रिश्तों की नई सुबह

 अंजलि वहीं खड़ी रही। उसके कपड़े गीले थे, उसकी मेहनत से बनाई रंगोली फर्श पर एक भद्दे से दाग की तरह फैल चुकी थी, लेकिन आज उससे भी ज्यादा कुछ और टूट गया था—उसका सब्र। पिछले चार सालों से वह इस घर में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही थी। विकास से उसने लव मैरिज की थी, और यही उसका सबसे बड़ा ‘गुनाह’ बन गया था। सुमित्रा देवी ने कभी उसे अपनी बहू के रूप में दिल से स्वीकार नहीं किया। बात-बात पर ताने, शिखा के तीखे बोल, और हर पारिवारिक फैसले में अंजलि को दरकिनार करना—ये सब अंजलि खामोशी से सहती आई थी। विकास हमेशा यही कहता था, “माँ पुराने ख्यालों की हैं, धीरे-धीरे मान जाएंगी। तुम चुप रहा करो, बहस करने से बात बिगड़ती है।”

दिवाली की सुहानी सुबह थी। घर के हर कोने से गेंदे के फूलों और कपूर की मिली-जुली महक आ रही थी। रसोई में काजू कतली और बेसन के लड्डुओं की चाशनी तैयार हो रही थी। पूरे घर को सजाने की जिम्मेदारी अंजलि ने अपने कंधों पर ले रखी थी। वह सुबह चार बजे से उठकर कभी रंगोली बनाती, तो कभी पर्दों के रंग बदलती। अंजलि ने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी थी कि इस बार की दिवाली उसके ससुराल में सबसे खास हो। वह चाहती थी कि किसी भी तरह उसकी सास, सुमित्रा देवी के चेहरे पर उसके लिए एक प्यार भरी मुस्कान आ जाए।

“मामी, आप मुझे हमेशा डांटती रहती हो! मैंने जानबूझकर थोड़ी न किया है,” दस साल के आर्यन की तेज आवाज ने पूरे घर की शांति भंग कर दी।

अंजलि जो जमीन पर बैठकर दीयों में तेल भर रही थी, उसने गहरी सांस ली और अपने कपड़ों पर गिरे रंग और पानी को देखा। आर्यन ने दौड़ते हुए आकर अंजलि की तीन घंटे की मेहनत से बनाई गई रंगोली को पैरों से रौंद दिया था और साथ ही पानी से भरा कलश भी अंजलि के ऊपर गिरा दिया था।

“आर्यन, बेटा आप पूरे घर में दौड़ रहे हो। मैंने आपसे कितनी बार कहा कि बरामदे में मत दौड़ो, यहाँ दीये रखे हैं। अगर आग लग जाती या तुम गिर जाते तो कितनी चोट आती?” अंजलि ने खुद को शांत रखते हुए कहा।

“आप मुझे मत सिखाइए कि मुझे क्या करना है। आप तो वैसे भी इस घर में मेरी मम्मी और नानी की मर्जी के खिलाफ आई हो। नानी कहती है कि आपने मेरे मामा को अपने जाल में फंसाया है। आप झूठी हो!” आर्यन ने अपनी छोटी सी उंगली अंजलि की तरफ उठाते हुए कहा।

अंजलि के लिए ये शब्द किसी तीर से कम नहीं थे। एक दस साल का बच्चा इतने कड़वे शब्द बोल रहा था, और ये शब्द उसके नहीं थे, ये वो बातें थीं जो उसने इस घर के बड़ों से सुनी थीं।

“क्या हो रहा है यहाँ? सुबह-सुबह मेरे पोते को क्यों रुला रही हो?” सुमित्रा देवी अपने कमरे से बाहर आते हुए जोर से गरजीं।

“माँ जी, मैंने इसे रुलाया नहीं है। ये दौड़ते हुए आया और इसने सारी रंगोली खराब कर दी, पानी भी मेरे ऊपर गिरा दिया। मैंने तो बस इसे संभल कर चलने को कहा था,” अंजलि ने अपनी सफाई देते हुए कहा।

“तो क्या हुआ? बच्चा है वो! तुम्हारे इस रंगोली के चक्कर में अगर मेरे आर्यन को कुछ हो जाता तो? जब से तुम इस घर में आई हो, मेरी बेटी शिखा और आर्यन जब भी यहाँ आते हैं, तुम्हें बर्दाश्त ही नहीं होता। तुम्हें तो बस बहाना चाहिए आर्यन को डांटने का,” सुमित्रा देवी ने अंजलि को खरी-खोटी सुनाते हुए कहा।

