“अब यह मेरे साथ रहेगा!” मीरा ने कबीर को गोदी में उठाते हुए एक सख्त आवाज में कहा।
“तू इसे कहीं नहीं ले जा सकती! मैं पुलिस बुला लूंगा! तुझे जेल भिजवा दूंगा, चरित्रहीन औरत!” राहुल ने चिल्लाते हुए मीरा का हाथ पकड़ने की कोशिश की।
मीरा ने राहुल का हाथ झटक दिया और उसकी आंखों में आंखें डालकर कहा, “बुला पुलिस! बुला ले आज ही पुलिस। कोर्ट में मैं साबित करूंगी कि तू कैसा बाप है और कैसा पति है। मेरे शरीर पर तेरे जुल्मों के निशान आज भी मौजूद हैं। तुझे जो करना है कर ले, लेकिन कबीर आज मेरे साथ जाएगा। अगर किसी ने मुझे रोकने की कोशिश की, तो मैं इस घर की ईंट से ईंट बजा दूंगी।”
मीरा का वह रौद्र रूप देखकर राहुल और उसकी मां दोनों पीछे हट गए। उन्हें अंदाजा नहीं था कि डर-डर कर जीने वाली मीरा आज एक चंडी का रूप ले चुकी थी।
मीरा ने और कुछ भी नहीं बोला। कबीर को मजबूती से अपनी गोद में उठाए हुए वह उस घर से बाहर निकल गई।
शहर की भागदौड़ भरी जिंदगी में सुबह का समय हमेशा ही आपाधापी वाला होता है। मीरा ई-रिक्शा से उतरकर तेज कदमों से अपने ऑफिस की इमारत की तरफ बढ़ रही थी। बारिश के मौसम की वजह से आज ऑटो मिलने में बहुत परेशानी हुई थी और वह पूरे पंद्रह मिनट लेट हो चुकी थी। उसके माथे पर पसीने की बूंदें झलक रही थीं, लेकिन उसके दिमाग में समय से ज्यादा एक और ही द्वंद्व चल रहा था।
रास्ते में रेड लाइट पर जब रिक्शा रुका था, तो उसने एक गरीब महिला को अपने छोटे से बच्चे को सीने से लगाए देखा था। वह बच्चा अपनी माँ के गले में बाहें डालकर खिलखिला कर हंस रहा था। उस एक दृश्य ने मीरा के सीने में दबे हुए एक ज्वालामुखी को फिर से दहका दिया था। जब भी वह किसी छोटे बच्चे को रोते, हंसते या अपनी माँ से लिपटते हुए देखती, तो उसके भीतर की ममता बुरी तरह तड़प उठती थी। उसकी बाहें सूनी थीं और वह सूनापन उसे हर पल अंदर ही अंदर खाए जा रहा था। समय की क्रूर ठोकरों और विपरीत परिस्थितियों ने उसे बाहर से एक बेहद मजबूत और स्वतंत्र महिला बना दिया था, परंतु इस सख्त आवरण के पीछे वह एक ऐसी माँ थी जिसका कोमल हृदय अपने कलेजे के टुकड़े के लिए हर रात खून के आंसू रोता था।
लिफ्ट से निकलकर वह अपने फ्लोर पर पहुंची। थोड़ी लेट तो हो गई थी, इसलिए जैसे ही उसने ऑफिस के कांच के दरवाजे को धकेला, उसे लगा कि सभी सहकर्मी उसकी तरफ ही देख रहे हैं। वह अपनी नजरें चुराते हुए, तेज कदमों से जाकर अपने क्यूबिकल में अपनी सीट पर बैठ गई। उसने अपना कंप्यूटर ऑन किया और गहरी सांस ली। फिर भी उसको ऐसा लग रहा था मानो पूरे ऑफिस की नजरें उसी की पीठ पर गड़ी हों।
तभी ऑफिस के चपरासी ने आकर कहा, “मैडम, मैनेजर साहब ने आपको अपने केबिन में बुलाया है।”
“जी, मैं अभी आती हूँ,” मीरा ने खुद को संभालते हुए कहा और उठकर मैनेजर मिस्टर खन्ना के केबिन की ओर चली गई।
