दिल्ली की भीड़भरी गलियों में रहने वाली बाईस वर्ष की नंदिनी अपने घर की सबसे छोटी बेटी थी। घर में सबसे छोटी होने के कारण उसे हमेशा बहुत लाड़-प्यार मिला था। माता-पिता और बड़े भाई-बहनों ने कभी उस पर घर की बड़ी जिम्मेदारियाँ नहीं डालीं। उसका जीवन पढ़ाई, खेल-कूद, सहेलियों और अपनी छोटी-सी दुनिया में ही बीतता रहा।
नंदिनी पढ़ाई में बहुत तेज नहीं थी, लेकिन समझदार और साफ दिल की लड़की थी। बस दुनियादारी की उतनी समझ नहीं थी, जितनी उसकी उम्र की दूसरी लड़कियों में आ गई थी। उसकी सहेलियाँ रिश्तों, आकर्षण और आधुनिक जीवन की बातें करती थीं। फिल्मों और आसपास के माहौल को देखकर नंदिनी को भी लगता था कि जीवन में किसी का उसे पसंद करना, उसकी तारीफ करना और उसे खास महसूस कराना शायद प्रेम ही होता है।
वह चश्मा लगाती थी। कुछ समय बाद उसने लेंस लगाने शुरू कर दिए। उसे लगता था कि इससे उसका व्यक्तित्व और अच्छा दिखाई देगा।
इसी बीच उसे पहली नौकरी मिली।
कार्यालय उसके लिए एक नई दुनिया था। वहाँ उसका बॉस अभय था—पढ़ा-लिखा, आत्मविश्वासी और आकर्षक व्यक्तित्व वाला युवक।
नंदिनी को पहली ही नजर में वह अच्छा लगा। यह प्रेम नहीं था, केवल आकर्षण था। लेकिन नंदिनी अपने मन की उस भावना को ठीक से समझ नहीं पा रही थी।
अभय ने भी उसके व्यवहार को महसूस कर लिया था।
कभी वह नंदिनी को उसके काम के लिए डाँटता—
“तुम्हें अभी बहुत कुछ सीखना है। अंग्रेजी पर भी काम करो।”
और कभी अचानक उसके काम की तारीफ कर देता।
कभी वह इतना कठोर हो जाता कि नंदिनी सहम जाती और कभी उसके साथ ऐसी आत्मीयता से बात करता कि नंदिनी को लगता, शायद वह उसे दूसरों से अलग समझता है।
यहीं से उसके मन में एक भ्रम जन्म लेने लगा।
एक दिन कार्यालय का एक जरूरी काम नंदिनी को सौंपा गया। संबंधित व्यक्ति उसका रिश्तेदार था। उसने अपने स्वार्थ के लिए ऐसी चाल चली कि नंदिनी और अभय दोनों के साथ विश्वासघात कर दिया। उसने नंदिनी से भी सच्चाई छिपाई और अभय को भी पूरी जानकारी नहीं दी।
अभय ने परिस्थितियों को गलत समझ लिया और नंदिनी को भी उस मामले में शामिल मान बैठा।
नंदिनी निर्दोष थी।
उस रिश्तेदार ने उसे चुप रहने के लिए कहा था और नंदिनी अपनी अनुभवहीनता के कारण उसकी बात मान गई।
लेकिन अभय के मन में उसके प्रति संदेह बैठ गया।
इसके बाद उसका व्यवहार और भी अजीब हो गया।
कभी वह नंदिनी से नाराज होता, कभी उसे अपने पास बुलाकर समझाता, कभी उसकी चिंता करने का दिखावा करता और कभी ऐसी बातें करता जिनसे नंदिनी को लगता कि उसके मन में उसके लिए कुछ विशेष है।
नंदिनी पहले से ही उसकी ओर आकर्षित थी। इसलिए अभय के शब्दों ने उसके मन में उम्मीद पैदा कर दी।
उसे लगा शायद अभय सचमुच उसे पसंद करता है।
वह उसके व्यवहार को समझने की कोशिश करती रहती।
कभी मन कहता—“हाँ, वह मुझे पसंद करता है।”
कभी भीतर से आवाज आती—“नहीं, शायद तुम ही कुछ ज्यादा सोच रही हो।”
फिर अभय की कोई प्रेम भरी बात उसकी सारी शंकाएँ मिटा देती।
धीरे-धीरे नंदिनी ने उस पर विश्वास करना शुरू कर दिया।
यही विश्वास बाद में उसके लिए सबसे बड़ा दर्द बनने वाला था।
एक दिन उसने आखिर हिम्मत करके अभय से पूछ ही लिया,
“आप मुझसे जिस तरह बातें करते हैं… क्या आप सचमुच मुझे पसंद करते हैं?”
नंदिनी को उम्मीद थी कि शायद आज उसके मन की उलझन खत्म हो जाएगी।
लेकिन अभय का चेहरा अचानक बदल गया।
उसने रूखे स्वर में कहा,
“मैंने कब कहा कि मैं तुमसे प्यार करता हूँ?”
नंदिनी कुछ पल उसे देखती रह गई।
“लेकिन आपने तो…”
“मैंने जो कुछ किया, तुम्हें अच्छा लगता था इसलिए किया। इसका मतलब यह नहीं कि मैं तुमसे प्यार करता हूँ। अगर तुम्हें मेरी बातें अच्छी नहीं लगतीं तो मेरे पास मत आना।”
नंदिनी के कानों में जैसे अचानक शोर भर गया।
जिस व्यक्ति की बातों को वह इतने दिनों से सच मानती रही थी, वही आज उन बातों से मुकर रहा था।
वह धीरे से बोली,
“तो फिर आपने मुझसे ऐसी बातें क्यों कीं?”
