आज उसे एहसास हुआ था कि हम बच्चे कितने स्वार्थी हो जाते हैं। हम अपने करियर, अपनी ज़िंदगी, अपने दोस्तों और अपनी नई ज़रूरतों में इतने खो जाते हैं कि हमें यह दिखाई ही नहीं देता कि हमारे माता-पिता उसी पुरानी धुरी पर खड़े रहकर हमारी सफलता की इमारत को सहारा दे रहे हैं। रोहन सीधा शहर के सबसे बड़े जूतों के शोरूम में गया। उसने वहाँ से अपनी माँ के लिए एक बहुत ही आरामदायक, आर्थोपेडिक (डॉक्टरी) सैंडल खरीदी, क्योंकि वह जानता था कि उसकी माँ के घुटनों और एड़ियों में अक्सर दर्द रहता है, लेकिन वो किसी से कहती नहीं हैं।
दीपावली का त्योहार बस कुछ ही दिन दूर था। पूरे शहर में एक अलग ही रौनक छाई हुई थी। बाज़ारों में भीड़ थी, घरों में साफ-सफाई का दौर चल रहा था और हवा में मिठाइयों की सोंधी खुशबू घुलने लगी थी। सुमित्रा देवी भी सुबह से अपने घर के काम में जुटी हुई थीं। घर का कोना-कोना चमकाने की ज़िम्मेदारी जैसे उन्होंने अकेले ही अपने कंधों पर ले रखी थी। उनके बेटे रोहन का आज रविवार का अवकाश था, इसलिए वह भी अपनी किताबों की अलमारी और अपने कमरे को व्यवस्थित करने में लगा हुआ था।
अचानक रोहन ने अपने कमरे से आवाज़ लगाई, “माँ! वो अपना फेवीक्विक या जूता चिपकाने वाला गोंद कहाँ रखा है?”
सुमित्रा देवी उस समय रसोई में बेसन के लड्डू बांध रही थीं। वहीं से आवाज़ देते हुए बोलीं, “बर्तन वाले रैक के ठीक ऊपर वाले छोटे डिब्बे में रखा है बेटा। पर तुझे क्या चिपकाना है अचानक से?”
रोहन ने अपनी माँ को कोई सीधा जवाब नहीं दिया। वह सीधा रसोई में गया, डिब्बा उठाया और वापस अपने कमरे में आ गया। जब काफी देर तक रोहन की कोई आवाज़ नहीं आई, तो सुमित्रा देवी ने अपने हाथ धोए और पल्लू से पोंछते हुए उसके कमरे की तरफ गईं। उन्होंने देखा कि रोहन अपने एक पुराने स्पोर्ट्स शू (जूते) के उखड़े हुए सोल को गोंद से चिपकाने की मशक्कत कर रहा था।
सुमित्रा देवी ने थोड़ी हैरानी और हल्की सी डांट के स्वर में कहा, “अरे बेटा! तूने मुझे बताया नहीं कि तू क्या चिपका रहा है? ये जूते तो तूने अपने कॉलेज के आखिरी साल में लिए थे ना? अब तो नौकरी करते हुए भी तुझे दो साल हो गए हैं। ये जूते पूरी तरह से घिस चुके हैं। इन्हें चिपका कर क्यों समय बर्बाद कर रहा है? इन्हें फेंक दे और जो नए जूते तूने पिछले महीने खरीदे थे, उन्हें पहन। वैसे भी त्योहार का समय है, ऐसे फटे-पुराने जूते क्यों पहन रहा है?”
रोहन अपने काम में लगा हुआ था। उसने जूता नीचे रखा, अपने हाथों से गोंद साफ किया और फिर अपनी माँ की तरफ देखकर एक बहुत ही गहरी और गंभीर मुस्कान के साथ बोला, “माँ, तीन साल पहले खरीदे गए मेरे जूते बहुत पुराने हो गए, इतने पुराने कि उन्हें मुझे अब फेंक देना चाहिए। लेकिन आपकी वो भूरे रंग की चप्पलें, जिन्हें आप पिछले पांच सालों से कभी मोची से सिलवाकर, तो कभी खुद सेफ्टी पिन लगाकर पहन रही हैं, वो पुरानी नहीं हुईं? और वो आपकी बनारसी साड़ी जो बाबूजी ने आपको शादी की सालगिरह पर दी थी, जिसे आप हर छोटे-बड़े फंक्शन में नई कहकर पहन लेती हैं और कहती हैं कि ‘ये तो अभी बिल्कुल नई है’, वो पुरानी नहीं हुई? क्यों माँ?”
