“सुधा, अगले हफ्ते बिल्डर को डाउन पेमेंट का चेक देना है। पंद्रह लाख रुपये। एफडी मैच्योर हो गई है, और पीएफ का पैसा भी आ गया है। भगवान की दया से, इस बार दिवाली हम अपने नए फ्लैट ‘आशियाना’ में मनाएंगे,” राघव ने डायरी बंद करते हुए चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान के साथ कहा।
सुधा ने फीकी मुस्कान के साथ सिर हिलाया। “हाँ, राघव। आखिर आपके दस साल की तपस्या सफल होने जा रही है।”
लेकिन सुधा की आवाज़ में वह खनक नहीं थी। उसका मन कहीं और उलझा हुआ था। कल रात ही मायके से फोन आया था। उसके छोटे भाई, समीर, का चयन अमेरिका की एक प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में मास्टर्स के लिए हो गया था। यह पूरे परिवार का सपना था। लेकिन स्कॉलरशिप के बावजूद, दाखिले और वीज़ा के लिए उसे तुरंत दस लाख रुपयों की ज़रूरत थी। पिताजी रिटायर हो चुके थे और उनकी जमापूंजी पहले ही समीर की कोचिंग और घर की मरम्मत में खर्च हो चुकी थी।
सुधा जानती थी कि पिताजी अपनी पुश्तैनी ज़मीन बेचने की सोच रहे हैं, लेकिन गाँव में ज़मीन के भाव गिरे हुए थे और इतनी जल्दी खरीदार मिलना नामुमकिन था। सुधा के पास अपने गहने थे, लेकिन वे सब बैंक के लॉकर में थे जिसकी चाबी राघव के पास रहती थी।
वह राघव से कैसे कहे? राघव ने पिछले पांच सालों से एक नई शर्ट तक नहीं खरीदी थी, लंच में बाहर खाना बंद कर दिया था, और छुट्टियों पर जाना तो जैसे उनके शब्दकोश से ही हट गया था—सिर्फ इसलिए ताकि वे पंद्रह लाख जमा कर सकें। अब, जब मंजिल बस एक कदम दूर थी, सुधा उससे यह कैसे कह दे कि “राघव, मेरे भाई के लिए अपने सपने को थोड़ा और टाल दो?”
उसने सोचा कि वह नहीं कहेगी। वह अपने पिताजी से झूठ बोल देगी कि राघव के पास अभी पैसे नहीं हैं। लेकिन दिल जानता था कि समीर का साल बर्बाद हो जाएगा।
दो दिन बीत गए। घर में तनाव का माहौल था। राघव अपने होम लोन के कागज़ात तैयार कर रहा था और सुधा अपनी बेचैनी छिपाने की कोशिश कर रही थी।
तीसरे दिन शाम को, राघव ऑफिस से जल्दी आ गया। उसके हाथ में एक मिठाई का डिब्बा था।
“सुधा! मिठाई लाओ, एक बहुत अच्छी खबर है,” राघव ने उत्साह से कहा।
सुधा का दिल बैठ गया। उसे लगा शायद बिल्डर ने पज़ेशन की तारीख दे दी है या लोन पास हो गया है। उसने कांपते हाथों से पानी का गिलास राघव को दिया।
“क्या हुआ? लोन का लेटर आ गया?” सुधा ने बुझे मन से पूछा।
“अरे लोन तो बाद की बात है। खबर यह है कि समीर का वीज़ा अप्रूव हो गया है और उसकी फ्लाइट अगले हफ्ते की है,” राघव ने बर्फी का टुकड़ा सुधा के मुंह में डालते हुए कहा।
सुधा सन्न रह गई। “क्या? लेकिन… लेकिन पैसे? पिताजी ने तो कहा था कि इंतज़ाम नहीं हो पा रहा…”
राघव ने अपनी शर्ट की आस्तीन ऊपर चढ़ाई और सोफे पर बैठ गया। “हाँ, इंतज़ाम थोड़ा मुश्किल था। मैंने परसों पिताजी से बात की थी। वे बहुत परेशान थे। ज़मीन बेचने की बात कर रहे थे किसी दलाल से, जो उन्हें कौड़ियों के भाव लूट रहा था।”
“तो? फिर पैसे कहाँ से आए?” सुधा की धड़कनें तेज हो गईं।
“मैंने ट्रांसफर कर दिए,” राघव ने बहुत ही सहज भाव से कहा, जैसे वह सब्जी खरीदने की बात कर रहा हो।
सुधा को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। “तुमने? मतलब… हमारे घर के पैसे? वो पंद्रह लाख जो हमने डाउन पेमेंट के लिए…”
“हाँ बाबा,” राघव ने टीवी का रिमोट उठाते हुए कहा। “दस लाख समीर को दे दिए। बाकी पांच लाख अभी भी हैं। घर… घर तो अगले साल भी ले सकते हैं। बिल्डर कहीं भागा थोड़ी जा रहा है। और वैसे भी, अगले साल शायद प्रॉपर्टी के रेट गिर जाएं, तो फायदा ही होगा।”
सुधा के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह जानती थी कि राघव के लिए वह ‘अपना घर’ क्या मायने रखता था। वह किराए के मकान की सीलन और मकान मालिक की चिक-चिक से कितना तंग था। उसने समीर के लिए अपनी दस साल की मेहनत एक पल में दे दी? और उसे बताया तक नहीं?
