सरिता की आँखों से एक बूँद आँसू छलक कर गाल पर ढुलक गया। आज उसके भीतर बरसों से जमी बर्फ पिघलने लगी थी। उसने अपने काँपते होठों को संभाला और बहुत ही संयमित आवाज़ में कहा, “दिनेश जी, शादी के बाद इस घर को संभालना और अपना पूरा जीवन इस चौखट पर न्योछावर करना मेरी अपनी पसंद थी। मेरे बाबूजी ने मुझे एम.कॉम तक पढ़ाया था, अगर मैं चाहती तो किसी बैंक या कॉलेज में नौकरी कर सकती थी।
दोपहर के करीब ढाई बज चुके थे। पूरे घर में सुबह से मची भागदौड़ के बाद अब जाकर थोड़ी शांति फैली थी। सरिता ने रसोई के सारे बर्तन समेटे, चूल्हे की स्लैब को कपड़े से चमकाया और फिर खुद के लिए थाली में दो ठंडी हो चुकी रोटियाँ और बची हुई तोरी की सब्जी परोसी। भूख से उसका पेट दुखने लगा था। उसने जैसे ही पहला निवाला तोड़ा, तभी दालान से उसके पति दिनेश की भारी आवाज़ गूँजी, “अरे सुनती हो सरिता! ज़रा एक कप कड़क अदरक वाली चाय बना देना। अभी गोदाम के लिए निकलना है, सिर में अजीब सा भारीपन लग रहा है। बाज़ार वाली चाय में वो बात कहाँ जो तुम्हारे हाथ में है। जल्दी बना दो, तुम तो घर पर ही हो, खाना तो थोड़ी देर बाद भी तसल्ली से खा सकती हो।”
सरिता के हाथ में उठा निवाला थाली में ही गिर गया। उसने अपनी आँखों की नमी को छुपाते हुए एक आदर्श और समर्पित पत्नी की तरह थाली को एक तरफ सरकाया और उठते हुए बोली, “जी, मैं अभी पाँच मिनट में आपके लिए चाय चढ़ाती हूँ, खाना बाद में खा लूँगी।”
वह रसोई की तरफ मुड़ ही रही थी कि छुट्टियों में हॉस्टल से आई उसकी उन्नीस वर्षीय बेटी, रिया, सामने आकर खड़ी हो गई। रिया ने अपनी माँ का हाथ पकड़कर वापस कुर्सी पर बिठाया और थाली को वापस सरिता के आगे खिसकाते हुए बोली, “माँ, पहले तुम चुपचाप बैठकर अपना खाना खत्म करोगी। दादी, परदादी और पापा सबने पेट भरकर गरमा-गरम खाना खा लिया है। तुम्हारी थाली में खाना परोसा जा चुका है, तो अब चाय बीच में नहीं बनेगी। पापा के लिए चाय मैं बना देती हूँ।”
सरिता ने अपनी बेटी की आँखों में देखा तो उसका गला भर आया। इस भरे-पूरे परिवार में दो पीढ़ियों की सासें मौजूद थीं, लेकिन एक माँ के पेट की भूख और उसके शरीर की टूटन को आज उसकी बेटी ने ही समझा था। सच ही कहा जाता है कि घर में जब बेटी बड़ी होती है, तो वह केवल संतान नहीं, अपनी माँ की सबसे संवेदनशील ढाल बन जाती है।
दालान में बैठे दिनेश ने यह सुना तो उन्हें अपनी बेटी की यह पहल ज़रा भी रास नहीं आई। वे अखबार समेटते हुए बोले, “अरे रिया बेटा, तुम क्यों चूल्हा फूँकने जा रही हो? हॉस्टल में रहकर वैसे भी तुम पढ़ाई और अपना काम खुद ही करती हो। तुम यहाँ आराम करने आई हो। तुम्हारी माँ दिन भर घर में ही तो रहती है, वो बना देगी चाय। उसे कौन सा दफ्तर की फाइलें संभालनी हैं।”
तभी पास के सोफे पर बैठी रिया की दादी, नर्मदा जी, जो माला फेर रही थीं, तुनककर बोलीं, “हाँ-हाँ बेटा दिनेश, तू ठीक कह रहा है। अरे बहू को तो आदत है देर से खाने की। अब इतनी सी देर में कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा। बहू, ज़रा इलायची कूटकर मेरे लिए भी एक कप चाय बना देना, सुस्ती सी चढ़ रही है दोपहर की।”
वहीं बरामदे की धूप में आरामकुर्सी पर लेटी नर्मदा जी की सास, यानी नब्बे वर्ष की हो चुकीं परदादी पार्वती जी ने अपनी लाठी से ज़मीन को खटखटाया। वे आज भी पुरानी मिट्टी की बनी थीं और उनकी आँखें बहुत पारखी थीं। वे व्यंग्य भरे स्वर में बोलीं, “अरे बड़ी बहू, तू तो बस बहाने ढूँढती है कि तेरी देह को तिनका भी न तोड़ना पड़े। खुद अपने ज़माने में तूने कभी किसी के लिए एक गिलास पानी नहीं उठाया, तो आज बहू का दर्द क्या समझेगी। बहू, तू अपना खाना खा। मैं इतनी मदद कर सकती हूँ कि इस दोपहर में चाय का नखरा नहीं करूँगी।”
रिया ने मुस्कुराते हुए परदादी की तरफ देखा, “बड़ी दादी, जहाँ सबके लिए चाय बनेगी, वहाँ आपकी तुलसी वाली चाय भी बन जाएगी। कम से कम आपने माँ के भूखे पेट का ख्याल तो किया।” फिर रिया मुड़ी और सीधे अपने पिता और दादी की आँखों में देखते हुए बोली, “पापा, दादी… क्या आप दोनों के लिए माँ का वजूद केवल एक घरेलू मशीन का है? एक मशीन भी लगातार चलने पर गर्म होकर बंद हो जाती है, लेकिन माँ को तो मैंने सुबह पाँच बजे से लेकर रात के ग्यारह बजे तक कभी रुकते नहीं देखा। क्या इस घर में उनके होने का मोल सिर्फ इतना है कि वे सबकी फरमाइशें बिना आवाज़ किए पूरी करती रहें?”
