आज रामनाथ और कौशल्या की शादी की पचासवीं सालगिरह थी। विकास के मन में सुबह से ही एक अजीब सी बेचैनी थी। उसे याद था कि बचपन में वह इस दिन अपने माता-पिता के लिए अपने गुल्लक के पैसे तोड़कर एक छोटा सा केक लाता था। ग्लानि के एक क्षणिक झोंके ने आज उसे मजबूर कर दिया कि वह जाकर अपने माता-पिता से मिल आए। लेकिन विकास के सामने एक बड़ी समस्या थी। वह अब एक जाना-माना चेहरा था। अगले महीने उसे ‘बेस्ट एंटरप्रेन्योर’ का अवार्ड मिलने वाला था। अगर मीडिया या उसके किसी परिचित ने उसे वृद्धाश्रम के बाहर देख लिया, तो उसकी सारी इमेज मिट्टी में मिल जाएगी। लोग कहेंगे कि जो इंसान अपने माता-पिता को घर में नहीं रख सकता, वह समाज का क्या भला करेगा।
विकास की जिंदगी किसी सपने से कम नहीं थी। उसके पास धन, दौलत, शोहरत, एक खूबसूरत पत्नी अंजलि और एक प्यारा सा बेटा था। विकास शहर का एक नामी बिजनेसमैन बन चुका था, जिसकी तस्वीरें अक्सर अखबारों के पहले पन्ने पर छपती थीं। उसकी सफलता की दास्तानें कॉर्पोरेट जगत में मिसाल के तौर पर दी जाती थीं। लेकिन इस चमकदार और चकाचौंध भरी जिंदगी के पीछे एक ऐसा स्याह सच छिपा था, जिसे विकास ने दुनिया की नज़रों से, और कहीं न कहीं खुद अपनी नज़रों से भी, बहुत गहराई में दफना दिया था। वह सच था उसके बूढ़े माता-पिता, रामनाथ और कौशल्या, जो शहर से मीलों दूर ‘शांति निकेतन’ नाम के एक वृद्धाश्रम में अपने दिन काट रहे थे।
रामनाथ जी एक साधारण स्कूल मास्टर थे और कौशल्या एक घरेलू महिला। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी अपने इकलौते बेटे विकास के सुनहरे भविष्य को संवारने में लगा दी थी। विकास को इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए विदेश भेजने की खातिर रामनाथ जी ने अपना पुश्तैनी मकान तक बेच दिया था। कौशल्या ने सालों तक नई साड़ी नहीं खरीदी, सिर्फ इसलिए ताकि उसके बेटे की किताबों और फीस में कोई कमी ना आए। जब विकास पढ़ाई पूरी करके लौटा और उसने अपना बिजनेस शुरू किया, तो दोनों की छाती गर्व से चौड़ी हो गई थी। शुरुआत के कुछ साल सब कुछ ठीक रहा। विकास की शादी अंजलि से हुई, जो एक बड़े घर की बेटी थी। अंजलि आधुनिक विचारों वाली महिला थी, जिसके लिए रामनाथ और कौशल्या का देसी और साधारण रहन-सहन हमेशा एक खटकने वाली बात रही।
जैसे-जैसे विकास का व्यापार बढ़ता गया, उसके घर में बड़ी-बड़ी पार्टियाँ होने लगीं, जिनमें शहर के रसूखदार लोग आते थे। अंजलि को अक्सर इन पार्टियों में अपने सास-ससुर का आना और मेहमानों से ठेठ गँवई अंदाज़ में बात करना अपनी शान के खिलाफ लगता था। विकास भी अब अपनी पत्नी के सुर में सुर मिलाने लगा था। उसे भी लगने लगा था कि उसके माता-पिता उसकी ‘हाई सोसाइटी’ वाली इमेज में फिट नहीं बैठते। घर में रोज़-रोज़ की चिक-चिक, तानों और मानसिक तनाव का माहौल बनने लगा। रामनाथ जी सब समझते थे। एक दिन जब अंजलि ने साफ कह दिया कि वह इस घर में इन ‘गंवारों’ के साथ नहीं रह सकती, तो रामनाथ जी ने खुद ही विकास से कह दिया कि वे लोग तीर्थ यात्रा पर जाना चाहते हैं और उसके बाद किसी शांत जगह पर रहेंगे। विकास ने भी जैसे इसी मौके की तलाश में था। उसने तुरंत शहर के बाहर एक महंगे वृद्धाश्रम में उनका दाखिला करवा दिया। दुनिया की नज़रों में उसने यह साबित किया कि वह अपने माता-पिता को एक ‘लक्ज़री केयर होम’ में रख रहा है, जहाँ उन्हें हर सुविधा मिलेगी। लेकिन हकीकत यह थी कि उसने अपने घर से एक बोझ उतार फेंका था।
