“कैसी हो सुमित्रा?” निर्मला ने अपने माथे की सिलवटों को उंगलियों से सहलाते हुए फोन पर पूछा। उसकी आवाज में एक अजीब सी थकान और झुंझलाहट थी। दूसरी तरफ से सुमित्रा की खनकती हुई शांत आवाज आई, “मैं बिल्कुल ठीक हूँ दीदी, आप कैसी हैं? बहुत दिनों बाद आपने फोन किया। सब घर में कुशल मंगल तो है ना?” सुमित्रा की इस सहजता ने निर्मला के भीतर दबी हुई आग को और भड़का दिया। निर्मला ने एक लंबी सांस छोड़ी और बोली, “क्या खाक कुशल मंगल है सुमित्रा! तुम तो जानती ही हो, मेरे घर में एक ही बहू है विशाखा, लेकिन उसने मेरी नाक में दम कर रखा है। न समय पर उठती है, न मेरे किसी काम को ढंग से करती है। हर वक्त बस अपने कमरे में फोन पर लगी रहती है या अपने मायके वालों से बात करती है। मेरा बेटा तो जैसे उसका गुलाम हो गया है। मैं तो इस एक बहू से ही इतनी त्रस्त आ चुकी हूँ कि मुझे लगता है मेरा जीवन ही नर्क बन गया है।”
इतना कहने के बाद निर्मला थोड़ा रुकी, उसे उम्मीद थी कि सुमित्रा भी अपनी बहुओं की कोई न कोई बुराई जरूर करेगी। आखिर सुमित्रा के घर में तो दो-दो बहुएं थीं और एक कुंवारी बेटी भी थी। निर्मला ने आगे कहा, “सच कहूँ तो मुझे तुम्हारी बहुत चिंता होती है। मेरे यहाँ तो फिर भी एक है, तुम्हारे घर में तो दो-दो बहुएं हैं और ऊपर से तुम्हारी बेटी शिखा भी अभी तक घर में ही है। ननद-भौजाई के झगड़े और दो देवरानी-जेठानी की कलह… बाप रे! मैं तो सोचकर ही कांप जाती हूँ। तुम कैसे बर्दाश्त करती हो यह सब?”
सुमित्रा हल्के से हंसी। उसकी हंसी में कोई बनावट नहीं थी। वह बड़ी नरमी से बोली, “नहीं दीदी, ऐसा बिल्कुल नहीं है। मेरे घर में तो मेरी दोनों बहुएं, नीता और गरिमा, मेरी दो आँखों की तरह हैं। और शिखा तो अपनी भाभियों की जान है। हमारे घर में कोई कलह नहीं होती। हम सब बहुत प्यार और समझदारी से रहते हैं। बल्कि, सच कहूँ तो मेरी बहुओं ने तो मेरे घर को स्वर्ग बना दिया है। मुझे तो रसोई में जाने की जरूरत ही नहीं पड़ती, दोनों सब कुछ खुद ही संभाल लेती हैं।”
सुमित्रा की ये बातें निर्मला के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतरीं। उसने किसी तरह बात खत्म की और फोन काट दिया। फोन रखते ही निर्मला का चेहरा ईर्ष्या और अविश्वास से लाल हो गया। “ऐसा कैसे हो सकता है?” वह बड़बड़ाई। “दुनिया की कोई भी दो बहुएं एक साथ शांति से नहीं रह सकतीं, और वो भी तब जब घर में कुंवारी ननद बैठी हो। सुमित्रा जरूर झूठ बोल रही है। रिश्तेदारों में अपनी झूठी शान बघारने के लिए वह यह सब नाटक कर रही है।”
