“अरे विशाखा! तुम कहां छुप कर बैठी हो अपने कमरे में? आज तुम्हारी सगी बहन की मेहंदी है और तुम ही पूरे घर से गायब हो? माना कि तुम्हारे अपने भाग्य में सुख नहीं लिखा, पर कम से कम बहन की खुशियों में तो ऐसे मनहूसियत मत फैलाओ। मुंह लटका कर बैठने से क्या अब तुम्हारी उजड़ी हुई दुनिया फिर से बस जाएगी?”
ताई जी के ये शब्द किसी धारदार खंजर की तरह विशाखा के कलेजे के आर-पार हो गए। आसपास खड़ी औरतों ने मुंह पर पल्लू रखकर अपनी हंसी दबाई। मां ने नजरें झुका लीं और पिता जी ने अनसुना करते हुए मुंह दूसरी तरफ फेर लिया। विशाखा वहीं की वहीं जड़ हो गई। उसका मन किया कि वह चीख-चीख कर कहे कि इसमें उसकी क्या गलती थी? क्या उसका वो फैसला गलत था जब उसने रोज-रोज के मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न से तंग आकर उस घुटन भरे रिश्ते को खत्म करने का फैसला किया था?
पूरे घर में गेंदे और गुलाब के फूलों की मीठी महक फैली हुई थी। छत से लेकर मुख्य द्वार तक रंग-बिरंगी लाइटें ऐसी जगमगा रही थीं मानो आसमान के सारे तारे इसी घर के आँगन में उतर आए हों। आज घर की सबसे छोटी बेटी काव्या की मेहंदी की रस्म थी। घर में मेहमानों की भीड़, औरतों के गाए जाते लोकगीत, बच्चों की धमाचौकड़ी और ढोलक की थाप ने पूरे माहौल को उत्सव में तब्दील कर दिया था। दो साल पहले जब मंझली बेटी राधिका की शादी हुई थी, तभी से पिता जी यानी दीनानाथ जी को बस इसी दिन का इंतजार था। उन्हें लगता था कि बेटियां तो बस एक अमानत होती हैं, जिन्हें सही समय पर उनके असली घर भेज देना ही एक पिता का सबसे बड़ा धर्म है। काव्या के लिए जब उनके ही एक दूर के रिश्तेदार के यहाँ से एक अच्छे और खाते-पीते परिवार का रिश्ता आया, तो उन्होंने बिना एक पल की भी देरी किए हां कर दी। उनका बस एक ही लक्ष्य था, अपनी इस अंतिम बड़ी जिम्मेदारी से मुक्त होकर जीवन के बाकी बचे दिन सुकून और शांति से बिताना।
दीनानाथ जी का एक छोटा बेटा भी था, सुमित। वह अभी शहर के एक बड़े कॉलेज से इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था। सुमित को लेकर दीनानाथ जी के माथे पर कभी चिंता की कोई लकीर नहीं दिखी। बेटों के लिए समाज और परिवार के नियम हमेशा से अलग ही रहे हैं। सुमित के लिए उनका स्पष्ट मानना था कि जब वह अपनी पढ़ाई पूरी कर लेगा, एक अच्छी सी नौकरी पकड़ लेगा और खुद अपने पैरों पर खड़ा हो जाएगा, तब जाकर उसकी शादी के बारे में इत्मीनान से सोचा जाएगा। आखिर बेटे की शादी में माता-पिता को वह फिक्र कहां होती है जो एक बेटी के भविष्य को लेकर होती है। बेटे तो घर का चिराग होते हैं, जबकि बेटियों को तो पराया धन मानकर हमेशा एक अदृश्य बोझ की तरह ही पाला जाता है। दीनानाथ जी की सोच भी समाज के इसी तयशुदा सांचे में ढली हुई थी।
