सुबह के करीब छह बज रहे थे। नवंबर की हल्की ठंड ने दस्तक दे दी थी, लेकिन मीरा के माथे पर पसीने की कुछ बूंदें साफ झलक रही थीं। गैस के एक चूल्हे पर कुकर की सीटी बजने को तैयार थी, तो दूसरे पर वह ओट्स और ताजी सब्जियों का चीला बना रही थी। घर के बाकी सदस्य अभी गहरी नींद में थे, लेकिन एक गृहिणी की सुबह तो सूरज की पहली किरण से भी पहले शुरू हो जाती है। मीरा सात साल के बेटे आरव और चार साल की बेटी मायरा का टिफिन पैक करने के साथ-साथ अपने पति रोहन के नाश्ते की तैयारी में जुटी थी। तभी रसोई के दरवाजे पर आहट हुई। उसकी सास, सावित्री देवी, हाथ में पूजा की थाली लिए खड़ी थीं। उनकी पैनी नजरें सीधे रोहन के लिए बन रहे नाश्ते पर जाकर टिक गईं।
सावित्री देवी के चेहरे पर एक अजीब सी सिकुड़न आ गई, जो उनके असंतोष को साफ बयां कर रही थी। उन्होंने एक गहरी सांस ली और ताने भरे लहजे में कहा, “अरे बहू, मेरे हट्टे-कट्टे बेटे को तुमने कोई बीमार मरीज समझ रखा है क्या? जब देखो यह घास-फूस और उबला हुआ खाना परोस देती हो। बेचारा मेरा बेटा, कुछ कहता नहीं है तो तुम जो मर्जी आए उसे खिला देती हो। मुझे तो समझ ही नहीं आता कि इस चिड़ियों वाले दाने से उसका पेट कैसे भरता होगा।”
मीरा ने गैस धीमी की और एक पल के लिए अपनी आंखें बंद कर लीं। यह कोई नई बात नहीं थी। हर दूसरे दिन नाश्ते के समय यही बहस होती थी। उसने खुद को शांत रखते हुए बड़ी ही विनम्रता से जवाब दिया, “मां जी, ऐसा नहीं है। कल रात को रोहन के दोस्तों की पार्टी थी, वहां उन्होंने काफी भारी और तला-भुना खाना खा लिया था। डॉक्टर ने भी उन्हें आगाह किया है कि उनका कोलेस्ट्रॉल बॉर्डरलाइन पर है। अगर अभी से खान-पान का ध्यान नहीं रखेंगे, तो आगे चलकर परेशानी हो सकती है। इसलिए आज मैंने उनके लिए यह हल्का और पौष्टिक नाश्ता बनाया है, ताकि उनका पेट भी ठीक रहे और शरीर को नुकसान भी न पहुंचे।”
लेकिन सावित्री देवी कहां कुछ सुनने वाली थीं। उनका अपना ही एक तर्क था, जो उनके जमाने से चला आ रहा था। “अरे रहने दे बहू, मुझे मत सिखा यह डॉक्टरों की बातें,” उन्होंने हाथ झटकते हुए कहा। “मेरा रोहन जब स्कूल और कॉलेज जाता था, तो मैं उसे सुबह-सुबह असली घी में डूबे हुए आलू और गोभी के पराठे, साथ में सफेद मक्खन और घर का बना गाढ़ा दही देती थी। तब जाकर उसके चेहरे पर लालिमा रहती थी। उसकी जो भी फरमाइश होती थी, वह मेरे मुंह से निकलने से पहले ही मैं पूरी कर देती थी। आजकल तो तुम लोग घी-तेल के नाम से ऐसे घबराते हो जैसे कोई जहर हो। इसी वजह से आजकल के बच्चों में जान ही नहीं बची है।”
मीरा खामोश रही। वह जानती थी कि इस विषय पर बहस करना बेकार है। लेकिन सावित्री देवी का गुस्सा अभी शांत नहीं हुआ था। उन्होंने बात का रुख मोड़ते हुए वह तीर छोड़ा, जो अक्सर हर सास के तरकश में होता है।
“और हां,” सावित्री देवी ने अपनी आवाज थोड़ी और तीखी करते हुए कहा, “कल मैंने देखा था, तू अपने मायके वालों से फोन पर बात कर रही थी। जब भी तुम्हारी मां या बहन का फोन आता है, तुम्हारा चेहरा ऐसे उतर जाता है जैसे हमने तुम पर कोई बहुत बड़ा जुल्म कर दिया हो। घंटों कमरे में बंद होकर बात करती हो। फिर बाहर आकर ऐसे जताती हो जैसे तुम्हें तो घर के कामों से सिर खुजलाने की भी फुर्सत नहीं है। मुझे तो पूरा यकीन है कि तुम वहां हमारी ही बुराइयां और शिकायतें करती होगी। वरना इतना क्या फुसफुसाना?”
