नीलिमा अब अपने आँसू नहीं रोक पाई। उसने रोते हुए ससुर जी के अस्पताल जाने वाली बात बताई और फिर फफकते हुए बोली, “दीदी, मुझे बहुत ज़ोर से भूख लगी है। पिछले तीन दिन से मैंने पेट भर के कुछ नहीं खाया है। यहाँ सब इतने परेशान हैं कि मैं किसी से कुछ कह भी नहीं पा रही हूँ। मेरे पेट में दर्द हो रहा है दीदी…”
फोन के दूसरी तरफ एक पल के लिए सन्नाटा छा गया, फिर बड़ी बहन की एक हल्की सी, सुकून भरी हँसी सुनाई दी। “पगली, तू रो क्यों रही है? मैं जानती थी कि शादी की इस भागदौड़ में ऐसा कुछ हो सकता है और तू अपने शर्मीले स्वभाव की वजह से किसी से कुछ नहीं माँगेगी। सुन, तेरा जो लाल वाला बड़ा सूटकेस है न, उसकी अंदर की साइड वाली चेन खोल।”
नीलिमा ने फोन कान पर लगाए हुए तुरंत अपना सूटकेस खोला। चेन खोलते ही उसके चेहरे पर एक चमक आ गई। वहाँ अंदर एक चौड़े से डिब्बे में उसकी पसंद के बेसन के लड्डू, सूखे मेवे, नमक पारे और घर की बनी मठरियाँ सहेज कर रखी हुई थीं।
हूक लाइन: क्या विदाई के बाद सच में मायका पीछे छूट जाता है, या अपनों का प्यार किसी न किसी रूप में एक अदृश्य डोर बनकर बेटी के साथ हमेशा जुड़ा रहता है? ससुराल के पहले ही दिन जब एक नई नवेली दुल्हन को अनपेक्षित संकट और कड़कड़ाती भूख का सामना करना पड़ा, तो कैसे एक छोटी सी समझदारी ने उसे टूटने से बचा लिया… यह कहानी हर उस बेटी और बहन के दिल को छू लेगी, जिसने कभी अपना घर छोड़ा है।
भारी ज़री वाले लाल लहंगे और गहनों के बोझ से लदी नीलिमा अपने सजे हुए कमरे में बैठी थी। आज उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा दिन था, लेकिन उसके भीतर एक अजीब सी बेचैनी छाई हुई थी। यह बेचैनी सिर्फ एक नए घर, नए लोगों और एक नए जीवनसाथी के इंतज़ार की नहीं थी, बल्कि यह उस तेज़ भूख की भी थी जो पिछले तीन दिनों से उसके पेट में आग लगा रही थी।
शादी वाले घर में कहाँ किसी को फुर्सत होती है ठीक से खाने-पीने की। पहले दिन हल्दी और मेहंदी की रस्मों में भागदौड़, दूसरे दिन उपवास और फिर शादी वाले दिन जब जयमाला के बाद वह खाना खाने बैठी ही थी, तभी खबर आई कि उसके पिताजी की तबीयत अचानक बिगड़ गई है। घबराहट और रोने-धोने में किसी को खाने का होश ही नहीं रहा। पिताजी को तो दवा देकर सुला दिया गया, लेकिन नीलिमा का निवाला वहीं छूट गया। उसके बाद सुबह भोर में विदाई की रुलाई और मायका छूटने का ऐसा गम कि गले से पानी की एक बूँद भी नीचे नहीं उतरी।
ससुराल पहुँचते ही रस्मों का ऐसा लंबा सिलसिला शुरू हुआ कि शाम ढल गई। अब रात के ग्यारह बज चुके थे। पूरे घर में थकान और शांति पसरने लगी थी। नीलिमा सोच रही थी कि अब शायद कोई उसे कुछ खाने को पूछेगा, लेकिन तभी कमरे का दरवाज़ा खुला और विहान अंदर आया। विहान, जिससे नीलिमा की शादी से पहले सिर्फ फोन पर कुछ बार ही बात हुई थी। आज पहली बार वे दोनों एक कमरे में अकेले थे। नीलिमा थोड़ी असहज हुई। विहान ने करीब आकर बहुत ही प्यार से नीलिमा का हाथ अपने हाथों में लिया। दोनों के बीच की झिझक अभी टूट ही रही थी और विहान उसे उसकी खूबसूरती के लिए सराह ही रहा था कि अचानक बाहर से एक ज़ोरदार चीख सुनाई दी।
चीख विहान की ताई जी की थी। विहान घबराकर तुरंत कमरे से बाहर दौड़ा। नीलिमा भी अपने भारी लहंगे को सँभालते हुए बाहर आई। पता चला कि विहान के पिता जी को अचानक सीने में तेज़ दर्द उठा है और वे ज़मीन पर गिर पड़े हैं। घर में कोहराम मच गया। विहान और उसके चाचा जी बिना एक पल गँवाए उन्हें गाड़ी में डालकर अस्पताल ले गए।
