मैं भी इंसान हूँ – डॉ पारुल अग्रवाल

सावित्री जी के हाथ कांप रहे थे। फोन रखते ही उनके माथे पर पसीने की बूंदें छलक आई थीं। अभी-अभी उनकी ननद, सुलोचना जी का फोन आया था कि वे अपने पूरे परिवार के साथ—बेटे, बहू और नाती-पोतों समेत—दो घंटे में पहुँच रही हैं।

सावित्री जी का ब्लड प्रेशर तो वैसे ही बढ़ा रहता था, ऊपर से यह खबर। वे हड़बड़ाते हुए रसोई की तरफ भागीं। “अरे, फ्रिज में तो मटर भी नहीं है, सुलोचना दीदी को मटर-पनीर पसंद है। और समोसे? उनके दामाद जी को घर के समोसे चाहिए होंगे। हे भगवान! घर भी बिखरा पड़ा है।”

वे अभी आंटे का डिब्बा उतार ही रही थीं कि उनकी बहू, ईशा, लैपटॉप बंद करके रसोई में आई। ईशा एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर थी और आज उसकी छुट्टी थी।

“मम्मी जी, क्या हुआ? आप इतनी परेशान क्यों लग रही हैं?” ईशा ने सास के हाथ से डिब्बा लेते हुए पूछा।

“बेटा, तेरी बुआ सास आ रही हैं, पूरे कुनबे के साथ। और तुझे तो पता है उनकी आदत, खाने में ज़रा सी कमी हुई तो दस साल तक ताने मारेंगी। जल्दी से आलू उबालने रख दे, मैं बाज़ार से मटर ले आती हूँ,” सावित्री जी की सांस फूल रही थी।

ईशा ने शांति से आंटे का डिब्बा वापस शेल्फ पर रख दिया और सावित्री जी को पकड़कर कुर्सी पर बैठा दिया।

“मम्मी जी, शांत हो जाइए। आप बाज़ार नहीं जा रही हैं और न ही हम समोसे तलने वाले हैं।”

सावित्री जी की आँखें फटी की फटी रह गईं। “तू पागल हो गई है ईशा? वो मेहमान हैं, और सुलोचना दीदी का स्वभाव…”

“मम्मी जी, मेहमान भगवान होते हैं, पर हम इंसान हैं, रोबोट नहीं,” ईशा ने दृढ़ता से कहा। “आपके घुटनों में कल से दर्द है। डॉक्टर ने आराम करने को कहा है। अगर हम दो घंटे में दस लोगों का खाना बनाने लगेंगे, तो शाम तक आपकी हालत खराब हो जाएगी। और फिर वो खा-पीकर चले जाएंगे, पर आपका दर्द तो हमें देखना पड़ेगा ना?”

“तो क्या भूखा मारेंगे उन्हें? मेरी नाक कट जाएगी समाज में,” सावित्री जी रुआंसे होकर बोलीं।

“नाक नहीं कटेगी मम्मी जी। मैंने शहर के सबसे अच्छे हलवाई से नाश्ता आर्डर कर दिया है। और खाने के लिए हम बाहर से थाली मंगवा लेंगे। रही बात उनकी पसंद की, तो मैं अच्छी सी चाय बनाऊंगी और हम सब बैठकर उनके साथ बातें करेंगे। मेहमान नवाज़ी का मतलब पसीना बहाना नहीं, बल्कि मुस्कुराहट के साथ स्वागत करना होता है।”

सावित्री जी चुप रह गईं, पर उनका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। उन्हें अपना वह दौर याद आ गया जब उनकी सास के मेहमान आते थे। तब सावित्री जी को 102 डिग्री बुखार था, फिर भी उन्होंने बीस लोगों के लिए पूरियां तली थीं। सास ने एक बार भी नहीं कहा था कि ‘बहू रहने दे’। उल्टा जाते वक्त मेहमानों ने कह दिया था, “सब्जी में नमक कम था,” और सावित्री जी घंटों रोई थीं। उन्होंने हमेशा यही सीखा था कि खुद को मिटाकर दूसरों को खुश करना ही एक अच्छी बहू का लक्षण है।

