न्याय की लाठी

 पार्वती ने हाथ जोड़कर कांपते हुए कहा, “मुखिया जी, मैं एक लाचार औरत हूँ। दिन-रात मेहनत करके अपने बच्चे का पेट पालती हूँ। आज दोपहर जब मैं खेत पर थी, तो मेरे जेठ भवानी और देवर महिपाल ने मेरे घर का ताला खोलकर संदूक से मेरे सास के दिए सोने के जेवर चुरा लिए। मेरे बेटे ने इन्हें अपनी आँखों से ले जाते देखा है। मेरे पास उन जेवरों के अलावा अपने बच्चे के भविष्य के लिए कुछ भी नहीं है।”

फागुन की ढलती दोपहर थी। खेतों से आती पछुआ हवा में उड़ती धूल जब कच्चे मकान के तिनकों से टकराती, तो एक अजीब सी उदासी का अहसास कराती थी। पार्वती जब गाँव के बाहर जमींदार के खेतों में दिन भर धान की कटाई और गहाई का कमरतोड़ काम करके घर लौटी, तो उसकी देह पसीने और थकान से चूर थी। सूती साड़ी के पल्लू से अपने चेहरे का पसीना पोंछते हुए जैसे ही उसने अपने दो कमरों वाले पुराने खपरैल के मकान के आँगन में कदम रखा, उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

अंदर कमरे का लकड़ी का पुराना किवाड़ खुला पड़ा था। कमरे के बीचों-बीच रखा लोहे का भारी ट्रंक खुला था और उसके भीतर रखे फटे-पुराने कपड़े, कुछ कागज़ात और गृहस्थी का टूटा-फूटा सामान फर्श पर बेतरतीब बिखरा हुआ था।

“चीकू! ओ चीकू!” पार्वती ने कांपती और रुंधती हुई आवाज़ में अपने आठ साल के बेटे को आवाज़ लगाई।

मिट्टी के चूल्हे के पास बैठी एक छोटी सी बिल्ली के बच्चे को सहला रहा बालक चीकू सहमकर माँ के पास दौड़ा आया। उसकी बड़ी-बड़ी मासूम आँखों में डर साफ दिखाई दे रहा था।

“चीकू, आज फिर तूने मेरे संदूक को हाथ लगाया? कितनी बार समझाया है बेटा कि कुछ चाहिए हो तो अपनी माँ से माँग लिया कर। पर इस तरह सामान की उठा-पटक क्यों की? तू तो जानता है कि उस बक्से में तेरे बाबूजी की आख़िरी निशानियाँ रखी हैं!” पार्वती का गला सूख रहा था।

चीकू ने तुरंत अपने दोनों हाथ पीछे कर लिए और मासूमियत से सिर हिलाकर बोला, “नहीं माँ, कसम से मैंने उस बक्से को छुआ तक नहीं। मैं तो बाहर नीम की छाँव में खेल रहा था।”

“तो क्या यहाँ कोई चोर आया था? यह सारा सामान किसने फैलाया?” पार्वती के भीतर एक अनजाना सा खौफ घर करने लगा।

चीकू ने धीरे से कहा, “माँ, दोपहर को जब तुम खेत पर थीं, तब छोटे चाचा और बड़े ताऊजी आए थे। वे कह रहे थे कि बाबूजी का कुछ ज़रूरी कागज़ ढूँढ रहे हैं। उन्होंने पूरा संदूक उलट दिया और सबसे नीचे तह करके रखी लाल मखमली पोटली निकालकर अपनी जेब में रख ली। जब मैंने पूछा तो उन्होंने मुझे डाँटकर बाहर भगा दिया।”

यह सुनते ही पार्वती की छाती पर जैसे किसी ने भारी हथौड़ा मार दिया हो। वह वहीं ठंडी मिट्टी के फर्श पर बैठ गई और अपने दोनों हाथों से अपना सिर पकड़ लिया। उसके सीने से एक चीख निकल पड़ी, “हे विधाता! कैसा कहर ढा रहे हो मुझ अभागिन पर! अब यही देखना बाकी रह गया था? मेरे सुहाग की बची-खुची आख़िरी पूँजी भी छीन ली!”