पीछे घर में सिर्फ कुछ दूर की रिश्तेदार महिलाएँ और नीलिमा रह गए। पूरा घर चिंता और खौफ में डूबा था। ऐसे माहौल में नीलिमा के लिए अपनी भूख का ज़िक्र करना किसी पाप से कम नहीं लग रहा था। वह चुपचाप एक कोने में बैठी भगवान से अपने ससुर जी की सलामती की दुआ माँग रही थी। रात के दो बज चुके थे। रिश्तेदारों ने आपस में चाय बनाकर पी ली थी, लेकिन किसी का ध्यान इस सहमी हुई नई दुल्हन की तरफ नहीं गया जो भूख और कमज़ोरी से लगभग चक्कर खाकर गिरने की हालत में थी।
नीलिमा का सिर भन्ना रहा था। उसे लग रहा था कि वह अब बेहोश हो जाएगी। उसे अपनी माँ की बहुत याद आ रही थी। अगर आज माँ होती, तो वह चाहे कितनी भी बड़ी मुसीबत क्यों न हो, अपनी बेटी को भूखा नहीं रहने देती।
तभी उसके पास रखे पर्स में फोन वाइब्रेट हुआ। स्क्रीन पर उसकी बड़ी बहन ‘दीदी’ का नाम चमक रहा था। नीलिमा ने जैसे-तैसे फोन उठाया और कमज़ोर आवाज़ में कहा, “हैलो दीदी…”
बड़ी बहन ने तुरंत भाँप लिया कि कुछ गड़बड़ है। “क्या हुआ नीलिमा ? तेरी आवाज़ इतनी कमज़ोर क्यों लग रही है? सब ठीक तो है न ससुराल में?”
नीलिमा अब अपने आँसू नहीं रोक पाई। उसने रोते हुए ससुर जी के अस्पताल जाने वाली बात बताई और फिर फफकते हुए बोली, “दीदी, मुझे बहुत ज़ोर से भूख लगी है। पिछले तीन दिन से मैंने पेट भर के कुछ नहीं खाया है। यहाँ सब इतने परेशान हैं कि मैं किसी से कुछ कह भी नहीं पा रही हूँ। मेरे पेट में दर्द हो रहा है दीदी…”
फोन के दूसरी तरफ एक पल के लिए सन्नाटा छा गया, फिर बड़ी बहन की एक हल्की सी, सुकून भरी हँसी सुनाई दी। “पगली, तू रो क्यों रही है? मैं जानती थी कि शादी की इस भागदौड़ में ऐसा कुछ हो सकता है और तू अपने शर्मीले स्वभाव की वजह से किसी से कुछ नहीं माँगेगी। सुन, तेरा जो लाल वाला बड़ा सूटकेस है न, उसकी अंदर की साइड वाली चेन खोल।”
नीलिमा ने फोन कान पर लगाए हुए तुरंत अपना सूटकेस खोला। चेन खोलते ही उसके चेहरे पर एक चमक आ गई। वहाँ अंदर एक चौड़े से डिब्बे में उसकी पसंद के बेसन के लड्डू, सूखे मेवे, नमक पारे और घर की बनी मठरियाँ सहेज कर रखी हुई थीं।
“दीदी…” नीलिमा के मुँह से बस इतना ही निकला।
“चुपचाप फोन रख और सबसे पहले पेट भरकर कुछ खा ले। और हाँ, भगवान पर भरोसा रख, ससुर जी भी बिल्कुल ठीक होकर घर आ जाएँगे,” बहन ने प्यार से डाँटते हुए कहा।
नीलिमा ने फोन काटा और उस डिब्बे को ऐसे सीने से लगा लिया जैसे वह कोई खज़ाना हो। उसने जी भरकर लड्डू और मठरियाँ खाईं। भूख मिटते ही उसके शरीर में जैसे नई जान आ गई। कुछ ही देर बाद विहान का फोन आया कि पिता जी को गैस की वजह से दर्द हुआ था, अब वे बिल्कुल खतरे से बाहर हैं और वे लोग सुबह तक घर आ जाएँगे। यह खबर सुनकर नीलिमा के दिल का बचा हुआ बोझ भी उतर गया।
उस रात नीलिमा ने जाना कि माँ और बड़ी बहन का प्यार किसी भी सरहद और ससुराल की दहलीज से बँधा नहीं होता। वे शारीरिक रूप से दूर होकर भी अपनी बेटी की हर तकलीफ को भाँप लेती हैं। बड़ी बहन ने अपनी दूरदर्शिता और समझदारी से नीलिमा की उस रात को एक बुरे सपने में बदलने से बचा लिया था। सुबह जब विहान घर लौटा, तो नीलिमा ने उसे भी वो लड्डू खिलाए, जिसकी मिठास ने उन दोनों के नए रिश्ते में एक नया और खूबसूरत रंग घोल दिया।
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जी भी ठीक होकर घर आ जाते हैं। यह कहानी दर्शाती है कि अपनों का प्यार और समझदारी बुरे वक्त में कैसे हमारी ढाल बन जाती है।