उम्मीदों की नई कोपल

सुखिया की बात सुनकर दीनदयाल के पैरों तले से जमीन खिसक गई। “हे मेरे मालिक!” बस यही दो शब्द उसके कांपते होठों से निकले और वह निढाल होकर चौखट पर ही बैठ गया। उसका पूरा शरीर सुन्न पड़ चुका था। एक अनजाना, भयानक डर उसके दिलो-दिमाग पर छा गया। जानकी रोने लगी और सहमी हुई आरोही अपनी मां के पल्लू से लिपट गई। उस काली, भयावह रात में पूरा परिवार जागता रहा और बाहर पानी का विकराल शोर बढ़ता गया।

सावन के अंतिम सप्ताह की रिमझिम फुहारें थम चुकी थीं और हवा में भीगी माटी की सोंधी खुशबू तैर रही थी। आसमान में तैरते बादलों के बीच से छनकर आती गुनगुनी धूप जब मिट्टी के कच्चे आंगन पर पड़ी, तो दीनदयाल के चेहरे पर एक गहरी, सुकून भरी चमक खिल उठी। वह अपने दालान में रखी बांस की खुरपी और कुदाल को बड़े जतन से कपड़े से पोंछ रहा था। उसका मन आज किसी पंछी की तरह हलका महसूस कर रहा था, क्योंकि महीनों से जिस सूखे और तंगहाली से उसका परिवार जूझ रहा था, उसे मिटाने का अवसर अब प्रकृति ने अपनी कृपा से प्रदान किया था।

दीनदयाल ने अपनी लुंगी को घुटनों तक समेटते हुए आंगन की ओर मुंह करके पुकारा कि अरे गुड़िया बिटिया, जरा वह लाल पोटली तो लेकर आना जो ताखे पर संजोकर रखी है। आवाज सुनते ही सात-आठ बरस की चुलबुली आरोही अपने नन्हे-नन्हे कदमों से दौड़ती हुई आई। उसके दोनों हाथों में लाल कपड़े में बंधी बीजों की थैली बड़े करीने से थमी हुई थी। उसने अपनी बड़ी-बड़ी आंखों में असीम कौतूहल भरकर दीनदयाल के हाथ में पोटली थमाते हुए बड़ी मिठास से जिद की कि बापू, आज वह घर पर अकेले नहीं रुकेगी, वह भी अपने बापू के साथ खेत पर जाएगी और बीजों को धरती में रोपने में पूरा हाथ बंटाएगी। दीनदयाल अपनी बेटी के मासूम उत्साह को देखकर मुस्कुरा उठा और उसके सिर पर बड़े दुलार से हाथ फेरते हुए बोला कि चल मेरी लाडो, आज तू ही मेरे साथ चलकर हमारी नई उम्मीदों की नींव रखेगी।

दीनदयाल एक सीधा-साधा, मेहनती और स्वाभिमानी किसान था। उसके पास गांव की सीमा पर पुश्तैनी रूप से मिला महज डेढ़ बीघा का एक छोटा सा खेत था। वह जमीन का टुकड़ा भले ही छोटा था, मगर दीनदयाल के पूरे परिवार का संसार उसी के इर्द-गिर्द सिमटा हुआ था। पिछले साल पत्नी जानकी की लंबी और गंभीर बीमारी के इलाज के लिए उसे गांव के साहूकार ठाकुर भवानी सिंह से आठ हजार रुपए का भारी कर्ज लेना पड़ा था। ठाकुर का ब्याज हर गुजरते महीने के साथ बढ़ता जा रहा था और भवानी सिंह की तीखी नजरें आए दिन दीनदयाल के दरवाजे पर टिक जाती थीं। दीनदयाल का स्वाभिमान उसे रोज कचोटता था। वह किसी भी हाल में कर्ज के इस बोझ को उतारकर अपनी देहरी को बेदाग रखना चाहता था।

इसी उम्मीद में उसने इस बार मौसम के रुख को भांपते हुए नकदी फसलों का चुनाव किया था। वह बाजार से शिमला मिर्च, खीरे, लौकी, तोरी और हरी पत्तेदार सब्जियों के उन्नत किस्म के संकर बीज खरीद लाया था। इन सब्जियों की खासियत यह थी कि बरसात के ठीक बाद के मौसम में यह फसल बहुत तेजी से फलती-फूलती थी और महज डेढ़-दो महीने के भीतर बाजार में ऊंचे दामों पर बिकने के लिए तैयार हो जाती थी। दीनदयाल के मन में पक्का विश्वास था कि इस बार की मेहनत रंग लाएगी, मंडी में सब्जियों की अच्छी कीमत मिलेगी, भवानी सिंह का पाई-पाई कर्ज चुकता हो जाएगा और फिर उसकी प्यारी बेटी आरोही के लिए एक नई साइकिल और घर के लिए साल भर का राशन भी जुट सकेगा।