पार्वती की ज़िंदगी कोई फूलों की सेज नहीं रही थी। तीन साल पहले तक उसका संसार भी खुशहाल था। उसके पति, राघव, गाँव के एक सीधे-साधे और मेहनती किसान थे। उनके हिस्से में तीन बीघा उपजाऊ ज़मीन और यह पुश्तैनी मकान का आधा हिस्सा आया था। लेकिन एक मनहूस रात, जब पास के कस्बे में एक शादी समारोह से लौटते समय मिलावटी शराब पीने से कई लोगों की जान गई थी, उसमें राघव भी अपनी जान गँवा बैठे थे। उस रात पार्वती का सिंदूर हमेशा के लिए धुल गया था।

पति के गुज़रते ही पार्वती पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। उसने चूड़ियाँ तोड़ीं, पर हौसला नहीं तोड़ा। उसने अपने मासूम बेटे के भविष्य के लिए दूसरों के खेतों में पसीना बहाना शुरू किया। सुबह सूरज उगने से पहले उठना, गाँव के बड़े कुएँ से पानी भरना, चीकू के लिए सूखी रोटी बनाना और फिर शाम ढलने तक खेतों में खटना—यही उसकी रोज़ की दिनचर्या बन गई थी।

लेकिन पार्वती का यह स्वाभिमान और खुद के दम पर जीना उसके देवर, महिपाल, और जेठ, भवानी शंकर, की आँखों में कांटे की तरह खटकता था। दोनों की नज़र उस तीन बीघा उपजाऊ ज़मीन और इस घर पर थी। वे कई महीनों से घात लगाए बैठे थे कि किसी तरह पार्वती टूट जाए, भूखों मर जाए और अपने बच्चे को लेकर अपने मायके या कहीं दूर भाग जाए, ताकि वे पूरी मिल्कियत पर कब्ज़ा कर सकें। कई बार उन्होंने उसे ताने मारे, पानी भरने से रोका, लेकिन जब पार्वती डिगी नहीं, तो आज उन्होंने यह घिनौनी हरकत कर दी थी। उस लाल मखमली पोटली में पार्वती की स्वर्गीय सास द्वारा उसके विवाह के समय दिए गए सोने के कुंडल और एक पुराना पुश्तैनी हार था, जिसे पार्वती ने अपने बेटे की पढ़ाई और बुरे वक्त के लिए छुपाकर रखा था।

पार्वती की रोने की आवाज़ सुनकर पास-पड़ोस की कुछ औरतें और बुज़ुर्ग आँगन में इकट्ठा हो गए।

“क्या हुआ बहू? इस तरह क्यों विलाप कर रही हो?” पड़ोस के शिवप्रसाद काका ने आगे बढ़कर पूछा।

पार्वती ने सिसकते हुए पूरी बात बताई। “काका, मुझ बेसहारा का सब कुछ लुट गया। राघव जी के जाने के बाद इन देवर-जेठ ने कभी एक दाना अन्न का नहीं पूछा। अब दिन-दहाड़े मेरे घर में घुसकर मेरे सुहाग के जेवर चुरा ले गए। मैं अपने बच्चे को लेकर कहाँ जाऊँ?”