सुधा की आँखों से आँसू बहने लगे। वह राघव के पास जाकर घुटनों के बल बैठ गई।
“राघव, तुमने मुझे बताया क्यों नहीं? तुमने मुझसे पूछा भी नहीं? वो तुम्हारा सपना था। तुम पिछले पांच सालों से एक-एक पैसा जोड़ रहे थे। और तुमने सब दे दिया? बिना किसी वादे के, बिना किसी लिखा-पढ़ी के? अगर समीर पैसे नहीं लौटा पाया तो?”
राघव ने टीवी म्यूट किया और सुधा की आँखों में देखा। उसका चेहरा शांत था, वही आंकड़ों वाला गंभीर चेहरा, लेकिन आँखों में एक अजीब सी नमी थी।
“सुधा, जब हमने शादी के फेरे लिए थे, तो पंडित जी ने बहुत से मंत्र पढ़े थे। मुझे संस्कृत तो नहीं आती, लेकिन मुझे इतना समझ आया था कि शादी सिर्फ दो लोगों की नहीं, दो परिवारों की होती है। समीर सिर्फ तुम्हारा भाई नहीं है, मेरा भी कुछ लगता है। साला है मेरा, और साले साहब की तरक्की में ही तो जीजाजी की कॉलर ऊंची होती है।”
राघव ने थोड़ा रुककर आगे कहा, “और रही बात पूछने की या वादा करने की… तो सुधा, वादे वहां किए जाते हैं जहाँ शक की गुंजाइश हो। जहाँ भरोसा होता है, वहां स्टाम्प पेपर की ज़रूरत नहीं होती। मुझे पता है समीर काबिल लड़का है, वह पैसे लौटा देगा। और अगर नहीं भी लौटा पाया… तो क्या हुआ? एक घर कम होगा, पर एक इंसान तो बन जाएगा। ईंट-गारे के मकान से ज्यादा मज़बूत किसी के करियर की नींव होती है।”
सुधा रो रही थी, लेकिन यह दुख के आँसू नहीं थे। उसे आज राघव का वह रूप दिखाई दिया जो शायद किसी रोमांटिक हीरो से भी बड़ा था। उसने कभी नहीं कहा था कि “मैं तुम्हारे परिवार को अपना मानता हूँ”, उसने कभी बड़ी-बड़ी बातें नहीं की थीं। लेकिन जब समय आया, तो उसने अपने सपनों की बलि चढ़ाकर सुधा के परिवार को बचा लिया।
“पर राघव, लोग क्या कहेंगे? सब पूछ रहे थे कि हम कब शिफ्ट हो रहे हैं,” सुधा ने सिसकते हुए कहा।
“लोगों का क्या है? कह देंगे कि बिल्डर से बात नहीं बनी। या कह देंगे कि हमें लोकेशन पसंद नहीं आई,” राघव हँसा। “सुनो, अब रोना बंद करो। मुझे भूख लगी है। और हाँ, समीर को फोन करके कह देना कि वहां जाकर सिर्फ पढ़ाई करे, पार्ट-टाइम जॉब के चक्कर में पढ़ाई खराब न करे। पैसे कम पड़ें तो बता दे, मेरी किडनी अभी सलामत है।”
सुधा हँस पड़ी, आंसुओं के बीच। उसने राघव का हाथ अपने गाल से लगा लिया। उसे महसूस हुआ कि सच्चा प्रेम गुलाब के फूलों और कैंडल लाइट डिनर में नहीं, बल्कि ‘त्याग’ और ‘समझदारी’ के उन खामोश पलों में होता है।
उस रात उस किराए के छोटे से मकान में सुधा को लगा कि वह दुनिया के सबसे सुरक्षित और आलीशान महल में है। क्योंकि उस घर की छत भले ही किराए की थी, लेकिन उस रिश्ते की नींव ‘विश्वास’ के सबसे मज़बूत पत्थर पर टिकी थी। राघव ने बिना कोई वादा किए, बिना कोई शोर मचाए, यह साबित कर दिया था कि निभाना उसे कहते हैं जब आपको अपनी परवाह से ज्यादा सामने वाले की ज़रूरत की फिक्र हो।
सुधा रसोई में गई और चाय बनाने लगी। बाहर बारिश अब भी हो रही थी, लेकिन अब वह डरावनी नहीं, सुहानी लग रही थी। उसने मन ही मन तय कर लिया कि अब वह भी राघव के त्याग को व्यर्थ नहीं जाने देगी। वह ट्यूशन शुरू करेगी, थोड़ी और बचत करेगी। घर तो वे बना ही लेंगे, लेकिन आज राघव ने जो ‘विश्वास का घर’ बनाया था, उसमें दरार कभी नहीं आने देगी।
समीर अमेरिका चला गया। दो साल बाद वह लौटा, एक बड़ी नौकरी के साथ। उसने आते ही सबसे पहले राघव के हाथ में एक चेक और एक चाबी रखी। चेक राघव के दिए पैसों का था, और चाबी उस नए फ्लैट की थी जिसे राघव ने पसंद किया था। समीर ने अपनी पहली सैलरी और साइनिंग बोनस से उसका डाउन पेमेंट कर दिया था।
लेकिन उस दिन, दो साल पहले की उस बरसात वाली शाम को, राघव ने जो निवेश किया था, उसका रिटर्न पैसों में नहीं, उस सम्मान में मिला जो सुधा और उसके परिवार की आँखों में राघव के लिए हमेशा-हमेशा के लिए बस गया था।
लेखक : मुकेश पटेल