जब पिता और पुत्री खेत की मेड़ पर पहुंचे, तो खेत की माटी बारिश के पानी से तृप्त होकर मुलायम और नम हो चुकी थी। दीनदयाल ने कुदाल से क्यारियां बनानी शुरू कीं। उसने आरोही को प्यार से समझाया कि बिटिया, तुम इस ऊपरी किनारे की मेड़ पर हलके हाथों से एक-एक फुट की दूरी पर बीजों को डालते जाओ और उन पर हल्की मिट्टी चढ़ाती जाओ, तब तक मैं बीच के ढलान पर मजबूत मेड़ें बनाकर नालियां तैयार करता हूं ताकि पौधों की जड़ों में पानी सड़े नहीं। आरोही ने बड़े चाव से बापू की बात गांठ बांध ली। उसने अपने नन्हे हाथों से मिट्टी को सहलाते हुए बीजों को धरती की गोद में ऐसे बिठाना शुरू किया मानो वह किसी छोटे बच्चे को लोरी गाकर सुला रही हो।

दोपहर ढलकर सांझ में तब्दील होने लगी। पश्चिम दिशा में सूरज सिंदूरी आभा बिखेरते हुए पेड़ों की ओट में छिपने की तैयारी करने लगा। दीनदयाल और आरोही ने मिलकर पूरे खेत की एक-एक क्यारी में बीजों की बुवाई पूरी कर ली थी। दोनों के बदन पसीने से भीगे हुए थे और पैरों में गीली मिट्टी लिपटी थी, लेकिन आंखों में थकान की जगह एक स्वर्णिम भविष्य के सपने तैर रहे थे। दीनदयाल ने कुदाल को कंधे पर रखा और आरोही की नन्ही उंगली थामते हुए बोला कि चल गुड़िया, आज का काम पूरा हुआ, अब अपनी मेहनत को ईश्वर के भरोसे सौंपकर घर लौटते हैं। दोनों बाप-बेटी मंद-मंद मुस्कुराते हुए अपने कच्चे आशियाने की ओर चल पड़े।

दिन पंख लगाकर उड़ने लगे। दीनदयाल की मेहनत और आरोही के दुलार का असर खेत पर साफ नजर आने लगा था। एक महीने के भीतर ही उस डेढ़ बीघे के टुकड़े ने हरियाली की घनी चादर ओढ़ ली थी। क्यारियों में शिमला मिर्च के छोटे-छोटे चमकदार फल लटकने लगे थे, तोरी और लौकी की हरी-भरी बेलें बांस के मचानों पर तेजी से ऊपर चढ़ रही थीं और खीरे के पीले-पीले फूल भौरों को अपनी ओर आकर्षित कर रहे थे। दीनदयाल जब भी सुबह-शाम अपने खेत पर जाता, तो उसका सीना गर्व और संतोष से चौड़ा हो जाता था। वह हर पौधे को ऐसे निहारता मानो वे उसकी अपनी संताने हों। उसे लगता था कि बस दो-तीन हफ्तों की बात और है, पहली तुड़ाई होते ही वह शहर की बड़ी मंडी में माल ले जाएगा और उसकी सारी परेशानियां हमेशा के लिए काफूर हो जाएंगी।

मगर नियति का चक्र कभी-कभी बड़ी क्रूरता से घूमता है। भाद्रपद का महीना अपने अंतिम पड़ाव पर था। एक दिन अचानक दोपहर के बाद से ही आसमान का रंग बदलने लगा। नीले गगन पर सलेटी और गहरे काले बादलों की ऐसी घनी परत चढ़ गई कि दिन में ही शाम का भ्रम होने लगा। हवाएं सांय-सांय चलने लगीं और देखते ही देखते मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। पहले तो किसानों को लगा कि यह सामान्य मौसमी बारिश है जो फसलों के लिए अमृत साबित होगी, लेकिन बारिश ने रुकने का नाम ही नहीं लिया।

पहला दिन बीता, दूसरा दिन बीता और फिर तीसरा दिन भी लगातार मूसलाधार पानी बरसता रहा। बादलों की गड़गड़ाहट और बिजली की भयानक कौंध से पूरा गांव थर्रा उठा था। चारों तरफ केवल पानी ही पानी नजर आ रहा था, नालियां उफन चुकी थीं और गांव के कच्चे रास्ते दलदल में बदल चुके थे।

