रमाकांत ने एक सरसरी निगाह उस वृद्धा पर डाली और फिर झुंझलाते हुए बोले, “अरे देवकी, तुम भी कहाँ इन सब के चक्कर में पड़ रही हो। ये तीर्थ स्थान है, यहाँ ऐसे हज़ारों लोग रोज़ आते हैं। हमारा संकल्प टूट जाएगा। चलो जल्दी, हमें बहुत देर हो रही है।”
रमाकांत ने देवकी को फिर से आगे की ओर खींच लिया। देवकी शारीरिक रूप से तो आगे बढ़ गई, लेकिन उसका मन वहीं उस गली के कोने में अटक कर रह गया। वह जैसे ही कुछ कदम आगे बढ़ती, उसे महसूस होता कि वो कांपती हुई काया उसे पुकार रही है। उसका अंतर्मन उसे कचोट रहा था। उसे लगा जैसे उसके द्वारा जपे जा रहे भगवान के नाम में कोई रस नहीं बचा है। एक तरफ गर्भगृह में विराजित ईश्वर थे, जिन्हें लोग रेशम और मखमल ओढ़ाने जा रहे थे, और दूसरी तरफ वही ईश्वर उस गली के नुक्कड़ पर एक बेबस बुढ़िया के रूप में ठंड से ठिठुर रहे थे।
उत्तर भारत में कड़कड़ाती ठंड का मौसम था। शीत लहर ने पूरे शहर को अपनी चादर में लपेट रखा था। आज मकर संक्रांति का पावन पर्व था और काशी के घाटों पर आस्था का एक विशाल सैलाब उमड़ पड़ा था। चारों ओर भोर के कोहरे के बीच शंख और घंटों की गूँज सुनाई दे रही थी। हर कोई पवित्र गंगा में डुबकी लगाकर जल्दी से जल्दी विश्वनाथ जी के दर्शन करने के लिए आतुर था। भीड़ इतनी अधिक थी कि तिल रखने की भी जगह नहीं थी। लोग एक-दूसरे को धकेलते हुए आगे बढ़ने की होड़ में थे।
इसी भीड़ के बीच देवकी और उनके पति रमाकांत भी चले जा रहे थे। रमाकांत एक अत्यंत नियम-धर्म वाले और कर्मकांडी व्यक्ति थे। उन्होंने आज के दिन के लिए एक विशेष पूजा का संकल्प लिया था। उनके हाथ में एक सुंदर सी पीतल की टोकरी थी, जिसमें भगवान को चढ़ाने के लिए एक बेहद कीमती बनारसी रेशमी शॉल, ताज़े फल, मेवे और मिठाइयाँ रखी हुई थीं। रमाकांत बार-बार अपनी घड़ी देख रहे थे क्योंकि वह शुभ मुहूर्त बीतने से पहले ही मंदिर के गर्भगृह तक पहुँचना चाहते थे। उन्होंने देवकी का हाथ कसकर पकड़ा हुआ था ताकि वह भीड़ में कहीं पीछे न छूट जाए।
“थोड़ा तेज़ चलो देवकी, अगर ऐसे चींटी की चाल चलोगी तो हम स्नान और दर्शन दोनों से वंचित रह जाएंगे,” रमाकांत ने अपनी पत्नी को लगभग खींचते हुए कहा।
देवकी भी पूरे मन से ईश्वर का स्मरण करते हुए अपने कदम बढ़ा रही थी। घाट की सीढ़ियों की तरफ मुड़ते ही एक संकरी गली आई जहाँ कुछ भिखारियों और साधुओं का जमावड़ा था। अचानक देवकी की नज़र गली के एक कोने में बैठी एक अति वृद्ध महिला पर पड़ी। वह बुढ़िया ठंड से बुरी तरह कांप रही थी। उसके शरीर पर कपड़ों के नाम पर केवल कुछ चिथड़े थे, जो इस हाड़ कंपा देने वाली ठंड को रोकने में पूरी तरह असमर्थ थे। महिला की आँखें धंसी हुई थीं, होंठ नीले पड़ चुके थे और उसके मुँह से दर्द भरी कराह निकल रही थी। वह किसी से कुछ मांग नहीं रही थी, बस अपने घुटनों को छाती से सटाकर खुद को थोड़ी सी गर्माहट देने का असफल प्रयास कर रही थी।
