बुरी बहू

“रवि, अब बस बहुत हुआ। मुझसे तुम्हारी माँ की सेवा नहीं होती। आज के बाद मैं उनके कमरे में पानी का एक गिलास लेकर भी नहीं जाऊंगी।”

स्नेहा ने यह बात इतने सपाट और ठंडे लहजे में कही कि डायनिंग टेबल पर बैठे रवि के हाथ से निवाला छूटकर प्लेट में गिर गया। कमरे में एसी चल रहा था, लेकिन रवि के माथे पर पसीने की बूंदें उभर आईं। उसने अपनी पत्नी को देखा—वही स्नेहा, जो पिछले छह महीने से उसकी माँ, सुमित्रा देवी, की परछाई बनी हुई थी। नहलाने से लेकर दवा देने तक, स्नेहा ने कभी उफ़ तक नहीं की थी। और आज अचानक यह विद्रोह?

“तुम… तुम होश में तो हो स्नेहा?” रवि ने लड़खड़ाती आवाज़ में पूछा। “माँ अभी पूरी तरह ठीक नहीं हुई हैं। डॉक्टर ने कहा था कि स्ट्रोक के बाद रिकवरी में समय लगता है। और तुम… तुम उन्हें ऐसे बीच मंझधार में छोड़ दोगी?”

स्नेहा ने अपनी साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा और सीधे रवि की आंखों में देखा। “हाँ, छोड़ दूंगी। और सिर्फ मैं ही नहीं, आज से तुम भी उनका कोई काम नहीं करोगे। न पानी दोगे, न खाना बिस्तर पर दोगे। अगर उन्हें भूख लगेगी, तो वे खुद डायनिंग टेबल तक आएंगी।”

“पागल हो गई हो क्या?” रवि चिल्ला पड़ा। “वे चल नहीं सकतीं! उनके बाएं पैर में अभी भी कमजोरी है। अगर गिर गईं तो? पड़ोसी क्या कहेंगे? कि बेटे-बहू ने बीमार माँ को लावारिस छोड़ दिया?”

“पड़ोसियों की छोड़ो रवि, मुझे माँ की चिंता है, इसलिए यह कह रही हूँ,” स्नेहा ने दृढ़ता से कहा, लेकिन रवि सुनने के मूड में नहीं था। वह गुस्से में कुर्सी धकेलकर खड़ा हो गया और अपनी माँ के कमरे की तरफ भागा।

सुमित्रा देवी अपने आलीशान पलंग पर तकियों के सहारे लेटी हुई थीं। चेहरे पर एक अजीब सी शून्यता थी। छह महीने पहले आए एक हल्के पैरालिसिस अटैक ने उनके शरीर से ज्यादा उनके मन को तोड़ दिया था। हालाँकि अब वे शारीरिक रूप से 80 प्रतिशत ठीक हो चुकी थीं, लेकिन मानसिक रूप से उन्होंने मान लिया था कि वे अब अपाहिज हैं। वे बस लेटी रहतीं, छत ताकतीं और छोटी-छोटी चीजों के लिए घंटी बजातीं।

रवि ने जाकर माँ का हाथ पकड़ा। “माँ, आपको कुछ चाहिए?”

सुमित्रा देवी ने कमजोर आवाज़ में कहा, “बेटा, गला सूख रहा है। जरा पानी दे दे। और बहू को बोलना, टीवी का रिमोट दे जाए।”

रवि ने पानी का जग उठाया, लेकिन तभी दरवाजे पर खड़ी स्नेहा की कड़क आवाज़ आई।

“रवि! गिलास नीचे रख दो।”

रवि और सुमित्रा देवी, दोनों सन्न रह गए।

स्नेहा कमरे के अंदर आई। उसने सुमित्रा देवी की तरफ देखा, लेकिन आज उसकी आंखों में वह हमेशा वाली नमी और ममता नहीं थी। आज वहां एक डॉक्टर जैसी सख्ती थी।

“माँ जी,” स्नेहा ने कहा, “पानी का जग वहां मेज पर रखा है। रिमोट टीवी के पास है। अगर आपको चाहिए, तो आपको उठना होगा। रवि आज ऑफिस जा रहे हैं, और मैं अपनी ऑनलाइन मीटिंग में व्यस्त हूँ।”