तीसरी रात का समय था। घड़ी में आधी रात के बारह बज चुके थे। दीनदयाल के घर की छत से जगह-जगह पानी टपक रहा था जिसे रोकने के लिए जानकी ने जमीन पर बर्तन सजा रखे थे। बर्तनों में गिरती बूंदों की टप-टप आवाज दीनदयाल की धड़कनों को और तेज कर रही थी। उसकी आंखों से नींद पूरी तरह गायब थी। वह करवटें बदल-बदल कर केवल अपने खेत के बारे में सोच रहा था। उसकी कोमल सब्जियों की फसल, जो पानी के जरा से ठहराव को भी नहीं झेल सकती थी, इस प्रलयंकारी बारिश में किस हाल में होगी, यह सोचकर ही उसकी रूह कांप उठती थी।

तभी बाहर के भारी लकड़ी के दरवाजे पर जोर-जोर से पीटने की आवाज गूंजी। कोई बाहर से घबराई हुई आवाज में चिल्ला रहा था कि दीनदयाल भाई, दरवाजा खोलो, अनहोनी हो गई!

दीनदयाल ने हड़बड़ाकर लालटेन उठाई और दौड़कर दरवाजे की सांकल खोली। सामने गांव का चरवाहा सुखिया खड़ा था। उसका पूरा शरीर भीगा हुआ था, वह ठंड से बुरी तरह कांप रहा था और उसकी सांसें उखड़ रही थीं। दीनदयाल ने घबराते हुए पूछा कि सुखिया, क्या बात है, इस भयानक रात में तू इस कदर क्यों बदहवास है?

सुखिया ने हांफते हुए छाती पर हाथ रखा और रुंधे गले से बोला कि दीनू भाई, ऊपर पहाड़ी वाले बांध का पानी छोड़ दिया गया है और हमारी बूढ़ी गंगा नदी पूरी तरह उफान पर आ गई है! नदी का तटबंध दो जगह से टूट चुका है। पानी निचले इलाके के सारे खेतों को लीलता हुआ आगे बढ़ रहा है। हमारे सारे खेत, खलिहान और मचान जलमग्न हो चुके हैं। पानी गांव की ओर बढ़ रहा है, जल्दी से अपने घर का जरूरी सामान समेटो और ऊंचे टीले की तरफ भागो!

सुखिया की बात सुनकर दीनदयाल के पैरों तले से जमीन खिसक गई। “हे मेरे मालिक!” बस यही दो शब्द उसके कांपते होठों से निकले और वह निढाल होकर चौखट पर ही बैठ गया। उसका पूरा शरीर सुन्न पड़ चुका था। एक अनजाना, भयानक डर उसके दिलो-दिमाग पर छा गया। जानकी रोने लगी और सहमी हुई आरोही अपनी मां के पल्लू से लिपट गई। उस काली, भयावह रात में पूरा परिवार जागता रहा और बाहर पानी का विकराल शोर बढ़ता गया।

सुबह की पहली किरण ने जब अंधेरे की काली चादर को चीरकर धरती पर कदम रखा, तो बारिश तो काफी हद तक धीमी पड़ चुकी थी, मगर जो दृश्य सामने आया उसने हर किसी का कलेजा चीर दिया। दीनदयाल पागलों की तरह बदहवास दौड़ता हुआ गांव की उस ऊंची मेड़ पर पहुंचा जहां से पूरे इलाके के खेत नजर आते थे।

दूर-दूर तक केवल मटमैले पानी का अथाह समंदर हिलोरें ले रहा था। जहां कल तक हरी-भरी शिमला मिर्च और बेलों की खुशहाली लहलहाती थी, वहां आज सिर्फ विनाश का सन्नाटा पसरा हुआ था। पानी के ऊपर सब्जियों की टूटी हुई टहनियां, उखड़े हुए पौधे और बांस के मचान तिनकों की तरह बहते हुए दिखाई दे रहे थे। उसकी पूरी फसल, उसकी महीनों की हाड़-तोड़ मेहनत, उसका स्वाभिमान और साहूकार का कर्ज चुकाने का इकलौता जरिया—सब कुछ उस मटमैले सैलाब की गहराई में हमेशा के लिए दफन हो चुका था।

दीनदयाल वहीं घुटनों के बल गीली मिट्टी में गिर पड़ा। उसकी दोनों आंखें पथरा गई थीं और गालों पर बेबसी के गर्म आंसू बहकर नीचे गिर रहे थे। उसने दोनों हाथों से अपना सिर पकड़ लिया और रोते हुए आकाश की तरफ देखने लगा मानो पूछ रहा हो कि हे विधाता, एक गरीब के सपनों के साथ ही यह क्रूर खेल क्यों खेला गया।

