ममता का स्पर्श

“पगली, किसने कह दिया कि तेरा मायका लुट गया? क्या मायका सिर्फ मां-बाप के जीवित रहने तक ही होता है? सुन बिटिया, मां-बाप शरीर से चले जाते हैं, पर उनका आशीष और उनकी आत्मा इसी चौखट, इसी आंगन और इसी मिट्टी में रची-बसी रहती है। तूने सोचा कि भाभी ने कमरा बदल दिया तो अपनापन खत्म हो गया? अरे, पीढ़ी बदलती है तो घर की व्यवस्था भी बदलती है। पर क्या तेरे भाई का प्रेम कम हुआ? क्या आलोक का तेरे प्रति आदर घट गया?”

गांव की पगडंडी से होते हुए जब टैक्सी हवेलीनुमा पुराने मकान के सामने आकर रुकी, तो संध्या का दिल किसी गहरे कुएं की तरह खाली महसूस हो रहा था। धूल भरी हवा में मिट्टी की वही सोंधी महक थी, जो पंद्रह साल पहले हुआ करती थी। भतीजे आलोक के ब्याह का न्योता लेकर जब छोटा भाई माधव शहर पहुंचा था, तो उसने हाथ जोड़कर कहा था, “जीजी, अगर तुम नहीं आई तो मंडप अधूरा रहेगा।” भाई का मान रखने और भतीजे के सिर पर अक्षत छिड़कने के लिए वह आ तो गई, मगर भीतर से मन बिल्कुल बुझा हुआ था। सच तो यह था कि सात साल पहले जब अम्मा इस दुनिया से गईं और उसके दो साल बाद बाबूजी की सांसों की डोर टूटी, तो संध्या के लिए मायका शब्द के मायने ही खत्म हो गए थे। मायका तो माँ के आंचल और बाबूजी की छड़ी की टेक से बनता है, उनके बिना तो यह सिर्फ ईंट-पत्थरों की एक दीवार भर थी।

गाड़ी का दरवाजा खुलते ही ढोलक की थाप और मंगल गीतों की गूंज कानों में पड़ी। आंगन में रिश्तेदारों का तांता लगा हुआ था। जैसे ही संध्या ने गाड़ी से पैर नीचे रखा, भाभी कौशल्या और भाई माधव लपक कर आगे आए।

“अरे जीजी! आ गईं आप… कितने बरसों का वनवास काट कर लौटी हो!” माधव ने झुककर संध्या के पैर छुए और सामान ड्राइवर से उतारने लगा।

भाभी ने गले लगाते हुए कहा, “दीदी, आपके बिना तो घर सूना लग रहा था। इतनी देर कर दी आने में?”

तभी दूल्हा बना आलोक और उसकी छोटी बहन पूजा दौड़ते हुए आए। आलोक ने संध्या के दोनों हाथ थाम लिए और शिकायतों का पिटारा खोल दिया, “बुआ, अब आए हो आप? जब मेरी नौकरी लगी तब नहीं आईं, जब सगाई हुई तब भी नहीं। अगर मेरी शादी में भी न आतीं, तो मैं सच में आपसे कभी बात नहीं करता। क्या आपको अपने इस भतीजे की जरा भी याद नहीं आती?”

संध्या ने चेहरे पर एक फीकी सी मुस्कान ओढ़ ली और आलोक के सिर पर हाथ फेर दिया। उसके होंठ हिले जरूर, पर आवाज गले में ही घुट कर रह गई। आलोक और पूजा उससे लगातार सवाल पूछे जा रहे थे, शादी की तैयारियों के किस्से सुना रहे थे, लेकिन संध्या की नजरें उन चेहरों पर नहीं थीं। उसकी आंखें तो उस मुख्य दरवाजे की चौखट को ताक रही थीं।

उसे लग रहा था कि अभी अंदर से सफेद सूती साड़ी का पल्लू कमर में खोंसे, पैरों में चांदी की बिछिया छनकाती अम्मा हांफती हुई बाहर आएंगी। आते ही कहेंगी, “आ गई मेरी लाडो! कितनी दुबली हो गई है, ससुराल में कोई ठीक से ख्याल नहीं रखता क्या?” और फिर बाबूजी दालान के तख्त से चश्मा उतारकर बोलेंगे, “अरे सुनती हो, बिटिया धूप में सफर करके आई है, पहले उसे शिकंजी तो पिलाओ, डांटना-डपटना बाद में करना।”

