दूसरी तरफ, कावेरी देवी की आँखों के कोर भी नम थे, लेकिन उन्होंने बहुत ही मज़बूती से खुद को संभाला हुआ था। एक माँ होने के नाते उनका दर्द शायद रघुवीर जी से भी कहीं ज्यादा था। नौ महीने कोख में रखने से लेकर उसे एक समझदार लड़की बनाने तक, कावेरी ने अपनी पूरी ज़िंदगी नव्या के नाम कर दी थी। उसका भी मन कर रहा था कि वह ज़मीन पर बैठकर फूट-फूट कर रोए, अपनी बच्ची को वापस पुकारे। लेकिन वह जानती थी कि अगर इस वक्त वह भी टूट गई, तो रघुवीर जी को कौन संभालेगा? वे तो वैसे ही सुध-बुध खो बैठे हैं।
विवाह स्थल ‘आशीर्वाद भवन’ के मुख्य द्वार से फूलों से सजी वह सफेद कार जैसे ही सड़क के मोड़ पर जाकर आँखों से ओझल हुई, रघुवीर जी के पैरों की ताकत जैसे खत्म हो गई। उनकी इकलौती बेटी, उनके घर की रौनक, नव्या अब अपने ससुराल जा चुकी थी। कुछ ही घंटों में वह मैरिज हॉल, जो पिछले तीन दिनों से शहनाई की धुनों, ढोलक की थाप और मेहमानों के ठहाकों से गूंज रहा था, अब एकदम वीरान और उदास लगने लगा था।
सर्दियों की सुबह की हल्की धूप प्रांगण में फैलने लगी थी, लेकिन रघुवीर जी के मन में एक अजीब सा कोहरा छाया हुआ था। विदाई की रस्म पूरी हो चुकी थी और अगले कुछ ही घंटों में उन्हें यह विवाह भवन खाली करके चाबियां मैनेजर को सौंपनी थीं। इसलिए, लड़की वालों की तरफ के जो कुछ गिने-चुने खास मेहमान और रिश्तेदार बचे थे, वे अब अपने-अपने कमरों में जाकर अपना अस्त-व्यस्त पड़ा सामान समेटने और सूटकेस बंद करने में लग गए थे। किसी को दोपहर की ट्रेन पकड़नी थी तो किसी को बस से अपने शहर लौटना था।
रघुवीर जी की पत्नी, कावेरी देवी, जो पिछले कई महीनों से इस शादी की तैयारियों में मशीन की तरह बिना थके लगी हुई थीं, अब दालान में एक मेज के पास खड़ी थीं। उनके चेहरे पर थकान की गहरी लकीरें थीं, लेकिन उनकी हरकतें अब भी फुर्तीली थीं। वे एक-एक करके बाहर जाने वाले रिश्तेदारों और मेहमानों से मिल रही थीं, उन्हें आदर के साथ मिठाई के डिब्बे, शगुन के लिफाफे और रिटर्न गिफ्ट दे रही थीं। सभी हाथ जोड़कर विदा ले रहे थे और कावेरी देवी उनके शामिल होने के लिए आभार व्यक्त कर रही थीं।
अभी तक तो विवाह की अनगिनत रस्मों, भागदौड़, हलवाई को निर्देश देने, मेहमानों के स्वागत और व्यवस्थाओं को देखने में समय जैसे पंख लगाकर उड़ गया था। तब यह सोचने की फुर्सत ही कहाँ थी कि यह सब खत्म होने के बाद क्या होगा? लेकिन अब, जब नव्या सच में विदा हो चुकी थी, तो इकलौती संतान के घर से जाने के दर्द की वो चुभन माता-पिता के सीनों में गहरे तक उतरने लगी थी।
रघुवीर जी का हाल तो सबसे बुरा था। वे मंडप के पास पड़ी एक खाली कुर्सी पर निढाल से बैठे थे। उनकी आँखें सूजकर लाल हो गई थीं और आँसुओं की धारा रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। उनके हाथों में गेंदे के फूल की एक टूटी हुई माला थी, जो शायद नव्या की विदाई के वक्त उसकी चुनरी से गिर गई थी। रघुवीर जी उस फूल को ऐसे सहला रहे थे जैसे वह नव्या का माथा हो। उन्हें याद आ रहा था कि कैसे वह छोटी सी बच्ची उनकी उंगली पकड़कर चलना सीखी थी, कैसे वह उनकी हर उदासी को अपनी तोतली बातों से दूर कर देती थी। आज वो चिड़िया उनका आंगन हमेशा के लिए सूना कर गई थी।