केबिन के अंदर मिस्टर खन्ना किसी नए प्रोजेक्ट की फाइल खोले बैठे थे। उन्होंने मीरा को बैठने का इशारा किया और काम को लेकर कुछ हिदायतें देने लगे। मिस्टर खन्ना पता नहीं क्या-क्या समझा रहे थे, लेकिन मीरा की समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था। या यह कहा जाए कि उसका मन वहां था ही नहीं, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। उसकी आंखें मिस्टर खन्ना की ओर थीं, लेकिन उसकी आंखों के सामने अभी भी वह नुक्कड़ पर अपनी माँ से लिपटा हुआ बच्चा ही घूम रहा था। मीरा का हृदय भीतर ही भीतर चीत्कार कर रहा था।
उसी उम्र का तो है उसका बेटा कबीर। बिल्कुल उसी बच्चे की तरह मासूम, निश्चल, जिसकी तोतली आवाज पूरे घर में गूंजा करती थी। लेकिन क्रूर परिस्थितियों ने और इंसानी स्वार्थ ने उसको उससे मीलों दूर कर दिया था।
“क्या हुआ मीरा? कोई प्रॉब्लम है क्या? तुम्हारा ध्यान कहां है?” मिस्टर खन्ना की तेज आवाज ने मीरा को उसकी ख्यालों की दुनिया से बाहर खींचा।
“नहीं सर, ऐसी कोई बात नहीं है। मैं बस… मैं सुन रही हूँ,” मीरा ने हड़बड़ाते हुए कहा।
“तुम्हारी परफॉरमेंस पिछले कुछ दिनों से गिर रही है मीरा। अगर कोई निजी परेशानी है तो तुम बता सकती हो, लेकिन काम पर इसका असर नहीं पड़ना चाहिए। खैर, अब तुम जा सकती हो और उस रिपोर्ट को शाम तक मेरी टेबल पर रख देना।”
“जी सर,” कहती हुई मीरा केबिन से बाहर आ गई और थके हुए कदमों से अपनी सीट पर बैठ गई।
मीरा का काम में बिल्कुल भी मन नहीं लग रहा था आज। कंप्यूटर की स्क्रीन पर चमकते हुए आंकड़े उसे धुंधले नजर आ रहे थे। उसने अपना मोबाइल निकाला और स्क्रीन लॉक खोलकर एक नंबर मिलाने लगी। उसकी उंगलियां कांप रही थीं। वह कबीर की आवाज सुनने के लिए तड़प रही थी। मगर अगले ही पल उसकी उंगलियां फिर से रुक गईं। उसे याद आ गया कि फोन के दूसरी तरफ से उसे कैसी जली-कटी बातें सुनने को मिलेंगी। उसने एक लंबी और गहरी सांस लेते हुए मोबाइल स्क्रीन को बंद किया, उसे एक तरफ रख दिया और फिर से खुद को काम में डुबाने की झूठी कोशिश करने लगी।
तभी बराबर वाले क्यूबिकल में बैठी उसकी सहकर्मी श्रुति ने अपना लंच बॉक्स खोला और शायद घर पर फोन मिलाया। वह अपने छोटे बेटे से वीडियो कॉल पर बात कर रही थी।
“हां मेरा बच्चा! मम्मा ने तुम्हारे लिए तुम्हारे फेवरेट आलू के पराठे बनाकर रखे हैं। तुम अच्छे से खा लेना… और सुनो, दोपहर को दादी को बिल्कुल परेशान मत करना। मम्मा शाम को जल्दी आएगी और तुम्हारे लिए चॉकलेट लाएगी।”
श्रुति की वह प्यार भरी आवाज सुनकर मीरा का मन भर आया। उसकी आंखों में आंसुओं का एक समंदर उमड़ पड़ा जिसे वह बड़ी मुश्किल से पलकों के पीछे रोक रही थी। कबीर कैसा होगा? क्या उसने खाना खाया होगा? क्या कोई उसे इतने प्यार से खाना खिलाता भी होगा या नहीं? क्या उसे अपनी माँ की याद नहीं आती होगी? ये सवाल मीरा के दिमाग में हथौड़े की तरह बज रहे थे।
अतीत को इंसान कितना भी भुलाना चाहे, मगर वह कभी पीछे नहीं छोड़ता। और अगर वह अतीत अपनी खुद की औलाद से जुड़ा हुआ हो, तो उसे भूलना किसी भी इंसान के लिए नामुमकिन होता है। मीरा ने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक लिया और टेबल पर सिर रख कर कुछ देर के लिए अपनी आंखें मूंद लीं। वह उस मनहूस घड़ी को कोसने लगी जब उसने कॉलेज के दिनों में राहुल से प्रेम विवाह करने का निश्चय किया था।
