ये कैसा बंधन – डॉ आभा माहेश्वरी

सुबह की पहली किरण खिड़की के पर्दों से छनकर कमरे में उतर रही थी। बाहर अमलतास के पीले फूल हवा के साथ झूम रहे थे। घर में सब कुछ वैसा ही था, जैसा पिछले कई वर्षों से था—वही आँगन, वही तुलसी का चौरा, वही बरामदे की पुरानी कुर्सी और दीवार पर टँगी एक तस्वीर।

तस्वीर में चार लोग मुस्कुरा रहे थे—माँ, पिता, बड़ी बेटी अंकिता और छोटा बेटा गौरव।

आज उस तस्वीर के सामने अंकिता अकेली खड़ी थी।

पिता को गुज़रे पाँच वर्ष हो चुके थे और माँ को भी इस दुनिया से गए लगभग दो वर्ष हो गए थे। गौरव विदेश में नौकरी करता था। साल में एक बार आता, कुछ दिन रुकता और फिर लौट जाता।

अंकिता ने तस्वीर पर जमी धूल साफ की और धीरे से बोली,

“आप दोनों होते तो शायद यह घर इतना खाली नहीं लगता।”

उसकी आँखें नम थीं, मगर चेहरे पर शिकायत नहीं थी।

इसी घर में उसका बचपन बीता था। यहीं माँ की डाँट, पिता की हँसी और गौरव की शरारतें थीं। समय ने सबको अलग-अलग दिशाओं में पहुँचा दिया था, लेकिन अंकिता के लिए यह घर आज भी साँस लेता था।

उस दिन दोपहर में डाकिया एक पत्र देकर गया।

पत्र गौरव का था।

“दीदी, मैंने तय किया है कि पुश्तैनी घर बेच दूँ। शहर में इसकी कीमत बहुत अच्छी मिल रही है। हम दोनों को अपना-अपना हिस्सा मिल जाएगा। आप भी इस पुराने घर के मोह से बाहर निकलो।”

पत्र पढ़कर अंकिता देर तक मौन बैठी रही।

घर बेचने का निर्णय केवल ईंट-पत्थर बेचने जैसा नहीं था। उसके लिए यह माँ की रसोई की खुशबू, पिता के कदमों की आहट और बचपन की अनगिनत स्मृतियाँ बेचने जैसा था।

उसने गौरव को फोन किया।

“गौरव, क्या तुम सचमुच घर बेचना चाहते हो?”

“हाँ दीदी। वहाँ रहना तो अब किसी के लिए संभव नहीं है। आप भी अकेली रहती हैं। इतने बड़े घर का क्या करोगी?”

“घर बड़ा नहीं है गौरव… यादें बड़ी हैं।”

दूसरी तरफ कुछ क्षण खामोशी रही।

“दीदी, भावनाओं से जिंदगी नहीं चलती।”

“सही कह रहे हो,” अंकिता ने शांत स्वर में कहा, “लेकिन केवल पैसों से भी तो नहीं चलती।”

फोन कट गया।

कुछ दिनों बाद गौरव भारत आया। घर के कागज़ देखने के लिए दोनों भाई-बहन बैठक में आमने-सामने बैठे थे।

गौरव ने फाइल मेज पर रखी।

“बस हस्ताक्षर कर दो, दीदी। अगले महीने तक घर बिक जाएगा।”

अंकिता ने कागज़ों की ओर देखा, फिर गौरव की ओर।

“तुम्हें याद है माँ आखिरी दिनों में क्या कहती थीं?”

गौरव चुप रहा।

“वह कहती थीं—‘मेरे बाद इस घर को मत छोड़ना। घर छोड़ दोगे तो एक-दूसरे से मिलने का बहाना भी चला जाएगा।’”

गौरव ने नजरें झुका लीं।

“दीदी, माँ भावुक थीं।”

“और हम?”

