आईने का सच

 गरिमा ने अपनी आवाज को थोड़ा ऊँचा करते हुए कहा, “माँ जी, इसमें बेहूदगी कैसी? शादी के तीन साल हो गए मुझे इस घर में रहते हुए। अब मैं इस पुराने ढर्रे और संयुक्त परिवार की रोज-रोज की बंदिशों से तंग आ चुकी हूँ। सुबह से शाम तक बस परिवार की खिदमत करो, सबकी पसंद-नापसंद का ख्याल रखो। अपनी कोई निजी जिंदगी बची ही नहीं है। मैं एक पढ़ी-लिखी, आधुनिक लड़की हूँ। मुझे अपनी आजादी चाहिए,

शाम की ढलती रोशनी में देवकी जी के ड्राइंग रूम का माहौल बेहद भारी और तनावपूर्ण हो चुका था। सोफे के एक कोने पर उनकी बेटी रोहिणी मुँह फुलाए बैठी थी और आँखों से लगातार आँसू बहाने का स्वाँग रच रही थी। ठीक उसके सामने सिर झुकाए खड़ा था दामाद आकाश—एक सीधा-साधा, शांत और संस्कारी युवक। आकाश की झुकी हुई नजरें यह बयाँ कर रही थीं कि वह इस घर में कटघरे में खड़े किसी मुजरिम की तरह महसूस कर रहा था। रसोई से चाय की ट्रे लेकर बाहर आ रही देवकी जी की बहू, गरिमा, ने जैसे ही कमरे में कदम रखा, देवकी जी की तीखी और तल्ख आवाज उसके कानों में गूँज उठी।

देवकी जी अपने दामाद को उँगली दिखाते हुए कह रही थीं, “देखिए दामाद जी, सीधी और साफ बात यह है कि मेरी बेटी रोहिणी कोई आपकी खानदानी नौकरानी नहीं है जिसे हमने जिंदगी भर पाल-पोसकर इसलिए बड़ा किया कि वह आपके बूढ़े माँ-बाप की सेवा में अपनी जवानी खपा दे। हमने अपनी बेटी को बड़े नाजों से पाला है, शहर के सबसे अच्छे कॉलेज में पढ़ाया-लिखाया है। शादी का मतलब यह कतई नहीं होता कि लड़की अपनी सारी खुशियाँ, अपनी आजादी और अपने सपने भूलकर सिर्फ ससुराल के चूल्हे-चौके और सास-ससुर की तीमारदारी में घुटती रहे। अगर आपको मेरी बेटी के साथ अपनी गृहस्थी बसानी है, तो आपको अपने माता-पिता से अलग होकर शहर में दूसरा फ्लैट लेना ही पड़ेगा। जब तक आप अलग रहने का फैसला नहीं करते, तब तक रोहिणी इस घर से एक कदम बाहर नहीं रखेगी।”

आकाश ने काँपते होठों और नम आँखों के साथ अपनी सास की ओर देखा। उसके चेहरे पर बेबसी साफ झलक रही थी। उसने हाथ जोड़ते हुए बेहद धीमे स्वर में कहा, “माँ जी, आप यह कैसी बात कह रही हैं? मेरे पिताजी को गठिया की गंभीर बीमारी है, माँ से अब घर का काम ठीक से नहीं होता। मैं उनका इकलौता सहारा हूँ। इस ढलती उम्र में, जब उन्हें मेरी सबसे ज्यादा जरूरत है, मैं उन्हें बेसहारा छोड़कर अलग कैसे हो जाऊँ? रोहिणी को घर में कोई तकलीफ नहीं है। माँ-बाबूजी तो उसे अपनी बेटी जैसा मानते हैं। कभी-कभार घर की सामान्य जिम्मेदारियों को अगर वह बोझ समझ लेगी, तो परिवार कैसे चलेगा माँ जी? थोड़ा-बहुत समझौता तो हर रिश्ते में करना ही पड़ता है।”