यह सुनकर मीरा को अंदर तक ठेस पहुंची। वह अपने मायके वालों से शिकायत करेगी? और वह भी इस घर की? उसने भारी मन से कहा, “मां जी, आप ऐसा क्यों सोचती हैं? मैं आपकी या इस घर की शिकायत अपने मायके में क्यों करूंगी? आखिर यह घर मेरा ही तो है, रोहन मेरे पति हैं, आप मेरी मां समान हैं। अपनों की शिकायत करके कोई इंसान कैसे खुश रह सकता है? कल मां की तबीयत थोड़ी ठीक नहीं थी, बस उसी बात को लेकर मैं चिंतित थी। इसलिए मेरे चेहरे पर परेशानी थी, इसका इस घर से कोई लेना-देना नहीं है।”
सावित्री देवी ने एक व्यंग्यात्मक हंसी हंसी। “रहने दे बहू, मुझे सब पता है। हमने भी अपने जमाने में घर-परिवार संभाला है। बीस लोगों का संयुक्त परिवार था हमारा। दिन भर चक्की पीसते थे, चूल्हे पर खाना बनाते थे, लेकिन मजाल है जो हमारे माथे पर कभी शिकन भी आई हो। हम तो हर रिश्तेदार का हंसते-मुस्कुराते स्वागत करते थे। आजकल की बहुओं को तो जरा सा काम क्या कह दो, उनके चेहरों पर तो बारह बज जाते हैं। खैर, छोड़ो! मैं भी किसे समझा रही हूं, जिसे जो समझना है वह वही समझेगा।”
इतना कहकर सावित्री देवी बड़बड़ाते हुए पूजा घर की ओर चली गईं। उनके जाने के बाद मीरा वहीं स्लैब पकड़कर कुछ देर खड़ी रही। उसकी आंखों में आंसू तैरने लगे थे, जिन्हें उसने बड़ी मुश्किल से पलकों के पीछे ही रोक लिया। उसने गहरी सांस ली और खुद से मन ही मन कहा, “किसी ने सच ही कहा है, एक औरत ही दूसरी औरत की परेशानी नहीं समझ सकती। मां जी को लगता है कि मैं जानबूझकर रोहन को अच्छा खाना नहीं देती, जबकि मैं तो उसकी लंबी उम्र और सेहत के लिए अपनी नींदे खराब करके ये सब तैयार करती हूं। मायके में बात करूं तो उन्हें लगता है मैं चुगली कर रही हूं, जबकि मैं तो बस अपने मन का बोझ हल्का करने के लिए मां से दो मीठे बोल सुन लेती हूं। मेरी यह मानसिक थकान, यह उलझन कोई क्यों नहीं देखता?”
मीरा ने अपने आंसुओं को पोंछा, क्योंकि उसे पता था कि अगर वह टूट गई तो सुबह की सारी दिनचर्या बिगड़ जाएगी। वह तुरंत बच्चों के कमरे में गई, उन्हें प्यार से उठाया और उनके स्कूल की तैयारियों में लग गई।
दिन अपनी रफ्तार से बीता। दोपहर के समय मीरा ने पूरे घर की साफ-सफाई की, मां जी के घुटनों के लिए गर्म तेल की मालिश की और उनके लिए उनकी पसंद की नरम रोटियां सेंकी। लेकिन सुबह की वह कड़वाहट उसके दिल के किसी कोने में अभी भी अटकी हुई थी।
शाम को जब रोहन ऑफिस से लौटा, तो वह काफी थका हुआ लग रहा था। सावित्री देवी तुरंत अपने बेटे के पास पहुंच गईं। “आ गया मेरा बच्चा! रुक, मैं तेरे लिए गरमा-गरम बेसन के लड्डू और मठरी लाती हूं। तू थक गया होगा, कुछ खा लेगा तो जान में जान आएगी।”
रोहन ने सोफे पर सिर टिकाते हुए कहा, “नहीं मां, प्लीज। आज कुछ भी भारी खाने का मन नहीं है। बल्कि आज तो पूरे दिन पेट बहुत हल्का और अच्छा महसूस हो रहा था। वो तो अच्छा हुआ कि सुबह मीरा ने मुझे वो ओट्स और सब्जियों वाला चीला खिला दिया था। कल रात के खाने की वजह से मुझे जो एसिडिटी हो रही थी, वो उस हल्के नाश्ते की वजह से बिल्कुल ठीक हो गई। मुझे तो लगता है अब से मुझे रोज सुबह वही खाना चाहिए।”
