खामोश प्रीत का मुखर उपहार

 आज वह स्मृति रघुनाथ जी के सीने में किसी खंजर की तरह चुभ रही थी। “इस उम्र में क्या ज़रूरत है?” क्या प्यार और उपहार की कोई उम्र होती है? क्या सुमित्रा का मन नहीं करता होगा कि उसका पति भी उसे खास महसूस कराए? रघुनाथ जी की आँखों से पहली बार आँसू छलक पड़े। उनका रोना अब सिसकियों में बदल रहा था। उनका दिल चीख-चीख कर कह रहा था कि हे ईश्वर, बस एक मौका दे दो। मैं अपनी खामोशी को अपनी कमज़ोरी नहीं बनने दूँगा। मैं उसे बताऊँगा कि वह मेरे जीवन की सबसे बड़ी पूँजी है।

तभी आईसीयू का दरवाज़ा खुला। डॉक्टर बाहर आए। रघुनाथ जी झटके से उठे और काँपते हाथों से डॉक्टर का हाथ पकड़ लिया।

“डॉक्टर साहब… मेरी सुमित्रा…?”

डॉक्टर के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान थी। “रघुनाथ जी, ईश्वर का शुक्र मनाइए। आपकी पत्नी खतरे से बाहर हैं। उन्होंने बहुत हिम्मत दिखाई है। उन्हें होश आ गया है। आप अंदर जाकर उनसे मिल सकते हैं, लेकिन उन्हें ज़्यादा थकाइएगा मत।”

अस्पताल के आईसीयू के बाहर पसरा सन्नाटा केवल मशीनों की बीप-बीप की आवाज़ से टूट रहा था। बाहर बेंच पर बैठे रघुनाथ जी की पथराई आँखें सामने के बंद दरवाज़े पर टिकी थीं। उनके चेहरे पर एक अजीब सी शून्यता थी, मानो उनके भीतर का सारा जीवन उस बंद दरवाज़े के पीछे वेंटिलेटर पर लेटी उनकी पत्नी सुमित्रा के साथ ही दाँव पर लग गया हो। आज सुबह तक सब कुछ कितना सामान्य था। आज उनकी शादी की पैंतीसवीं सालगिरह थी। सुमित्रा सुबह से ही उत्साह में थी। वह रघुनाथ जी की पसंद की खीर बना रही थी कि तभी अचानक उसके सीने में तेज़ दर्द उठा और वह रसोई के फर्श पर गिर पड़ी। जब तक रघुनाथ जी उसे संभालते, वह बेसुध हो चुकी थी।

पड़ोसियों की मदद से उसे अस्पताल लाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने बताया कि यह एक गंभीर हार्ट अटैक है। अगले कुछ घंटे बहुत नाज़ुक हैं। बेटा अमन और बेटी नीतिका भी खबर सुनते ही दूसरे शहर से निकल चुके थे, लेकिन रघुनाथ जी इस वक्त नितांत अकेले थे। अपनी पूरी ज़िंदगी में रघुनाथ जी ने कभी खुद को इतना असहाय महसूस नहीं किया था। वे हमेशा से एक मज़बूत, कठोर और व्यावहारिक इंसान रहे थे। परिवार की ज़िम्मेदारियों ने उन्हें ऐसा बना दिया था।

आईसीयू के ठंडे गलियारे में बैठे-बैठे रघुनाथ जी की आँखों के सामने पिछले पैंतीस साल किसी फिल्म की रील की तरह घूमने लगे। जब सुमित्रा ब्याह कर उनके घर आई थी, तब रघुनाथ जी के ऊपर एक बड़े संयुक्त परिवार की ज़िम्मेदारी थी। पिता का कर्ज़, दो छोटी बहनों की शादी और भाइयों की पढ़ाई। इन सबके बीच सुमित्रा ने कब खुद को इस परिवार की नींव की ईंट बना लिया, यह रघुनाथ जी को पता ही नहीं चला। सुमित्रा ने कभी उफ़ तक नहीं की। बहनों की शादी में जब पैसों की कमी पड़ी, तो सुमित्रा ने चुपचाप अपने मायके से मिले गहने रघुनाथ जी के हाथों में रख दिए थे। बदले में रघुनाथ जी ने क्या दिया? सिर्फ एक खामोश स्वीकृति।

रघुनाथ जी का मानना था कि एक पुरुष का प्यार उसके कर्तव्यों में झलकता है। उन्होंने दिन-रात एक करके परिवार को पाला, बच्चों को अच्छी शिक्षा दी, एक पक्का मकान बनवाया। उन्हें लगता था कि यही तो प्यार है। लेकिन आज, इस खौफनाक सन्नाटे में उन्हें एहसास हो रहा था कि ज़िम्मेदारी निभाना और प्यार जताना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। उन्होंने अपनी पत्नी को एक मशीन की तरह समझा, जो बस घर चलाती थी। क्या कभी उन्होंने सुमित्रा की आँखों में देखकर कहा कि वह उनके लिए क्या मायने रखती है? क्या कभी उन्होंने बिना किसी त्योहार या ज़रूरत के उसे कोई उपहार दिया?