“समझौता सिर्फ मेरी ही बेटी क्यों करे?” देवकी जी का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उन्होंने मेज पर हाथ पटकते हुए कहा, “सुन लीजिए आकाश बाबू, दुनिया बदल चुकी है। आज के जमाने में पति-पत्नी का रिश्ता ही सबसे बड़ा रिश्ता होता है। माँ-बाप तो अपनी जिंदगी जी चुके हैं, अब उनके पीछे आप अपनी और मेरी बेटी की जिंदगी बर्बाद नहीं कर सकते। आपका पहला फर्ज अपनी पत्नी की खुशियों का ख्याल रखना है। अगर आप अपने बूढ़े माँ-बाप का मोह नहीं छोड़ सकते, तो भूल जाइए कि रोहिणी कभी उस घर में वापस लौटेगी। फैसला आपके हाथ में है—या तो अपना परिवार चुनिए या फिर मेरी बेटी के साथ एक खुशहाल, आजाद जिंदगी।”

आकाश का दिल अंदर तक टूट गया। अपनी सगी सास के मुँह से ऐसी बेरहम और स्वार्थी बातें सुनकर उसकी आत्मा सिहर उठी। उसने एक उम्मीद भरी नजर अपनी पत्नी रोहिणी पर डाली, लेकिन रोहिणी ने नजरें फेर लीं। आकाश चुपचाप भरे मन से वहाँ से उठकर बिना कुछ कहे बाहर निकल गया।

रसोई के दरवाजे पर खड़ी गरिमा ने यह सारा तमाशा अपनी आँखों से देखा था। आकाश की आँखों से टपका वह एक कतरा आँसू गरिमा के दिल में तीर की तरह चुभ गया था। गरिमा सोचने लगी कि जिस माँ ने अपने बेटे प्रणव को इतने लाड़-प्यार से पाला है, वही माँ किसी दूसरे के बेटे को उसके बूढ़े माँ-बाप से अलग करने की इतनी घिनौनी साजिश कैसे रच सकती है? क्या रोहिणी के ससुर किसी के पिता नहीं थे? क्या उसकी सास किसी की माँ नहीं थी? अपनी बेटी का घर बसाने के नाम पर एक हँसते-खेलते परिवार को उजाड़ने की यह जिद देवकी जी के दोहरे चरित्र को उजागर कर रही थी।

उसी रात जब गरिमा के पति प्रणव अपने दफ्तर से थके-हारे घर लौटे, तो देवकी जी ने बड़े गर्व से उन्हें बताया कि कैसे उन्होंने आज दामाद आकाश की हेकड़ी निकाली और अपनी बेटी के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए उसे अलग फ्लैट लेने पर मजबूर कर दिया। प्रणव अपनी माँ की बातें सुनकर सन्न रह गया, लेकिन संस्कारों के कारण वह माँ के सामने तीखी प्रतिक्रिया नहीं दे सका।

कमरे में आकर जब प्रणव ने अपना माथा पकड़ लिया, तब गरिमा ने उसके पास आकर बड़े ही संजीदा लहजे में कहा, “प्रणव, आज जो कुछ भी इस घर में हुआ, क्या वह सही था? क्या माँ जी जो आकाश जी के साथ कर रही हैं, वह एक न्यायसंगत बात है?”

प्रणव ने गहरी साँस लेते हुए कहा, “बिल्कुल गलत है गरिमा। मैं आकाश को अच्छी तरह जानता हूँ। वह बहुत ही नेक इंसान है और अपने परिवार से बेहद प्यार करता है। रोहिणी की छोटी-छोटी बातों को तूल देकर माँ ने आकाश के सामने जो शर्त रखी है, वह किसी भी बेटे के कलेजे को छलनी कर देगी। लेकिन मैं क्या करूँ? माँ का मिजाज तुम जानती हो। अगर मैं उन्हें समझाने जाऊँगा, तो वे रोना-धोना शुरू कर देंगी और कहेंगी कि बेटा भी अपनी बहन के सुख से जलता है।”