“बहू?” सुमित्रा देवी की आंखों में अविश्वास तैर गया। “तुझे पता है न, मेरे पैरों में जान नहीं है।”

“जान है माँ जी, बस हिम्मत नहीं है,” स्नेहा ने कहा और रवि का हाथ पकड़कर उसे कमरे से बाहर खींच लाई।

रवि ने बाहर आते ही हाथ झटक दिया। “यह क्रूरता है स्नेहा! मैं अपनी माँ के साथ यह नहीं कर सकता।”

स्नेहा ने गहरी सांस ली। “रवि, मेरी बात सुनो। मैं फिजियोथेरेपी की स्टूडेंट रही हूँ। मैं जानती हूँ कि स्ट्रोक के मरीजों के साथ क्या होता है। माँ ठीक हो चुकी हैं। डॉक्टर ने दो महीने पहले ही कह दिया था कि अब इन्हें चलना-फिरना चाहिए। लेकिन हमने क्या किया? हमने ‘सेवा’ के नाम पर उन्हें अपाहिज बना दिया है। हम उन्हें बिस्तर पर खाना देते हैं, करवट हम दिलाते हैं, पानी हम पिलाते हैं। उन्हें कोशिश करने का मौका ही नहीं देते। यह सेवा नहीं है रवि, यह उन्हें मखमल की जंजीरों में बांधना है। वे डिप्रेशन में जा रही हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि वे अब किसी काम की नहीं रहीं।”

“तो इसका मतलब यह है कि तुम उन्हें तड़पाओगी?” रवि की आंखों में आंसू थे।

“हाँ,” स्नेहा ने कठोर होकर कहा। “अगले 15 दिन मैं इस घर की ‘बुरी बहू’ बनूंगी। अगर तुम्हें मुझ पर भरोसा है, तो बीच में मत आना। अगर 15 दिन बाद भी माँ अपने पैरों पर खड़ी नहीं हुईं, तो मैं वादा करती हूँ, मैं जिंदगी भर उनकी दासी बनकर रहूँगी।”

रवि के पास कोई विकल्प नहीं था। वह भारी मन से ऑफिस चला गया।

घर में अब एक अजीब सा युद्ध शुरू हो चुका था। सुमित्रा देवी ने पहले दिन तो इसे बहू का गुस्सा समझा। उन्होंने सोचा कि शायद कोई कहा-सुनी हुई होगी। दोपहर को उन्हें भूख लगी। उन्होंने आवाज़ दी, “स्नेहा… खाना?”

रसोई से आवाज़ आई, “माँ जी, खाना मेज पर लगा दिया है। आ कर खा लीजिये।”

सुमित्रा देवी की आंखों से आंसू बह निकले। उन्हें यकीन नहीं हो रहा था कि जिस बहू ने कल तक उन्हें फूलों की तरह रखा था, आज वह पत्थर हो गई है। भूख बर्दाश्त नहीं हुई, तो उन्होंने अपने कांपते हाथों से वॉकर टटोला। महीनों बाद उन्होंने अकेले बिस्तर से नीचे पैर रखे। पैर कांप रहे थे, लेकिन शरीर ने साथ दिया। वे घिसटते हुए, गिरते-पड़ते डायनिंग टेबल तक पहुंचीं।

स्नेहा रसोई के दरवाजे के पीछे छिपी यह सब देख रही थी। उसका मन कर रहा था कि दौड़कर जाए और सास को थाम ले, लेकिन उसने अपनी मुट्ठी भींच ली। उसने अपने होंठ काट लिए ताकि सिसकी बाहर न निकले।

सुमित्रा देवी ने खाना खाया और वहीं कुर्सी पर सुस्ताने लगीं। उन्हें थकान महसूस हो रही थी, लेकिन साथ ही एक अजीब सा अहसास भी था—खुद चलकर आने का अहसास।

शाम को जब रवि आया, तो उसने देखा माँ सोफे पर बैठी हैं, बिस्तर पर नहीं। वह खुश हुआ, लेकिन माँ ने उसे देखते ही रोना शुरू कर दिया।

“रवि, मुझे वृद्धाश्रम छोड़ आ। अब इस घर में मेरी जरूरत नहीं है। बहू ने तो पानी तक नहीं दिया मुझे,” सुमित्रा देवी ने बच्चों की तरह शिकायत की।

