यह कैसा बंधन – मधु वशिष्ठ

“देखो चाहे कुछ भी हो जाए, मुझसे कोई उम्मीद नहीं करना, इतना लंबा घूंघट मेरे से नहीं निकाला जाता| जाने यह कैसा बंधन है?    बाहर कुछ दिखता नहीं है, गर्मी बेहिसाब होती है| तुम्हें नहीं पता पिछली बार कितनी मुश्किलों से मैंने दिन काटे थे।” ट्रेन से उतरने के बाद टैक्सी में प्रिया का बोलना लगातार जारी था

और विक्की लगभग गिड़गिड़ा ही रहा था कि “देखो पिछली बार जैसा हाल तो अब के नहीं होगा, पिछली बार तो तुम शादी के बाद पहली बार घर गईं थी। घर में सब  लोग आए भी थे। अब तो सिर्फ बाऊजी ही होंगे, अगर वह भी बाहर गए हुए हों तो, बेशक थोड़ी देर को घूंघट हटा लेना। मम्मी आज तक भी चाचा जी और ताऊ जी से पर्दा करती आई हैं।”

हुंह, कह कर प्रिया पुरानी यादों में खो गई। दाखिला मिलने के बाद कॉलेज में जाना या शादी होने के बाद ससुराल में आना, अनुभव लगभग एक सा ही था।

वहां रैगिंग में कम से कम सीनियर्स को देख तो पाते थे, यहां तो लंबा सा घूंघट करके बिठा दिया। बेतुकी रैगिंग सी रस्में, अजीब अजीब से टास्क, विक्की तो सरेंडर ही किए बैठा था, हर टास्क में प्रिया ही जीत रही थी। सबका बोलना सुन तो रहा था, लेकिन घूंघट में दिख कोई नहीं रहा था। कमरे में बढ़ती हुई भीड़, घूघट में लगती असहनीय गर्मी, उफ्फ!

“वैसे भी अब इतनी गर्मी  तो नहीं है” विक्की बोला।

“यार, मुझे साड़ी पहनने की आदत ही नहीं है। पिछली बार तुम्हें याद है ना, क्या हाल हुआ था अपने कमरे में? ऊपर जाते हुए साड़ी का एक हिस्सा तो नीचे रह गया था और घूंघट में लिपटी हुई मैं ऊपर जीने तक भी चढ़ गई थी। खांस खांस कर बाऊ जी हालांकि कुछ कुछ इशारा दिए तो जा रहे थे,

लेकिन घूंघट में मैं तो खुद गूगल में सर्च कर रही थी, खिच खिच दूर करने की तो बहुत दवाई आतीं हैं पर क्या कोई ऐसी दवाई भी है जिससे कि बुजुर्गों की खांसी ठीक हो जाती है? नकली खांसी खांस कर तुम्हारे बाऊजी का भी हाल खराब हो गया होगा। अबके तो मैंने एक भी हाई हील की सैंडल नहीं रखी, चप्पल पहनकर ही भारी भारी साड़ियों में नहीं चला जा रहा था।”

आइए आपको विक्की और  प्रिया से मिलवाएं। प्रिया का लगातार बोलना जारी था। चेन्नई के इंजीनियरिंग कॉलेज में दोनों मिले थे क्योंकि दोनों नॉर्थ इंडियन थे| शायद इसलिए उनमें घनिष्ठता बढ़ी और विक्की का हैदराबाद में कैंपस सिलेक्शन होते ही दोनों ने शादी का फैसला कर लिया था।

प्रिया के मेहरा परिवार को तो दोनों की शादी में कोई एतराज ना था, लेकिन उम्मीद के विरुद्ध मिश्रा जी ने भी अपने बेटे की खुशी जानकर इस विवाह के लिए हामी भर दी थी। वैसे भी शादी के बाद दोनों ने रहना तो हैदराबाद में ही था।

प्रिया के मूड को ठीक करने के इरादे से विक्की बोला, “अबके तो तुमने पतली पतली साड़ियां ही रखीं है, उनमें से बाहर का कुछ तो दिखेगा ही। कम से कम पिछली बार के जैसे बाऊजी का हाथ पकड़कर तो नहीं चल दोगी। यार, उन्होंने हमारी शादी पर कोई एतराज नहीं किया “यही बहुत है”, इससे आगे तो मां बाऊजी से मैं कुछ कह नहीं सकता।

रीति रिवाज तो मानने ही पड़ेंगे ना। दोनों दीदियों को भी देखो, क्योंकि शादी में उनके ससुराल से भी लोग आए थे, वह तो अपने मायके में भी घूंघट करके घूम रही थीं। धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा।”

“पता नहीं, यह कैसा रिवाज है। अपने लोग अपनों को ही नहीं देख सकते। शायद कुछ औरतों को कॉम्प्लेक्स होता होगा कि कहीं दूसरी औरत उससे सुंदर ना लगे, इसलिए खुद को सुंदर बनाने की बजाए दूसरे का भी चेहरा छुपा दो, कहीं घूंघट के पीछे यही तो कारण नहीं रहा होगा?” प्रिया बोली।

  “यार! तुम हैदराबाद जाकर के इस विषय पर रिसर्च भी कर लेना मुझे कोई एतराज नहीं है, पर प्लीज 20 दिन और निभा दो।” विक्की फिर गिड़गिड़ाया।

टैक्सी घर के बाहर रुक चुकी थी। बेमन से टैक्सी से उतरने के बाद भी प्रिया घर के बाहर ही खड़ी थी। टैक्सी की आवाज सुनकर विक्की की दोनों बहनें भी बाहर आ गई थीं| भाभी के आने की खुशी में शायद वह दोनों भी घर आई हुई थीं। साड़ी में घूंघट को और लंबा करते हुए लड़खड़ाते कदमों से प्रिया ने घर में प्रवेश करा।

प्रणाम करने को वह सास और बाऊजी के चरणों की ओर बढ़ ही रही थी कि बाऊजी की आवाज सुनाई दी। बेटा अब घूंघट करने की जरूरत नहीं है, तुम इस घर के बारे में कुछ नहीं जानती हो,

कहीं सीढ़ियां चढ़ने उतरने में गिर गई तो बेहद मुश्किल होगी। हां अगर घर में किसी और को इस बात से ऐतराज हो तो चुन्नी मुझे ही दे देना, मैं तो चुन्नी लेकर के भी सारे घर में घूम सकता हूं। तुम इसे अपना ही घर समझते हुए आराम से रहो। वैसे भी कभी हम तुमसे मिलने शहर आएं तो हम आपस में बातें कैसे करेंगे?

पूरे घर में हंसी का माहौल छा गया था। दीदी ने प्रिया के सिर से घुंघट हटाकर उसे पीने के लिए पानी दिया। बहुत बड़ी समस्या के निवारण के कारण विक्की आंखों ही आंखों में प्रिया को देखकर मुस्कुरा रहा था और पिता के पैर छूते हुए आंखों ही आंखों में उनका धन्यवाद भी कर रहा था ।

वास्तव में बाबूजी ने विक्की को बहुत बड़ी मुसीबत से बच्चा दिया था वरना उसे प्रिया से न जाने और क्या-क्या सुनना पड़ता। 

       वैसे पाठक गण आपके मन में भी है ख्याल आता है कि घर में अपनों से ही इतना लंबा घूंघट करने का क्या कारण रहा होगा?

मधु वशिष्ठ फरीदाबाद हरियाणा

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