काँपते हाथों का वो आख़िरी नंबर

 वह आवाज़… वह लहज़ा… वह नफ़रत… सब कुछ स्पीकर के ज़रिए उस प्रतीक्षालय की दीवारों से टकराकर वापस लौट रहा था। मेरे हाथ में पकड़ा हुआ फ़ोन अचानक मुझे किसी दहकते हुए अंगारे जैसा लगने लगा। मेरी नज़रें स्क्रीन से उठकर उन माँ के चेहरे पर गईं, और जो मैंने देखा, वह मैं ताउम्र नहीं भूल पाऊँगा।

उनके चेहरे की वो हल्की सी मुस्कान, वो गर्व, वो उम्मीद… सब कुछ जैसे एक ही पल में किसी काँच के बर्तन की तरह चकनाचूर हो गया था। उनके चेहरे की वो तनी हुई नसें, जो अभी तक बेटे के इंतज़ार में फड़क रही थीं, अचानक शांत हो गईं। वो पूरी तरह से सुन्न पड़ चुकी थीं। हँसी, ख़ुशी, ग़म, ग़ुस्सा, अपमान—सारे अहसास जैसे गड्डमड्ड होकर उनके गले में किसी भारी पत्थर की तरह अटक गए थे।

दिसंबर की वह रात किसी बर्फ़ की सिल्ली जैसी ठंडी थी। कोहरे की घनी चादर ने पूरे रेलवे स्टेशन को अपने आगोश में ले रखा था। मेरी ट्रेन चार घंटे लेट थी और इंतज़ार के सिवा कोई दूसरा विकल्प नहीं था।

मैं एक कुल्हड़ चाय लेकर प्रतीक्षालय (वेटिंग रूम) के एक कोने में बैठ गया। वहाँ की उदासी और सन्नाटे को सिर्फ़ ट्रेन के आने-जाने की घोषणाएँ ही तोड़ रही थीं। मेरी नज़र सामने की एक बेंच पर गई, जहाँ एक वृद्ध महिला बैठी थीं।

उनका नाम क्या था, यह तो मैं तब नहीं जानता था, लेकिन उनके चेहरे की लकीरों में अनगिनत कहानियाँ छिपी हुई थीं। उन्होंने एक सूती साड़ी पहनी हुई थी और एक पुरानी सी शॉल में खुद को समेटने की नाकाम कोशिश कर रही थीं। सर्दी से उनके होंठ नीले पड़ रहे थे और हाथ ऐसे काँप रहे थे जैसे किसी ने उन्हें बर्फ़ के पानी में डुबो दिया हो।

उनके पास सामान के नाम पर बस एक प्लास्टिक का झोला था, जिसे वो अपने सीने से ऐसे चिपकाए बैठी थीं जैसे उसमें दुनिया भर की दौलत हो। उनके चेहरे की तमाम झुर्रियाँ किसी सूखे हुए दरख़्त की छाल जैसी लग रही थीं, जिनमें ज़िंदगी का रस न जाने कब से सूख चुका था।

मैं उन्हें ही देख रहा था कि अचानक हमारी नज़रें मिलीं। उनकी आँखों में एक अजीब सी बेबसी थी, एक ऐसी गुहार जो बिना बोले ही बहुत कुछ कह रही थी। वो धीरे से उठीं और लड़खड़ाते कदमों से मेरी तरफ़ बढ़ने लगीं। पास आकर उन्होंने बड़ी हिचकिचाहट के साथ पूछा, “बेटा, तुम्हारे पास मोबाइल है क्या?”

उनकी आवाज़ में एक अजीब सा कंपन था, जो सिर्फ़ ठंड की वजह से नहीं था। मैंने तुरंत अपना फ़ोन निकाला और कहा, “जी माँ जी, बताइए। किसे फ़ोन करना है?”

उन्होंने अपने झोले में काँपते हाथ डाले और एक पुरानी, मैली सी लाल रंग की डायरी निकाली। डायरी के पन्ने पीले पड़ चुके थे। एक पन्ना खोलकर उन्होंने मेरी तरफ़ किया। वहाँ एक नंबर लिखा था। “बेटा, ये मेरे बेटे सुमित का नंबर है। वो शहर में बहुत बड़ा अफ़सर है। मैंने उसे बताया था कि मैं आज की गाड़ी से आ रही हूँ। शायद उसे आने में देर हो गई है। मेरा अपना फ़ोन रास्ते में ही बंद हो गया। ज़रा उसे मिला दो, पूछ लूँ कि वो कहाँ तक पहुँचा है।”

कहते-कहते उनके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आ गई, जिसमें एक माँ का गर्व साफ़ झलक रहा था। “बहुत काम रहता है उसे… बड़ी कंपनी में है न। हो सकता है काम में फँस गया हो,” उन्होंने अपनी बात को सही ठहराते हुए एक सफ़ाई सी दी।

मैंने मुस्कुराकर उनकी तसल्ली के लिए नंबर डायल किया। नंबर मिलाते ही मैंने सोचा कि शायद उन्हें सुनने में तकलीफ़ हो, इसलिए मैंने फ़ोन को स्पीकर पर डाल दिया ताकि वो अपने बेटे की आवाज़ साफ़-साफ़ सुन सकें। फ़ोन की घंटी बज रही थी और हर एक घंटी के साथ उन बूढ़ी आँखों में चमक बढ़ती जा रही थी। जैसे उस आवाज़ के उस पार उनकी सारी दुनिया बसी हो।

कुछ सेकंड बाद कॉल उठ गई।

“हेलो?” उधर से एक भारी, नींद से भरी और खीझी हुई आवाज़ आई।

मैंने सलीके से बात शुरू की, “जी, मैं रेलवे स्टेशन से बोल रहा हूँ। यहाँ एक माता जी हैं, आपकी माँ। वो आपका इंतज़ार कर रही हैं। उनका फ़ोन बंद हो गया है, तो उन्होंने मेरे फ़ोन से कॉल करवाया है। आप कहाँ हैं?”