दूसरी तरफ, कावेरी देवी की आँखों के कोर भी नम थे, लेकिन उन्होंने बहुत ही मज़बूती से खुद को संभाला हुआ था। एक माँ होने के नाते उनका दर्द शायद रघुवीर जी से भी कहीं ज्यादा था। नौ महीने कोख में रखने से लेकर उसे एक समझदार लड़की बनाने तक, कावेरी ने अपनी पूरी ज़िंदगी नव्या के नाम कर दी थी। उसका भी मन कर रहा था कि वह ज़मीन पर बैठकर फूट-फूट कर रोए, अपनी बच्ची को वापस पुकारे। लेकिन वह जानती थी कि अगर इस वक्त वह भी टूट गई, तो रघुवीर जी को कौन संभालेगा? वे तो वैसे ही सुध-बुध खो बैठे हैं।
विवाह के बाद के अभी सैकड़ों काम बाकी थे। टेंट वाले का हिसाब करना था, कैटरिंग वाले को बचे हुए पैसे देने थे, कमरों की चाबियां गिनकर लौटानी थीं, और सबसे बड़ा काम—रघुवीर जी को इस सदमे से बाहर निकालकर वापस उनके खाली हो चुके घर तक ले जाना था। कावेरी देवी ने एक गहरी सांस ली, अपने आंसुओं को साड़ी के पल्लू से सुखाया और एक गिलास पानी लेकर रघुवीर जी के पास गई।
“सुनते हो… थोड़ा पानी पी लो,” कावेरी देवी ने रघुवीर जी के कांपते हाथों पर अपना हाथ रखते हुए बहुत ही मुलायम स्वर में कहा।
रघुवीर जी ने अपनी पत्नी को देखा और बिलख पड़े, “कावेरी, हमारी बच्ची चली गई। घर कितना सूना लगेगा अब। मैं कैसे रहूँगा उसके बिना?”
कावेरी देवी का गला भी रुंध गया, लेकिन उन्होंने अपने आँसुओं को पलकों की दहलीज पार नहीं करने दी। उन्होंने रघुवीर जी के आँसू पोंछे और हौसला देते हुए कहा, “अरे, आप ऐसे हिम्मत हारेंगे तो कैसे चलेगा? बेटियां तो होती ही हैं दूसरे घर को रोशन करने के लिए। नव्या बहुत खुश रहेगी अपने नए घर में। और हम कौन सा दूर हैं? जब मन करेगा, चले जाएंगे मिलने। उठिए अब, अभी बहुत सारे बिल चुकाने हैं, सामान गाड़ी में रखवाना है। लोग हमें ही देख रहे हैं। एक पिता को इस तरह कमज़ोर पड़ते देख हमारी बच्ची को भी वहाँ अच्छा नहीं लगेगा।”
पत्नी के इन धीरज भरे शब्दों ने रघुवीर जी के भीतर एक अजीब सी ताकत भर दी। उन्होंने कावेरी की आँखों में देखा—वहाँ दर्द का एक समंदर था, लेकिन उस समंदर को रोकने के लिए एक माँ ने अपने फर्ज़ का कितना बड़ा बांध बना रखा था, यह उन्हें समझ आ गया। रघुवीर जी ने पानी पिया, एक लंबी सांस ली और अपनी पत्नी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर शादी के बचे हुए कामों को समेटने में लग गए। दोनों के दिल में एक ही दुआ थी कि उनकी बेटी जहाँ भी रहे, हमेशा आबाद रहे।
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दोस्तों, एक बेटी की विदाई का यह मार्मिक पल हर उस माता-पिता के लिए सबसे कठिन होता है, जिन्होंने अपनी बच्ची को नाज़ों से पाला हो। क्या आपने भी कभी किसी शादी में एक पिता के छलकते आँसू और एक माँ की उस खामोश ताकत को करीब से महसूस किया है? अपने अनुभव और विचार हमारे साथ ज़रूर साझा करें।
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लेखिका : रमा शुक्ला