रोहन के इन सीधे सवालों ने सुमित्रा देवी को निशब्द कर दिया। उनके पास रोहन की बात का कोई जवाब नहीं था। वह बस अवाक सी अपने बेटे के चेहरे को देखती रह गईं। एक मध्यमवर्गीय माँ के पास ऐसे सवालों का शायद कभी कोई जवाब होता भी नहीं है। वह अपने बच्चों की हर छोटी-बड़ी ज़रूरत को पूरा करने के लिए अपनी इच्छाओं का गला इतनी खामोशी से घोंटती है कि किसी को कानो-कान खबर भी नहीं होती। सुमित्रा देवी को उसी खामोशी में छोड़कर रोहन अपनी बाइक की चाबी उठाकर घर से बाहर निकल गया।
सुमित्रा देवी वापस रसोई में आ गईं, लेकिन अब उनका मन काम में नहीं लग रहा था। रोहन की बातें उनके कानों में बार-बार गूंज रही थीं। उन्हें याद आने लगा वो समय जब रोहन के पिता के गुज़र जाने के बाद उन्होंने अकेले ही सिलाई-कढ़ाई करके रोहन को पढ़ाया-लिखाया था। बेटे की फीस भरने के लिए, उसकी नई किताबों के लिए और उसके कॉलेज के कपड़ों के लिए सुमित्रा देवी ने ना जाने कितनी दीवालियों पर अपने लिए एक नया सूती धागा तक नहीं खरीदा था। “मेरे पास तो बहुत कपड़े हैं”, “मुझे अभी नई चप्पलों की क्या ज़रूरत, मैं कौन सा बाहर जाती हूँ”, यही सब कहकर उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी निकाल दी थी। आज जब रोहन ने उनके उसी त्याग को शब्दों में पिरोकर उनके सामने रख दिया, तो उनकी आँखें भर आईं।
उधर रोहन बाइक चलाते हुए बाज़ार की तरफ जा रहा था। आज उसे एहसास हुआ था कि हम बच्चे कितने स्वार्थी हो जाते हैं। हम अपने करियर, अपनी ज़िंदगी, अपने दोस्तों और अपनी नई ज़रूरतों में इतने खो जाते हैं कि हमें यह दिखाई ही नहीं देता कि हमारे माता-पिता उसी पुरानी धुरी पर खड़े रहकर हमारी सफलता की इमारत को सहारा दे रहे हैं। रोहन सीधा शहर के सबसे बड़े जूतों के शोरूम में गया। उसने वहाँ से अपनी माँ के लिए एक बहुत ही आरामदायक, आर्थोपेडिक (डॉक्टरी) सैंडल खरीदी, क्योंकि वह जानता था कि उसकी माँ के घुटनों और एड़ियों में अक्सर दर्द रहता है, लेकिन वो किसी से कहती नहीं हैं।
इसके बाद वह एक प्रसिद्ध साड़ी के शोरूम में गया। वहाँ उसने अपनी माँ की पसंद के अनुसार एक बहुत ही खूबसूरत, सुनहरे बॉर्डर वाली गहरे लाल रंग की रेशमी साड़ी चुनी। साड़ी के साथ उसने एक शॉल भी खरीदा, क्योंकि सर्दियों की शुरुआत हो चुकी थी। उपहार पैक करवाने के बाद वह एक स्टेशनरी की दुकान पर रुका और एक सुंदर सा ग्रीटिंग कार्ड खरीदा।
शाम ढल चुकी थी। दीवाली की लड़ियों से आस-पड़ोस के घर जगमगा रहे थे। सुमित्रा देवी ने घर के आंगन में दीये जला दिए थे और तुलसी के पास बैठकर पूजा कर रही थीं। तभी रोहन हाथ में कई सारे पैकेट लेकर घर में दाखिल हुआ। उसने सारे पैकेट सोफे पर रखे और चुपचाप अपनी माँ के पास जाकर खड़ा हो गया। पूजा खत्म होने के बाद जब सुमित्रा देवी मुड़ीं, तो रोहन ने उन्हें हाथ पकड़कर सोफे पर बिठाया।