कितना समझाया था उसके माता-पिता ने। उसके पिता ने हाथ जोड़कर कहा था कि बेटी, यह लड़का तुम्हारे लिए बिल्कुल भी अच्छा नहीं है। इसकी आंखों में कोई सपने नहीं हैं, बस एक झूठा गुरूर है। लेकिन उस समय मीरा की आंखों पर प्रेम का ऐसा अंधा भूत सवार था कि उसे राहुल के सिवा कोई और सच्चा लगता ही नहीं था। उसने किसी की एक न सुनी, अपने परिवार वालों से बगावत कर ली और अपनी मर्जी से घर छोड़कर राहुल से आर्य समाज मंदिर में शादी कर ली। उसे लगा था कि उसका सच्चा प्यार राहुल की दुनिया बदल देगा।
लेकिन शादी के कुछ महीनों बाद ही राहुल ने अपना असली रंग दिखाना शुरू कर दिया। वह एक महत्वाकांक्षी लड़की थी, जबकि राहुल कामचोर निकला। थोड़े ही दिनों में उसने अपनी छोटी-मोटी नौकरी भी छोड़ दी और घर में ही पड़ा रहने लगा। बात-बात पर वह चिढ़ने लगा था। बहुत अधिक शराब पीने लगा था और जब मीरा उसे समझाने की कोशिश करती, तो वह उसके साथ मारपीट करने लगा था। हद तो तब हो गई जब राहुल की मां, यानी मीरा की सास, सावित्री देवी ने अपने बेटे को सुधारने के बजाय मीरा को ही ताने मारने शुरू कर दिए। वह कहतीं कि औरतों को मर्दों के सामने जुबान नहीं लड़ानी चाहिए, और अगर पति दो थप्पड़ मार भी दे, तो पत्नी को उसे भगवान का प्रसाद समझकर चुपचाप सह लेना चाहिए।
जब मीरा पेट से हुई, तो उसे एक झूठी खुशी हुई थी। उसे लगा कि शायद एक नन्ही जान के आने से, एक पिता बनने के अहसास से राहुल बदल जाए। उसमें जिम्मेदारी का भाव आ जाए। लेकिन यह उसकी सबसे बड़ी भूल थी। उसकी हरकतें तो दिन-ब-दिन और ज्यादा बद से बदतर होती चली गईं।
बेटे कबीर के जन्म के बाद भी राहुल के व्यवहार में जरा भी परिवर्तन नहीं हुआ। बल्कि अब वह और ज्यादा बेखौफ हो गया था। शराब के नशे में वह मीरा को और ज्यादा बुरी तरह पीटने लगा था। कबीर जब रोता था, तो राहुल उसे चुप कराने के बजाय मीरा पर चिल्लाता कि वह अपने बच्चे को चुप नहीं करा सकती। मीरा ने तीन साल तक यह सब सिर्फ इसलिए सहा क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि कबीर पर बिना पिता के बड़े होने का ठप्पा लगे। लेकिन जब एक रात राहुल ने नशे में मीरा को इतना पीटा कि उसके सिर से खून बहने लगा, और वह कबीर को भी धक्का देने लगा, तब मीरा का सब्र टूट गया। उसने समझ लिया कि अगर वह यहां रही तो एक दिन वह जान से हाथ धो बैठेगी। इससे तंग आकर मीरा ने खुद को और अपनी गरिमा को बचाने के लिए उस नर्क को छोड़ने का फैसला कर लिया।
उस रात जब वह जाने लगी, तो राहुल ने अपनी नीचता की सारी हदें पार कर दीं। उसने मीरा पर चरित्रहीन होने का घिनौना आरोप लगाया। उसने मोहल्ले वालों के सामने तमाशा किया कि मीरा का किसी गैर मर्द के साथ चक्कर है और इसीलिए वह घर छोड़कर जा रही है। सबसे बड़ा आघात उसने यह किया कि उसने बेटे कबीर को मीरा को देने से साफ इनकार कर दिया। उसने उसे एक कमरे में बंद कर दिया और मीरा को धक्के मारकर घर से निकाल दिया। वह बहुत अच्छी तरह जानता था कि मीरा का जीवन कबीर में बसता है। वह कबीर के बिना नहीं रह पाएगी और इसी मजबूरी में, इसी तड़प में एक दिन वह घुटने टेककर, उसकी सारी शर्तें मानकर वापस उसी नर्क में लौट आएगी।