निर्मला के मन में शक का कीड़ा कुलबुलाने लगा। सभी रिश्तेदार हमेशा सुमित्रा के घर की मिसालें देते थे कि सुमित्रा का परिवार कितना आदर्श है। निर्मला को अपनी बहू विशाखा से तो चिढ़ थी ही, लेकिन सुमित्रा की इस ‘परफेक्ट’ जिंदगी से उसे और भी ज्यादा जलन होने लगी थी। उसने मन ही मन एक योजना बनाई। उसने तय किया कि वह कुछ दिनों के लिए सुमित्रा के घर जाकर रहेगी। वह अपनी आँखों से देखना चाहती थी कि इस तथाकथित ‘स्वर्ग’ के पीछे की असली सच्चाई क्या है। उसे यकीन था कि अगर वह वहां चार-पांच दिन रहेगी, तो सुमित्रा की बहुओं का असली रंग जरूर सामने आ जाएगा और वह सुमित्रा के इस झूठे घमंड को तोड़कर ही वापस आएगी।
अगले ही हफ्ते निर्मला अपना सूटकेस लेकर सुमित्रा के घर पहुंच गई। सुमित्रा ने अपनी बड़ी बहन का बहुत गर्मजोशी से स्वागत किया। जैसे ही निर्मला ने घर में कदम रखा, बड़ी बहू नीता दौड़कर आई और उसके पैर छूकर बोली, “प्रणाम मौसी जी, सफर में कोई तकलीफ तो नहीं हुई?” तभी छोटी बहू गरिमा हाथ में शरबत का गिलास लिए मुस्कुराती हुई बाहर आई और उसने भी पैर छुए। शिखा ने आकर निर्मला का सूटकेस ले लिया और उसे गेस्ट रूम में पहुँचा दिया। यह सब देखकर निर्मला को अंदर ही अंदर बहुत अजीब लगा, लेकिन उसने अपने चेहरे पर एक नकली मुस्कान बनाए रखी। उसने सोचा, “यह तो बस पहला दिन है, मेहमान को देखकर सब ऐसा ही दिखावा करते हैं। दो दिन बीतने दो, इनकी सारी पोल खुल जाएगी।”
निर्मला ने अपनी जासूसी शुरू कर दी। अगले दिन सुबह वह जल्दी उठ गई और चुपके से रसोई के पास जाकर छिपकर देखने लगी। उसने सोचा कि सुबह-सुबह काम को लेकर देवरानी-जेठानी में जरूर कोई न कोई बहस होगी। लेकिन उसने जो देखा, वह उसके गले के नीचे नहीं उतरा। नीता और गरिमा दोनों रसोई में थीं। एक तरफ नीता चाय बना रही थी और दूसरी तरफ गरिमा नाश्ते के लिए सब्जियां काट रही थी। दोनों आपस में किसी टीवी सीरियल की बात करके हंस रही थीं।
“दीदी, आज मौसी जी के लिए वो स्पेशल पोहा बना लें जो आपको बहुत पसंद है?” गरिमा ने नीता से पूछा।
“हाँ बिल्कुल, और सुनो, उन्हें ज्यादा तीखा पसंद नहीं है, तो हरी मिर्च थोड़ी कम डालना,” नीता ने प्यार से समझाते हुए कहा।
निर्मला वहां से खीझकर लौट आई। उसने हार नहीं मानी। दोपहर के समय जब सुमित्रा आराम कर रही थी, निर्मला ने शिखा को अपने पास बुलाया और बातों ही बातों में कुरेदने की कोशिश की। “शिखा बेटा, तुम तो दिन भर घर में रहती हो। तुम्हारी दोनों भाभियां तुम्हें कोई काम-वाम तो नहीं करने देतीं? आजकल की बहुएं तो ननदों से जलती हैं, कहीं वो तुम्हें ताने तो नहीं मारतीं?”