पर वहां कोई नहीं था। सिर्फ दीवारों पर ताजा चूने की सफेदी थी और कानों में बजता शोर। संध्या को अचानक ऐसा लगा जैसे वह किसी मेले में खो गई हो। सब अपने थे, सब मुस्कुरा रहे थे, फिर भी भीतर से हर कोई बेगाना लग रहा था। यह वही घर था जहां उसने गुड़ियों के ब्याह रचाए थे, जहां की दीवारों पर कभी उसने कोयले से लकीरें खींची थीं, पर आज उस जमीन पर पैर रखते हुए उसके कदम झिझक रहे थे।

माधव ने शायद अपनी बहन की आंखों में तैरते उस खालीपन को भांप लिया। उसने तुरंत बच्चों को डांटते हुए कहा, “अरे तुम लोग जीजी को दरवाजे पर ही घेरे रहोगे क्या? इतनी दूर के सफर से आई हैं, थक गई होंगी। चलो, भीतर ले चलो इन्हें।”

सब लोग हंसते-बोलते सामान उठाकर भीतर आंगन की तरफ बढ़ गए। संध्या भारी मन से उनके पीछे-पीछे चलने लगी। उसके कदम यंत्रवत उठ रहे थे। आंगन पार करते ही दाईं ओर वह बड़ा कमरा पड़ा, जहां कभी अम्मा का बड़ा सा संदूक और बाबूजी का नक्काशीदार पलंग हुआ करता था। बचपन में जब भी वह ससुराल से आती, अपना भारी बैग दरवाजे पर ही पटक कर सीधे अम्मा की गोद में सिर रखकर पसर जाती थी।

संध्या के पैर अपने आप उस कमरे की तरफ मुड़ गए। कमरे का पर्दा हटाकर जैसे ही उसने कदम अंदर रखना चाहा, पूजा ने पीछे से उसका हाथ पकड़ लिया।

“अरे बुआ, उधर कहां जा रही हैं? वह कमरा तो अब भैया और भाभी के लिए सजाया गया है, नई दुल्हन वहीं रुकेगी। आपका कमरा तो ऊपर पहली मंजिल पर मेरे साथ है। मैंने आपका सारा सामान वहीं रखवा दिया है। आप पूरे दस दिन मेरे साथ ही रहेंगी, खूब बातें करेंगे!” पूजा चहकते हुए बोली।

संध्या का उठता हुआ कदम हवा में ही ठिठक गया। कमरे के भीतर नजर डाली तो वहां न अम्मा का संदूक था, न बाबूजी की वह पुरानी आरामकुर्सी। वहां एक आधुनिक डबल बेड, नया शीशा और दीवार पर फैंसी वॉलपेपर लगा था। उस कमरे से अम्मा की वह जानी-पहचानी इत्र और जड़ी-बूटियों की गंध पूरी तरह मिट चुकी थी। संध्या को लगा जैसे किसी ने उसकी छाती पर भारी पत्थर रख दिया हो। आंखों में आंसुओं का एक सैलाब उमड़ पड़ा। उसने बड़ी मुश्किल से पलकें झपकाकर उन आंसुओं को भीतर धकेला और बिना कुछ कहे पूजा के पीछे ऊपर चली गई।

कमरे में पहुंचकर उसने हाथ-मुंह धोया, कपड़े बदले, पर दिल का घमासान शांत नहीं हो रहा था। घर में चारों तरफ शहनाई की धुन और हंसी-ठिठोली की आवाजें आ रही थीं, जो उसके अकेलेपन को और गहरा कर रही थीं। उसे लगा कि अगर वह थोड़ी देर और यहां रुकी, तो सबके सामने रो पड़ेगी।

संध्या दबे पांव सीढ़ियों से नीचे उतरी। उसने देखा कि सब लोग रसोई और दालान में शादी के लेन-देन के सामान की गिनती में व्यस्त थे। किसी का ध्यान उसकी तरफ नहीं था। वह चुपके से पिछले दरवाजे की सांकल खोलकर घर के पिछवाड़े निकल गई।

