“काव्या, मेरी बात एक बार गौर से सुन लो। मैं तुम्हारे लिए अपनी ज़िंदगी की आखिरी सांस तक इंतज़ार कर सकता हूँ। लेकिन इस दिल में तुम्हारे सिवा कोई और कभी जगह नहीं ले पाएगा, यह मेरा वादा है।” मेज पर रखी कॉफी की प्याली को बिना छुए ही रजत वहाँ से उठकर चला गया।
समय किसी की मुट्ठी में नहीं बंधता। दिन हफ्तों में, हफ्ते महीनों में और महीने सालों में कब तब्दील हो गए, किसी को पता ही नहीं चला। समय का पहिया अपनी तेज़ गति से घूमता रहा और अपने पीछे कई यादें और अनकहे जज़्बात छोड़ता गया। काव्या की बेटी, आरोही, जो कभी रजत की उंगली पकड़कर चलना सीखती थी, अब इतनी बड़ी और समझदार हो चुकी थी कि रिश्तों की उलझनों और खामोशियों की भाषा को आसानी से पढ़ सकती थी।
रजत का काव्या के प्रति यह समर्पण कोई एक दिन का आकर्षण नहीं था। काव्या के पति के गुजर जाने के बाद, जब दुनिया ने उसे बेचारी समझकर अकेले छोड़ दिया था, तब रजत ही वह इकलौता इंसान था जो एक मजबूत चट्टान की तरह उसके परिवार के साथ खड़ा रहा। शुरुआत में रजत की माँ, सुशीला जी, और काव्या की सास, सुभद्रा देवी, दोनों ने ही इस अनचाहे रिश्ते का बहुत विरोध किया था। सुशीला जी चाहती थीं कि उनका बेटा अपना घर बसाए, और सुभद्रा देवी को समाज के तानों का डर था। दोनों ने मिलकर कई बार रजत को समझाने की, उसे काव्या की ज़िंदगी से दूर करने की कोशिश की। लेकिन रजत की अटल सहनशक्ति और उसके निस्वार्थ प्रेम के आगे दोनों माताओं को हार माननी पड़ी। उन्होंने देख लिया था कि रजत के इरादे किसी जिद्दी बच्चे की तरह नहीं, बल्कि एक परिपक्व साधू की तपस्या की तरह दृढ़ हैं।
हैरानी की बात यह थी कि इतने सालों तक काव्या के इतने करीब रहने के बावजूद, रजत ने कभी अपनी मर्यादा की सीमा नहीं लांघी। वह आरोही के लिए एक पिता समान था, घर के हर छोटे-बड़े काम में एक बेटे की तरह मौजूद रहता था, लेकिन काव्या के लिए उसने कभी कोई ऐसा शब्द या व्यवहार इस्तेमाल नहीं किया जिससे उसके आत्मसम्मान को ठेस पहुंचे। एक सम्मानजनक दूरी हमेशा बनी रही। इस रिश्ते की साझेदारी बहुत ही पवित्र और खामोश तरीके से आगे बढ़ रही थी। दोनों एक छत के नीचे ना होकर भी एक-दूसरे की आत्मा से जुड़े हुए थे। काव्या भी रजत की इस तपस्या से अनजान नहीं थी, लेकिन अपने अतीत की बेड़ियों और समाज के अदृश्य बंधनों ने उसके होंठ सिल रखे थे।
लेकिन एक सुबह, नाश्ते की मेज पर कुछ ऐसा हुआ जिसने काव्या की दुनिया हिला कर रख दी। आरोही, जो अब कॉलेज जाने लगी थी, अपनी प्लेट में टोस्ट घुमाते हुए बहुत देर से काव्या को घूर रही थी।
“क्या हुआ आरोही? ऐसे क्या देख रही हो? कॉलेज के लिए देर नहीं हो रही तुम्हें?” काव्या ने अपनी नज़रें चुराते हुए पूछा।