रवि का दिल पसीज गया। उसने गुस्से से स्नेहा की तरफ देखा। स्नेहा ने बस नज़रों से उसे चुप रहने का इशारा किया। रवि ने माँ को समझाया, लेकिन वह खुद अंदर से टूट रहा था। उसे अपनी पत्नी एक जल्लाद लग रही थी।

यह सिलसिला एक हफ्ते तक चला।

पड़ोसियों में फुसफुसाहट शुरू हो गई। “अरे, गुप्ता जी की बहू तो बड़ी संस्कारी बनती थी, अब देखो बेचारी बुढ़िया को कपड़े धोने पर मजबूर कर दिया।”

हाँ, स्नेहा ने वाशिंग मशीन का स्विच ऑन करना भी बंद कर दिया था। सुमित्रा देवी को अपनी साड़ियाँ खुद मशीन में डालनी पड़ती थीं।

आठवें दिन एक घटना घटी।

स्नेहा घर पर नहीं थी, बाजार गई थी। रवि ऑफिस में था। घर पर सुमित्रा देवी अकेली थीं। अचानक फोन की घंटी बजी। लैंडलाइन फोन दूसरे कमरे में था। सुमित्रा देवी लेटी हुई थीं। घंटी बजती रही। पहले वे पड़ी रहीं कि कोई उठा लेगा, फिर याद आया कि घर में कोई नहीं है।

फोन लगातार बज रहा था। उन्हें लगा कि शायद रवि का फोन हो, कोई मुसीबत हो। ममता, डर पर हावी हो गई। उन्होंने वॉकर भी नहीं उठाया और दीवार के सहारे खड़ी हो गईं। वे धीरे-धीरे दूसरे कमरे की तरफ बढ़ीं। उनके कदम पहले से ज्यादा सधे हुए थे। पिछले एक हफ्ते की ‘जबरदस्ती की कसरत’ ने उनकी मांसपेशियों में जान फूंक दी थी।

उन्होंने फोन उठाया। “हल्लो?”

उधर से आवाज़ आई, “नानी! मैं चिंटू बोल रहा हूँ। मेरा रिजल्ट आया है। मैं पास हो गया!”

यह उनकी बेटी का बेटा था। सुमित्रा देवी खुशी से खिल उठीं। “अरे वाह मेरे लाल!”

बात करते-करते वे यह भूल ही गईं कि वे खड़ी हैं। उन्होंने दस मिनट तक बात की। जब फोन रखा, तब उन्हें एहसास हुआ कि वे बिना किसी सहारे के खड़ी थीं। उनकी नज़र सामने लगे आईने पर पड़ी। आईने में उन्हें एक लाचार मरीज नहीं, बल्कि एक खड़ी औरत दिखाई दी। उनके चेहरे पर महीनों बाद एक वास्तविक मुस्कान आई।

तभी दरवाजे पर आहट हुई। स्नेहा खड़ी थी। उसके हाथ में सब्जी के थैले थे। उसने सब देख लिया था।

सुमित्रा देवी ने सकपका कर दीवार का सहारा ले लिया। वे फिर से ‘मरीज’ बनने की कोशिश करने लगीं।

स्नेहा ने थैले नीचे रखे और तालियां बजाने लगी। “वाह माँ जी! तो अब हम बिना वॉकर के भी चल सकते हैं?”

सुमित्रा देवी का चेहरा शर्म से लाल हो गया। जैसे उनकी चोरी पकड़ी गई हो।

“तुम… तुम बहुत चालाक हो स्नेहा,” सुमित्रा देवी ने रुंधे गले से कहा। “तुमने जानबूझकर फोन वहां रखा था न?”

स्नेहा मुस्कुराई, लेकिन उसकी आंखों में आंसू थे। वह आगे बढ़ी और सुमित्रा देवी के पैरों में बैठ गई। उसने अपना सिर उनकी गोद में रख दिया।

“माँ जी, मुझे माफ़ कर दीजिये,” स्नेहा फूट-फूट कर रो पड़ी। “पिछले आठ दिनों में मैंने आपको जितना रुलाया है, उससे सौ गुना ज्यादा मैं खुद अंदर ही अंदर रोई हूँ। मैं आपको तकलीफ नहीं देना चाहती थी, लेकिन मैं आपको उस बिस्तर पर तिल-तिल मरते हुए भी नहीं देख सकती थी। डॉक्टर दवा दे सकते हैं, पर जीने की इच्छा तो आपको खुद ही जगानी थी। जब तक आपको सहारा मिलता रहता, आप कभी अपनी ताकत नहीं पहचान पातीं।”

