दोहरे मापदंड 

रास्ते भर सुमन का दिमाग उबलता रहा। उसे याद आया कि कल रात जब उसने राकेश से कहा था कि ‘आज बर्तन तुम धो दो, मेरी कमर दुख रही है’, तो राकेश ने साफ़ मना कर दिया था। “मैं मर्द हूँ सुमन, ये औरतों वाले काम मुझसे नहीं होते,” यह कहकर वह टीवी देखने बैठ गया था। और विमला जी ने भी आग में घी डालते हुए कहा था, “हां-हां, मेरा बेटा ऑफिस से थक कर आया है, अब वो बर्तन मांजेगा? शर्म नहीं आती तुझे?”

सुमन को सबसे ज्यादा गुस्सा इस दोहरे मापदंड पर आता था। वह भी तो नौकरी करती थी, वह भी तो थकती थी। पर उसकी थकान किसी को नज़र नहीं आती थी।

सुबह की चाय का कप हाथ में थामे हुए सुमन ने घड़ी देखी। सात बजने वाले थे, लेकिन उसके पति राकेश अभी तक बिस्तर में थे। सुमन जानती थी कि उसे अब दस बार और आवाज़ लगानी होगी तब जाकर राकेश की आँख खुलेगी। यह रोज़ का ड्रामा था। सुमन खुद एक प्राइवेट स्कूल में शिक्षिका थी, और राकेश एक सरकारी दफ्तर में क्लर्क। दोनों काम पर जाते थे, लेकिन सुबह की आपाधापी सिर्फ सुमन के हिस्से आती थी।

“राकेश, उठो अब। सात बज गए हैं। फिर कहोगे नाश्ता नहीं मिला,” सुमन ने झुंझलाते हुए कहा।

“अरे यार, पांच मिनट और सोने दो,” राकेश ने रजाई मुंह पर खींच ली।

सुमन ने एक गहरी सांस ली और रसोई की ओर बढ़ गई। उसकी सास, विमला जी, पहले से ही वहां मौजूद थीं और सब्ज़ी काट रही थीं। विमला जी का एक ही उसूल था—बेटा चाहे जो करे, बहू को ‘आदर्श’ होना चाहिए।

“बहू, आज आलू के परांठे बना ले। राकेश को बहुत पसंद हैं,” विमला जी ने बिना सुमन की तरफ देखे कहा।

“माजी, आज मुझे स्कूल जल्दी पहुंचना है। स्टाफ मीटिंग है। परांठे बनाने में वक्त लगेगा। मैं पोहा बना देती हूँ, जल्दी बन जाएगा,” सुमन ने विनती भरे स्वर में कहा।

“अरे, तो क्या हुआ? दस मिनट जल्दी हाथ चला ले। मेरा बेटा भूखा जाएगा क्या? पोहा खाने से पेट थोड़ी भरता है,” विमला जी ने ताना मारा। “आजकल की लड़कियाँ बस काम चोरी करना जानती हैं। हमारे ज़माने में तो…”

सुमन ने बात आगे बढ़ाना ठीक नहीं समझा। उसने चुपचाप आटा गूंथना शुरू कर दिया। 45 मिनट की मशक्कत के बाद परांठे तैयार हुए। राकेश तब तक तैयार होकर डाइनिंग टेबल पर आ चुका था।

“वाह! आज आलू के परांठे? मज़ा आ गया,” राकेश ने पहला निवाला तोड़ते हुए कहा। “सुमन, थोड़ा अचार भी दे दो।”

सुमन ने अचार दिया, पानी दिया, चाय दी। खुद जल्दी-जल्दी एक परांठा लपेटा और अपना बैग उठाकर भागने लगी।

“अरे सुमन, मेरा लंच बॉक्स?” राकेश ने पीछे से आवाज़ दी।

“टेबल पर ही रखा है,” सुमन ने बिना मुड़े जवाब दिया और ऑटो पकड़ने निकल गई।

रास्ते भर सुमन का दिमाग उबलता रहा। उसे याद आया कि कल रात जब उसने राकेश से कहा था कि ‘आज बर्तन तुम धो दो, मेरी कमर दुख रही है’, तो राकेश ने साफ़ मना कर दिया था। “मैं मर्द हूँ सुमन, ये औरतों वाले काम मुझसे नहीं होते,” यह कहकर वह टीवी देखने बैठ गया था। और विमला जी ने भी आग में घी डालते हुए कहा था, “हां-हां, मेरा बेटा ऑफिस से थक कर आया है, अब वो बर्तन मांजेगा? शर्म नहीं आती तुझे?”