तब से लेकर आज तक एक साल बीत चुका था। मीरा ने खुद को संभाला, एक प्राइवेट कंपनी में अच्छी नौकरी पाई, अपने पैरों पर खड़ी हुई, लेकिन कबीर के बिना उसकी जिंदगी एक बिना रूह के शरीर जैसी थी।
मीरा ने अपना सिर उठाया। उसकी आंखें आंसुओं से लाल हो चुकी थीं। उसने फिर से स्क्रीन की तरफ देखा, लेकिन अब उसके मन में दुविधा की जगह एक दृढ़ संकल्प ने ले ली थी। वह अब यह निश्चय कर चुकी थी कि बहुत हो गया समाज का डर, बहुत हो गई कानूनी दांव-पेंच की फिक्र। वह अब अपने बेटे कबीर से और दूर नहीं रहेगी।
उसने एक झटके में फोन उठाया और राहुल के घर का नंबर डायल कर लिया। फोन की घंटी बजती रही और फिर फोन उसकी सास सावित्री देवी ने उठाया।
“हैलो,” दूसरी तरफ से कर्कश आवाज आई।
“मां जी, मुझे कबीर से बात करनी है। प्लीज उसे फोन दीजिए,” मीरा ने अपनी आवाज को शांत रखने की कोशिश करते हुए कहा।
“अरे ओ कुलटा! अब क्यों फोन कर रही है? तुझे शर्म नहीं आती? चली गई मुंह काला करवा के, अब मेरा पोता तुझे भूल चुका है। वो अब अपनी मां का नाम भी नहीं लेता। खबरदार जो दोबारा इस घर में फोन किया!” सावित्री देवी ने बिना रुके गालियों और तानों की बौछार कर दी और फोन काट दिया।
मीरा का चेहरा गुस्से और अपमान से तमतमा उठा। सालों की दबी हुई भड़ास और एक मां की तड़प अब बगावत में बदल चुकी थी। वह अपनी सीट से उठी। उसके चेहरे पर एक अजीब सा तेज और कठोरता थी। वह सीधे मिस्टर खन्ना के केबिन में गई।
“सर, मुझे अभी इसी वक्त घर जाना होगा। एक बहुत जरूरी काम आ गया है। मैं आज हाफ डे के बाद जा रही हूँ,” मीरा की आवाज में कोई गुजारिश नहीं, बल्कि एक अटल फैसला था।
मिस्टर खन्ना उसे इस तरह देखकर थोड़ा चौंके। “मीरा, ऐसे अचानक कैसे जा सकती हो? रिपोर्ट का क्या होगा? आज तो छुट्टी नहीं मिल पाएगी। बहुत जरूरी काम है तो कल पूरे दिन की लीव ले लेना।”
“नहीं सर, मुझे आज और अभी जाना है। रिपोर्ट कल मिल जाएगी,” मीरा ने इतना कहा, हामी में गर्दन हिलाई और जवाब का इंतजार किए बिना वापस आकर अपना बैग उठाने लगी।
शाम हो चुकी थी। आसमान में काले बादल छाए हुए थे। मीरा सीधे अपने पीजी (पेइंग गेस्ट) रूम में गई। उसने झटपट अपना एक छोटा सा बैग तैयार किया, जिसमें उसने अपने कुछ जरूरी कागजात और कबीर के पुराने कपड़े रखे। वहां से उसके ससुराल का रास्ता बस एक घंटे का था। आज यह एक घंटे का रास्ता उसे सदियों जैसा लग रहा था। ऑटो में बैठी मीरा का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था, लेकिन उसके इरादे हिमालय की तरह अडिग थे।
उसने अपने ससुराल के दरवाजे की डोर बेल बजाई। कुछ देर बाद दरवाजा सावित्री देवी ने ही खोला। सामने मीरा को खड़ी देखकर वह हक्की-बक्की रह गईं।
“तू? तू यहां क्या कर रही है? अब क्यों आई है? जा यहां से… निकल मेरे घर से!” सावित्री देवी ने अपना मुंह बनाते हुए और चिल्लाते हुए कहा। उन्होंने दरवाजा बंद करने की कोशिश की।