तभी शिखा भी अपने कमरे से बाहर आ गई। “भाभी, आपको तो तमीज ही नहीं है कि बड़ों से और बच्चों से कैसे बात की जाती है। आर्यन बच्चा है, उसने गलती कर दी तो क्या आप उसे ऐसे डांटेंगी? माँ सही कहती हैं, आपके मन में हमारे लिए सिर्फ कड़वाहट है।”

उसी वक्त मुख्य दरवाजे से विकास अंदर आया। उसके हाथों में मिठाइयों और तोहफों के डिब्बे थे। घर का माहौल देखकर उसके चेहरे की खुशी गायब हो गई। “अब क्या हो गया? त्योहार का दिन है, आज तो कम से कम शांति रखो।”

“शांति? अपनी पत्नी से कहो कि वो शांति रखे। इसे तो बस क्लेश करना आता है। मेरे आर्यन को सुबह-सुबह डांट कर रुला दिया,” सुमित्रा देवी ने विकास को देखते ही शिकायत की।

विकास ने गहरी सांस ली और अंजलि की तरफ देखते हुए थके हुए स्वर में बोला, “अंजलि, तुम्हें पता है कि शिखा और आर्यन कुछ ही दिनों के लिए आते हैं। फिर भी तुम छोटी-छोटी बातों का बतंगड़ बना देती हो। बच्चा ही तो है, इग्नोर कर दिया करो। माँ और शिखा से बहस करने की क्या जरूरत थी? जाओ, जाकर कपड़े बदल लो और नाश्ता लगाओ।”

अंजलि वहीं खड़ी रही। उसके कपड़े गीले थे, उसकी मेहनत से बनाई रंगोली फर्श पर एक भद्दे से दाग की तरह फैल चुकी थी, लेकिन आज उससे भी ज्यादा कुछ और टूट गया था—उसका सब्र। पिछले चार सालों से वह इस घर में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही थी। विकास से उसने लव मैरिज की थी, और यही उसका सबसे बड़ा ‘गुनाह’ बन गया था। सुमित्रा देवी ने कभी उसे अपनी बहू के रूप में दिल से स्वीकार नहीं किया। बात-बात पर ताने, शिखा के तीखे बोल, और हर पारिवारिक फैसले में अंजलि को दरकिनार करना—ये सब अंजलि खामोशी से सहती आई थी। विकास हमेशा यही कहता था, “माँ पुराने ख्यालों की हैं, धीरे-धीरे मान जाएंगी। तुम चुप रहा करो, बहस करने से बात बिगड़ती है।”

लेकिन आज, एक दस साल के बच्चे ने अंजलि की इज्जत को जिस तरह तार-तार किया था, उसने अंजलि के भीतर के सारे बांध तोड़ दिए।

“नहीं विकास, आज मैं नाश्ता नहीं लगाऊंगी। और ना ही आज मैं चुप रहूंगी,” अंजलि की आवाज में एक अजीब सी खनक थी, जिसे सुनकर पूरा घर शांत हो गया। विकास ने हैरानी से अंजलि की तरफ देखा।

“क्या कहा तुमने? अब तुम हमें भूखा मारोगी?” सुमित्रा देवी ने आंखें तरेरते हुए कहा।

“माँ जी, भूखा तो मैं किसी को नहीं मार रही, लेकिन आप लोगों ने मेरी आत्मा को जरूर भूखा मार दिया है,” अंजलि ने सुमित्रा देवी की आँखों में आँखें डालते हुए कहा। “चार साल… चार साल से मैं इस घर की हर ईंट को अपना बनाने की कोशिश कर रही हूँ। आपकी हर कड़वी बात, शिखा के हर ताने को मैंने प्रसाद समझ कर रख लिया। क्यों? क्योंकि विकास ने मुझसे कहा था कि प्यार से सब ठीक हो जाएगा। लेकिन आज मुझे समझ आ गया है कि जहाँ सम्मान नहीं होता, वहाँ प्यार कभी पनप ही नहीं सकता।”

“अंजलि, क्या बोल रही हो तुम? माँ से ऐसे बात करते हैं?” विकास ने बीच-बचाव करना चाहा।