समय बीतता गया। दो साल हो गए थे। विकास हर महीने समय पर पैसे भेज देता था, लेकिन मिलने जाने का समय उसे कभी नहीं मिला। रामनाथ और कौशल्या हर रोज़ दरवाज़े की तरफ टकटकी लगाए देखते रहते कि शायद आज उनका बेटा उन्हें देखने आएगा। आश्रम के बाकी लोगों से रामनाथ जी हमेशा यही कहते, “मेरा बेटा बहुत बड़ा आदमी है, उसे फुरसत ही नहीं मिलती, वरना वह तो हमें रोज़ याद करता है।” वे अपने बेटे की तस्वीर को सीने से लगाकर सोते थे।
आज रामनाथ और कौशल्या की शादी की पचासवीं सालगिरह थी। विकास के मन में सुबह से ही एक अजीब सी बेचैनी थी। उसे याद था कि बचपन में वह इस दिन अपने माता-पिता के लिए अपने गुल्लक के पैसे तोड़कर एक छोटा सा केक लाता था। ग्लानि के एक क्षणिक झोंके ने आज उसे मजबूर कर दिया कि वह जाकर अपने माता-पिता से मिल आए। लेकिन विकास के सामने एक बड़ी समस्या थी। वह अब एक जाना-माना चेहरा था। अगले महीने उसे ‘बेस्ट एंटरप्रेन्योर’ का अवार्ड मिलने वाला था। अगर मीडिया या उसके किसी परिचित ने उसे वृद्धाश्रम के बाहर देख लिया, तो उसकी सारी इमेज मिट्टी में मिल जाएगी। लोग कहेंगे कि जो इंसान अपने माता-पिता को घर में नहीं रख सकता, वह समाज का क्या भला करेगा।
अपनी झूठी प्रतिष्ठा को बचाने के लिए विकास ने एक तरकीब निकाली। उसने अपनी महंगी लग्जरी कार के बजाय घर की एक पुरानी और साधारण सी गाड़ी निकाली। उसने एक लंबा ओवरकोट पहना, सिर पर एक बड़ी सी टोपी लगाई, आँखों पर बड़ा सा काला चश्मा पहना और अपने चेहरे को एक बड़े से मफलर से आधा ढँक लिया। वह ऐसे तैयार हुआ जैसे कोई जासूस हो या कोई ऐसा अपराधी जो पुलिस से छिप रहा हो। उसका मकसद सिर्फ एक था – कोई उसे पहचान ना ले।
गाड़ी चलाते हुए विकास का मन अतीत की गलियों में भटक रहा था। उसे याद आ रहा था कि कैसे एक बार उसे तेज़ बुखार हुआ था और उसकी माँ ने लगातार तीन रातों तक जागकर उसके सिर पर ठंडे पानी की पट्टियाँ रखी थीं। उसे याद आया कि कैसे उसके पिता ने उसे एक साइकिल दिलाने के लिए पूरे साल पैदल स्कूल जाकर पैसे बचाए थे। लेकिन जैसे ही उसे अपनी आलीशान जिंदगी और अंजलि की नाराज़गी याद आती, वह अपने आप को दिलासा दे देता कि उसने जो किया, वह समय की माँग थी। “आखिर मैंने उन्हें कोई कमी तो नहीं दी है, वहाँ उनका पूरा ख्याल रखा जाता है,” वह खुद से बड़बड़ाया।
शहर की भीड़भाड़ से दूर, कच्ची और धूल भरी सड़क से होते हुए उसकी गाड़ी ‘शांति निकेतन’ के मुख्य द्वार पर पहुँची। उसने गाड़ी को गेट से थोड़ा दूर एक पेड़ के नीचे खड़ा किया ताकि किसी की नज़र ना पड़े। उसने अपना मफलर और ऊपर खींचा, चश्मे को ठीक किया और गेट की तरफ बढ़ा।
आश्रम का गेट काफी पुराना था और वहाँ एक बूढ़ा लेकिन रौबदार गार्ड कुर्सी पर बैठा था। उस गार्ड का नाम दरबान सिंह था। दरबान सिंह पिछले बीस सालों से इस आश्रम की रखवाली कर रहा था। उसने यहाँ अनगिनत बूढ़े माँ-बापों को अपनों के लिए तड़पते और सिसकते देखा था। दरबान सिंह की नज़रें बहुत पारखी थीं। वह लोगों के कपड़ों से नहीं, उनकी आँखों में छिपे अपराधबोध से उन्हें पहचान लेता था।
विकास ने गेट पर पहुँचकर अपनी आवाज़ को थोड़ा बदलते हुए और चेहरा नीचे रखते हुए कहा, “मुझे… मुझे रामनाथ जी और कौशल्या जी से मिलना है।”
दरबान सिंह ने अपनी ऐनक को नाक पर नीचे खिसकाया और विकास को सिर से पैर तक घूरा। विकास का कोट, उसकी टोपी, काला चश्मा और मफलर से ढँका आधा चेहरा देखकर दरबान सिंह को कुछ अजीब लगा। उसने पास रखे रजिस्टर के पन्ने पलटते हुए पूछा, “आपका नाम क्या है और आप उनके क्या लगते हैं?”