शिवप्रसाद काका ने माथे पर हाथ फेरा और गंभीर होकर बोले, “यह तो घोर अन्याय है। ऐसे लोगों का मुँह बंद केवल पंचायत ही कर सकती है। तू रोना बंद कर बेटी, चल सीधे गाँव के मुखिया जी के पास। आज न्याय के चबूतरे पर ही इस बात का फैसला होगा।”

गाँव के विशाल बरगद के पेड़ के नीचे, प्राचीन शिव मंदिर के प्रांगण में पंचायत बैठाई गई। गाँव के सम्मानित मुखिया बलदेव सिंह चबूतरे पर बैठे थे। उनके आसपास गाँव के पंच और भारी भीड़ जमा थी। एक तरफ पार्वती अपने बेटे चीकू का हाथ पकड़े, फटे पल्लू से अपना चेहरा ढँके खड़ी थी। दूसरी तरफ उसका जेठ भवानी शंकर और देवर महिपाल अपनी मूँछों पर ताव देते हुए खड़े थे।

मुखिया बलदेव सिंह ने कड़क आवाज़ में पूछा, “पार्वती, तूने अपने जेठ और देवर पर चोरी का आरोप लगाया है। क्या कहना है तेरा?”

पार्वती ने हाथ जोड़कर कांपते हुए कहा, “मुखिया जी, मैं एक लाचार औरत हूँ। दिन-रात मेहनत करके अपने बच्चे का पेट पालती हूँ। आज दोपहर जब मैं खेत पर थी, तो मेरे जेठ भवानी और देवर महिपाल ने मेरे घर का ताला खोलकर संदूक से मेरे सास के दिए सोने के जेवर चुरा लिए। मेरे बेटे ने इन्हें अपनी आँखों से ले जाते देखा है। मेरे पास उन जेवरों के अलावा अपने बच्चे के भविष्य के लिए कुछ भी नहीं है।”

इससे पहले कि मुखिया कुछ कहते, महिपाल आगे बढ़ा और चिल्लाकर बोला, “झूठ बोलती है यह औरत! मुखिया जी, इस विधवा के दिमाग में फितूर बैठ गया है। हमने कोई चोरी नहीं की। असलियत तो यह है कि वे जेवर हमारी माँ के थे, जो उन्होंने पूरे परिवार के लिए बनवाए थे। हमारे भाई राघव ने बेईमानी करके अपनी बीमारी और तंगहाली के बहाने माँ से वे जेवर अपने पास रखवा लिए थे। उन जेवरों पर हमारे पूरे खानदान का बराबर हक है। यह अकेली उन पर कुंडली मारकर बैठना चाहती थी। हम तो बस अपना पुश्तैनी हक़ वापस लेकर आए हैं।”

भवानी शंकर ने भी बात का समर्थन किया, “हाँ मुखिया जी, महिपाल ठीक कह रहा है। हमने कोई डाका नहीं डाला। वे गहने हमारे हैं, और अब उन गहनों के तीन हिस्से होने चाहिए—एक इसका और दो हमारे। हम तो कहते हैं कि गाँव के पंच ही फैसला करें।”

भीड़ में खुसुर-पुसुर होने लगी। बात उलझ चुकी थी। जेवर पार्वती की सास के समय के थे, इसका कोई पक्का कागज़ या रसीद किसी के पास नहीं थी।

मुखिया बलदेव सिंह ने अपनी सफेद दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए कहा, “भवानी और महिपाल, अगर तुम्हारी नीयत साफ थी, तो तुम्हें पंचों के सामने यह बात रखनी चाहिए थी, इस तरह पीठ पीछे किसी के घर से सामान नहीं उठाना चाहिए था। सबसे पहले वो पोटली पंचों के सामने पेश की जाए।”

महिपाल ने भारी मन से अपनी जेब से वह लाल मखमली पोटली निकालकर मंदिर के चबूतरे पर, भगवान शिव के त्रिशूल के ठीक सामने रख दी।

मुखिया जी ने पोटली को हाथ में लिया और बोले, “यह मामला पारिवारिक धरोहर का है और सच्चाई की तह तक पहुँचना ज़रूरी है। कानून और कागज़ हमारे पास नहीं हैं, लेकिन धर्म और मर्यादा इस चौखट पर साक्षी है। यह पोटली आज से आठ दिनों तक इसी मंदिर के गर्भगृह में, भगवान के चरणों में सुरक्षित रखी जाएगी। इन आठ दिनों में पंच इस बात की पूरी पड़ताल करेंगे कि इन जेवरों का असली हकदार कौन है। आठवें दिन ठीक इसी समय पंचायत अपना अंतिम फैसला सुनाएगी।”