सुमन को सबसे ज्यादा गुस्सा इस दोहरे मापदंड पर आता था। वह भी तो नौकरी करती थी, वह भी तो थकती थी। पर उसकी थकान किसी को नज़र नहीं आती थी।

कुछ महीने ऐसे ही बीते। सुमन ने कई बार राकेश को समझाने की कोशिश की कि गृहस्थी गाड़ी के दो पहिए हैं, दोनों को साथ चलना होगा। लेकिन राकेश और विमला जी की सोच में कोई बदलाव नहीं आया।

फिर एक दिन सुमन के स्कूल से एक ट्रिप जाने वाला था। सुमन को तीन दिन के लिए शहर से बाहर जाना था। उसने घर पर बता दिया।

“तीन दिन? तो घर कौन संभालेगा? खाना कौन बनाएगा?” विमला जी ने सवाल दागा।

“माजी, आप हैं, राकेश है। मिलजुल कर कर लीजिएगा। राकेश अब बच्चा थोड़ी है,” सुमन ने दृढ़ता से कहा और अपनी पैकिंग करने लगी।

सुमन के जाने के बाद घर का नक्शा ही बदल गया। पहले दिन राकेश ने बाहर से खाना मंगवाया, लेकिन दूसरे दिन विमला जी की तबीयत थोड़ी खराब हो गई। डॉक्टर ने सादा घर का खाना खाने को कहा। अब मुसीबत राकेश पर आ पड़ी। उसे खिचड़ी बनानी पड़ी। कुकर की सीटी गिनते-गिनते उसका पसीना छूट गया। रसोई में आटा फैला हुआ था, सिंक में बर्तन जमा थे।

तीसरे दिन जब सुमन वापस लौटी, तो उसने देखा कि घर अस्त-व्यस्त है, लेकिन एक अजीब सी शांति है। राकेश सोफे पर बैठा था और विमला जी चुपचाप टीवी देख रही थीं।

राकेश ने सुमन को देखते ही राहत की सांस ली। “सुमन, तुम आ गई! शुक्र है भगवान का।”

सुमन ने मुस्कुराते हुए पूछा, “क्या हुआ? सब ठीक तो है?”

उस रात खाने की टेबल पर एक चमत्कार हुआ। राकेश ने खुद उठकर पानी की बोतल भरी और सबके गिलासों में पानी डाला। खाना खाने के बाद उसने अपनी और विमला जी की प्लेट उठाई और सिंक में रखने गया।

विमला जी ने टोकना चाहा, “अरे बेटा, रहने दे। सुमन कर लेगी।”

लेकिन राकेश ने बीच में ही कह दिया, “नहीं मां, रहने दो। तीन दिन में मुझे समझ आ गया कि एक कप चाय बनाने में और एक वक्त का खाना बनाने में कितनी मेहनत लगती है। सुमन भी नौकरी करती है, उसे भी आराम चाहिए। अब से मैं भी घर के कामों में हाथ बंटाऊंगा।”

सुमन हैरान थी। उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। क्या यह वही राकेश था जो बर्तन धोने को ‘औरतों वाला काम’ कहता था?

बाद में सुमन को पता चला कि उसकी गैरमौजूदगी में जब राकेश को रसोई संभालनी पड़ी और मां की देखभाल करनी पड़ी, तब उसे एहसास हुआ कि ‘गृहणी’ होना कोई आसान काम नहीं है। उसे यह भी समझ आया कि जिन कामों को वह छोटा समझता था, असल में वही घर को घर बनाए रखते हैं।

उस दिन के बाद से सुमन की ज़िंदगी थोड़ी आसान हो गई। अब सुबह की चाय अक्सर राकेश बनाता था, और विमला जी भी अब चुप रहने लगी थीं, क्योंकि उनका लाडला बेटा अब बदल चुका था। सुमन ने महसूस किया कि कभी-कभी खामोशी और अनुपस्थिति वो सबक सिखा देती है जो हज़ारों शब्द नहीं सिखा पाते।

मूल लेखिका : विभा गुप्ता

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