अभय ने कोई स्पष्ट उत्तर नहीं दिया।
बस इतना कहा,
“तुमने ही सब कुछ अपनी तरफ से समझ लिया।”
नंदिनी के भीतर कुछ टूट गया।
वह वहाँ से चली तो आई, लेकिन उसके कदमों से ज्यादा उसका मन लड़खड़ा रहा था।
उस रात वह देर तक जागती रही।
उसे बार-बार अभय की बातें याद आतीं।
क्या उसने सचमुच सब कुछ गलत समझा था?
क्या उसकी हर बात केवल उसका भ्रम थी?
अगर ऐसा था तो अभय ने उसे समय रहते रोका क्यों नहीं?
उसने उसकी उम्मीदों को बढ़ने क्यों दिया?
नंदिनी को अपने आकर्षण पर शर्म नहीं थी, लेकिन उसे इस बात का गहरा धक्का लगा था कि उसने जिस व्यक्ति पर विश्वास किया, उसने उसके विश्वास की कोई कीमत नहीं समझी।
उसने नौकरी छोड़ दी।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
कुछ दिनों बाद मोहल्ले में अचानक उसके बारे में तरह-तरह की बातें होने लगीं।
नंदिनी समझ गई कि अभय ने अपनी कहानी लोगों तक पहुँचा दी थी।
और उस कहानी में नंदिनी ही दोषी थी।
किसी ने उससे नहीं पूछा कि उसकी तरफ की सच्चाई क्या थी।
किसी ने यह नहीं पूछा कि उसने क्या समझा था।
किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि आखिर वह उस स्थिति तक पहुँची कैसे।
बस उसे गलत ठहरा दिया गया।
नंदिनी अपने कमरे में जाकर बैठ गई।
उस दिन उसकी आँखों में आँसू थे, मगर उससे भी ज्यादा भीतर एक सवाल था—
“जिसे मैंने अपना विश्वास दिया था, उसने मेरे विश्वास को ही मेरे खिलाफ क्यों इस्तेमाल किया?”
उसे पहली बार महसूस हुआ कि यह केवल प्रेम का भ्रम टूटना नहीं था।
यह विश्वासघात था।
उसने अभय पर भरोसा किया था। उसके शब्दों को सच माना था। उसकी कही बातों को अपने मन में जगह दी थी। और जब उसे लगा कि अब शायद वह अपनी भावनाओं को समझ पाएगी, उसी व्यक्ति ने पीछे हटकर सारी जिम्मेदारी उसके सिर डाल दी।
नंदिनी कई दिनों तक स्वयं को दोष देती रही।
कभी उसे लगता—गलती मेरी थी, मुझे पहले ही पूछ लेना चाहिए था।
कभी लगता—मुझे किसी पर इतना विश्वास करना ही नहीं चाहिए था।
फिर माँ की एक बात उसके मन में गूँजती—
“बेटी, किसी पर विश्वास करना कमजोरी नहीं है। लेकिन अगर कोई तुम्हारे विश्वास का गलत फायदा उठाए, तो उसकी गलती का बोझ जिंदगी भर अपने सिर पर मत रखना।”
धीरे-धीरे नंदिनी ने स्वयं को संभालना शुरू किया।
समय बीता।
कुछ महीनों बाद उसके लिए विवेक का रिश्ता आया। विवेक शांत और समझदार स्वभाव का था। पहली मुलाकात में उसने नंदिनी से कोई बड़ी-बड़ी बातें नहीं कीं।
उसने केवल इतना कहा,
“किसी भी रिश्ते में सबसे जरूरी चीज यह है कि दोनों लोग एक-दूसरे से सच बोल सकें और बिना डर अपनी बात कह सकें।”
नंदिनी चुप रही।
लेकिन उसके भीतर जैसे कोई बंद दरवाजा धीरे-धीरे खुल गया।
विवेक के साथ विवाह के बाद उसे पहली बार समझ आया कि प्रेम केवल मीठी बातें करने का नाम नहीं है। प्रेम में स्पष्टता होती है, सम्मान होता है और सबसे बढ़कर विश्वास की जिम्मेदारी होती है।
समय के साथ नंदिनी अपने पुराने अनुभव से बाहर निकल आई।
एक दिन वह आईने के सामने खड़ी थी। उसने लेंस निकालकर फिर अपना चश्मा पहन लिया।
वह खुद को देखकर मुस्कराई।
अब उसे किसी की नजर में सुंदर दिखने की जरूरत महसूस नहीं होती थी।
उसने अपने अतीत को भुलाया नहीं था, लेकिन उससे सीख ली थी।
उसे समझ आ गया था कि हर आकर्षण प्रेम नहीं होता और हर मीठी बात विश्वास के योग्य नहीं होती।
लेकिन उससे भी बड़ी बात उसने यह सीखी थी कि किसी का विश्वास तोड़ देना केवल एक रिश्ते को नहीं तोड़ता—कभी-कभी सामने वाले के अपने ऊपर से विश्वास को भी हिला देता है।
नंदिनी ने उस टूटे हुए विश्वास को फिर से जोड़ा।
इस बार किसी और के सहारे नहीं, अपने भीतर के भरोसे से।
और तब उसे लगा—अभय ने उससे जो छीना था, वह केवल उसका विश्वास था; लेकिन जिंदगी ने उसे उससे कहीं अधिक मूल्यवान चीज लौटा दी थी—अपने फैसलों पर विश्वास।
स्वरचित, मौलिक व अप्रकाशित रचना,
लक्ष्मी कनोडिया ‘अनिका’
खुर्जा, उत्तर प्रदेश