यह सुनकर सावित्री देवी के कदम वहीं रुक गए। उन्हें सुबह कही गई अपनी ही बातें याद आने लगीं, जब उन्होंने मीरा को ‘घास-फूस’ बनाने के लिए ताने दिए थे। उन्हें एहसास हुआ कि मीरा जो भी कर रही थी, वह रोहन की भलाई के लिए ही था।
रात का खाना खाने के बाद, जब घर में शांति छा गई, तो सावित्री देवी पानी लेने के लिए उठीं। तभी उन्हें मीरा के कमरे से हल्की-हल्की आवाज सुनाई दी। दरवाजा थोड़ा खुला था। उन्होंने देखा कि मीरा अपनी मां से फोन पर बात कर रही है। सुबह के शक के कारण सावित्री देवी ठिठक कर सुनने लगीं।
फोन के दूसरी तरफ से मीरा की मां की आवाज आ रही थी, “बेटा, तू बहुत थक जाती होगी ना? बच्चे, रोहन और तेरी सास… अकेले सब कैसे मैनेज करती है? तेरी सास तुझे परेशान तो नहीं करती?”
मीरा ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “अरे नहीं मां, आप कैसी बातें कर रही हैं। मां जी तो मेरा बहुत ख्याल रखती हैं। बल्कि वो तो बच्चों को इतने अच्छे से संभालती हैं कि मैं बेफिक्र होकर घर के बाकी काम कर पाती हूं। रही बात काम की, तो वो तो हर घर में होता है। वो रोहन से बहुत प्यार करती हैं, इसलिए कभी-कभी फिक्रमंद होकर कुछ कह देती हैं, लेकिन उनका दिल बहुत साफ है। आप मेरी चिंता बिल्कुल मत किया करो, मैं यहां बहुत खुश हूं। आप बस अपनी दवाइयां समय पर लिया करो।”
यह सुनकर सावित्री देवी के पैरों तले जमीन खिसक गई। जिस बहू को वह सुबह से ताने दे रही थीं, जिस पर वह मायके में बुराई करने का शक कर रही थीं, वह तो उनकी कमियों को भी अपनी मां के सामने ढक रही थी। उनकी आंखों से पश्चाताप के आंसू बहने लगे। उन्हें समझ आ गया था कि उनका जमाना अलग था और आज की चुनौतियां अलग हैं। मीरा शिकायत नहीं करती थी, वह बस इस नए दौर की भागदौड़ में तालमेल बिठाने की कोशिश कर रही थी।
अगली सुबह, जब मीरा किचन में पहुंची, तो उसने देखा कि गैस जली हुई है और सावित्री देवी खुद ओट्स और सब्जियां काट रही हैं। मीरा हैरान रह गई, “मां जी, आप यह क्या कर रही हैं? आप रहने दीजिए, मैं कर लूंगी।”
सावित्री देवी ने मुस्कुराते हुए मीरा के सिर पर हाथ फेरा और कहा, “अरे, तूने ही तो कहा था कि रोहन के लिए यही सही है। कल रात मैंने तेरी और तेरी मां की बातें सुन ली थीं। मुझे माफ कर दे बेटा, मैं अपने बुढ़ापे और पुरानी सोच के घमंड में यह भूल गई थी कि तू इस घर की बहू बाद में, मेरे बेटे की परछाई और इस घर की नींव पहले है। मैं औरत होकर भी तेरी थकान नहीं समझ पाई।”
मीरा की आंखें छलक आईं। उसने आगे बढ़कर अपनी सास को गले लगा लिया। आज रसोई में सिर्फ नाश्ता नहीं पक रहा था, बल्कि दो पीढ़ियों के बीच समझ और अपनेपन का एक नया रिश्ता जन्म ले रहा था। दोनों को यह बात समझ में आ गई थी कि परिवार सिर्फ अधिकारों से नहीं, बल्कि एक-दूसरे के प्रति सम्मान और खामोश कुर्बानियों को समझने से चलता है।
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