उन्हें एक घटना याद आई। बात कुछ महीने पहले की है। दोनों बाज़ार से गुज़र रहे थे। सुमित्रा के कदम एक गहनों की दुकान के बाहर अचानक रुक गए थे। काँच के पार डिस्प्ले में एक खूबसूरत सोने की चेन और पेंडेंट रखा था। सुमित्रा की आँखों में उस गहने के लिए एक अजीब सी चमक थी। उसने ठंडी आह भरते हुए कहा था, “कितनी सुंदर डिज़ाइन है ना?” रघुनाथ जी उस वक्त अमन की कॉलेज की फीस और घर के राशन का हिसाब दिमाग में जोड़ रहे थे। उन्होंने रूखेपन से कहा था, “सुंदर है, पर अभी हमारे पास इन फालतू खर्चों के लिए पैसे नहीं हैं। तुम्हें क्या ज़रूरत है अब इन दिखावों की?” सुमित्रा ने तुरंत नज़रे चुरा ली थीं और मुस्कुराते हुए कहा था, “हाँ, आप सही कह रहे हैं, इस उम्र में ये सब मुझ पर अच्छा भी नहीं लगेगा।” और वह आगे बढ़ गई थी।

आज वह स्मृति रघुनाथ जी के सीने में किसी खंजर की तरह चुभ रही थी। “इस उम्र में क्या ज़रूरत है?” क्या प्यार और उपहार की कोई उम्र होती है? क्या सुमित्रा का मन नहीं करता होगा कि उसका पति भी उसे खास महसूस कराए? रघुनाथ जी की आँखों से पहली बार आँसू छलक पड़े। उनका रोना अब सिसकियों में बदल रहा था। उनका दिल चीख-चीख कर कह रहा था कि हे ईश्वर, बस एक मौका दे दो। मैं अपनी खामोशी को अपनी कमज़ोरी नहीं बनने दूँगा। मैं उसे बताऊँगा कि वह मेरे जीवन की सबसे बड़ी पूँजी है।

तभी आईसीयू का दरवाज़ा खुला। डॉक्टर बाहर आए। रघुनाथ जी झटके से उठे और काँपते हाथों से डॉक्टर का हाथ पकड़ लिया।

“डॉक्टर साहब… मेरी सुमित्रा…?”

डॉक्टर के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान थी। “रघुनाथ जी, ईश्वर का शुक्र मनाइए। आपकी पत्नी खतरे से बाहर हैं। उन्होंने बहुत हिम्मत दिखाई है। उन्हें होश आ गया है। आप अंदर जाकर उनसे मिल सकते हैं, लेकिन उन्हें ज़्यादा थकाइएगा मत।”

यह सुनते ही रघुनाथ जी के भीतर मानो प्राण लौट आए। उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर आसमान की तरफ देखा। लेकिन अंदर जाने से पहले उनके कदम ठिठक गए। उन्होंने जेब से अपना फोन निकाला और बैंक का बैलेंस चेक किया। फिर उन्होंने नर्स से कहा, “मैं बस आधे घंटे में आता हूँ, मेरी पत्नी का खयाल रखिएगा।”

रघुनाथ जी अस्पताल से बाहर निकले और सीधे बाज़ार की तरफ भागे। आज उनके चेहरे पर एक अलग ही दृढ़ता थी। वह सीधे उसी गहनों की दुकान पर पहुँचे। उन्होंने अपनी रिटायरमेंट की एफडी तुड़वाकर जो पैसे बैंक में रखे थे, आज उनका सही इस्तेमाल करने का समय आ गया था। उन्होंने दुकानदार से वही सोने की चेन और पेंडेंट माँगा जिसे सुमित्रा ने कुछ महीने पहले देखा था। डिब्बे में पैक उस चेन को जब रघुनाथ जी ने अपने हाथों में लिया, तो उन्हें लगा जैसे उन्होंने अपने जीवन की सबसे बड़ी भूल को सुधारने का पहला कदम उठा लिया है।