दो घंटे बाद मेहमान आए। सुलोचना बुआ आते ही सोफे पर जम गईं। “अरे भाभी, बड़ी भूख लगी है। सफर में तो घर के खाने की याद आ रही थी।”

सावित्री जी सहम गईं। ईशा ने आगे बढ़कर मुस्कुराते हुए नमस्ते किया और मेज पर गरमा-गरम कचौड़ी, जलेबी और ढोकला सजा दिया।

“बुआ जी, हमें पता था आप थकी होंगी, इसलिए मैंने शहर की सबसे मशहूर दुकान से यह मंगवाया है। मम्मी जी बनाने ही वाली थीं, पर मैंने मना कर दिया। उनके पैरों में बहुत दर्द है, और मैं नहीं चाहती थी कि मेरी मम्मी जी रसोई में खटें और आप लोगों के साथ बैठ भी न पाएं। आख़िर आप उनसे मिलने आई हैं, रसोई का स्वाद लेने थोड़ी न आई हैं?”

ईशा की बात में इतना अपनापन और तर्क था कि सुलोचना बुआ की बोलती बंद हो गई। उन्होंने सावित्री जी की तरफ देखा।

“हां भाभी… यह बहू ठीक ही तो कह रही है। अब उम्र हो गई है, आराम करना चाहिए। और यह बाज़ार की कचौड़ी तो वाकई बहुत स्वादिष्ट है।”

हॉल में हंसी-ठहाके गूंजने लगे। सावित्री जी एक कोने में बैठी सब देख रही थीं। न कोई दौड़-भाग, न पसीना, न कमर दर्द। सब खुश थे। ईशा ने सबको संभाल लिया था, बिना खुद को या अपनी सास को कष्ट दिए।

उस रात जब मेहमान चले गए, तो सावित्री जी ईशा के कमरे में गईं। ईशा सोने की तैयारी कर रही थी।

“ईशा…”

“जी मम्मी जी? कुछ चाहिए?”

सावित्री जी ने ईशा का हाथ अपने हाथों में ले लिया। उनकी आँखों में आंसू थे।

“नहीं बेटा, कुछ नहीं चाहिए। आज तूने मुझे वो दिया जो पिछले तीस सालों में किसी ने नहीं दिया—’मेरा अपना वजूद’। मैं हमेशा सोचती थी कि झुकना और सहना ही संस्कार है। पर आज तूने सिखा दिया कि अपनी तकलीफ बोलकर जताना बदतमीजी नहीं, बल्कि अपनी कद्र करना है। काश… काश मेरे ज़माने में भी मुझमें तेरी जितनी हिम्मत होती, तो शायद मैं भी अपनी सास को समझा पाती कि मैं भी इंसान हूँ।”

ईशा ने मुस्कुराकर सास को गले लगा लिया। “मम्मी जी, ज़माना बदल गया है। अब बहुएं ‘त्याग की देवी’ नहीं, बल्कि ‘घर की बेटी’ बनना चाहती हैं। और बेटी को दर्द में देखकर माँ खुश थोड़ी न रह सकती है?”

सावित्री जी उस रात बहुत चैन की नींद सोईं। उन्हें लगा कि उनके हिस्से का जो विद्रोह अधूरा रह गया था, आज उनकी बहू ने उसे पूरा कर दिया है। घर की शांति, चुप्पी साधने से नहीं, बल्कि एक-दूसरे को समझने से आती है।

कहानी के अंत में आपसे एक सवाल:

क्या ईशा ने मेहमानों के लिए खाना न बनाकर गलत किया, या उसने अपनी सास की सेहत को चुनकर सही फैसला लिया? क्या आपने भी कभी परंपरा और सेहत के बीच चुनाव किया है? अपने अनुभव कमेंट में जरूर बताएं।

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मूल लेखिका : डॉ पारुल अग्रवाल

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