तभी पीछे से किसी के नन्हे और कोमल हाथों ने आकर उसके आंसुओं से भीगे चेहरे को छुआ। दीनदयाल ने चौंककर दृष्टि घुमाई। सामने आरोही खड़ी थी। उसके मासूम चेहरे पर कोई निराशा नहीं थी, बल्कि उसकी आंखों में एक अनोखा, अटूट विश्वास जगमगा रहा था। उसने अपनी फ्रॉक की जेब से एक छोटी सी पुड़िया निकाली और अपने बापू की हथेली पर रख दी।

दीनदयाल ने नम आंखों से देखा, उस पुड़िया में कद्दू और करेले के करीब बीस-पच्चीस सूखे बीज सुरक्षित रखे हुए थे। आरोही ने बड़े भोलेपन और दृढ़ता से अपने बापू के आंसू पोंछते हुए कहा कि बापू, रोते क्यों हो? नदी का पानी तो हमारी फसल बहा ले गया, लेकिन हमारे हाथ तो हमारे पास ही हैं न? और देखो, यह बीज मैंने उस दिन बचाकर रख लिए थे। पानी जैसे ही सूखेगा, हम दोनों मिलकर फिर से क्यारियां बनाएंगे, फिर से मिट्टी को सहलाएंगे और इन बीजों को रोपेंगे। आप ही तो कहते थे कि जब तक इंसान की सांसें चलती हैं, तब तक हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। बापू, हमारे पौधे फिर उगेंगे, देखना!

सात साल की उस नन्ही बच्ची के इन शब्दों ने दीनदयाल के भीतर एक सोए हुए तूफान को जगा दिया। उसके मन में पसरा निराशा का गहरा अंधकार अचानक उस बच्ची की सकारात्मकता के सामने पिघलने लगा। उसे अहसास हुआ कि जब तक परिवार का यह अटूट प्रेम और विश्वास उसके साथ है, तब तक कोई भी सैलाब उसे पूरी तरह मिटा नहीं सकता। फसल नष्ट हुई थी, लेकिन उसका पुरुषार्थ और जीने का जज्बा तो अभी भी जिंदा था।

दीनदयाल ने अपनी बेटी को कसकर सीने से लगा लिया। उसने अपने चेहरे से आंसुओं को पोंछा और एक दृढ़ संकल्प के साथ उठ खड़ा हुआ। उसी दोपहर गांव के बाकी प्रभावित किसानों ने जब दीनदयाल को टूटने के बजाय अपने खेत से पानी निकालने की जुगत में जुटते देखा, तो उनका भी टूटा हुआ हौसला लौट आया। सभी ने मिलकर एक-दूसरे के खेतों से पानी निकालने और राहत कार्य में हाथ बंटाया। सरकारी कृषि विभाग की टीम ने भी गांव का दौरा किया और संकट की इस घड़ी में किसानों को बिना ब्याज के आसान बीज-खाद ऋण और मुआवजा देने की घोषणा की।

अगले तीन हफ्तों में जब धूप खिली और नदी वापस अपने दायरे में सिमटी, तो दीनदयाल ने आरोही के बचाए हुए बीजों और मिले नए हौसले के साथ धरती के सीने पर दोबारा हल चलाया। मिट्टी फिर से उर्वर थी और इस बार उम्मीदों की कोपलें पहले से भी ज्यादा मजबूती और चमक के साथ फूटने को तैयार थीं। दीनदयाल समझ चुका था कि कुदरत चाहे कितने भी इम्तिहान ले, अगर इंसान के भीतर संघर्ष का साहस और अपनों का संबल हो, तो हर महाविनाश के बाद भी एक नए, सुंदर जीवन का सृजन निश्चित होता है।

पाठकों के लिए एक विचारणीय प्रश्न:

जब जीवन में अचानक कोई अप्रत्याशित संकट हमारी सारी उम्मीदों और मेहनत पर पानी फेर देता है, तो क्या हमें परिस्थितियों के आगे घुटने टेक देने चाहिए, या फिर नन्हीं आरोही की तरह बची हुई उम्मीद के चंद बीजों को संजोकर दोबारा शून्य से शुरुआत करनी चाहिए? विपत्ति के समय आपका सबसे बड़ा संबल क्या बनता है? अपने अनमोल विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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 मूल लेखक : माता प्रसाद दुबे

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