“ये सब क्या है बेटा? तू इतनी रात को ये सब क्या खरीद लाया?” सुमित्रा देवी ने आश्चर्य से पूछा।
रोहन ने बिना कुछ कहे लाल रंग की वह खूबसूरत रेशमी साड़ी निकाली और अपनी माँ के कंधों पर रख दी। फिर उसने डिब्बे से वो आरामदायक सैंडल निकाली और अपनी माँ के पैरों के पास रखते हुए उनके पैर छुए। सुमित्रा देवी की आँखें फटी की फटी रह गईं। “बेटा, इसकी क्या ज़रूरत थी? तूने इतने पैसे क्यों खर्च किए? मेरे पास तो…”
सुमित्रा देवी अपनी पुरानी बात दोहराने ही वाली थीं कि रोहन ने उन्हें बीच में टोकते हुए कहा, “माँ, आज आप ये नहीं कहेंगी कि आपके पास बहुत साड़ियाँ हैं या आपको इनकी ज़रूरत नहीं है। आज दीपावली के इस शुभ अवसर पर मेरी तरफ से यह एक छोटा सा उपहार है।”
फिर रोहन ने वो ग्रीटिंग कार्ड अपनी माँ के हाथ में थमा दिया। सुमित्रा देवी ने कांपते हाथों से वह कार्ड खोला। कार्ड के अंदर रोहन ने अपनी सुंदर लिखावट में लिखा था:
“मेरी प्यारी माँ,
दीपावली के इन दीयों की तरह आपने पूरी ज़िंदगी खुद को जलाकर मेरे जीवन में रोशनी की है। जब मैं छोटा था, तब आपने यशोदा माँ बनकर मेरी हर ज़िद पूरी की। जब मैं स्कूल गया, तो आपने सरस्वती माँ बनकर मुझे ज्ञान और संस्कार दिए। जब हमारे परिवार पर बुरा वक्त आया, तो आप माँ भवानी बनकर हर मुसीबत से लड़ गईं, और आज जब मैं पैरों पर खड़ा हूँ, तो आपने अन्नपूर्णा और लक्ष्मी माँ बनकर इस घर को अपने प्यार से सींचा है। आपने अपने सारे शौक, अपनी सारी इच्छाएं एक पुरानी अलमारी में बंद कर दीं ताकि मैं खुले आसमान में उड़ सकूँ। माँ, मैं चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो जाऊं, आपके इन एहसानों का कर्ज़ कभी नहीं चुका सकता। आपको दीपावली की ढेरों शुभकामनाएँ। आपका बेटा, रोहन।”
कार्ड में लिखे उन शब्दों को पढ़ते ही सुमित्रा देवी की आँखों से आंसुओं की धारा फूट पड़ी। यह दुःख के नहीं, बल्कि परम सुख और तृप्ति के आंसू थे। एक माँ के लिए दुनिया का सबसे बड़ा उपहार यही होता है कि उसकी संतान उसके त्याग को समझे और उसका सम्मान करे। रोहन ने आगे बढ़कर अपनी माँ को गले से लगा लिया। उस दिन उस छोटे से घर में जल रहे दीयों की रोशनी दुनिया की किसी भी चकाचौंध से ज्यादा उज्ज्वल और पवित्र लग रही थी।
दोस्तों, हमारी माँ कभी हमसे कुछ मांगती नहीं है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उनकी कोई इच्छाएं नहीं होतीं। आज ही अपनी माँ के पास बैठिए, उनसे बात कीजिए, और बिना उनके कहे उनकी ज़रूरतों को पूरा करने की कोशिश कीजिए। यकीन मानिए, उनके चेहरे की वो एक मुस्कान आपकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी कमाई होगी।
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