पिछवाड़े में आते ही एक ठंडी, जानी-पहचानी छांव ने उसका स्वागत किया। सामने वही पुराना, विशाल बरगद और उसके पास लगा अमरूद का पेड़ अपनी शाखाएं फैलाए खड़ा था। अमरूद के उस तने को देखकर संध्या के भीतर का बांध टूट गया। यह वही पेड़ था जिसे बाबूजी ने संध्या के जन्म पर अपने हाथों से रोपा था। बाबूजी अक्सर कहते थे, “यह पेड़ नहीं, मेरी संध्या की सहेली है।”

संध्या लड़खड़ाते कदमों से उस पेड़ के पास पहुंची। उसने दोनों बांहों में उस खुरदुरे तने को कसकर जकड़ लिया और अपना माथा उसकी छाल पर टिका दिया। इतने बरसों से दबा हुआ सारा दर्द, उपेक्षा, अनाथ होने का अहसास और मायके के सूनेपन की पीड़ा आंसुओं के रूप में फूट पड़ी। वह हिचकियां ले-लेकर रोने लगी।

उसे याद आने लगा कि कैसे तपती दोपहरी में जब अम्मा उसे डांटती थीं, तो वह इसी पेड़ की छांव में आकर बैठ जाती थी। तब बाबूजी पीछे से आते थे, अपनी जेब से गुड़ की डली निकालकर उसकी हथेली पर रख देते थे और कहते थे, “मेरी गुड़िया रूठ गई क्या?” आज न वह गुड़ देने वाले बाबूजी थे, न डांटने वाली अम्मा। वह जितनी देर रो सकती थी, रोती रही। पेड़ के पत्तों की सरसराहट मानो कह रही थी कि मत रो, हम तुम्हें भूले नहीं हैं।

“बिटिया… ओ संध्या बिटिया!”

तभी एक बहुत ही स्नेहिल और कांपती हुई आवाज उसके कानों में पड़ी। साथ ही किसी ने बहुत कोमलता से उसके कंधे पर एक झुर्रियों भरा हाथ रख दिया।

संध्या ने चौंक कर अपने आंसू पोंछे और पलट कर देखा। सामने सफेद सूती धोती पहने, आंखों पर मोटा फ्रेम लगाए पार्वती चाची खड़ी थीं। पड़ोस की चाची, जो अम्मा की बचपन की सखी थीं और जिन्हें संध्या बचपन से ‘बड़ी काकी’ कहकर पुकारती थी। उनके एक हाथ में पीतल का लोटा था जिसमें तुलसी का जल था और दूसरे हाथ में घर के बने तिल के लड्डू थे।

“काकी… आप?” संध्या का गला भर आया।

काकी ने लोटा एक किनारे मुंडेर पर रखा और अपनी दोनों बांहें फैला दीं। संध्या बिना एक पल सोचे उस बूढ़ी काकी के सीने से लग गई। काकी ने अपने आंचल से संध्या के भीगे गालों को पोंछा और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोलीं, “मैं कब से पूरे घर में तुझे ढूंढ रही थी। पूजा से पूछा तो उसने कहा बुआ आराम कर रही हैं। पर मैं जानती थी कि कमला की बेटी अपने सुख-दुख कहां बांटने जाती है। जब भी तेरा मन भारी होता था, तू इसी पेड़ के नीचे आकर छिप जाती थी।”

संध्या सिसकते हुए बोली, “काकी, अम्मा-बाबूजी के बिना यह घर मुझे काट खाने को दौड़ रहा है। चारों तरफ लोग हैं, सब हंस रहे हैं, पर मुझे लग रहा है जैसे मैं किसी अजनबी की बस्ती में आ गई हूं। अम्मा का कमरा बदल गया, बाबूजी की बैठक बदल गई… मेरा तो मायका ही लुट गया काकी।”

काकी ने बहुत प्यार से संध्या की ठोड़ी पकड़ी और उसका चेहरा ऊपर उठाया। काकी की ममता भरी आंखों में भी पानी तैर रहा था।

उन्होंने बहुत धीमे और गंभीर स्वर में कहा, “पगली, किसने कह दिया कि तेरा मायका लुट गया? क्या मायका सिर्फ मां-बाप के जीवित रहने तक ही होता है? सुन बिटिया, मां-बाप शरीर से चले जाते हैं, पर उनका आशीष और उनकी आत्मा इसी चौखट, इसी आंगन और इसी मिट्टी में रची-बसी रहती है। तूने सोचा कि भाभी ने कमरा बदल दिया तो अपनापन खत्म हो गया? अरे, पीढ़ी बदलती है तो घर की व्यवस्था भी बदलती है। पर क्या तेरे भाई का प्रेम कम हुआ? क्या आलोक का तेरे प्रति आदर घट गया?”