पंचायत समाप्त होने लगी। भवानी और महिपाल के चेहरों पर एक कुटिल मुस्कान थी। उन्हें लग रहा था कि पंचों को अपनी बातों में उलझाकर और कुछ रुपयों का लेन-देन करके वे आधा या पूरा हिस्सा हड़प ही लेंगे। वे दोनों अकड़ते हुए भगवान के मंदिर की सीढ़ियों से उतरने लगे।

तभी पार्वती ने आगे बढ़कर उस चबूतरे की मिट्टी को अपने माथे से लगाया। उसने भगवान शिव के शिवलिंग की ओर देखा और फिर अपने जेठ-देवर की ओर घूमकर एक ऐसी स्थिर, गंभीर और भेदने वाली आवाज़ में कहा, जिसने वहाँ मौजूद हर इंसान के रोंगटे खड़े कर दिए।

पार्वती ने कहा, “सुन लो भवानी भाई साहब और महिपाल! इस धरती पर कोई पंच भले ही तुम्हारी चालाकियों को न समझ पाए, लेकिन ऊपर एक ऐसा न्यायाधीश बैठा है जिसकी लाठी में आवाज़ नहीं होती, पर चोट बेमिसाल होती है। मैंने एक विधवा होकर भी कभी किसी का एक तिनका नहीं छीना। आज इस भोलेनाथ के मंदिर के सामने मैं यह बात कहती हूँ—हम तीनों में से जो भी झूठा होगा, जो भी इस अनाथ बच्चे के निवाले पर नज़र गड़ाए बैठा होगा, उसे यह कुदरत इन आठ दिनों के भीतर कोई न कोई ऐसा दंड ज़रूर देगी जो उसकी आँखें खोल देगा। और जो बेगुनाह होगा, उसका बाल भी बांका नहीं होगा। अब फैसला गाँव के पंच नहीं, साक्षात ईश्वर करेंगे!”

पार्वती की आँखों से निकले वे आँसू कोई साधारण पानी नहीं थे, वे एक सताई हुई, बेबस माँ के कलेजे की आग थे। वहाँ खड़े लोग सिहर उठे। महिपाल ने हँसकर बात टालने की कोशिश की, “चलो-चलो, बड़ी आई ईश्वर की दुहाई देने वाली!” और दोनों अपने घर की ओर बढ़ गए।

पहला दिन शांति से बीत गया। पार्वती अपने घर में चुपचाप ईश्वर का ध्यान करती रही और खेतों में काम करती रही।

लेकिन कुदरत का चक्र चलना शुरू हो चुका था।

तीसरे दिन की बात है। महिपाल अपनी नई मोटरसाइकिल से शहर से कुछ सामान और शराब की बोतलें लेकर तेज़ रफ्तार में गाँव की ओर लौट रहा था। शाम का धुंधलका था। जैसे ही वह गाँव की नहर वाली पुलिया के पास पहुँचा, अचानक सड़क के बीचों-बीच एक बेसहारा गाय आकर खड़ी हो गई। हड़बड़ाहट में महिपाल ने ज़ोरदार ब्रेक मारा। गीली मिट्टी पर बाइक बुरी तरह फिसल गई और महिपाल सड़क किनारे पत्थरों के ढेर पर जा गिरा।

उसका दायाँ पैर बाइक के भारी इंजन और पत्थरों के बीच ऐसा फँसा कि उसकी चीख पूरे इलाके में गूँज गई। राहगीरों ने बड़ी मुश्किल से उसे निकाला और अस्पताल पहुँचाया। डॉक्टरों ने एक्स-रे देखकर बताया कि उसकी जांघ और टखने की हड्डी तीन जगह से टूट चुकी है (मल्टीपल फ्रैक्चर)। डॉक्टरों ने तुरंत रॉड डालने और बड़े ऑपरेशन की बात कही। जो पैसा उसने हड़पने के सपने देखे थे, उससे कई गुना ज्यादा खर्च उसकी दवाओं, प्लास्टर और अस्पताल के बिस्तर पर लग गया। वह बिस्तर पर ऐसा पड़ा कि करवट बदलने के लिए भी दूसरों का मोहताज हो गया।

