आरव ने पलटकर अपनी माँ की आँखों में देखा। उसकी मासूमियत में एक ऐसी सच्चाई थी जो किसी भी इंसान की रूह कंपा सकती थी। उसने सहजता से कहा, “नहीं मम्मा, ये कमरा आपके और पापा के लिए है। जब आप और पापा दादा-दादी की तरह बूढ़े हो जाओगे, तो मेरी पत्नी भी तो आप दोनों को देखकर तुनक जाएगी ना। मैं नहीं चाहता कि आपको मेरी पत्नी के ताने सुनने पड़ें या उसे आपको ‘झेलना’ पड़े। और बुआ की तरह मेरी बहन भी आपको अपने घर नहीं ले जाएगी। इसलिए मैंने आपके लिए पहले ही अलग कमरा बना दिया है।”
पसीने से लथपथ राधिका एक हाथ से साड़ी का पल्लू संभाल रही थी और दूसरे हाथ से रोटियां सेंक रही थी। तभी बाहर वाले कमरे से ससुर जी, यानी पंडित दीनानाथ की खांसने की आवाज़ आई। साथ ही सास, सुभद्रा देवी की कमज़ोर सी पुकार गूँजी, “बहू… ज़रा एक गिलास गुनगुना पानी तो दे जाना, तुम्हारे बाबूजी को दवा खानी है।”
राधिका ने गहरी साँस छोड़ी और बुदबुदाते हुए गैस धीमी की। उसके चेहरे पर चिड़चिड़ाहट साफ झलक रही थी। वह पानी गर्म करने लगी। तभी उसका आठ साल का बेटा आरव, जो काफी देर से अपनी माँ को देख रहा था, रसोई के दरवाज़े पर आकर खड़ा हो गया। उसकी मासूम आँखों में एक अजीब सी उलझन थी।
“मम्मा ये बताओ, दादा-दादी आपको बहुत परेशान करते हैं ना?” आरव ने अपनी तोतली लेकिन स्पष्ट आवाज़ में पूछा।
राधिका ने पानी का गिलास ट्रे में रखते हुए एक ठंडी साँस ली, “हाँ बेटा, पर क्या कर सकते हैं। अब हैं यहाँ तो झेलना ही पड़ेगा।”
आरव ने अपनी गर्दन टेढ़ी की, “पर क्यूँ मम्मा… क्यूँ झेलना पड़ेगा?”
राधिका को लगा कि बच्चे को ये सब समझाना बेकार है। उसने बात टालने के लहज़े में कहा, “तुम नहीं समझोगे आरव, रहने दो।”
लेकिन आरव इतनी जल्दी हार मानने वाला नहीं था। उसने अपनी बाल सुलभ बुद्धि दौड़ाई और चहकते हुए बोला, “एक काम करते हैं मम्मा, इन दोनों को छोटे चाचा-चाची के घर भेज देते हैं। फिर आपको कोई परेशान नहीं करेगा।”
राधिका के होंठों पर एक कड़वी और बेबस सी मुस्कान तैर गई। “वो वहाँ दो दिन भी नहीं रह पाएंगे बेटा। तुम्हारी चाची तो दादा-दादी को देखते ही तुनक जाती है। और तुम्हारे चाचा? वो तो तुम्हारी चाची के पल्ले से ऐसे बंधे हैं कि बस उतना ही सुनते हैं जितना चाची कहती है। वहाँ इनका कोई गुज़ारा नहीं होने वाला।”
आरव थोड़ा सोच में पड़ गया। फिर जैसे उसे कोई बहुत बड़ा समाधान मिल गया हो, उसने कहा, “तो बुआ को बोल दो ना! ये उनके भी तो माँ-पापा हैं ना। वो ही ले जाएं कुछ दिनों के लिए इन दोनों को।”
राधिका ने ट्रे उठाई और आरव के गाल को हल्के से छूते हुए कहा, “तुम भी ना बड़े भोले हो बेटा। वहाँ नहीं जाएंगे दादा-दादी। ढकोसला करेंगे कि हम तो बेटी के घर का पानी भी नहीं पी सकते, तो वहाँ जाकर रहेंगे कैसे? और अगर रहने को तैयार हो भी गए, तो तुम्हारी बुआ के पचासों बहाने निकल आएंगे। वो कम थोड़े ना है, वो भी तो अपनी माँ पर ही गई है।”
इतना कहकर राधिका पानी देने बाहर चली गई। आरव चुपचाप अपने कमरे में लौट गया। राधिका ने सास-ससुर को पानी दिया और फिर से अपने काम में उलझ गई। शाम को जब घर के सारे काम निपट गए, तो राधिका आरव को पढ़ाने के लिए उसके कमरे में गई।
आरव अपनी ड्राइंग बुक में कुछ बना रहा था। वह इतना मगन था कि उसे राधिका के आने की आहट भी नहीं हुई। राधिका ने पीछे से झाँक कर देखा। आरव ने एक बहुत बड़ा और सुंदर सा घर बनाया था। उस घर के बाहर, काफी दूरी पर, एक छोटा सा टूटा-फूटा डब्बे जैसा कमरा भी बनाया था।
राधिका मुस्कुराई, “अरे वाह मेरे बेटे! ये इतना बड़ा घर किसका है?”