“तुम बीच में मत बोलो विकास!” अंजलि ने पहली बार विकास को इतने अधिकार से टोका। “आज मुझे बोलने दो। तुमने हमेशा मुझे चुप कराया है ‘रिश्तों की शांति’ के नाम पर। लेकिन उस शांति की कीमत हमेशा मैंने चुकाई है। मेरी खामोशी को इस घर ने मेरी कमजोरी समझ लिया है। माँ जी, आपने मुझे कभी अपनी बहू नहीं माना, ये मैं जानती थी। मैंने इसके लिए कभी आपसे कोई शिकायत भी नहीं की। मैंने सोचा, मैं अपनी सेवा से, अपने समर्पण से आपका दिल जीत लूंगी। लेकिन आज… आज आपके इस छोटे से पोते ने मुझे जो कहा, उसने मुझे आईना दिखा दिया।”

अंजलि की आँखों से आंसू बह रहे थे लेकिन उसकी आवाज़ कांप नहीं रही थी। “आर्यन ने मुझसे कहा कि मैं झूठी हूँ, मैंने उसके मामा को फंसाया है। माँ जी, एक दस साल का बच्चा ये बातें खुद नहीं गढ़ता। ये वही बातें हैं जो वो आप दोनों से सुनता आ रहा है। आप अपने दिल में मेरे लिए जो ज़हर रखती हैं, वो आप इस बच्चे के दिमाग में भी घोल रही हैं। क्या यही आपके संस्कार हैं?”

शिखा आगे आई, “भाभी, आप मेरे बेटे को बीच में मत लाइए। आप अपनी हद पार कर रही हैं।”

“हद तो तुमने पार की है शिखा!” अंजलि ने दृढ़ता से कहा। “तुम इस घर की बेटी हो, तुम्हारा हर अधिकार है यहाँ। लेकिन मैं भी किसी की बेटी हूँ। अगर तुम्हारी सास तुम्हारे साथ ऐसा सुलूक करे, तुम पर झूठे इल्जाम लगाए और तुम्हारा बेटा तुम्हारी ही आँखों के सामने तुम्हें बेइज्जत करे, तो क्या तुम चुप रहोगी? क्या तुम तब भी नाश्ता बनाने रसोई में चली जाओगी?”

शिखा के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था। वह नजरें चुराकर पीछे हट गई।

अंजलि ने सुमित्रा देवी की तरफ मुड़कर कहा, “माँ जी, मैंने विकास से प्यार किया था, कोई गुनाह नहीं। हम दोनों ने अपनी मर्जी से जीवनसाथी चुना, पर मैंने आपके बेटे को आपसे कभी दूर नहीं किया। लेकिन आप लोगों ने मुझे कभी इस परिवार का हिस्सा नहीं बनने दिया। मुझे दुख इस बात का नहीं है कि आपने मुझे नहीं अपनाया, दुख इस बात का है कि मेरी खामोशी और शराफत को आपने मेरी बेवकूफी समझ लिया। मुझे लगा था कि बड़ों के सामने जवाब ना देना इज्जत होती है, लेकिन आज समझ आया कि अगर हम गलत का विरोध ना करें, तो सामने वाले अपनी सारी हदें भूल जाते हैं।”

अंजलि ने एक गहरी सांस ली और अपने आंसू पोंछे। “आज के बाद, इस घर में मैं किसी का भी गलत व्यवहार बर्दाश्त नहीं करूंगी। मैं इस घर की बहू हूँ, कोई बाहर से आई हुई नौकरानी या अपराधी नहीं। मुझे मेरा सम्मान चाहिए। अगर आप लोग मुझे प्यार नहीं दे सकते, तो कम से कम मुझे बेइज्जत करने का अधिकार भी मैं आपको नहीं दूंगी। और विकास… अगर तुम आज भी यही कहोगे कि मैं चुप रहूँ, तो मुझे इस रिश्ते के बारे में दोबारा सोचना पड़ेगा।”

इतना कहकर अंजलि अपने कमरे में चली गई और दरवाजा बंद कर लिया।

बरामदे में सन्नाटा छा गया था। आर्यन डर कर अपनी माँ के पीछे छुप गया था। विकास सिर झुकाए खड़ा था। सुमित्रा देवी पत्थर की मूर्ति की तरह खड़ी रह गईं। अंजलि के एक-एक शब्द उनके कानों में गूंज रहे थे—’अगर तुम्हारी सास तुम्हारे साथ ऐसा सुलूक करे…’

सुमित्रा देवी को अचानक अपने पुराने दिन याद आ गए। जब वह नई-नई ब्याह कर आई थीं, तो उनकी सास भी उन्हें ऐसे ही ताने मारती थीं। उन्हें याद आया कि कैसे वह रातों को रोती थीं और उनके पति भी उन्हें ‘चुप रहने’ की ही सलाह देते थे। जिस पीड़ा से वह गुजरी थीं, आज अनजाने में वही पीड़ा वह अपनी बहू को दे रही थीं। और सबसे बड़ा झटका उन्हें तब लगा जब अंजलि ने आर्यन का जिक्र किया। उन्हें एहसास हुआ कि अपने अहम की खातिर वह एक मासूम बच्चे के मन में नफरत का बीज बो रही थीं।