काकी ने लड्डू का एक टुकड़ा तोड़कर संध्या के मुंह में डालते हुए कहा, “मायका दीवारों से नहीं बनता संध्या, मायका बनता है उन रिश्तों की जड़ों से जो तेरे पुरखों ने सींची हैं। अगर तू ही यह सोचकर किनारा कर लेगी कि मां नहीं है तो मायका कैसा, तो फिर इन बच्चों को अपनी जड़ों से कौन जोड़ेगा? आलोक की नजरें दरवाजे पर टिकी थीं कि मेरी बुआ आएंगी तो शादी की रस्में शुरू होंगी। तेरे भाई की आंखों में तेरे आने की जो चमक थी, क्या वह झूठी थी? मां की जगह कोई नहीं ले सकता, यह सच है। लेकिन मां के जाने के बाद बड़ी बहन ही तो घर की मां बनती है। आज तू मेहमान बनकर कोने में रो रही है, जबकि इस घर की देहरी तुझे अपनी मालकिन समझकर बाहें पसारे खड़ी है।”

काकी के इन शब्दों ने संध्या के अंतर्मन पर जैसे अमृत छिड़क दिया हो। उसका भ्रम, उसका संकोच और उसका अकेलापन सब एक पल में बह गया। उसे समझ आया कि मायका सिर्फ लेने का नाम नहीं है, मायका तो वह वटवृक्ष है जिसकी छांव अब उसे अगली पीढ़ी को देनी थी। अम्मा नहीं थीं, तो क्या हुआ? अम्मा का संस्कार और उनका वात्सल्य अब संध्या के भीतर जीवित रहना चाहिए था।

संध्या ने काकी के हाथ से पीतल का लोटा लिया और एक सांस में पानी पी लिया। उसका मन बिल्कुल शांत और हल्का हो चुका था।

काकी ने हंसते हुए कहा, “चल अब, अपनी आंखें पोंछ और भीतर चल। देख, ढोलक बज रही है। भाभी तेरी राह देख रही होगी कि जीजी आएंगी तो बन्ना-बन्नी के गीत शुरू होंगे। तू घर की सबसे बड़ी बेटी है, तेरा चेहरा उदास रहेगा तो घर का शगुन कैसे पूरा होगा?”

संध्या ने अमरूद के तने पर एक बार फिर हाथ फेरा, इस बार विलाप में नहीं बल्कि एक नए संकल्प के साथ। जब वह काकी का हाथ थामकर आंगन में लौटी, तो उसका रूप ही बदला हुआ था।

“अरे जीजी, आप कहां चली गई थीं? देखिए, बन्ना गाने के लिए सब आपका ही इंतजार कर रहे हैं,” भाभी ने दौड़कर उसके हाथ में ढोलक की मंजीरा थमा दी।

संध्या ने मुस्कुराते हुए मंजीरा संभाला और आलोक को अपने पास बैठा लिया। उसने ऊंचा सुर लगाया, “हरियर-हरियर दूब जमि आई, अंगना में बाजे शहनाई…”

पूरा घर उस मंगल गान से गूंज उठा। संध्या की आंखों में अब आंसू नहीं थे, बल्कि एक ऐसी आत्मीयता और सुकून की चमक थी जो पूरे परिवार को अपने आंचल में समेट रही थी। उसे महसूस हुआ कि माँ कहीं नहीं गईं, वे तो उसी के गीतों में, उसी के दुलार में और इस भरे-पूरे परिवार की मुस्कुराहट में जिंदा थीं।

मायका कभी पराया नहीं होता, बस वक्त के साथ उसकी जिम्मेदारियों का रुख बदल जाता है। जब तक दिल में अपनों के लिए प्रेम और सम्मान की भावना जीवित है, तब तक हर चौखट अपनी है और हर रिश्ता अनमोल है।

क्या माता-पिता के चले जाने के बाद भी मायके का वही मान और अपनापन बना रहना चाहिए? इस बारे में आपकी क्या राय है, हमें कमेंट करके जरूर बताएं।

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मूल लेखिका : डॉ ,अनुपमा श्रीवास्तवा

मुजफ्फरपुर, बिहार

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