गरिमा ने प्रणव का हाथ अपने हाथ में लिया और उसकी आँखों में देखते हुए बोली, “प्रणव, जब कोई इंसान अंधा होकर दूसरों के घर में आग लगाने चले, तो उसे उपदेश देने से कोई फायदा नहीं होता। उसे उस आग की तपिश का अहसास तभी होता है जब चिंगारी उसके अपने आँगन में गिरती है। माँ जी आज इसलिए इतना इतरा रही हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि उनका बेटा, उनकी बहू और उनका घर तो पूरी तरह सुरक्षित है। उन्हें दूसरों के बेटों का दर्द महसूस नहीं हो रहा क्योंकि उनका अपना बेटा उनकी आँखों के सामने है। हमें माँ जी को आईना दिखाना होगा, ताकि उन्हें समझ आए कि जब एक बेटा अपनी माँ से दूर होता है, तो उस माँ के दिल पर क्या बीतती है।”

प्रणव ने चौंककर पूछा, “गरिमा, तुम्हारा मतलब क्या है? तुम क्या करने की सोच रही हो?”

गरिमा ने मंद सी मुस्कान के साथ अपनी योजना प्रणव के कान में कही। पहले तो प्रणव झिझका, उसे लगा कि यह कदम बहुत कठोर हो सकता है, लेकिन फिर यह सोचकर कि यह कड़वी दवा उसकी माँ के अंधे स्वार्थ को ठीक करने और उसकी बहन रोहिणी का उजड़ता हुआ संसार बचाने के लिए बेहद जरूरी है, वह गरिमा के साथ इस नाटक में शामिल होने के लिए तैयार हो गया।

अगले दिन की शाम बड़ी शांत थी। रोहिणी सोफे पर बैठकर अपने मोबाइल में मग्न थी और देवकी जी अपने लिए तुलसी की चाय बना रही थीं। तभी अचानक कमरे से भारी-भरकम सूटकेस घसीटने की आवाज आई। देवकी जी ने चौंककर रसोई से बाहर झाँका, तो देखा कि गरिमा दो बड़े-बड़े ट्रॉली बैग ड्राइंग रूम के बीचों-बीच लाकर रख रही थी। उसके पीछे-पीछे प्रणव भी अपने हाथ में कुछ जरूरी फाइलों का बैग लिए बेहद गंभीर चेहरे के साथ बाहर आया।

देवकी जी ने घबराते हुए पूछा, “अरे! यह सब क्या है गरिमा? ये सूटकेस बाहर क्यों निकाले हैं? क्या तुम दोनों कहीं घूमने जा रहे हो? प्रणव, तूने तो मुझे कुछ बताया नहीं बेटा?”

गरिमा ने बिना किसी घबराहट के, अपनी साड़ी का पल्लू ठीक करते हुए बड़े ही सपाट और ठंडे स्वर में कहा, “नहीं माँ जी, हम कहीं घूमने नहीं जा रहे हैं। दरअसल, आज से हम इस घर को छोड़कर जा रहे हैं। हमने शहर के नए पॉश इलाके में एक बहुत ही खूबसूरत टू-बीएचके फ्लैट किराए पर ले लिया है। आज शाम ही हमारा सामान वहाँ शिफ्ट होना है।”

देवकी जी के हाथ से चाय की प्याली छूटते-छूटते बची। उनके चेहरे का रंग पल भर में उड़ गया। उन्हें अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ। वे लड़खड़ाते कदमों से आगे बढ़ीं और चीखते हुए बोलीं, “यह क्या बकवास कर रही है गरिमा? दिमाग तो ठिकाने है तुम्हारा? तुम मेरा घर छोड़कर जाओगी? और प्रणव, तू चुपचाप खड़ा क्या तमाशा देख रहा है? अपनी इस पत्नी को समझाता क्यों नहीं? यह क्या बेहूदगी फैला रखी है इसने?”