इतनी बड़ी भीड़ वहाँ से गुज़र रही थी, हर कोई ‘हर हर महादेव’ का उद्घोष कर रहा था, लेकिन किसी की भी नज़र उस निस्सहाय वृद्धा पर नहीं पड़ रही थी। देवकी के कदम अचानक भारी हो गए। वह ठिठक कर उस वृद्धा को देखने लगी।
“सुनिए,” देवकी ने रमाकांत के हाथ को हल्का सा खींचते हुए कहा, “ज़रा उस बेचारी बूढ़ी माँ को देखिए। ठंड के मारे उनकी जान निकल रही है।”
रमाकांत ने एक सरसरी निगाह उस वृद्धा पर डाली और फिर झुंझलाते हुए बोले, “अरे देवकी, तुम भी कहाँ इन सब के चक्कर में पड़ रही हो। ये तीर्थ स्थान है, यहाँ ऐसे हज़ारों लोग रोज़ आते हैं। हमारा संकल्प टूट जाएगा। चलो जल्दी, हमें बहुत देर हो रही है।”
रमाकांत ने देवकी को फिर से आगे की ओर खींच लिया। देवकी शारीरिक रूप से तो आगे बढ़ गई, लेकिन उसका मन वहीं उस गली के कोने में अटक कर रह गया। वह जैसे ही कुछ कदम आगे बढ़ती, उसे महसूस होता कि वो कांपती हुई काया उसे पुकार रही है। उसका अंतर्मन उसे कचोट रहा था। उसे लगा जैसे उसके द्वारा जपे जा रहे भगवान के नाम में कोई रस नहीं बचा है। एक तरफ गर्भगृह में विराजित ईश्वर थे, जिन्हें लोग रेशम और मखमल ओढ़ाने जा रहे थे, और दूसरी तरफ वही ईश्वर उस गली के नुक्कड़ पर एक बेबस बुढ़िया के रूप में ठंड से ठिठुर रहे थे।
भीड़ का रेला और तेज़ हो गया। धक्का-मुक्की बढ़ने लगी। तभी किसी ने ज़ोर का धक्का दिया और रमाकांत के हाथ से देवकी का हाथ छूट गया। रमाकांत आगे निकल गए। देवकी ने पीछे मुड़कर देखा, वह बुढ़िया अब ज़मीन पर लुढ़क गई थी और उसकी आँखें बंद हो रही थीं।
अब देवकी से और रहा नहीं गया। उसने कुछ नहीं सोचा, न मुहूर्त की चिंता की और न ही पति के क्रोध की। वह उल्टे पाँव भीड़ को चीरती हुई लगभग दौड़ते हुए उस वृद्धा के पास जा पहुँची।
“देवकी! यह क्या कर रही हो? वापस आओ!” भीड़ में कुछ दूरी से रमाकांत की तेज़ और क्रोधित आवाज़ गूँजी, लेकिन देवकी ने अनसुना कर दिया।
देवकी ने उस बुढ़िया के पास पहुँचकर उसे सीधा किया। उसका शरीर बर्फ की तरह ठंडा पड़ चुका था। बुढ़िया ने बड़ी मुश्किल से अपनी आँखें खोलीं और देवकी की ओर देखा। उन आँखों में जो बेबसी और पीड़ा थी, उसने देवकी के हृदय को चीर कर रख दिया।
“माँ जी, आप ठीक तो हैं?” देवकी ने घबराते हुए पूछा।
वृद्धा के मुँह से कोई आवाज़ नहीं निकली, बस उसके होंठ कांप रहे थे। देवकी को समझ आ गया कि अगर इस समय इसे गर्माहट नहीं मिली, तो इसके प्राण पखेरू उड़ जाएंगे। उसने तुरंत अपने हाथों से रमाकांत द्वारा थमाई गई पीतल की पूजा की टोकरी खोली। उसने वह कीमती, सुनहरी ज़री वाला बनारसी रेशमी शॉल निकाला, जिसे वह भगवान को ओढ़ाने लाई थी, और बिना एक पल की देरी किए उसे उस वृद्धा के कांपते शरीर के चारों ओर कसकर लपेट दिया।
बुढ़िया को रेशम की उस गर्माहट से कुछ राहत मिली। फिर देवकी ने अपने थैले से गर्म चाय का थर्मस निकाला और एक कप में चाय उड़ेल कर बुढ़िया के होंठों से लगा दी। चाय के कुछ घूंट गले के नीचे उतरते ही बुढ़िया की साँसों में जैसे नई जान आ गई। देवकी ने टोकरी में रखा भगवान का भोग (पेड़े और ताज़े फल) भी निकालकर बुढ़िया के हाथों में रख दिया।