बाहर आँगन में मेहंदी के गीतों की धुन जितनी तेज हो रही थी, घर के ऊपरी हिस्से में बने उस छोटे से कमरे में सन्नाटा उतना ही गहरा होता जा रहा था। यह कमरा विशाखा का था। विशाखा, इस घर की सबसे बड़ी बेटी। एक समय था जब इस घर की हर खुशी विशाखा की हंसी से शुरू होती थी, लेकिन आज वही विशाखा अपने ही घर के इस जश्न में एक अजनबी, एक अनचाही परछाई बनकर रह गई थी। वह अपने बिस्तर पर निढाल सी लेटी हुई थी। कमरे की खिड़की से छनकर आती रोशनी उसके पीले पड़ चुके चेहरे पर पड़ रही थी, जहां अब मुस्कान की जगह सिर्फ एक गहरा, अनजाना सा दर्द ठहरा हुआ था। उसकी आंखें छत के पंखे को घूर रही थीं, लेकिन उसका दिमाग अतीत की उन खुरदरी पगडंडियों पर भटक रहा था, जहां से लौटकर आना अब उसके लिए नामुमकिन था।
नीचे से रह-रह कर हंसी-ठिठोली की आवाजें आ रही थीं, जो विशाखा के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतर रही थीं। वह उठना नहीं चाहती थी। उसका मन कर रहा था कि वह इस कमरे का दरवाजा अंदर से हमेशा के लिए बंद कर ले और खुद को इस दुनिया की नजरों से छुपा ले। तभी दरवाजे पर एक हल्की सी दस्तक हुई और मां की दबी हुई आवाज आई।
“विशाखा… ओ विशाखा! सुन रही है? नीचे आ जा बेटा। काव्या को मेहंदी लग रही है, सब पूछ रहे हैं तेरे बारे में।” मां की आवाज में एक अजीब सी झिझक थी, जैसे वह खुद भी नहीं चाहती थीं कि विशाखा नीचे आए, लेकिन सामाजिक औपचारिकताओं के दबाव में उसे बुलाना उनकी मजबूरी थी।
विशाखा ने एक गहरी सांस ली। अपनी सूजी हुई आंखों को दुपट्टे के पल्लू से पोंछा। न चाहते हुए भी उसके कदम दरवाजे की तरफ बढ़ गए। उसने दरवाजा खोला तो सामने मां खड़ी थीं। मां की आंखों में एक पल के लिए दर्द उभरा, लेकिन अगले ही पल उन्होंने अपनी नजरें चुरा लीं। विशाखा बिना कुछ कहे सीढ़ियां उतरने लगी। हर एक सीढ़ी उतरते हुए उसे लग रहा था मानो वह अपने सीने पर रखा कोई भारी पत्थर ढो रही हो।
जैसे ही वह आँगन में पहुंची, वहां अचानक से एक अजीब सी खामोशी छा गई। जो औरतें अभी तक जोर-जोर से हंसते हुए चुटकुले सुना रही थीं, उनकी आवाजें फुसफुसाहट में बदल गईं। सबकी नजरें विशाखा पर आकर टिक गईं। उन नजरों में हमदर्दी कम और चुभन ज्यादा थी। तभी भीड़ को चीरती हुई बड़ी ताई जी की भारी और तीखी आवाज गूंजी।
“अरे विशाखा! तुम कहां छुप कर बैठी हो अपने कमरे में? आज तुम्हारी सगी बहन की मेहंदी है और तुम ही पूरे घर से गायब हो? माना कि तुम्हारे अपने भाग्य में सुख नहीं लिखा, पर कम से कम बहन की खुशियों में तो ऐसे मनहूसियत मत फैलाओ। मुंह लटका कर बैठने से क्या अब तुम्हारी उजड़ी हुई दुनिया फिर से बस जाएगी?”