गरिमा ने अपनी आवाज को थोड़ा ऊँचा करते हुए कहा, “माँ जी, इसमें बेहूदगी कैसी? शादी के तीन साल हो गए मुझे इस घर में रहते हुए। अब मैं इस पुराने ढर्रे और संयुक्त परिवार की रोज-रोज की बंदिशों से तंग आ चुकी हूँ। सुबह से शाम तक बस परिवार की खिदमत करो, सबकी पसंद-नापसंद का ख्याल रखो। अपनी कोई निजी जिंदगी बची ही नहीं है। मैं एक पढ़ी-लिखी, आधुनिक लड़की हूँ। मुझे अपनी आजादी चाहिए, अपनी निजता चाहिए। मुझे अपनी मर्जी से उठना है, अपनी मर्जी से घूमना है। मैं कब तक इस घर में सबकी सेवा करती रहूँगी? प्रणव मेरे पति हैं और उनका पहला फर्ज मुझे खुश रखना है। इसलिए मैंने फैसला कर लिया है कि हम अब अलग ही रहेंगे।”

देवकी जी का कलेजा धक से रह गया। उनका सिर चकराने लगा। उन्होंने अपनी बहू की तरफ गुस्से और अविश्वास से देखते हुए कहा, “तेरी इतनी हिम्मत! तू मेरे ही घर में रहकर मेरे ही बेटे को मुझसे छीनने की बात कर रही है? अरे कुलच्छनी, क्या इसी दिन के लिए मैंने अपनी कोख से प्रणव को जन्म दिया था? क्या इसीलिए अपनी हड्डियों का पानी बनाकर इसे बड़ा किया था कि एक दिन कोई पराए घर की लड़की आएगी और मेरे बेटे को मेरी आँखों के सामने से उड़ा ले जाएगी? प्रणव मेरा इकलौता बेटा है, मेरे बुढ़ापे की लाठी है। तू उसे मुझसे अलग करने की सोच भी कैसे सकती है?”

तभी तक खामोश खड़ा प्रणव आगे आया। उसने अपनी माँ की आँखों में आँखें डालकर, बिना किसी झिझक के वही शब्द दोहराना शुरू किया जो कल देवकी जी ने आकाश से कहे थे। प्रणव ने बेहद संयत लेकिन कठोर लहजे में कहा, “माँ, आप गरिमा पर क्यों चिल्ला रही हैं? गरिमा बिल्कुल सच तो कह रही है। आखिर कब तक हम इस पुराने रीति-रिवाजों और दुनियादारी के बोझ तले दबे रहेंगे? मेरी भी तो कोई निजी जिंदगी है। मेरी कमाई का एक बड़ा हिस्सा इस घर के खर्चों और दवाइयों में चला जाता है। अगर मैं अलग रहूँगा तो कुछ बचत कर पाऊँगा, अपनी पत्नी को एक आलीशान जिंदगी दे पाऊँगा। आखिर शादी के बाद पति-पत्नी का रिश्ता ही तो सबसे ऊपर होता है, बाकी रिश्ते तो पीछे छूट ही जाते हैं ना माँ?”

प्रणव के मुँह से ये शब्द सुनकर देवकी जी को लगा जैसे किसी ने उनके सीने पर जलता हुआ अंगारा रख दिया हो। उनकी आँखों से आँसुओं की धार बह निकली। वे छाती पीटते हुए सोफे पर गिर पड़ीं और बिलखने लगीं, “हाय राम! यह मैं क्या सुन रही हूँ? मेरा श्रवण कुमार जैसा बेटा, जिसने आज तक कभी मुझसे ऊँची आवाज में बात नहीं की, आज वह अपनी माँ को बोझ बता रहा है? बेटा, तू मुझे इस उम्र में किसके सहारे छोड़कर जाएगा? तेरे बाबूजी के जाने के बाद तू ही तो मेरा सब कुछ था। अगर तू चला गया, तो मैं इस सूने घर में घुट-घुटकर मर जाऊँगी। मेरे दूध का कर्ज तो मत चुका, पर मुझे जीते जी मत मार मेरे बच्चे!”