उधर, पाँचवें दिन भवानी शंकर के घर पर ऐसा वज्रपात हुआ जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। भवानी की पत्नी, जो पार्वती को रोज़ तरह-तरह के ताने देती थी और जिसने अपने पति को जेवर चुराने के लिए उकसाया था, सुबह आँगन में झाड़ू लगाते-लगाते अचानक सीने पर हाथ रखकर गिर पड़ी। उसे ज़बरदस्त दिल का दौरा (हार्ट अटैक) पड़ा था।

गाँव में हड़कंप मच गया। भवानी बदहवास होकर उसे पास के बड़े मेडिकल कॉलेज अस्पताल लेकर भागा। आईसीयू में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों ने कहा कि हालत बेहद नाज़ुक है और चौबीस घंटे के भीतर पचास हज़ार रुपये जमा करने होंगे। भवानी के हाथ-पाँव फूल गए। उसने जिन रिश्तेदारों और दोस्तों के भरोसे यह सब किया था, उन्होंने ऐन वक्त पर मुँह मोड़ लिया। भवानी को अपनी बचत का एक-एक पैसा निकालना पड़ा, यहाँ तक कि अपने खेत की फसल भी औने-पौने दाम में बेचनी पड़ी। दिन-रात अस्पताल की ठंडी सीढ़ियों पर बैठकर जब वह अपनी पत्नी की ज़िंदगी की भीख मांग रहा था, तब उसे मंदिर के चबूतरे पर कही पार्वती की वह बात याद आई—”कुदरत का फैसला होकर रहेगा।” भवानी की रूह कांप उठी।

आठवाँ दिन आ पहुँचा।

सूरज की किरणें जब शिव मंदिर के प्रांगण पर पड़ीं, तो पूरा गाँव कौतूहल से भर गया। पंचायत फिर से बैठी। चबूतरे पर वही लाल मखमली पोटली रखी थी।

पार्वती अपने बेटे चीकू के साथ शांत, सौम्य और निश्छल भाव से एक कोने में खड़ी थी। उसके चेहरे पर कोई डर नहीं था, बल्कि एक गहरा आत्मिक संतोष था।

लेकिन चबूतरे के दूसरी तरफ का नज़ारा सब कुछ बयाँ कर रहा था। भवानी शंकर वहाँ सिर झुकाए, हाथ बाँधे, फटे हाल में अकेला खड़ा था। उसकी आँखों के नीचे गहरे गड्ढे थे और चेहरा शर्मिंदगी से काला पड़ चुका था। महिपाल तो आने की हालत में ही नहीं था, वह अस्पताल के बिस्तर पर दर्द से कराह रहा था।

मुखिया बलदेव सिंह ने चारों तरफ नज़र दौड़ाई और गंभीर स्वर में पूछा, “भवानी शंकर, तुम्हारे भाई महिपाल कहाँ हैं? और तुम दोनों का इन जेवरों को लेकर क्या कहना है? पंचायत अपना फैसला सुनाने के लिए तैयार है।”

भवानी शंकर की आँखों से आँसुओं की धार बह निकली। वह अपनी जगह से हिला और लड़खड़ाते कदमों से सीधे उस चबूतरे के पास गया जहाँ पार्वती खड़ी थी। पूरे गाँव के सामने, भवानी शंकर घुटनों के बल ज़मीन पर बैठ गया और उसने अपने दोनों हाथ जोड़कर पार्वती के पैरों के सामने रख दिए।

