अंधेरे कमरे के एक कोने में बैठा समीर पिछले दो सालों से सिर्फ़ दीवारों को घूरता रहता था। घर के बाकी सदस्य दबे पाँव उसके कमरे के पास से गुज़रते। उसकी आँखों के नीचे गहरे काले घेरे थे और दाढ़ी बढ़ी हुई थी। समीर, जो कभी पूरे घर की जान हुआ करता था, अपनी छोटी बहन ‘छुटकी’ के अचानक चले जाने के बाद जैसे एक ज़िंदा लाश बन गया था।
समीर और छुटकी के बीच दस साल का अंतर था। माँ-बाप के गुज़रने के बाद समीर ने छुटकी को पाल-पोसकर बड़ा किया था। वह उसे स्कूल छोड़ने जाता, उसकी चोटियों में तेल लगाता और जब उसे बुखार आता, तो रात-रात भर उसके सिरहाने बैठा रहता। छुटकी उसे ‘भैया’ नहीं, ‘पापा’ कहती थी। छुटकी को कथक का बहुत शौक था। पूरे घर में उसके घुंघरू की छन-छन गूंजती रहती थी। लेकिन एक सड़क हादसे ने वो आवाज़ हमेशा के लिए खामोश कर दी। छुटकी के जाने के साथ ही समीर की दुनिया भी अंधेरी हो गई। उसने छुटकी के कमरे को ताला लगा दिया और कसम खाई कि उस कमरे का दरवाज़ा अब कभी नहीं खुलेगा।
समीर की पत्नी, मेघा, बहुत कोशिश करती कि समीर को इस सदमे से बाहर निकाल सके, पर सब बेकार। समीर अपनी नन्हीं बेटी, ‘आरोही’, की तरफ भी ज़्यादा ध्यान नहीं देता था। उसे डर लगता था कि अगर उसने आरोही से दिल लगाया और उसे कुछ हो गया, तो वह दोबारा टूट जाएगा।
एक दोपहर, घर में सन्नाटा था। मेघा बाज़ार गई हुई थी। समीर अपनी आर्मचेयर पर आँखें मूंदे लेटा था। तभी उसे एक जानी-पहचानी आवाज़ सुनाई दी—छन-छन-छन।
समीर का दिल ज़ोर से धड़का। उसे लगा शायद वह सपना देख रहा है। लेकिन आवाज़ फिर आई। छन-छन…
यह आवाज़ उसी बंद कमरे से आ रही थी, जिसे समीर ने ‘छुटकी का कमरा’ कहकर हमेशा के लिए बंद कर दिया था।
गुस्से और घबराहट में समीर अपनी कुर्सी से उठा। “किसने खोला वो दरवाज़ा?” वह बड़बड़ाया। उसके पैर कांप रहे थे। जैसे-जैसे वह कमरे के पास पहुंचा, घुंघरुओं की आवाज़ तेज़ होती गई।
समीर ने झटके से दरवाज़ा खोला।
सामने का नज़ारा देखकर उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। धूल भरे कमरे में, दोपहर की धूप खिड़की से छनकर आ रही थी। और उस रोशनी के बीचों-बीच पाँच साल की आरोही खड़ी थी। उसने अपनी नन्हीं एड़ियों में वो ही पुराने, बड़े-बड़े घुंघरू बांध रखे थे जो छुटकी के थे।
आरोही ने समीर को देखा, तो डर गई। उसे लगा पापा डांटेंगे। लेकिन तभी उसने, बिल्कुल छुटकी के अंदाज़ में, अपनी कमर पर हाथ रखा और गर्दन टेढ़ी करके बोली, “पापा, देखो! मैं बुआ जैसी लग रही हूँ ना?”
समीर की साँसें अटक गईं। आरोही की आँखों में वही चमक थी, वही शरारत थी जो छुटकी की आँखों में हुआ करती थी। समीर को लगा जैसे वक्त का पहिया पीछे घूम गया है। उसे अपनी आँखों के सामने आरोही नहीं, बल्कि उसकी छुटकी खड़ी दिखाई दे रही थी जो कह रही थी, “भैया, देखो मैंने नया स्टेप सीखा।”
समीर का गुस्सा, उसका अवसाद (डिप्रेशन), उसकी ख़ामोशी—सब उस एक पल में पिघलने लगा। वह धीरे-धीरे आरोही के पास गया और घुटनों के बल बैठ गया।
“बेटा… ये… ये घुंघरू तुम्हें कहाँ मिले?” समीर की आवाज़ कांप रही थी।
आरोही ने मासूमियत से बक्से की तरफ इशारा किया। “पापा, बुआ सपने में आई थीं। उन्होंने कहा कि वो बोर हो रही हैं, उन्हें नाचना है। इसलिए मैंने उनके ये ‘छन-छन’ पहन लिए। क्या मैं गंदी लग रही हूँ?”
समीर की आँखों से आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा। पिछले दो सालों में जो आंसू उसकी आँखों में पत्थर बन गए थे, आज वो बह निकले। उसने आरोही को कसकर गले लगा लिया। आरोही की नन्हीं बाहें उसके गले में लिपट गईं।
“नहीं बेटा… तुम बहुत सुंदर लग रही हो। बिल्कुल मेरी छुटकी जैसी,” समीर सिसकते हुए बोला।
उस दिन समीर को एहसास हुआ कि वह जिसे खो चुका है, वो कहीं गई ही नहीं थी। वो तो आरोही के रूप में उसी के पास थी। आरोही की हंसी में छुटकी की खनक थी, उसकी ज़िद में छुटकी का बचपना था। समीर ने महसूस किया कि वह दुख के अंधेरे में इतना खो गया था कि अपने आंगन में खिले इस नए फूल को देख ही नहीं पा रहा था।
शाम को जब मेघा घर लौटी, तो वह हैरान रह गई। हॉल में म्यूज़िक सिस्टम पर एक पुराना शास्त्रीय संगीत बज रहा था। समीर सोफे पर बैठा ताली बजा रहा था और नन्हीं आरोही, अपने बड़े-बड़े घुंघरू पहनकर, बेतरतीब लेकिन ख़ुशी से नाच रही थी।
घर का वो सन्नाटा, जो पिछले दो सालों से किसी श्राप की तरह छाया हुआ था, आज आरोही के घुंघरुओं की आवाज़ से टूट चुका था। समीर के चेहरे पर एक मुस्कान थी—एक पिता की मुस्कान, और एक भाई का सुकून।
उस रात समीर ने डायरी में लिखा: “मैं जिस परछाई के पीछे भाग रहा था, वो अंधेरे में थी। पर आज रोशनी में देखा तो पाया कि मेरी बहन एक बेटी बनकर मेरी गोद में वापस आ गई है। अब मैं इस बचपन को नहीं खोने दूंगा।”
क्या आपने कभी महसूस किया है कि हमारे अपने कभी हमें छोड़कर नहीं जाते, बस किसी और रूप में वापस आ जाते हैं?
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ, तो लाइक, कमेंट और शेयर करें। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक और पारिवारिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें। धन्यवाद!
मूल लेखिका : रश्मि प्रकाश