नर्मदा जी की त्योरियाँ चढ़ गईं। वे बोलीं, “रिया, तू अपनी माँ की तरफदारी में हद से ज़्यादा बोल रही है। तुम्हारी माँ कोई दुनिया का अनोखा काम नहीं कर रही है। सदियों से औरतें घर-गृहस्थी संभालती आई हैं। इसमें कौन सा अहसान है? और अब तो हमने घर में वाशिंग मशीन, मिक्सर और गीज़र जैसी सारी सुख-सुविधाएँ दे रखी हैं। कौन सा कुएँ से पानी खींचना पड़ता है!”
दिनेश ने भी अपनी माँ की बात का समर्थन किया, “सही कह रही हैं माँ जी। घर में किसी चीज़ की कमी नहीं है। अच्छा खाना, अच्छे कपड़े और हर आधुनिक सुविधा मौजूद है। फिर भी बेटी शिकायत कर रही है, तो इसका मतलब साफ है कि सरिता ने ही इसके कान भरे होंगे। सरिता, तुम्हें किस बात की तकलीफ है? घर की रानी बनाकर रखा है, और क्या चाहिए?”
सरिता की आँखों से एक बूँद आँसू छलक कर गाल पर ढुलक गया। आज उसके भीतर बरसों से जमी बर्फ पिघलने लगी थी। उसने अपने काँपते होठों को संभाला और बहुत ही संयमित आवाज़ में कहा, “दिनेश जी, शादी के बाद इस घर को संभालना और अपना पूरा जीवन इस चौखट पर न्योछावर करना मेरी अपनी पसंद थी। मेरे बाबूजी ने मुझे एम.कॉम तक पढ़ाया था, अगर मैं चाहती तो किसी बैंक या कॉलेज में नौकरी कर सकती थी। लेकिन मैंने इस परिवार को चुना। पर क्या इस घर में मेरी हैसियत सिर्फ एक बिना वेतन वाली नौकरानी की है, जो सबकी ज़रूरतें पूरी होने के बाद बची-खुची ज़िंदगी जिए? क्या मेरा अपना कोई सम्मान, अपनी कोई भूख और अपनी कोई थकान नहीं है?”
नर्मदा जी भड़क उठीं, “बहू, बात का बतंगड़ मत बनाओ। बेटी क्या आ गई, तुम्हारी ज़ुबान बहुत चलने लगी है। ऐसा कौन सा तीरकमान चला दिया तुमने जो बाकी औरतें नहीं करतीं?”