मीरा ने अपना एक हाथ दरवाजे पर रखा और पूरी ताकत से उसे पीछे धकेल दिया। वह अंदर दाखिल हो गई। “यहां रहने कौन आया है? मैं अपने घर में रहने नहीं, अपना हक लेने आई हूँ,” मीरा ने तपाक से कहा, उसकी आवाज में शेरनी जैसी दहाड़ थी।
राहुल, जो सोफे पर बैठकर टीवी देख रहा था, यह हंगामा सुनकर उठ खड़ा हुआ। “तेरी हिम्मत कैसे हुई इस घर में कदम रखने की?” वह आगे बढ़ा।
इतने में अंदर के कमरे से छोटे-छोटे कदमों की आहट हुई। कबीर, जो एक पुराना सा खिलौना हाथ में लिए हुए था, वहां आकर खड़ा हो गया। उसने जैसे ही दरवाजे पर मीरा को देखा, उसकी आंखें चमक उठीं। उसके छोटे से हाथों से खिलौना छूटकर जमीन पर गिर गया।
“मम्मा… मम्मा!” कहता हुआ वह दौड़कर मीरा से आ लिपटा।
मीरा ने उसे झटके से अपने सीने से लगा लिया। कबीर फूट-फूट कर रोने लगा। मीरा की भी आंखों से आंसुओं का बांध टूट पड़ा। उसने कबीर को अपनी बाहों में कस लिया, जैसे कोई अपने प्राणों को मुट्ठी में भींच लेता है। वह बार-बार उसके छोटे-छोटे गालों, उसके माथे और उसके हाथों को चूमने लगी, दुलारने लगी। कबीर बहुत कमजोर लग रहा था, उसके कपड़े भी गंदे थे, लेकिन अपनी मां की गोद में आते ही वह जैसे दुनिया का सबसे सुरक्षित बच्चा बन गया था।
“अब यह मेरे साथ रहेगा!” मीरा ने कबीर को गोदी में उठाते हुए एक सख्त आवाज में कहा।
“तू इसे कहीं नहीं ले जा सकती! मैं पुलिस बुला लूंगा! तुझे जेल भिजवा दूंगा, चरित्रहीन औरत!” राहुल ने चिल्लाते हुए मीरा का हाथ पकड़ने की कोशिश की।
मीरा ने राहुल का हाथ झटक दिया और उसकी आंखों में आंखें डालकर कहा, “बुला पुलिस! बुला ले आज ही पुलिस। कोर्ट में मैं साबित करूंगी कि तू कैसा बाप है और कैसा पति है। मेरे शरीर पर तेरे जुल्मों के निशान आज भी मौजूद हैं। तुझे जो करना है कर ले, लेकिन कबीर आज मेरे साथ जाएगा। अगर किसी ने मुझे रोकने की कोशिश की, तो मैं इस घर की ईंट से ईंट बजा दूंगी।”
मीरा का वह रौद्र रूप देखकर राहुल और उसकी मां दोनों पीछे हट गए। उन्हें अंदाजा नहीं था कि डर-डर कर जीने वाली मीरा आज एक चंडी का रूप ले चुकी थी।
मीरा ने और कुछ भी नहीं बोला। कबीर को मजबूती से अपनी गोद में उठाए हुए वह उस घर से बाहर निकल गई।
उसकी सास सावित्री देवी पीछे से गालियां देती हुई और चिल्लाती हुई दरवाजे तक भागीं, “ले जा इसे! हम भी कोर्ट में देखेंगे तुझे!”
लेकिन मीरा ने मुड़कर नहीं देखा। बाहर ठंडी हवा चल रही थी। कबीर ने अपना सिर मीरा के कंधे पर रख दिया था और सिसकते हुए शांत हो रहा था। मीरा को अब दुनिया की कोई फिक्र नहीं थी। वह जानती थी कि आने वाला रास्ता आसान नहीं होगा। समाज की बातें, कोर्ट-कचहरी के धक्के और राहुल की धमकियां उसका इंतजार कर रही थीं। लेकिन कबीर के माथे का वह स्पर्श उसे हर प्रकार की कानूनी लड़ाई लड़ने की असीम शक्ति दे रहा था। आज एक मां ने अपनी ममता के लिए हर डर से बगावत कर दी थी।
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