इतना सुनना था कि स्पीकर से आने वाली उस चंद सेकंड की खामोशी के बाद जो अल्फ़ाज़ गूँजे, उसने प्रतीक्षालय की उस ठंड को और भी ज़्यादा जमा देने वाला बना दिया।

“मैंने उसे पहले ही कह दिया था कि मेरे घर में उसके लिए कोई जगह नहीं है!” सुमित की आवाज़ में ज़हर घुला हुआ था, “मेरी पत्नी और बच्चे उसके साथ नहीं रह सकते। उसे जहाँ जाना है जाए, किसी वृद्धाश्रम में जाकर मरे या उसी स्टेशन पर पड़ी रहे। मुझे कोई मतलब नहीं है। और आइंदा… आइंदा इस नंबर पर फ़ोन करने की जुर्रत मत करना!”

खटाक! कॉल कट गई।

वह आवाज़… वह लहज़ा… वह नफ़रत… सब कुछ स्पीकर के ज़रिए उस प्रतीक्षालय की दीवारों से टकराकर वापस लौट रहा था। मेरे हाथ में पकड़ा हुआ फ़ोन अचानक मुझे किसी दहकते हुए अंगारे जैसा लगने लगा। मेरी नज़रें स्क्रीन से उठकर उन माँ के चेहरे पर गईं, और जो मैंने देखा, वह मैं ताउम्र नहीं भूल पाऊँगा।

उनके चेहरे की वो हल्की सी मुस्कान, वो गर्व, वो उम्मीद… सब कुछ जैसे एक ही पल में किसी काँच के बर्तन की तरह चकनाचूर हो गया था। उनके चेहरे की वो तनी हुई नसें, जो अभी तक बेटे के इंतज़ार में फड़क रही थीं, अचानक शांत हो गईं। वो पूरी तरह से सुन्न पड़ चुकी थीं। हँसी, ख़ुशी, ग़म, ग़ुस्सा, अपमान—सारे अहसास जैसे गड्डमड्ड होकर उनके गले में किसी भारी पत्थर की तरह अटक गए थे।

उन्होंने कुछ नहीं कहा। उनके होंठ हिले तक नहीं, लेकिन उनकी बूढ़ी, धंसी हुई आँखों से आँसुओं की एक मोटी धार फूट पड़ी और उन गहरी झुर्रियों वाले रास्तों से होती हुई ज़मीन पर टपकने लगी। वो आँसू बिना आवाज़ के रो रहे थे। उनकी वो खामोशी किसी चीख से हज़ार गुना ज़्यादा बहरी करने वाली थी।

मैं वहीं बुत बनकर खड़ा था। मैं क्या कहता? क्या सांत्वना देता? कौन सा झूठ बोलता? जो मैंने सुना था… काश… काश उन्होंने वो न सुना होता। वो सच इतना नंगा और क्रूर था कि उसने उस बूढ़ी माँ की बची-खुची रूह को भी लहूलुहान कर दिया था।

कुछ देर बाद, उन्होंने बहुत धीरे से अपने दोनों काँपते हाथ आगे बढ़ाए। उन्होंने मेरे हाथ से बिना कुछ कहे अपनी वो मैली सी डायरी वापस ली, उसे बड़े जतन से अपने झोले में रखा, और अपनी शॉल को कसकर पकड़ते हुए वापस उसी ठंडी बेंच की तरफ़ मुड़ गईं।

उनके लड़खड़ाते कदमों को देखते हुए मेरा दिल चीत्कार कर उठा। एक माँ जिसने अपनी पूरी उम्र, अपनी जवानी, अपनी खुशियाँ जिस बेटे को पालने में लगा दीं, आज उसी बेटे ने उसे एक लावारिस सामान की तरह स्टेशन पर मरने के लिए छोड़ दिया था। उस रात मेरी ट्रेन आ गई, मैंने स्थानीय पुलिस और एक एनजीओ की मदद से उन्हें एक सुरक्षित आश्रम पहुँचाने का इंतज़ाम भी किया, लेकिन मेरे अंदर का इंसान उस रात हमेशा के लिए सहम गया।

आपके लिए एक सवाल:

दोस्तों, जब आपने इस बेबस माँ का दर्द महसूस किया, तो आपके मन में सुमित जैसे बेटों के लिए क्या विचार आए? क्या आधुनिकता और अपनी ‘प्राइवेसी’ की अंधी दौड़ में हम इतने अंधे हो गए हैं कि जिन हाथों ने चलना सिखाया, उन्हीं हाथों को झटक रहे हैं? इस कहानी को पढ़कर आपके दिल में जो भी अहसास जगा हो, अपने विचार कमेंट में ज़रूर बताएँ।

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद

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