सरिता ने सिर उठाकर अपनी सास को देखा, “माँ जी, मैं सिर्फ यह चाहती हूँ कि मेरी बेटी इस गलतफहमी में बड़ी न हो कि जो औरत घर संभालती है, उसकी अपनी कोई इज़्ज़त नहीं होती। ईंट-गारे से बना मकान दीवारों से बनता है, लेकिन उसे ‘घर’ एक औरत अपने प्यार, त्याग और खून-पसीने से बनाती है। जो लोग इस अदृश्य मेहनत को कभी महसूस नहीं कर पाते, उन्हें कोई क्या समझाए। और जब इंसान को यह बात समझ आती है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।”
इतना कहकर सरिता ने चुपचाप रुंधे गले से दो कौर खाए, थाली धोई और बिना एक शब्द बोले अपने कमरे में चली गई। माहौल में एक भारी कड़वाहट घुल चुकी थी। दिनेश बिना चाय पिए ही चुपचाप जूते पहनकर गोदाम के लिए निकल गए।
रात का समय हुआ। गोदाम से जब दिनेश लौटे, तो घर का माहौल बिल्कुल सामान्य लग रहा था। सरिता ने रोज़ की तरह सबको आदर से खाना परोसा, ससुर की दवाइयां निकालीं, सास के पैर दबाए और जब सब सो गए, तब वह रसोई समेटकर अपने कमरे में आई।
कमरे में आते ही उसने देखा कि दिनेश बिस्तर पर बैठे किसी गहरी सोच में डूबे थे। सरिता ने चुपचाप अपनी साड़ी का पल्लू संभाला और थके हुए कदमों से दीवार के सहारे अपना सिर टिकाकर आँखें मूँद लीं। उसकी पिंडलियों और कमर में असहनीय दर्द हो रहा था।
दिनेश ने उसे देखा। दिन में रिया की कही एक-एक बात उनके कानों में गूँज रही थी। दोपहर में जब वे गोदाम पर थे, तो रिया का एक सवाल उन्हें लगातार कचोट रहा था। रिया ने उनसे अकेले में कहा था, “पापा, अगर कल को मेरी शादी हो जाए, और आपका दामाद मुझे सिर्फ एक काम करने वाली के रूप में देखे, मेरी भूख और मेरे आत्मसम्मान की परवाह न करे, तो क्या आप बर्दाश्त कर पाएंगे? जिस तरह माँ पूरे घर के लिए हवा की तरह ज़रूरी हैं, क्या कभी आपने महसूस किया कि अगर वह एक दिन के लिए भी काम छोड़ दें, तो इस घर का क्या हाल होगा?”
दिनेश धीरे से उठे। वे सरिता के पास आए और बिना कुछ कहे, धीरे-धीरे उसके थके हुए कंधों और सिर को दबाने लगे।
सरिता हड़बड़ाकर एकदम सीधी हो गई। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। “ये… ये आप क्या कर रहे हैं? अगर माँ जी ने देख लिया तो अनर्थ हो जाएगा। वे कहेंगी कि बहू ने बेटे को वश में कर लिया है।”
दिनेश की आँखें गीली हो चुकी थीं। उन्होंने सरिता के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। “सरिता, मुझे माफ़ कर दो। आज रिया ने मेरी आँखों पर बंधी उस पुरुषवादी अहंकार की पट्टी को उतार फेंका है। हम मर्द बाहर की दुनिया में ज़रा सी मेहनत करके खुद को खुदा समझने लगते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि जिस सुकून के दम पर हम बाहर सीना तानकर चलते हैं, उस सुकून की नींव तुम जैसी औरतें अपने अरमानों को दबाकर रखती हैं। औरत का मोल क्या होता है, यह मूर्ख लोग तब समझते हैं जब वह चली जाती है। पर मैं उस कतार में खड़ा नहीं होना चाहता। तुम इस घर की नौकर नहीं, इस घर की आत्मा हो।”
सरिता की आँखों से खुशी और राहत के आँसू बह निकले। पिछले बीस सालों में पहली बार किसी ने उसकी थकान को समझा था, उसके वजूद को मान दिया था। दिनेश ने बड़े प्यार से उसके आँसू पोंछे और उसे बिस्तर पर सहारा देकर लिटाया।
कमरे के बाहर दरवाज़े की ओट में खड़ी रिया यह सब देख रही थी। उसके चेहरे पर एक गहरी, सुकून भरी मुस्कान खिल गई। उसने देखा कि आज उसकी माँ उस बड़े घर में अकेली नहीं थी; उसके आँसुओं को पोंछने और उसकी थकान को बाँटने के लिए उसके जीवनसाथी का मजबूत कंधा उसके साथ खड़ा था। रिया समझ गई कि बरसों पुरानी दकियानूसी सोच की ज़ंजीरें टूट चुकी हैं।
अगली सुबह जब नर्मदा जी ने चाय के लिए आवाज़ लगाई, तो रसोई से दिनेश खुद दो कप चाय बनाकर बाहर आए। उन्होंने एक कप अपनी माँ के हाथ में दिया और दूसरा कप सरिता के लिए कमरे में ले गए।
नर्मदा जी के टोकने से पहले ही दिनेश ने शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा, “माँ, आपके ज़माने में आपको जो दर्द सहना पड़ा, उसके लिए मैं कुछ नहीं कर सकता। लेकिन आज मैं अपनी पत्नी और अपनी आने वाली पीढ़ी को उस घुटन में नहीं जीने दूँगा। सरिता इस घर की रीढ़ है, और आज से हम सब उसके काम और उसके मान-सम्मान का उतना ही ख्याल रखेंगे जितना वो हमारा रखती है।”
नर्मदा जी ने अपने बेटे की आँखों में एक नया संकल्प देखा और वे निरुत्तर हो गईं। उस दिन उस घर के आँगन में केवल चाय की खुशबू नहीं फैली थी, बल्कि बराबरी, सम्मान और एक-दूसरे की कद्र करने का एक नया सवेरा हुआ था।
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