अंकिता की आवाज़ भर्रा गई।

“हम क्या हैं, गौरव? इतने वर्षों से हम एक-दूसरे से दूर हैं। तुम विदेश में हो, मैं यहाँ हूँ। त्योहार पर फोन, जन्मदिन पर संदेश… बस इतना ही रह गया है हमारे बीच।”

गौरव ने कोई उत्तर नहीं दिया।

उसी रात अचानक तेज बारिश शुरू हो गई। बिजली चली गई। अंकिता रसोई में मोमबत्ती ढूँढ़ रही थी कि बाहर से किसी बच्चे के रोने की आवाज़ सुनाई दी।

दोनों भाई-बहन बाहर आए।

दरवाजे के पास लगभग दस-ग्यारह वर्ष की एक बच्ची भीगती हुई खड़ी थी।

“कौन हो तुम?” गौरव ने पूछा।

“मेरा नाम गौरी है,” बच्ची ने काँपते हुए कहा। “माँ बीमार हैं। हमारे घर की छत गिर गई है। पड़ोस वाली चाची ने कहा कि यहाँ आ जाओ।”

अंकिता तुरंत उसे भीतर ले आई।

अगले दिन पता चला कि गौरी की माँ विधवा थी और सिलाई करके किसी तरह घर चलाती थी। बारिश में उनका कच्चा मकान बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया था।

अंकिता ने माँ-बेटी को कुछ दिनों के लिए घर के पिछले हिस्से में रहने की जगह दे दी।

गौरव यह सब देखता रहा।

एक शाम गौरी आँगन में बैठकर अपनी कॉपी में कुछ लिख रही थी।

गौरव ने पूछा, “क्या लिख रही हो?”

“निबंध—‘मेरा घर।’”

“तुम्हारा घर तो बारिश में टूट गया।”

गौरी मुस्कुराई।

“घर दीवारों से थोड़ी बनता है, भैया? जहाँ अपने लोग हों, वही घर होता है।”

गौरव जैसे भीतर तक हिल गया।

उसने अंकिता की ओर देखा।

वह तुलसी में पानी डाल रही थी।

उस रात गौरव देर तक सो नहीं सका।

सुबह उसने घर के कागज़ उठाए और फाड़कर कूड़ेदान में डाल दिए।

अंकिता ने आश्चर्य से पूछा, “ये क्या किया?”

गौरव मुस्कुराया।

“घर नहीं बेचेंगे।”

“क्यों?”

“क्योंकि मुझे समझ आ गया कि मैं इतने सालों से घर नहीं, अपने रिश्ते से दूर भाग रहा था।”

अंकिता की आँखों में आँसू आ गए।

गौरव ने आगे कहा, “और एक बात… इस घर के पिछले हिस्से में हम गौरी और उसकी माँ के लिए कमरा बनवाएँगे। माँ कहती थीं न, घर वही अच्छा है जिसके दरवाजे किसी जरूरतमंद के लिए खुले हों।”

अंकिता कुछ कह नहीं पाई।

उसने बस भाई का हाथ पकड़ लिया।

कभी यही हाथ बचपन में उसके पीछे दौड़ता था। कभी वही हाथ राखी बँधवाने के लिए आगे बढ़ता था। समय ने दोनों को दूर कर दिया था, मगर उस स्पर्श में आज भी बचपन जीवित था।

कुछ महीनों बाद घर का रूप बदल गया। पिछले हिस्से में गौरी और उसकी माँ के लिए एक छोटा-सा कमरा बन गया। आँगन में बच्चों के लिए शाम की पढ़ाई शुरू हो गई। गौरव ने विदेश से किताबें भेजनी शुरू कर दीं और अंकिता ने घर को फिर से हँसी से भर दिया।

एक दिन अंकिता ने दीवार पर लगी पुरानी तस्वीर के नीचे एक नया वाक्य लिख दिया—

“रिश्ते वे नहीं जो हमें बाँधें, रिश्ते वे हैं जो हमें जोड़कर रखें।”

गौरव ने पढ़कर कहा,

“दीदी, अब समझ आया—ये कैसा बंधन है!”

अंकिता मुस्कुरा दी।

“कौन-सा?”

गौरव ने तस्वीर की ओर देखते हुए कहा—

“जिसमें दूरी भी हो तो अपनापन कम नहीं होता, समय बदल जाए तो रिश्ता नहीं बदलता, और जिसे तोड़ने की कोशिश करो तो खुद ही बिखरने लगते हो।”

बाहर अमलतास फिर झूम रहा था।

घर वही था।

दीवारें वही थीं।

लेकिन अब उसमें रहने वाले समझ चुके थे कि सच्चे बंधन दरवाज़े बंद नहीं करते—वे दिलों के दरवाज़े खोलते हैं।

लेखिका:डॉ आभा माहेश्वरी

अलीगढ 

#ये कैसा बंधन 

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