अस्पताल वापस लौटकर वे दबे पाँव आईसीयू में दाखिल हुए। सुमित्रा पीली और कमज़ोर लग रही थी, लेकिन रघुनाथ जी को देखते ही उसकी आँखों में वही पुरानी, परिचित चमक आ गई। ऑक्सीजन मास्क हटा दिया गया था।

रघुनाथ जी धीरे से उसके बिस्तर के पास स्टूल पर बैठ गए। उन्होंने सुमित्रा का कमज़ोर हाथ अपने दोनों हाथों में ले लिया।

“तुमने तो मुझे डरा ही दिया था सुमित्रा,” रघुनाथ जी की आवाज़ भर्राई हुई थी।

सुमित्रा ने फीकी सी मुस्कान के साथ कहा, “आपको छोड़कर कहाँ जा सकती हूँ? अभी तो बच्चों की शादी देखनी है, घर के कितने काम बाकी हैं।”

रघुनाथ जी ने गहरी साँस ली। “बस सुमित्रा, बहुत काम कर लिया तुमने। अब कोई काम नहीं। बहुत ज़िम्मेदारियाँ निभा लीं हमने।”

यह कहते हुए रघुनाथ जी ने अपनी जेब से वह मखमली डिब्बी निकाली और सुमित्रा के हाथों पर रख दी।

सुमित्रा ने हैरानी से डिब्बी को देखा और फिर रघुनाथ जी को। “यह क्या है?” काँपते हाथों से उसने डिब्बी खोली। अंदर वही सोने की चेन चमक रही थी, जिसे देखकर उसने कभी अपनी इच्छा मार दी थी।

सुमित्रा की आँखों से झर-झर आँसू बहने लगे। “आप ये क्यों ले आए? इसकी क्या ज़रूरत थी? आपको पता है ना इसमें कितने पैसे लगे होंगे?”

रघुनाथ जी ने अपनी उंगली सुमित्रा के होंठों पर रख दी। “हाँ, मुझे पता है कि इसमें पैसे लगे हैं। लेकिन ये भी पता है कि मेरी ज़िंदगी की सबसे कीमती चीज़ के सामने इसकी कोई कीमत नहीं है। सुमित्रा, मैंने ज़िंदगी भर तुम्हें सिर्फ एक पत्नी, एक बहू और एक माँ के रूप में देखा। मैं भूल गया था कि तुम एक ऐसी स्त्री हो जिसने मेरे लिए अपने हर शौक, हर इच्छा को मार दिया। मैंने कभी तुम्हें कोई तोहफा नहीं दिया, कभी यह नहीं कहा कि मैं तुमसे कितना प्यार करता हूँ। मेरी खामोशी मेरा अहंकार बन गई थी। मुझे लगा कि मैं परिवार के लिए कमा रहा हूँ, यही मेरा प्यार है। लेकिन आज जब तुम्हें खोने का डर सामने आया, तो मुझे एहसास हुआ कि बिना इज़हार के प्यार अधूरा रह जाता है।”

सुमित्रा अवाक रह गई। जो पति पैंतीस सालों में कभी प्यार के दो मीठे बोल नहीं बोला, वह आज अपना पूरा हृदय खोलकर उसके सामने रख रहा था।

रघुनाथ जी ने डिब्बी से चेन निकाली और आगे बढ़कर सुमित्रा के गले में पहना दी। “सालगिरह मुबारक हो सुमित्रा। यह सिर्फ एक सोने का टुकड़ा नहीं है, यह मेरा पश्चाताप है, मेरा समर्पण है, और मेरा वो प्यार है जो आज तक मेरी खामोशी में कैद था। अब हम एक नई ज़िंदगी शुरू करेंगे, जहाँ सिर्फ ज़िम्मेदारियाँ नहीं होंगी, बल्कि एक-दूसरे के लिए व्यक्त किया गया प्रेम होगा।”

सुमित्रा ने रघुनाथ जी का हाथ चूम लिया। आज अस्पताल के उस कमरे में कोई मशीन की आवाज़ नहीं, बल्कि दो दिलों के फिर से जुड़ने की, एक नई शुरुआत की धड़कन गूँज रही थी। ज़िंदगी ने उन्हें दूसरा मौका दिया था, और इस बार रघुनाथ जी ने तय कर लिया था कि वे इस मौके को अपनी खामोशी की भेंट नहीं चढ़ने देंगे। प्यार सिर्फ महसूस करने की चीज़ नहीं है, उसे जताना, उसे शब्दों में और छोटे-छोटे उपहारों में पिरोकर अपनों तक पहुँचाना ही जीवन का असली सुकून है।

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