, मेरी माँ—वही घमंडी कल्याणी देवी—तुम्हारे पैरों में गिर पड़ीं। उनके हाथ कांप रहे थे और वे रोते हुए कह रही थीं, “मुझे माफ़ कर दे बेटी! मैंने तेरे स्वाभिमान को कुचला, मैंने तेरी ममता का गला घोंटा। मुझे अपने किए की सज़ा मिल गई है लावण्या। मेरा बेटा आज तक मुझे माफ़ नहीं कर पाया। आज मैं एक सास बनकर नहीं, एक पापी औरत बनकर तेरे सामने अपनी ग़लती स्वीकार करने आई हूँ।”
तुम स्तब्ध रह गईं। तुमने तुरंत झुककर माँ को उठाया, उन्हें सोफ़े पर बैठाया और पानी का गिलास उनके हाथों में थमा दिया। तुम्हारी आँखों में भी नमी उतर आई थी। फिर तुमने मेरी तरफ़ देखा।
मैंने हाथ जोड़कर, अपनी नज़रें नीची करते हुए कहा, “लावण्या, मैं यहाँ अपना खोया हुआ हक मांगने नहीं आया हूँ। मैं जानता हूँ कि एक कमज़ोर और कायर पति के रूप में मैंने तुम्हें जो दर्द दिया, उसकी कोई भरपाई नहीं हो सकती। मैं बस तुम्हें यह बताने आया हूँ कि मुझे अपनी उस चुप्पी पर ज़िंदगी भर पछतावा रहेगा। तुमने अपने दम पर जो यह मकाम हासिल किया है, उस पर मुझे नाज़ है। हम सिर्फ़ अपनी आत्मा का बोझ हल्का करने और तुम्हें तुम्हारे स्वाभिमान की जीत की बधाई देने आए हैं।”
कमरे में कुछ देर के लिए गहरा सन्नाटा छा गया।
फिर तुमने एक गहरी सांस ली। तुम्हारे चेहरे पर एक असीम शांति थी। तुमने कहा, “आदित्य, जिस दिन मैं वह घर छोड़कर निकली थी, मेरे मन में बहुत गुस्सा और अपमान की आग थी। पर उस आग को मैंने अपनी ताक़त बनाया। मैंने मेहनत की और खुद को साबित किया। आज जब मैं माँ जी को इस रूप में देख रही हूँ और आपकी बातों में सच्चा पश्चाताप देख रही हूँ, तो मेरे दिल से वह पुराना ज़ख्म पूरी तरह भर गया है। माफ़ी मांगने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि मैंने आप दोनों को बहुत पहले माफ़ कर दिया था। नफ़रत को ढोते हुए कोई इंसान आगे नहीं बढ़ सकता।”
माँ ने रोते हुए पूछा, “क्या तू हमारे साथ घर वापस नहीं चलेगी बेटी?”
तुमने बड़ी विनम्रता और दृढ़ता के साथ मुस्कुराते हुए कहा, “नहीं माँ जी। जो नदी एक बार सागर की ओर निकल पड़ती है, वह वापस अपने उद्गम की संकरी गलियों में नहीं लौट सकती। मेरा जीवन अब इस काम, इस मुकाम और इस आत्मनिर्भरता से जुड़ा है। अतीत में लौटना किसी के लिए भी सही नहीं होगा। पर हाँ, आज हमारे बीच की कड़वाहट हमेशा के लिए ख़त्म हो गई। अब हमारे बीच कोई बैर नहीं है।”
उस दिन हमने तुम्हारे घर पर बैठकर साथ चाय पी। कोई कड़वी बात नहीं हुई, सिर्फ़ एक-दूसरे के जीवन के प्रति सम्मान और शुभकामनाएं थीं। जब हम स्टेशन के लिए निकले, तो तुमने माँ के पैर छूकर आशीर्वाद लिया और मुझसे हाथ मिलाते हुए कहा, “आदित्य, खुद को कोसना बंद कीजिए। ज़िंदगी किसी ग़लती पर ख़त्म नहीं होती। अपने मौन को तोड़िए और एक सकारात्मक इंसान बनकर आगे बढ़िए।”
आज जब मैं वापस अपने घर की इस बालकनी में खड़ा हूँ, तो मौसम वही है, पर मेरे भीतर का पतझड़ अब समाप्त हो चुका है। हमारे रिश्ते का वह पुराना ढांचा भले ही टूट गया, पर हम दोनों ने अपनी-अपनी ज़िंदगी में एक नया सवेरा देख लिया है। तुमने अपनी आत्मनिर्भरता से अपनी पहचान बनाई, और मैंने अपने मौन को तोड़कर सच का सामना करने का साहस जुटाया। माँ के चेहरे पर अब पश्चाताप के बाद का सुकून है।
ज़िंदगी कभी-कभी हमें दूसरा मौका उस रूप में नहीं देती जैसा हम चाहते हैं, पर वह हमें एक बेहतर इंसान बनने और अपनी आत्मा को शुद्ध करने का अवसर ज़रूर देती है। स्वाभिमान और सत्य के आगे जब अहंकार झुकता है, तभी जीवन में सच्ची शांति का वास होता है।
पाठकों के लिए विचार:
एक परिवार में जब अन्याय हो रहा हो, तो क्या किसी बेटे या पति का संस्कारों के नाम पर मौन साधे रहना सही है? क्या सही समय पर बोली गई एक कड़वी सच्चाई, पूरे परिवार को बिखरने और ज़िंदगी भर के पछतावे से नहीं बचा सकती थी? आपकी राय इस विषय पर क्या है, नीचे कमेंट बॉक्स में अपने विचार ज़रूर साझा करें।
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