विकास थोड़ा घबराया। वह नहीं चाहता था कि रजिस्टर में उसका असली नाम दर्ज हो। उसने हिचकिचाते हुए कहा, “मैं… मैं उनका एक दूर का रिश्तेदार हूँ। बस उन्हें देखने आया था।”
दरबान सिंह ने पेन को रजिस्टर पर रखा और अपनी कुर्सी से धीरे से उठा। वह विकास के बिल्कुल करीब आया। दरबान सिंह की आँखों में एक अजीब सी कठोरता थी, लेकिन साथ ही एक गहरी समझ भी। उसने विकास की आँखों में सीधा देखते हुए, जो काले चश्मे के पीछे छिपने की कोशिश कर रही थीं, बहुत ही शांत लेकिन चुभने वाली आवाज़ में कहा, “साहब, झूठ क्यों बोलते हो? आप रामनाथ जी के बेटे विकास बाबू हो ना?”
विकास के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह पसीना-पसीना हो गया। उसने घबराहट में कहा, “नहीं, आपको कोई गलतफहमी हुई है, मैं तो बस…”
दरबान सिंह ने उसकी बात बीच में ही काट दी और एक गहरी सांस लेते हुए बोला, “मुझे कोई गलतफहमी नहीं हुई है विकास बाबू। वो बूढ़ा बाप, जिसे आपने यहाँ छोड़ दिया है, वो रोज़ सुबह उठकर सबसे पहले आपकी तस्वीर को चूमता है। दिन में सौ बार वो आश्रम के हर आदमी को आपका फोटो दिखाता है और फक्र से कहता है कि मेरा बेटा शहर का सबसे बड़ा सेठ है। उनकी आँखों में आपकी तस्वीर इस कदर बसी है कि मैंने भी उस तस्वीर को देखकर आपको पहचान लिया। वो दोनों तो आज सुबह से नहा-धोकर दरवाज़े की तरफ टकटकी लगाए बैठे हैं, क्योंकि उन्हें यकीन था कि आज उनकी सालगिरह पर उनका बेटा उन्हें भूल नहीं सकता।”
विकास अवाक रह गया। उसका मफलर थोड़ा नीचे खिसक गया था और उसके होंठ कांप रहे थे। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या जवाब दे। वह नज़रें चुराने लगा।
तभी दरबान सिंह ने एक ऐसी बात कही जिसने विकास की आत्मा को चीर कर रख दिया। दरबान सिंह ने विकास के मफलर और काले चश्मे की तरफ इशारा करते हुए तल्ख लहज़े में कहा, “मुझे हैरानी इस बात की नहीं है कि आप इतने सालों बाद आज यहाँ आए हैं। मुझे हैरानी इस बात की है कि आप ये चश्मा, टोपी और मफलर लगाकर अपना आधा मुँह छिपाकर क्यों आए हैं? दुनिया से डर लग रहा है? या अपनी उस झूठी शान से जिसे बचाने के लिए आपने अपने भगवान को इस वृद्धाश्रम में फेंक दिया? विकास बाबू, एक बात कहूँ? जिस माँ ने आपको अपना खून पिलाकर बड़ा किया, जिस बाप ने अपनी जवानी आपको एक बड़ा आदमी बनाने में जला दी, उन्हें इस बुढ़ापे में दर-दर की ठोकरें खाने के लिए छोड़कर जाते वक्त जब आपको ज़रा भी शर्म नहीं आई… तो आज ये मफलर क्यों? आज ये मुँह क्यों छिपा रहे हो?”
