सुमित्रा के अंतिम संस्कार की तैयारी चल रही थी। घर में सभी इधर-उधर तैयारी में लगे हुए थे । लेकिन बेटे मनीष की आंखों में आंसू रोकने का नाम नहीं ले रहे थे । बेटा भी बेइंतहा दर्द से तड़प रहा था । और मन ही मन सोचा रहा था काश मां की बात मान लेता । लोग तो मां-बाप के बुढ़ापे में सब कुछ इच्छाएं जरूर पूरी कर देते हैं
कि उन्होंने पता नहीं कब तक वह हमारे पास रहेंगे। लेकिन क्या किया मैंने माँ की एक इच्छा भी पूरी न कर पाया। इतना पैसा के पीछे अंधा हो गया था मैं। लेकिन क्या पता था मां की जिस बात को मैं अगले साल के लिए टाल रहा था वह अगला साल माँ देख ही नहीं पाएगी इस बुढ़ापे में ।
उम्र हो चुकी थी मां की 7 5 साल की हो रही थी पापा के कुछ समय पहले गुजर जाने से वह और ज्यादा ही टूट गई थी। पापा मम्मी का इतना ख्याल रखते थे । पापा के जाने के बाद मम्मी दिन पर दिन कमजोर होती जा रही थी । किसी से ज्यादा बात नहीं करती थी बस चुपचाप से रहती थी और शांत होकर फिर अपने कमरे में बैठी रहती थी।
सुमित्रा और वीरेंद्र दोनों पति पत्नी अपनी जिंदगी में खुश थे। उनके तीन बच्चे थे दो बेटियां और एक बेटा मनीष। वीरेंद्र जी पेशे से सरकारी स्कूल में अध्यापक थे। सुमित्रा जी बहुत ही गंभीर और सुघड़ महिला थी। गृहस्थी को अच्छे से संभाला और बच्चों की अच्छी परवरिश की है उसके बाद उनकी शादी कर दी है ।
मनीष घर में सबसे छोटा था उसको भी पढ़ाया लिखाया और वह भी बैंक में क्लर्क की नौकरी करता था । मनीष की शादी नहीं हुई थी और वीरेंद्र जी रिटायर हो गए थे मनीष की शादी का बहुत उल्लास था और मनीष की शादी भी करके वह निश्चित हो जाना चाहते थे । लड़की की खोज भी शुरू हो गई और आखिर में निधि सबको घर की बहू बनने के लिए पसंद आ गई।
मनीष और नीधि की शादी हो गई और सुमित्रा जी और वीरेंद्र जी निश्चित हो गए चलो अब आराम की जिंदगी जिएंगे सारी जिम्मेदारियां पूरी हो गई है। अब घर बैठकर मनीष के बच्चों के संग खेलेंगे। अभी मनीष की शादी के पांच महीने हुए थे कि एक दिन सुबह में वीरेन्द्र जी को हृदयाघात आया और उनका अस्पताल ले जाया गया।
लेकिन बचाया न जा सका डॉक्टर ने कहा कि लाने में देर हो गई हृदयाघात करीब सुबह के चार-पांच के बीच में आया होगा उसे समय घर में सब सो रहे थे सुबह जब सब उठे तब पता चला । अस्पताल ले जाते ले जाते तब तक बहुत देर हो चुकी थी वीरेंद्र जी की मौत हो गई। सुमित्रा जी की तो जैसे दुनिया उजड़ गई दोनों एक दूसरे के प्रति आदर सम्मान और जिम्मेदारी थी।
वीरेंद्र जी की जाने के बाद सुमित्रा जी बहुत अकेली हो गई थी। तो घर का थोड़ा बहुत काम करती थी और फिर अपने पूजा पाठ में समय व्यतीत करती थी।लेकिन मन का कोना कहीं खाली हो गया था। अब घर की सारी जिम्मेदारी मनीष उठाने लगा । पापा की पेंशन लाता तो अपने पास रख लेता ।
क दिन सुमित्रा जी ने पूछ लिया बेटा पापा की पेंशन निकाल लाओ हां निकाल लेता हूँ माँ अब पेंशन मेरे पास ही रहती है तुम्हें क्या जरूरत है तुम तो घर पर रहती हो । सारी ज़रूरतें पूरी होती है तुम्हारी । सुमित्रा जी चुप हो जाती।पति की चिंता में घुटते घुटते सुमित्रा जी भी हृदय रोग की मरीज बन गई थी। डॉक्टर को दिखाया तो डाकटर ने कहा कि मनीष जी मां को कोई सदमा बैठ गया है ।
अब उम्र हो रही है आपकी मां की ध्यान रखिए अब कुछ इच्छा हो तो उनकी पूरी करिए, बस इस उम्र में मां-बाप को और क्या चाहिए। सुमित्रा जी मन लगाने की कोशिश करती लेकिन उनकी उदासी उनके पीछे नहीं छोड़ रही थी अब बच्चों को कहां फुर्सत है कि माँ बाप के पास बैठे।इस बीच निधि प्रेग्नेंट हो गई।सुमित्रा जी खुश हो गई चलो अब घर पर उनके एक मेहमान आने वाला है मन लग जाएगा।