ताई जी के ये शब्द किसी धारदार खंजर की तरह विशाखा के कलेजे के आर-पार हो गए। आसपास खड़ी औरतों ने मुंह पर पल्लू रखकर अपनी हंसी दबाई। मां ने नजरें झुका लीं और पिता जी ने अनसुना करते हुए मुंह दूसरी तरफ फेर लिया। विशाखा वहीं की वहीं जड़ हो गई। उसका मन किया कि वह चीख-चीख कर कहे कि इसमें उसकी क्या गलती थी? क्या उसका वो फैसला गलत था जब उसने रोज-रोज के मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न से तंग आकर उस घुटन भरे रिश्ते को खत्म करने का फैसला किया था? क्या एक औरत का सम्मान उसकी शादीशुदा हैसियत से ज्यादा जरूरी नहीं है? लेकिन उसके होंठ सिल गए थे। समाज की नजरों में एक तलाकशुदा औरत किसी भी शुभ काम में शामिल होने का अधिकार खो देती है, यह कड़वा सच आज उसे फिर से निगलने की कोशिश कर रहा था।
उसने अपने आंसुओं को पलकों के पीछे ही रोक लिया। उसके चेहरे पर एक बेहद ठंडी और फीकी सी मुस्कान तैर गई—वह मुस्कान जो दर्द के चरम पर पहुंचने के बाद ही इंसान के चेहरे पर आती है। वह धीरे-धीरे काव्या के पास गई। काव्या, जो अपनी हथेलियों पर मेहंदी के खूबसूरत डिजाइन सजवा रही थी, अपनी बड़ी बहन को देखकर उसकी आंखें छलक आईं। काव्या जानती थी कि उसकी दीदी किस नरक से गुजरी है और आज उन्हें किन नजरों का सामना करना पड़ रहा है।
विशाखा ने पास रखी कटोरी से थोड़ी सी मेहंदी अपनी उंगली में ली और रस्म पूरी करते हुए काव्या की हथेली के एक खाली कोने पर एक छोटा सा टीका लगा दिया। यह सिर्फ एक खोखली औपचारिकता थी। एक ऐसा बेमन से निभाया गया रिवाज, जिसमें न तो कोई खुशी बची थी और न ही कोई उत्साह। काव्या ने धीरे से विशाखा का हाथ अपने हाथ में ले लिया, मानो बिना कुछ कहे वह उसे हौसला दे रही हो। विशाखा ने उसके माथे को चूमा, लेकिन वह वहां एक पल भी और रुक नहीं सकी। उन चुभती हुई नजरों और तानों के बीच सांस लेना उसके लिए दुश्वार हो रहा था।
मेहंदी लगाने के तुरंत बाद वह वापस मुड़ी और तेज कदमों से सीढ़ियां चढ़ती हुई अपने उसी अंधेरे कमरे में लौट आई। दरवाजा बंद करते ही उसकी सालों से बंधी हुई हिम्मत का बांध टूट गया। वह जमीन पर घुटनों के बल बैठ गई और फूट-फूट कर रोने लगी। नीचे बजने वाले ढोल की तेज आवाज ने उसकी सिसकियों को अपने शोर में दबा लिया। उसे याद आने लगे वो दिन जब वह भी एक नई नवेली दुल्हन बनकर इस घर से विदा हुई थी। कितनी उम्मीदें, कितने सपने थे उसकी आंखों में। लेकिन उसे क्या पता था कि जिस घर को वह अपना मानकर जा रही है, वहां उसे सिर्फ एक मशीन और एक गुलाम की तरह समझा जाएगा। जब उसने अपने आत्मसम्मान के लिए आवाज उठाई, तो किसी ने उसका साथ नहीं दिया। यहां तक कि उसके अपने माता-पिता ने भी उसे यह कहकर सहने की सलाह दी थी कि “बेटियों का तो जीवन ही समझौता होता है।”
आज जब वह अपने स्वाभिमान को चुनकर वापस अपने घर लौट आई थी, तो वह अपने ही लोगों के लिए एक बोझ बन गई थी। ताई जी का उलाहना सिर्फ एक शुरुआत थी, असल में यह उस पूरे समाज की सोच थी जो एक औरत को उसकी स्वतंत्र पहचान नहीं देना चाहता। उसे लगा कि यह सन्नाटा, यह अकेला कमरा और यह आंसू ही अब उसकी नियति हैं। बाहर की दुनिया जश्न मना रही थी, लेकिन विशाखा के अंदर एक पूरा का पूरा शहर खंडहर में तब्दील हो चुका था, जिसकी चीख सुनने वाला इस भरी-पूरी दुनिया में कोई नहीं था।
क्या आपको लगता है कि समाज में एक लड़की की अहमियत सिर्फ उसकी शादी से तय होनी चाहिए? विशाखा के दर्द और ताई जी के तानों को लेकर आपकी क्या राय है, कृपया नीचे कमेंट करके जरूर बताएं!
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