“ये मेरा और मेरी पत्नी का घर है मम्मा, जब मैं बड़ा हो जाऊंगा,” आरव ने गर्व से कहा।
राधिका को हंसी आ गई। “अच्छा! और ये जो बाहर एक छोटा सा कमरा है, वो किसके लिए है? तुम्हारे कुत्ते के लिए?”
आरव ने पलटकर अपनी माँ की आँखों में देखा। उसकी मासूमियत में एक ऐसी सच्चाई थी जो किसी भी इंसान की रूह कंपा सकती थी। उसने सहजता से कहा, “नहीं मम्मा, ये कमरा आपके और पापा के लिए है। जब आप और पापा दादा-दादी की तरह बूढ़े हो जाओगे, तो मेरी पत्नी भी तो आप दोनों को देखकर तुनक जाएगी ना। मैं नहीं चाहता कि आपको मेरी पत्नी के ताने सुनने पड़ें या उसे आपको ‘झेलना’ पड़े। और बुआ की तरह मेरी बहन भी आपको अपने घर नहीं ले जाएगी। इसलिए मैंने आपके लिए पहले ही अलग कमरा बना दिया है।”
कमरे में एक खौफनाक सन्नाटा छा गया। राधिका के चेहरे की मुस्कान जैसे जम सी गई थी। उसके पैरों तले से ज़मीन खिसक चुकी थी। आरव ने जो कहा था, वह कोई मज़ाक नहीं था। वह वही सीख रहा था जो वह देख रहा था।
राधिका के कानों में अपने ही शब्द गूंजने लगे— “झेलना पड़ेगा… चाची तुनक जाती है… बुआ बहाने बनाएगी…”
उसे अचानक अतीत के वो दिन याद आने लगे जब वह नई-नई इस घर में ब्याह कर आई थी। सुभद्रा देवी ने अपनी सोने की चूड़ियां बेचकर राधिका के लिए एक बुटीक खुलवाया था ताकि वह अपने पैरों पर खड़ी हो सके। जब आरव पैदा हुआ था, तो पंडित दीनानाथ रात-रात भर उसे गोद में लेकर टहलते थे ताकि राधिका सो सके। उन्होंने अपनी पूरी जवानी, अपनी सारी पूँजी अपने बच्चों पर लुटा दी थी। और आज जब वे कमज़ोर हो गए थे, जब उनके हाथ कांपने लगे थे, तो वे अपनी ही औलादों के लिए एक ‘बोझ’ बन गए थे, जिसे सब एक-दूसरे पर थोपना चाहते थे।
राधिका की आँखों से पश्चाताप के आँसू बह निकले। उसने देखा कि जाने-अनजाने में वह अपने ही बुढ़ापे के लिए एक बबूल का पेड़ बो रही थी। अगर आज वह अपने सास-ससुर को बोझ समझेगी, तो कल उसका बेटा भी उसे एक ऐसा ही बोझ समझेगा।
उसने कांपते हाथों से आरव की ड्राइंग बुक बंद कर दी और उसे कसकर सीने से लगा लिया। वह फूट-फूट कर रोने लगी। आरव घबरा गया, “क्या हुआ मम्मा? मैंने कुछ गलत बनाया क्या?”
“नहीं मेरे लाल,” राधिका ने सुबकते हुए कहा, “तूने कुछ गलत नहीं बनाया, बल्कि तूने आज अपनी माँ को सही रास्ता दिखा दिया।”
राधिका उसी पल उठी। उसने अपने आँसू पोंछे और सीधे अपने सास-ससुर के कमरे में गई। पंडित जी और सुभद्रा देवी अँधेरे में चुपचाप बैठे थे, शायद अपनी किस्मत और अपने बेगानों जैसे हो चुके बच्चों के बारे में ही सोच रहे थे।
राधिका ने कमरे की लाइट जलाई। उसके चेहरे पर अब कोई चिड़चिड़ाहट नहीं थी। वह जाकर सुभद्रा देवी के पैरों के पास ज़मीन पर बैठ गई और उनके कमज़ोर पैरों को अपने हाथों में लेकर दबाने लगी। सुभद्रा देवी हैरान रह गईं।
“अरे बहू, ये क्या कर रही है? तू थक गई होगी, जा आराम कर ले,” सास ने हिचकिचाते हुए कहा।
राधिका ने नम आँखों से मुस्कुराते हुए कहा, “नहीं माँ जी, असल में मैं बहुत गहरी नींद में सो रही थी। आज जाकर मेरी आँख खुली है। आप दोनों इस घर का बोझ नहीं, इस घर की नींव हैं। और नींव के बिना कोई भी महल खड़ा नहीं रह सकता।”
दरवाज़े पर खड़ा आरव यह सब देख रहा था और मुस्कुरा रहा था। राधिका जान गई थी कि घर के बुज़ुर्गों की सेवा कोई एहसान नहीं है, बल्कि यह वह आईना है जिसमें हमारी आने वाली पीढ़ी अपना अक्स ढूँढती है। आज उसने उस आईने को साफ कर दिया था, हमेशा के लिए।
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