सुमित्रा जी के दो भाई थे ।सुमित्रा मायके नहीं जा पाती थी क्योंकि स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता था और अब उम्र भी हो चली थी सफर करना आसान नहीं था। दोनों भाई छोटे थे सुमित्रा जी से।इसी बीच राखी का त्यौहार आ रहा था ,इस बार सुमित्रा का मन अपने दोनों भाइयों से मिलने का कर रहा था एक बार अपनों के साथ समय बिताने का मन कर रहा था दोनों ननदो को भी बुला लूगीं।सबसे मिलने का मन कर रहा था ।
अपने घर में बुला लिया जाए 2 दिन की बहुत अच्छा लगेगा सबसे मिलना जुलना हो जाएगा बहुत दिन हो गया सबसे मिले हुए सुबह मनीष से बात करूंगी सोचकर वह रात कोसो गई।सुबह मनीष चाय पी रहा था सुमित्रा ने कहा मनीष हां बेटा ,मेरी एक इच्छा है मैं चाहती तू पूरी कर दे पता नहीं अब कब इस दुनिया से जाना हो जाए। क्यों माँ तबीयत ठीक नहीं है क्या हां ठीक है लेकिन तेरे मामा लोगों से मिलने का बहुत मन कर रहा है
मैंने सोचा है बेटा क्यों ना इस बार राखी पर दो दिन को सब कोई को यहाँ बुला ले एक आखरी बार। आखिरी बार और दोनों बुआ को भी बुला ले । क्या माँ आपको बैठे-बैठे जाने क्या सूझता रहता है ,सब मिलाकर आठ लोग हो जाएंगे सब कैसे संभाले की निधि इतना सारा काम। नहीं माँ यह नहीं नहीं हो पाएगा,
किसी एक मामा को बुलाना हो तो अकेले बुला लो बस अरे मनीष सुन तो निधि का कुछ नहीं करना पड़ेगा वह जो नजदीक में मंदिर है ना उसके बगल में धर्मशाला है चार कमरे हैं और एक हाल है वही ले लेते हैं 2 दिन के लिए और यह खाना बनाने वाली को और एक सफाई वाली को लगा देंगे बस सब काम हो जाएगा।
कैसी बात कर रही हो माँ दुनिया कहाँ की कहाँ चली गई और आप,,,,,। अब कोई धर्मशाला मे नही रहना चाहता, अब सबको बढियां होटल का कमरा और बढिया इंतजाम चाहिए। नही बेटा तेरे मामा वगैरह ऐसे नही है वो तो सीधे साधे सिपंलसे है कहीं भी रह लेगें। और बस दो दिन की ही तो बात है। और खर्चा, खर्चा कौन उठाएगा अरे वो तेरे पापा की पेंशन आती है न, मै तो उसे लेती नहीं हू आखिर ये पेंशन अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए ही तो होती है न। माँ तुम नहीं लेती तो क्या सब आपके ऊपर ही तो खर्च हो जाता है न। डाक्टरों की फीस, दवाईयां। अरे सब पैसा थोड़ी न खर्च हो जाता है, तीन महीने मे एक बार डाक्टर को दिखाना रहता है हां इस बार थोड़ी जल्दी जाना पड़ा बस दवाइयाँ तो बस वही चलती रहती है। अच्छा अच्छा देखूंगा कहकर मनीष ने बात को टाल दिया।
रात को निधि ने मनीष से कहा यह माँ को बैठे-बैठे क्या फालतू काम सूझता रहता है इतने लोगों का बुलाने का, कौन संभालेगा यह सब आप तो साफ मना कर दो। मनीष बोला हां तुम ठीक कह रही हो कौन बवाल मोल लेगा और सुबह-सुबह मनीष ने मां से साफ मना कर दिया की मां यह सब नहीं हो पाएगा सुमित्रा जी अपना सा मुंह लेकर रह गई।
राखी का त्योहार आया और चला गया ।। राखी के दो दिन बाद सुमित्रा जी ने शाम को खाने को मना कर दिया और लेट गई। सुबह जब उठकर बाहर नहीं आई तो मनीष जगाने गया तो देखा माँ बेसूध पड़ी है, उनके प्राण पखेरू उड़ गए हैं। मनीष माँ माँ चिल्लाता रहा पर वह ना उठी डॉक्टर को बुलाया तो डॉक्टर ने बताया कि मां को तो देहांत हो चुका है 4 घंटे पहले।
अब मनीष फूट फूट कर रो पड़ा अपने आप को माफ नहीं कर पा रहा था बेइंतहा दर्द से बोझिल हुआ जा रहा था। क्यों नहीं मां के लिए एक आखिरी इच्छा पूरी कर दी कितनी उम्मीद से मुझसे कह रही थी और मैं क्या किया मैंने साफ-साफ मना कर दिया अपने इस पछतावे से वह बाहर नहीं आ पा रहा था। वह बेमन से ही माँ की अंतिम यात्रा की तैयारी कर रहा था। सुमित्रा जी का पार्थिव शरीर पंचतंत्र में विलय हो गया लेकिन दर्द का सलाम मनीष के मन में हमेशा के लिए छोड़ दिया तो शायद उम्र भर उसके मन को सालर रहेगा।
पाठकों उम्र के आखिरी पड़ाव पर यदि मा बाप कोई इच्छा रखते है तो उन्हें पूरी करने की कोशिश अवश्य करें। क्योंकि पता नहीं उनकी कितनी उम्र बची है। फिर पछतावा आपको जीने नही देगा इसलिए माँ बाप की इच्छाओं का मान जरूर करे।
मंजू ओमर
झांसी उत्तर प्रदेश
10 सिंतबर