सुमित्रा देवी का हाथ कांपते हुए स्नेहा के सिर पर गया। उन्होंने महसूस किया कि स्नेहा के बाल पसीने से भीगे थे। उन्होंने याद किया कि कैसे पिछले एक हफ्ते में, भले ही स्नेहा ने उन्हें पानी नहीं दिया, लेकिन चुपके से उनकी डाइट में बादाम और पौष्टिक चीजें बढ़ा दी थीं। कैसे वह छिप-छिप कर उन्हें देखती रहती थी।

“पगली लड़की,” सुमित्रा देवी की आवाज़ में अब शिकायत नहीं, आशीर्वाद था। “तूने तो मुझे मेरी ही नज़र में विलेन बना दिया था। मैं सोच रही थी कि तू बदल गई है, पर तू तो वही है… मेरी जिद्दी बहू।”

शाम को जब रवि घर लौटा, तो घर का नज़ारा बदला हुआ था।

हमेशा की तरह सन्नाटा नहीं था। रसोई से हंसने की आवाज़ें आ रही थीं। रवि डरते-डरते अंदर गया। उसने देखा कि सुमित्रा देवी रसोई में स्टूल पर बैठी हैं और मटर छील रही हैं, जबकि स्नेहा सब्जी छौंक रही है।

“माँ?” रवि अवाक रह गया।

सुमित्रा देवी ने मुड़कर देखा। “आ गया तू? जा हाथ-मुंह धो ले, आज मैंने तेरे पसंद की मटर-पनीर बनवाई है। बहू को तो मसाला भूनना भी नहीं आता ठीक से,” उन्होंने हंसते हुए कहा।

रवि ने स्नेहा की तरफ देखा। स्नेहा ने आंख मारी और मुस्कुरा दी।

रात के खाने पर, सुमित्रा देवी ने खुद उठकर रवि को रोटी परोसी। रवि ने जब मना करना चाहा, तो सुमित्रा देवी ने उसे डांट दिया।

“चुपचाप खा। मेरे हाथ-पैर अभी टूटे नहीं हैं। और खबरदार जो अब मुझे ‘बीमार-बीमार’ कह कर बिस्तर पर लिटाया। मैं तो ऊब गई थी उस कमरे से। अब से मैं शाम को पार्क भी जाया करूँगी।”

रवि ने खाना खाते हुए महसूस किया कि यह निवाला पिछले छह महीनों में सबसे स्वादिष्ट था। खाने के बाद, जब वे कमरे में गए, रवि ने स्नेहा का हाथ थाम लिया।

“धन्यवाद,” उसने धीरे से कहा। “तुमने आज मुझे मेरी माँ वापस लौटा दी।”

स्नेहा ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा, “रवि, सेवा सिर्फ वो नहीं होती जो हम ‘करने’ के लिए करते हैं। कभी-कभी, किसी के आत्मसम्मान को लौटाना सबसे बड़ी सेवा होती है। प्यार कभी-कभी कड़वा होता है, जैसे नीम की दवा। लेकिन वही जान बचाती है।”

उस रात, सुमित्रा देवी अपने कमरे में सोईं, लेकिन उन्होंने अपने सिरहाने रखी घंटी हटा दी थी। उन्हें अब किसी को बुलाने की जरूरत नहीं थी। उन्हें पता चल गया था कि उनके भीतर की शक्ति ही उनकी सबसे बड़ी साथी है। और उस शक्ति को जगाने वाली वह ‘बुरी बहू’ दूसरे कमरे में सुकून की नींद सो रही थी, यह जानते हुए कि कल सुबह उसे फिर से दुनिया के ताने सुनने पड़ सकते हैं, लेकिन उसकी अपनी दुनिया—उसका परिवार—अब अपने पैरों पर खड़ा था।

कहानी का सार: सच्चा प्रेम और सेवा हमेशा कोमल नहीं होते। कभी-कभी अपने प्रियजनों की भलाई के लिए हमें कठोर निर्णय लेने पड़ते हैं, ताकि वे अपनी खोई हुई गरिमा और आत्मविश्वास को पुनः प्राप्त कर सकें।

लेखक : मुकेश पटेल

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