शिखा हंस पड़ी और बोली, “क्या बात कर रही हैं मौसी जी! मेरी भाभियां तो मेरी सहेलियों जैसी हैं। कल ही बड़ी भाभी ने मुझे अपनी एक बहुत महंगी साड़ी पहनने को दी थी, और छोटी भाभी तो रोज रात को मुझे मेरे कॉलेज के प्रोजेक्ट में मदद करती है। माँ से ज्यादा तो मैं अपनी भाभियों से अपनी बातें शेयर करती हूँ।” निर्मला का यह दांव भी खाली गया।
तीसरे दिन निर्मला ने देवरानी-जेठानी के बीच फूट डालने की सोची। जब नीता अकेली कपड़े सुखा रही थी, तो निर्मला उसके पास गई और फुसफुसाते हुए बोली, “नीता, मैं देख रही हूँ कि सारा भारी काम तुम ही करती हो। गरिमा तो बस बैठकर आराम करती है। तुम बड़ी हो, तुम्हें सुमित्रा पर दबाव डालना चाहिए कि वह गरिमा से भी बराबर का काम करवाए। कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारी शराफत का ये लोग फायदा उठाएं।”
नीता ने कपड़े सुखाने का क्लिप लगाया और निर्मला की तरफ मुड़कर बहुत ही सौम्यता से बोली, “मौसी जी, घर का काम किसी का बँटा हुआ नहीं होता। गरिमा अभी पिछले महीने ही बीमार थी, इसलिए मैं उसे ज्यादा काम नहीं करने देती। और रही बात काम की, तो जब मैं अपने मायके जाती हूँ, तो सारा घर गरिमा ही तो संभालती है। हम दोनों में कोई फर्क नहीं है।” निर्मला यह सुनकर शर्मिंदा होने के बजाय और चिढ़ गई।
चार दिन बीत चुके थे और निर्मला को सुमित्रा के घर में एक भी सुराग ऐसा नहीं मिला जिससे वह साबित कर सके कि यह घर नर्क है। घर का माहौल सच में किसी मंदिर की तरह शांत और पवित्र था। सुमित्रा अपनी बहुओं पर हुक्म चलाने के बजाय उनके साथ सहेली की तरह रहती थी। वह उनके फैसलों का सम्मान करती थी और बहुएं सुमित्रा को अपनी माँ से भी बढ़कर मानती थीं।
पांचवें दिन एक ऐसी घटना घटी जिसने निर्मला की आँखें हमेशा के लिए खोल दीं। शाम को सुमित्रा के कुछ खास मेहमान आने वाले थे। सुमित्रा ने गरिमा को अपनी एक बहुत ही खास और महंगी बनारसी साड़ी प्रेस करने के लिए दी थी। गरिमा प्रेस कर ही रही थी कि अचानक उसका ध्यान भटका और साड़ी का एक हिस्सा जल गया। साड़ी से धुआं उठने लगा। गरिमा घबराकर रोने लगी। निर्मला जो दूर खड़ी यह सब देख रही थी, मन ही मन बहुत खुश हुई। उसने सोचा, “अब आएगा मजा! सुमित्रा की सबसे पसंदीदा साड़ी जल गई है। अब तो इस घर में महाभारत होकर रहेगी। अब सुमित्रा अपनी इस लाडली बहू को कच्चा चबा जाएगी।”
निर्मला दौड़कर ड्राइंग रूम में गई जहाँ सुमित्रा और नीता बैठे थे। “गजब हो गया सुमित्रा! तुम्हारी वो लाल बनारसी साड़ी… गरिमा ने जला दी! मैंने कहा था न, आजकल की लड़कियों को कोई काम ढंग से नहीं आता,” निर्मला ने आग में घी डालने का काम किया।
सुमित्रा घबराकर उठी और गरिमा के कमरे की तरफ भागी। नीता भी पीछे-पीछे आई। कमरे में गरिमा साड़ी को छाती से लगाए फूट-फूटकर रो रही थी। निर्मला दरवाजे पर खड़ी तमाशा देखने के लिए तैयार थी। सुमित्रा ने गरिमा के पास जाकर उसके हाथ से साड़ी ली। जली हुई साड़ी को देखकर सुमित्रा के चेहरे पर एक पल के लिए दुख जरूर आया, लेकिन अगले ही पल उसने जो किया, वह निर्मला की कल्पना से परे था।