प्रणव ने अपनी नजरें कठोर बनाए रखीं, यद्यपि अंदर से उसका दिल भी अपनी माँ के आँसू देखकर फटा जा रहा था। उसने आगे बढ़कर कहा, “माँ, आप इतना नाटक क्यों कर रही हैं? आप तो पढ़ी-लिखी और समझदार हैं। कल ही तो आप इसी सोफे पर बैठकर जीजाजी को समझा रही थीं कि माँ-बाप अपनी जिंदगी जी चुके होते हैं, अब बच्चों को उनके हाल पर छोड़ देना चाहिए। आपने ही तो कहा था कि पति का पहला धर्म अपनी पत्नी की खुशियाँ पूरी करना है, न कि माँ-बाप के नखरे उठाना। जब जीजाजी अपने बीमार माता-पिता को अकेला छोड़कर रोहिणी के लिए अलग घर ले सकते हैं, तो मैं अपनी पत्नी की खुशी के लिए आपको अकेला क्यों नहीं छोड़ सकता? माँ, जो नियम बेटी के ससुराल के लिए सही है, वही नियम आपके अपने घर के लिए गलत कैसे हो सकता है? क्या केवल आपकी बेटी को ही आजादी का हक है, मेरी पत्नी को नहीं? और क्या सिर्फ दामाद का ही फर्ज बनता है जोरू का गुलाम बनना, मेरा नहीं?”

प्रणव का हर एक शब्द देवकी जी के अंतर्मन पर हथौड़े की तरह चोट कर रहा था। उन्हें ऐसा लगा जैसे कल के उनके अपने ही शब्द आज खंजर बनकर उनके अपने सीने में उतर रहे हों। उनके कान सुन्न हो गए। कल जब वे आकाश को बेबस कर रही थीं, तब उन्हें अपनी बेटी का सुख दिख रहा था; लेकिन आज जब वही स्थिति उनके अपने सामने आ खड़ी हुई, तो उन्हें समझ आया कि एक बेटे के छिन जाने का खौफ क्या होता है। एक माँ के लिए अपने जीते-जी अपने बेटे से अलग होने की कल्पना ही कितनी जानलेवा होती है।

कमरे के एक कोने में खड़ी रोहिणी पत्थर की मूरत बनी यह सब देख रही थी। अपनी माँ को जमीन पर बैठकर फफक-फफक कर रोते देख, और अपने भाई के तर्कों को सुनकर उसका दिल भी बुरी तरह काँप उठा। उसने सोचा कि यदि आज गरिमा भाभी सचमुच उसके भाई को लेकर अलग हो गईं, तो उसकी माँ की क्या हालत होगी? माँ तो पल-पल तिल-तिल कर मर जाएँगी। और अचानक, रोहिणी की आँखों के सामने आकाश के बूढ़े माँ-बाप का चेहरा घूम गया। अगर आकाश भी अपनी माँ को छोड़कर उसके साथ अलग रहने चला आता, तो आकाश की माँ की हालत भी तो बिल्कुल ऐसी ही होती जैसी आज उसकी अपनी माँ की हो रही थी! क्या वह किसी दूसरी माँ का कलेजा चीरकर अपनी खुशियों का महल बना सकती थी?

देवकी जी ने घुटनों के बल बैठकर गरिमा के हाथ पकड़ लिए। उनके हाथ काँप रहे थे और आवाज रुँध चुकी थी। वे गिड़गिड़ाते हुए बोलीं, “बहू… मुझे माफ कर दे बहू! मेरी मति मारी गई थी। मैं अंधी हो गई थी अपने झूठे अहंकार और बेटी के बेजा लाड़ में। मुझे आज समझ आ गया कि जिस दर्द से मैं अभी तड़प रही हूँ, वही दर्द मैंने कल आकाश और उसके परिवार को देने की कोशिश की थी। मैं एक माँ होकर दूसरी माँ की ममता की दुश्मन बन बैठी थी। प्रणव, बेटा… मुझे छोड़कर मत जा। मैं हाथ जोड़ती हूँ तुम दोनों के आगे। मैं आज ही… अभी इसी वक्त आकाश को फोन करती हूँ और उससे अपने कहे हर एक शब्द की माफी माँगती हूँ। मैं अपनी बेटी को समझाऊँगी कि उसका असली सुख अपने ससुराल को अपना समझने में है, उसे तोड़ने में नहीं। बस तुम लोग इस घर को छोड़कर मत जाओ!”