दरबान सिंह थोड़ा और करीब आया और उसकी आवाज़ में अब एक अजीब सी कड़वाहट थी, “आपको तो इस मफलर की ज़रूरत ही नहीं है। जो घिनौना काम आपने किया है ना, उसके बाद तो आपको अपना पूरा सिर से पैर तक का वजूद ही किसी काले लबादे में ढँक कर आना चाहिए था। क्योंकि मुँह पर पट्टी बाँध लेने से दुनिया की नज़र तो बच सकती है, लेकिन इंसान अपने खुद के ज़मीर से नहीं बच सकता। जो बेटा अपने जीते-जी माँ-बाप को अनाथ कर दे, उसे तो आईना भी मुँह चिढ़ाता होगा।”
ये शब्द किसी तेज़ धार वाले खंजर की तरह विकास के सीने में उतर गए। दरबान सिंह की हर एक बात में एक सच्चाई थी, जो विकास के उस खोखले अहंकार को चकनाचूर कर रही थी जिसे उसने पिछले कई सालों में बड़ी मेहनत से बनाया था। उसका काला चश्मा उसकी आँखों से छलकते हुए गर्म आँसुओं को अब रोक नहीं पा रहा था। उसका पूरा शरीर कांपने लगा। उसने अपने हाथों से अपना चश्मा, टोपी और मफलर उतार कर वहीं ज़मीन पर फेंक दिया। आज उसे अपनी उस ‘इमेज’ से सख्त नफरत हो रही थी जिसके लिए उसने अपने माँ-बाप का सौदा कर लिया था।
विकास बिना कुछ कहे, भारी कदमों से आश्रम के अंदर की तरफ भागा। अंदर प्रांगण में एक पुराने बरगद के पेड़ के नीचे, एक सीमेंट की बेंच पर रामनाथ जी और कौशल्या बैठे थे। दोनों की आँखें दरवाज़े की तरफ ही थीं। रामनाथ जी के हाथ में एक छोटी सी मिठाई का डिब्बा था, शायद उन्होंने अपने हिस्से के पैसे बचाकर आज के दिन के लिए खरीदा था। कौशल्या जी की आँखें सूज रही थीं, शायद वे रो-रो कर थक चुकी थीं।
जैसे ही विकास ने उन्हें देखा, उसके पैरों की ताकत जवाब दे गई। वह दौड़कर गया और सीधा अपने पिता के पैरों में गिर पड़ा। वह फूट-फूट कर रोने लगा। “मुझे माफ़ कर दो बाबूजी! मुझे माफ़ कर दो माँ! मैं अँधा हो गया था। मैं एक बहुत बुरा बेटा हूँ…” उसकी आवाज़ आंसुओं में डूब गई थी।
रामनाथ जी ने अपने बेटे को देखा तो उनकी आँखों से भी आँसुओं की धार बह निकली। उन्होंने झुककर अपने बेटे को उठाया और सीने से लगा लिया। एक पिता का दिल इतना विशाल होता है कि वह अपने बच्चे की हर खता को एक पल में भूल जाता है। कौशल्या जी ने भी अपने बेटे का माथा चूमा और रोते हुए कहा, “तू आ गया मेरे लाल, बस हमारी तो सारी उम्र की तपस्या पूरी हो गई।”
उस दिन विकास ने अपने माता-पिता के सामने कसम खाई कि वह अब कभी उन्हें खुद से दूर नहीं होने देगा। उसने तुरंत आश्रम का सारा हिसाब किया और अपने माता-पिता का सामान अपनी गाड़ी में रखवाया। जब वह गाड़ी में बैठ रहा था, तो उसकी नज़र फिर से गेट पर खड़े दरबान सिंह पर पड़ी। दरबान सिंह के चेहरे पर अब कठोरता नहीं, बल्कि एक सुकून भरी मुस्कान थी। विकास ने दूर से ही दोनों हाथ जोड़कर उस बूढ़े गार्ड को नमन किया, क्योंकि आज उस गार्ड ने उसे सिर्फ पहचाना ही नहीं था, बल्कि उसे खुद से मिलवा दिया था। उसने विकास को एक ऐसा आईना दिखाया था, जिसने उसकी सोई हुई इंसानियत को हमेशा के लिए जगा दिया था।
विकास जब अपने माता-पिता को लेकर अपने आलीशान घर पहुँचा, तो अंजलि कुछ कहने ही वाली थी कि विकास ने अपना हाथ उठाकर उसे चुप करा दिया। विकास की आँखों में एक ऐसा दृढ़ संकल्प था, जिसे देखकर अंजलि समझ गई कि अब इस घर में रामनाथ और कौशल्या का राज होगा, और अगर वह इसका हिस्सा बनना चाहती है, तो उसे अपनी सोच बदलनी होगी।
उस दिन के बाद विकास की तस्वीरें अखबारों में कम छपीं, उसके घर में बड़ी-बड़ी पार्टियाँ भी कम हो गईं, लेकिन जब भी वह रात को अपने कमरे में जाता, तो उसके दिल में एक ऐसा सुकून होता था जो दुनिया की किसी भी दौलत या शोहरत से नहीं खरीदा जा सकता था। उसे अब किसी के सामने मुँह छिपाने की ज़रूरत नहीं थी, क्योंकि उसका ज़मीर अब पूरी तरह से साफ था।
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