सुमित्रा ने साड़ी को एक तरफ रखा और गरिमा को गले से लगा लिया। “रो क्यों रही है पगली? साड़ी ही तो थी, जल गई तो जल गई। कहीं तेरा हाथ तो नहीं जला?” सुमित्रा ने गरिमा के आंसू पोंछते हुए कहा।
तभी नीता आगे आई और बोली, “गरिमा, तू चिंता मत कर। मेरे पास जो नीली वाली रेशमी साड़ी है, वो माँ जी पर बहुत जचेगी। हम अभी वो साड़ी निकाल लेते हैं। और इस जली हुई साड़ी का मैं कोई अच्छा सा सूट बनवा दूंगी। तू रोना बंद कर, मेहमान आने वाले हैं, तुम्हारी आँखें सूज जाएंगी तो अच्छा नहीं लगेगा।”
सुमित्रा और नीता ने मिलकर गरिमा को हंसा दिया और माहौल तुरंत सामान्य हो गया। दरवाजे पर खड़ी निर्मला मानो पत्थर की मूरत बन गई थी। उसके भीतर का सारा अहंकार, सारी ईर्ष्या और सारा घमंड उस जले हुए कपड़े की तरह खाक हो गया था। उसे अपनी बहू विशाखा का ध्यान आया। एक बार विशाखा से सब्जी में नमक ज्यादा हो गया था, तो निर्मला ने तीन दिन तक पूरे घर में हंगामा मचा रखा था और विशाखा को खूब ताने मारे थे। आज उसे समझ में आ रहा था कि उसके घर में कलह का कारण उसकी बहू नहीं, बल्कि उसका अपना कठोर और ईर्ष्यालु स्वभाव था।
उस रात निर्मला सो नहीं पाई। वह चुपचाप उठी और सुमित्रा के कमरे में गई। सुमित्रा जाग रही थी। निर्मला जाकर सुमित्रा के बिस्तर के पास जमीन पर बैठ गई और उसके हाथ पकड़कर रोने लगी। “मुझे माफ कर दे सुमित्रा। मैं यहाँ तेरे घर की शांति भंग करने और तेरी बहुओं में कमियां निकालने आई थी। मैं तेरी खुशियों से जलती थी। लेकिन आज तूने मुझे जिंदगी का सबसे बड़ा सबक सिखा दिया है।”
सुमित्रा ने निर्मला को उठाकर बिस्तर पर अपने पास बैठाया और प्यार से बोली, “दीदी, आप ये क्या कह रही हैं? आपने ऐसा क्या कर दिया?”
निर्मला सुबकते हुए बोली, “तूने अपनी बहुओं को जो प्यार और सम्मान दिया है, वो मैंने विशाखा को कभी नहीं दिया। मैं हमेशा उसमें कमियां निकालती रही, उसे अपनी नौकरानी समझती रही। आज मैंने देखा कि कैसे एक साड़ी के जलने पर भी तूने गरिमा को गले लगा लिया, और कैसे नीता ने अपनी देवरानी का साथ दिया। तुम्हारे घर की नींव ईंट-पत्थरों से नहीं, बल्कि एक-दूसरे के प्रति सम्मान और प्रेम से बनी है। मुझे समझ आ गया है कि ताली हमेशा दोनों हाथों से बजती है। अगर सास माँ बन जाए, तो बहू को बेटी बनते देर नहीं लगती।”
सुमित्रा ने मुस्कुराते हुए निर्मला को सांत्वना दी, “दीदी, रिश्ते किसी पौधे की तरह होते हैं। उन्हें तानों और हुक्म के तेजाब से नहीं, बल्कि समझदारी और प्यार के पानी से सींचा जाता है। आप बस एक बार विशाखा को अपनी बेटी मानकर तो देखिए, मैं वादा करती हूँ, आपका घर भी स्वर्ग बन जाएगा।”
अगले दिन सुबह निर्मला जब अपने घर के लिए वापस निकली, तो वह वह निर्मला नहीं थी जो पांच दिन पहले आई थी। उसके चेहरे पर अब कोई ईर्ष्या नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत की चमक थी। उसने तय कर लिया था कि घर पहुंचते ही वह सबसे पहले अपनी बहू विशाखा को गले लगाएगी और अपने घर के आंगन को भी सुमित्रा के घर की तरह खुशियों से भर देगी।
आपकी राय हमारे लिए महत्वपूर्ण है!
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद। आप कहानी के बारे में अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।
लेखिका : सीमा श्रीवास्तव