माँ की यह दुर्दशा देखकर गरिमा और प्रणव की आँखों में भी नमी तैर गई। गरिमा तुरंत घुटनों के बल बैठ गई और उसने देवकी जी को सहारा देकर उठाया और अपने सीने से लगा लिया। गरिमा ने अपनी सगी माँ की तरह देवकी जी के आँसू पोंछते हुए कहा, “माँ जी, शांत हो जाइए। हम कहीं नहीं जा रहे हैं। भला अपने ही माँ-बाप की छाँव छोड़कर कोई खुश रह सकता है क्या? यह सब तो बस हमने इसलिए किया ताकि आप उस दर्द को महसूस कर सकें जो कल आकाश जी महसूस कर रहे थे। परिवार कभी एक-दूसरे से अलग होकर नहीं, बल्कि एक-दूसरे का संबल बनकर चलता है।”

देवकी जी ने हैरान होकर अपने बेटे और बहू को देखा। प्रणव ने धीरे से मुस्कुराते हुए कहा, “हाँ माँ, गरिमा ने यह नाटक केवल इसलिए किया ताकि हमारी रोहिणी का घर टूटने से बच जाए और आप उस पाप की भागीदार बनने से बच जाएँ जो अनजाने में आप करने जा रही थीं।”

उसी पल रोहिणी दौड़कर आई और अपनी माँ और भाभी के गले लगकर फूट-फूटकर रोने लगी। उसने रोते हुए कहा, “भाभी, मुझे माफ कर दीजिए। माँ के साथ-साथ सबसे बड़ी गुनहगार तो मैं थी। मैं अपनी छोटी-मोटी जिम्मेदारियों से भागने के लिए आकाश पर अलग होने का दबाव बना रही थी। मैंने कभी सोचा ही नहीं था कि परिवार से अलग होने की कीमत इतनी भयानक होती है। आज अगर आपने मुझे यह आईना न दिखाया होता, तो शायद मैं अपने ही हाथों अपनी गृहस्थी की चिता सजा चुकी होती। मैं अभी आकाश को फोन करती हूँ और उनसे माफी माँगकर अपने घर वापस लौटती हूँ। अब मैं कभी अपने ससुराल को पराया नहीं समझूँगी।”

देवकी जी ने अपनी दोनों बेटियों—अपनी कोख से जन्मी रोहिणी और दूसरे घर से आई गरिमा—को अपने दोनों बाजुओं में समेट लिया। आज उनके घर से स्वार्थ, अहंकार और दोहरे मापदंडों का अँधेरा छँट चुका था और समझदारी, त्याग तथा सच्चे पारिवारिक प्रेम की एक नई सुबह की शुरुआत हो चुकी थी। उन्होंने गरिमा के सिर पर हाथ फेरते हुए मन ही मन ईश्वर का धन्यवाद किया कि उनके घर को बिखरने से बचाने वाली एक ऐसी समझदार बहू उनके आँगन में मौजूद थी जिसने कड़वी दवाई देकर पूरे परिवार की आत्मा का इलाज कर दिया था।

पाठकों से विचार-विमर्श:

अक्सर हमारे समाज में यह देखा जाता है कि लोग अपनी बेटी के लिए तो ऐसा ससुराल चाहते हैं जहाँ सास-ससुर का कोई दखल न हो और दामाद पूरी तरह अलग रहे, लेकिन जब बात अपने बेटे और बहू की आती है, तो वे चाहते हैं कि बहू चौबीसों घंटे सेवा करे और बेटा कभी नजरों से दूर न हो। क्या आपको लगता है कि समाज की यह दोहरी मानसिकता ही आज टूटते हुए परिवारों और बढ़ते हुए वृद्धाश्रमों की सबसे बड़ी वजह है? इस संवेदनशील मुद्दे पर आपकी क्या राय है, हमें नीचे कमेंट करके जरूर बताइए।

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