“मुझे माफ़ कर दो बहू… मुझे माफ़ कर दो!” भवानी की आवाज़ सिसकियों में बदल गई। “हम अंधे हो गए थे लालच में। हमने एक अनाथ बच्चे और एक बेसहारा विधवा के हक पर डाका डालने की कोशिश की थी। लेकिन भगवान ने हमें ऐसा सबक सिखाया है जिसे हम सात जन्मों तक नहीं भूलेंगे। महिपाल अस्पताल में बिस्तर पर सड़ रहा है और मेरी पत्नी मौत के मुंह से बाल-बाल बची है। हमारा सारा घमंड, हमारा सारा पैसा उस पाप की आग में स्वाहा हो गया। हमें हमारा न्याय मिल चुका है।”

भवानी ने मुखिया की तरफ देखकर रोते हुए कहा, “मुखिया जी, ये सारे जेवर सिर्फ और सिर्फ पार्वती के हैं। हमारे भाई राघव ने इसे अपने पसीने से अपनी पत्नी के लिए सुरक्षित रखा था। हमारा इस पर कोई हक़ नहीं है। हम गुनहगार हैं।”

पूरे प्रांगण में एक गहरा सन्नाटा छा गया। गाँव वालों की आँखें फटी की फटी रह गईं। किसी को यकीन नहीं हो रहा था कि जो दो भाई कल तक ज़मीन और जेवर हड़पने के लिए सीना ताने घूम रहे थे, वे आज बिना किसी पुलिस या मार-पीट के, केवल कुदरत के एक थपेड़े से धूल में मिल चुके थे।

मुखिया बलदेव सिंह ने आदरपूर्वक वह लाल मखमली पोटली उठाई। उन्होंने आगे बढ़कर उसे पार्वती के कांपते हाथों में सौंप दिया।

“बेटी पार्वती,” मुखिया जी ने भरे गले से कहा, “आज तूने यह साबित कर दिया कि जिसके साथ सच्चाई और ईश्वर का भरोसा होता है, उसका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता। पंचों का फैसला तो इंसानों का था, लेकिन साक्षात महादेव ने अपना फैसला पहले ही सुना दिया। ये जेवर तेरे हैं और तेरे ही रहेंगे।”

पार्वती ने पोटली को अपने सीने से लगा लिया। उसकी आँखों से जो आँसू बहे, वे किसी बदले की खुशी के नहीं थे, बल्कि ईश्वर के प्रति कृतज्ञता के थे। उसने अपने जेठ भवानी शंकर को देखा, जो ज़मीन पर रो रहा था।

पार्वती ने आगे बढ़कर अपने जेठ के हाथ पकड़े और उन्हें सहारा देकर खड़ा किया। “उठिए भाई साहब। आप मेरे पति के बड़े भाई हैं, मेरे पिता समान हैं। मेरा इरादा कभी आपका बुरा चाहने का नहीं था। बस मुझे अपने बच्चे के हक की चिंता थी। ईश्वर ने जो किया, वह उनका विधान था। आप भाभी का इलाज कराइए, अगर मेरे इन जेवरों में से भी कुछ पैसे की ज़रूरत पड़े उनकी जान बचाने के लिए, तो मैं पीछे नहीं हटूंगी।”

पार्वती की यह महानता देखकर वहाँ खड़े हर इंसान का सिर उसके सम्मान में झुक गया। भवानी शंकर शर्म से गड़ गया और उसने मन ही मन संकल्प लिया कि आज के बाद वह कभी किसी के साथ कपट नहीं करेगा।

पार्वती अपने बेटे चीकू की उंगली थामकर जब मंदिर की सीढ़ियों से उतरकर अपने कच्चे घर की ओर बढ़ी, तो दोपहर की धूप अब चुभ नहीं रही थी, बल्कि उसके रास्ते को सुनहरी रोशनी से सजा रही थी। उसने साबित कर दिया था कि सच्चाई का रास्ता चाहे जितना भी कांटों भरा हो, उसकी मंज़िल हमेशा सम्मान और आत्मिक शांति की छाँव में ही खुलती है।

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 मूल लेखिका : कमलेश राणा

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