“इसे खा लीजिए माँ जी, आपको बहुत कमज़ोरी आ गई है,” देवकी ने अत्यंत वात्सल्य और करुणा से कहा।
वृद्धा की आँखों से झर-झर आँसू बहने लगे। उसने अपने दोनों कांपते हाथ जोड़ लिए और रूंधे हुए गले से बोली, “बेटी, तू इंसान नहीं, साक्षात अन्नपूर्णा माँ है। आज अगर तू न आती, तो यह अभागन इस ठंड में ही अपने प्राण त्याग देती। भगवान तेरा सुहाग और तेरा घर हमेशा आबाद रखे।”
बुढ़िया के उन आंसुओं और आशीर्वाद में देवकी को जो सुकून मिला, वह दुनिया के किसी भी तीर्थ में नहीं मिल सकता था। उसे लगा जैसे उसने साक्षात ईश्वर के दर्शन कर लिए हैं और उसका चढ़ाया हुआ शॉल सीधे भगवान ने स्वीकार कर लिया है।
तभी पीछे से रमाकांत हाँफते हुए वहाँ पहुँचे। उनका चेहरा गुस्से से तमतमाया हुआ था। “यह तुमने क्या अनर्थ कर दिया देवकी? तुमने भगवान के लिए लाया गया पवित्र शॉल और भोग एक भिखारिन को दे दिया? तुमने हमारी सारी पूजा, हमारा सारा संकल्प नष्ट कर दिया। अब हम भगवान के सामने खाली हाथ कैसे जाएंगे?”
देवकी ने बहुत ही शांत और निर्मल स्वर में अपने पति की ओर देखा और बोली, “स्वामी, क्या भगवान को गर्भगृह में ठंड लग रही थी? नहीं ना? ठंड तो यहाँ इस माँ को लग रही थी। जो भगवान पूरी सृष्टि को वस्त्र पहनाता है, उसे मेरे लाए हुए इस एक शॉल की क्या आवश्यकता थी? मैंने वह शॉल उसी को पहनाया है, जिसे उसकी सबसे अधिक ज़रूरत थी। और विश्वास मानिए, आज हमारी पूजा खंडित नहीं हुई है, बल्कि वह सीधे भगवान तक पहुँच गई है।”
रमाकांत कुछ और बोलने ही वाले थे कि उनकी नज़र उस वृद्धा पर पड़ी। बनारसी शॉल में लिपटी वह वृद्धा दोनों हाथ जोड़े देवकी को दुआएं दे रही थी, और उसके चेहरे पर एक अलौकिक शांति थी। रमाकांत को अचानक लगा जैसे उस वृद्धा की जगह कोई और नहीं, बल्कि स्वयं ईश्वर बैठे हों। उनके अंदर का कठोर कर्मकांडी इंसान पिघलने लगा। उन्हें समझ आ गया कि पत्थरों की मूरत को पूजना बहुत आसान है, लेकिन एक जीवित और पीड़ित इंसान के दुख को दूर करना ही ईश्वर की सच्ची आराधना है।
रमाकांत की आँखों में भी नमी आ गई। उन्होंने आगे बढ़कर अपने बटुए से कुछ रुपये निकाले और उस वृद्धा के हाथ में रखते हुए बोले, “माँ जी, इससे अपने लिए कुछ दवाइयाँ ले लेना।”
फिर उन्होंने देवकी की ओर मुड़कर अत्यंत गर्व और प्रेम से कहा, “तुम सही कह रही थी देवकी। आज तुमने मेरी आँखें खोल दीं। चलो, आज भगवान के दर्शन हम खाली हाथ ही करेंगे, क्योंकि हमारी सबसे कीमती भेंट तो उन्होंने यहीं बाहर ही स्वीकार कर ली है।”
दोनों पति-पत्नी खाली हाथों, लेकिन एक असीम संतुष्टि और पवित्रता से भरे हृदय के साथ मंदिर की सीढ़ियां चढ़ने लगे। आज उनके मन में कोई जल्दबाज़ी नहीं थी, क्योंकि उनके भीतर साक्षात ईश्वर विराजमान हो चुके थे।
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