शाम हो चुकी थी। घर में कोई चहल-पहल नहीं थी। अंजलि कमरे से बाहर नहीं आई थी। तभी दरवाजे पर हल्की सी दस्तक हुई। अंजलि ने दरवाजा खोला तो सामने सुमित्रा देवी खड़ी थीं। उनके हाथों में दीयों की एक थाली थी।

अंजलि कुछ समझ नहीं पाई और थोड़ा पीछे हट गई। सुमित्रा देवी ने थाली मेज पर रखी और अंजलि के पास आकर उसके दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। उनकी आँखों में पश्चाताप के आंसू थे।

“मुझे माफ कर दे बहू,” सुमित्रा देवी की आवाज़ रुंध गई थी।

अंजलि हैरान रह गई। “माँ जी… आप ये क्या…”

“नहीं अंजलि, आज मुझे बोलने दे। तूने आज जो कुछ भी कहा, उसने मेरी आँखों पर पड़ी पट्टी खोल दी है। मैंने अपने झूठे गुरूर और पुरानी सोच के चक्कर में ये देखा ही नहीं कि तू कितनी अच्छी लड़की है। तूने हमेशा इस घर को जोड़ने की कोशिश की, और मैं हमेशा तुझे तोड़ने में लगी रही। जब तूने शिखा का उदाहरण दिया, तो मेरा दिल कांप गया। कोई भी माँ अपनी बेटी के लिए वो सब नहीं चाह सकती जो मैंने तेरे साथ किया। तूने मेरे बेटे से प्यार किया, ये तेरा गुनाह नहीं था, ये मेरी छोटी सोच थी जिसे मैं अपनी परंपरा मान बैठी थी।”

सुमित्रा देवी ने अंजलि के माथे पर हाथ रखा। “तूने आज अगर अपनी खामोशी नहीं तोड़ी होती, तो मैं शायद कभी अपनी गलती नहीं समझ पाती। आज आर्यन ने जो कहा, उसके लिए मैं कसूरवार हूँ। मैंने ही उस बच्चे के सामने तेरे बारे में गलत बातें की थीं। लेकिन मैं वादा करती हूँ, आज के बाद इस घर में तुझे वो सम्मान मिलेगा जिसकी तू हकदार है। आज से तू मेरी बहू नहीं, मेरी दूसरी बेटी है।”

तभी पीछे से शिखा भी आ गई और उसने भी अंजलि का हाथ पकड़ लिया। “भाभी, मुझे भी माफ कर दीजिए। मैंने हमेशा आपको नीचा दिखाने की कोशिश की। मुझे नहीं पता था कि मेरी बातों से आपको कितनी तकलीफ होती है।”

विकास भी कमरे के दरवाजे पर खड़ा था, उसकी आँखों में अंजलि के लिए एक नया सम्मान और प्यार था। आर्यन दौड़कर अंदर आया और अंजलि के पैरों से लिपट गया। “सॉरी मामी, मैं अब कभी आपको कुछ गंदा नहीं बोलूंगा।”

अंजलि ने झुककर आर्यन को गले लगा लिया और उसके आंसू छलक पड़े। ये आंसू दुख के नहीं, बल्कि सुकून और जीत के थे।

“चल बहू, बाहर चल। तेरे बिना इस घर की दिवाली कैसे मनेगी? तूने जो रंगोली बनाई थी, उसे मैंने और शिखा ने मिलकर ठीक कर दिया है। आकर पहला दीया तू ही जला,” सुमित्रा देवी ने अंजलि का हाथ पकड़कर उसे बाहर लाते हुए कहा।

बरामदे में अब दीयों की रोशनी जगमगा रही थी। बाहर आसमान में पटाखों की गूंज थी, लेकिन उस घर के अंदर आज जो रोशनी हुई थी, उसने बरसों की कड़वाहट के अंधेरे को हमेशा के लिए मिटा दिया था। अंजलि ने पहला दीया जलाया, तो उस दीये की लौ ने सिर्फ घर को ही नहीं, बल्कि उन सबके रिश्तों को एक नए और पवित्र धागे में बांध दिया था।

क्या आपने भी कभी अपने अधिकारों के लिए अपनी खामोशी तोड़ी है?

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लेखिका : आर्या विनोद

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