आरोही ने गहरी सांस ली और सीधे काव्या की आँखों में देखते हुए कहा, “माँ, आप आखिर कब तक खुद से और रजत अंकल से ये झूठ बोलती रहेंगी? क्या आपको लगता है कि मैं कुछ समझती नहीं हूँ? मैं देख सकती हूँ कि जब आप परेशान होती हैं, तो रजत अंकल की रातों की नींद उड़ जाती है। और मैं यह भी देख सकती हूँ कि आपके दिन की शुरुआत उनकी एक झलक देखे बिना नहीं होती। आप दोनों एक-दूसरे से प्यार करते हैं।”
काव्या अवाक रह गई। एक पल के लिए उसके गले से आवाज़ ही नहीं निकली।
आरोही रुकी नहीं, उसने आगे कहा, “माँ, क्यों नहीं थाम लेतीं आप रजत अंकल का हाथ? आप भी तो उन्हें उतना ही चाहती हैं। रजत अंकल की आँखों में मैं आपके लिए जो अथाह प्रेम और इज़्ज़त देखती हूँ, वो आपको क्यों नज़र नहीं आता? क्या समाज का डर उस इंसान के प्यार से बड़ा है जिसने अपनी पूरी जवानी हमारे इंतज़ार में गुज़ार दी?”
काव्या के पास अपनी ही बेटी के इन तीखे लेकिन सच्चे सवालों का कोई जवाब नहीं था। उसके अंदर जैसे एक तूफान सा उठ खड़ा हुआ था। उसने बिना कोई जवाब दिए अपना बैग उठाया, स्कूटी की चाबी ली और चुपचाप ऑफिस के लिए निकल गई।
ऑफिस में काव्या की नज़रें अपने कंप्यूटर स्क्रीन पर तो थीं, लेकिन दिमाग में सिर्फ आरोही के शब्द गूंज रहे थे। क्या वह सच में इतनी स्वार्थी हो गई थी? रजत ने कभी उससे कुछ नहीं मांगा, सिर्फ उसका साथ निभाने की इजाज़त मांगी थी। काव्या को याद आया कि कैसे जब आरोही को तेज़ बुखार था, तो रजत ने पूरी रात अस्पताल के बाहर जागकर बिताई थी। कैसे हर दिवाली पर वह घर को रोशन करता था ताकि आरोही को अपने पिता की कमी महसूस न हो। और इस सब के बदले काव्या ने उसे क्या दिया? सिर्फ इंतज़ार। एक अंतहीन इंतज़ार।
शाम को जब काव्या ऑफिस से घर लौटी, तो उसने देखा कि रजत दालान में बैठा आरोही के कॉलेज के असाइनमेंट में उसकी मदद कर रहा था। हमेशा की तरह उसके चेहरे पर वही शांत और निस्वार्थ मुस्कान थी। काव्या सीधे रसोई में गई और उसने दो कप चाय बनाई। आज उसके कदमों में कोई झिझक नहीं थी।
वह चाय की ट्रे लेकर बाहर आई और एक कप रजत की तरफ बढ़ा दिया। रजत ने हैरानी से काव्या को देखा, क्योंकि अमूमन काव्या शाम की चाय खुद पीकर ही बाहर आती थी।
रजत ने कप हाथ में लिया तो काव्या ने अपनी कांपती हुई उंगलियों से रजत का हाथ थाम लिया। रजत अवाक रह गया। काव्या की आँखों में आँसू थे, लेकिन आज वो आँसू बेबसी के नहीं, बल्कि एक नए सफर की शुरुआत के थे।
“तुम्हारा इंतज़ार खत्म हुआ रजत। मुझे माफ कर दो, मुझे इस सच्चाई को अपनाने में बहुत देर लग गई,” काव्या ने रुंधे हुए गले से कहा।
पास खड़ी आरोही के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान फैल गई। सालों की वो खामोश तपस्या आज पूरी हो गई थी। बिना कोई शोर किए, बिना कोई वादे तोड़े, एक अनकहे रिश्ते ने आखिरकार अपनी मंजिल पा ही ली।
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